ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३८ [ सातवीं पञ्चिका
विश्वामित्र ने उनको शाप दिया, "तुम्हारी संतान अभक्ष्य
वाली होगी"। इस प्रकार अन्ध्र, पुण्ड्र, शबर, पुलिंद आदि दस्यु
लोग विश्वामित्र की औलाद हैं। लेकिन मधुच्छन्दा और
उसके पचास भाइयों ने कहा, "हमारे पिता जी जो कुछ कहेंगे
हम उसी को मानेंगे। हम तुझको ज्येष्ठ मानते हैं। और हम
तेरा अनुसरण करेंगे"। विश्वामित्र इस उत्तर से प्रसन्न हुआ
और उसने इस मन्त्रों से इन लड़कों की स्तुति की" ।
"मेरे पुत्रो, तुम पशु और सन्तान से फूलो फलो। तुमने
मेरा कहा मानकर मुझे पुत्र वाला बनाया"।
"हे गाधि के पुत्रो तुम पुत्रवान् होगे और देवरात के
संरक्षण में फूलो फलोगे। वह तुमको सत्य के मार्ग पर ले
चलेगा"।
'हे कुशिक के पुत्रो, वीर देवरात के अनुचर बनो। यह
तुम्हारा पथप्रदर्शक होगा और हमारी विद्या का वारिस
होगा"।
"विश्वामित्र के सब सच्चे पुत्र और गाथी के पौत्र जो
देवरात के साथ हुये उनको धन, यश, और कीर्त्ति की प्राप्ति
हुई"।
इस प्रकार देवरात दो ऋषियों का वारिस हुआ। जह्नु के
वंश की सम्पत्ति का और गाथि के वंश की विद्या का।
यह सौ से अधिक ऋचाओं में शुनःशेप का आख्यान है।
होता स्वर्ण के आसन पर बैठ कर अभिषेक के पश्चात्
राजा को इसका उपदेश करता है। और अध्वर्यु भी स्वर्ण के
आसन पर बैठता है। क्योंकि स्वर्ण यश है, इससे राजा को
यश प्राप्त होता है। होता जब कोई ऋचा पढ़ता है तो अध्वर्यु
कहता है 'ओ३म्' और जब होता गाथा कहता है तो अध्वर्यु