अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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को जूँ तक न रेंगी, इसकी धृष्टता देखकर बीरबल एक दम
खिसला गया और एक सिपाही को तुरत आज्ञा दी—"इस
झूठे को अभी सौ कोड़े लगावो।" सिपाही कोड़ा लेकर
मारने को उद्यत हुआ, इस बीच ब्योपारी का लड़का फिर
बोल उठा-"वाह पिताजी ! अभी उस दिन तो आप स्वयं
कह रहे थे कि इस महाजन का मुझे पाँच सौ का ऋण
चुकाना है, परन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं है इस समय
रुपये मेरे पास मौजूद हैं, किसी दिन चुका दूँगा। तब
आप उन रुपयों को इसे क्यों नहीं दे देते ?" लड़के की
सभ्यता देखकर बाप ने हार मानली और बीरबल के सामने
उन रुपयों को चुका देना स्वीकार किया। किसी ने सत्य
कहा है-"मार के आगे भूत भागता है।" न सौ कोड़े की
नौबत आती न रुपया बरामद होता ।
बीरबल ने तत्क्षण मुद्दई के रुपयों को दिलवा दिया और
प्रतिवादी (मुद्दालेह) को सजा देकर रुपया मारने के अपराध
में जेल भेज दिया। मुद्दई अपना धन पाकर बड़ा हर्षित
हुआ और बीरबल के न्याय की भूरि भूरि प्रशंसा करने
लगा। फिर बीरबल अन्य ब्योपारियों को चिताकर
बोला-"यहाँ पर आप लोग अधिकतर ब्योपारी ही उपस्थित
हैं, सबको उचित है की ईमानदारी का सौदा करें, बेइ-
मानी करने के पहले तो भला मालूम होता है, परन्तु
उसका परिणाम बुरा निकलता है। यह लड़का अभी तक
बड़ा ईमानदार है, यदि इसको बुरों की सुहबत न होगी और
बापका असर न आयेगा, तो आगे चलकर इसका ब्योपार