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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 292 में से

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पृष्ठ 69

५५ अकबर बीरबल विनोद
से पूछा-"क्या तुम मुँहर लेकर आये हो ?" "जी हाँ !"
कहता हुआ लड़का पिता के सामने ही मुहर को बीरबल के
हवाले किया । बीरबल ने कहा- "वाह, क्या खूब, यह तो एकही
मुँहर है और तुम्हारा पिता बतलाता था कि उस घी के कुप्पे
से इसी तरह की चार मुँहरें निकली हैं।"
लड़का बाप की तरफ देखकर बोला- "पिताजी ! चार
मोहरें कब निकली थीं, आपने तो मुझको यही एक मुहर
दिया था न ।" पिता इशारे से पुत्रको दबाते हुए बोला-
"भला यह तू क्या कहता है; कुप्पे से कब मुहर निकली थी?"
लड़का बिचारा भला अपने बाप की मंशा क्या जानता था,
वह विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-"क्यों पिताजी ! जब घी का
कुप्पा तपाया जा रहा था तो उसमें से एकही अशर्फी निकाली
थी न।" बाप बोला- "लोग अपने ही से हारते हैं।" फिर
गुस्सा मन में मार कर कहा- "तू इतना बड़ा हुआ परन्तु
अभी तक तुझ में किसी बात की समझ न आई, भला तू
मेरे व्योपार को कैसे कायम रक्खेगा ?" इसी तरह बाप बेटों
में कुछ देर तक गपड़चौथ होती रही । तब बीरबल बोला-
"यह तुम्हारा घरू चरखा फिर चलता रहेगा अब साफ २
बयान करो कि तुम्हें मुद्दई का रुपया देना मंजूर है वा नहीं ?
बीरबल की बात का मुद्दालेह ने कुछ उत्तर नहीं दिया।
तब भीतर से चिढ़कर वह बोला-"तू अब पट्टी पढ़ाकर मुझे
धोखा नहीं दे सकता । जब एक मुहर के लिये ईमान
छोड़ रहा है तो भला पाँच सौ की गठरी कब न दबाना
चाहेगा।" बीरबल तो इतना कह गया, परन्तु व्योपारी