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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

३ आल्हखण्ड । ११८
झूटि सुमिरनी गे देवन के शाखा सुनो शूरमनक्यार ॥
ब्याह बखानों मैं आल्हाका होई तहाँ भयानक मार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
नैनागढ़ का जो महराजा साजा सबै भांति कर्त्तार ॥
राजा इन्दर का बरदानी औ नैपाली नाम उदार १
तिन घर कन्या इक पैदा भै सबविधि रूप शीलगुणखान ॥
पढ़िकै विद्या सब जादूकी कछुदिनबाद भई फिरिज्वान २
संगसहेलिन के खेलति भय सुनवाँ कही तासुका नाम ॥
खेल लरिकई को जाहिर है लरिका खेलैं चारिहूयाम ३
खेलत खेलत फुलबगिया गईं सब मिलि करैं फूलनकी मार ॥
कटहर बड़हर त्यहि बगिया में कहुँ कहुँ फूलिरही कचनार ४
उठै सुगन्धे कहुँ चन्दन की कतहूँ कदलिन खड़ी कतार ॥
गुम्मज सोहैं मोमशिरिन के कहुँ कहुँ फुलीं चमेलीडार ५
बेला फूले अलबेला कहुँ खिन्निन लता गई बहुछाय ॥
हर्र बहेरा साँखो बिरवा सीधे चले उपर को जायँ ६
बरगद फैले हैं नीचे को फैले भूमि रहे नियराय ॥
जैसे सम्पति सज्जन पावैं नीचे शीश झुकावत जायँ ७
शीशम जानो तुम नीचनको आधे सरग फरहरा खायँ ॥
चलै कुल्हाड़ा जब नीचेते गिरिकै टूक टूक हैजाएँ ८
को गति वरणै तहँ अधमनकै सोहैं करिल रूपते भाय ॥
ताल तमालन कै गिनतीना कदमन गई सघनता छाय ६
फुली नेवारी अब अगस्त्य हैं आमनडार कैलिया बोल ॥
सोहैं अशोकन के बिरवा भल तीनों तहाँ बयारी डोल १०
गूलर जामुन पाकर पीपर कोनन खड़े वृक्ष सरदार ॥