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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

३०२ [ पाँचवीं पञ्चिका
इस सूक्त का छन्द पंक्ति है। और पाँच पद हैं। यह पाँचवें
दिन का रूप है।
'इन्द्रो मदाय वावृधे' ( १।८१ )
इसमें 'मद' है, पंक्ति छन्द है। पाँच पद हैं। यह पाँचवें
दिन का रूप है।
सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः। सत्रा
वाजानामभवो विभक्ता यद् देवेषु धारयथा असुर्यम् ॥
( ऋ० ६।३६।१ )
इसमें 'मद' है और यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके स्थिर
पदों द्वारा यह सत्रन को ठीक स्थान पर रखता है और गिरने
नहीं देता।
नीचे तृच पर्यास है :-
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे। स वृषा वृषभो भुवत् ॥
इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः। द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः ॥
गिरा वज्रो न सम्भृतः सबलो अनपच्युतः। ववक्ष ऋष्वो अस्तृतः ॥
( ऋ० ८।९३।७-९ )
यहाँ "सवृषा वृषभो भुवत्" में पशु का रूप है। यह पांचवें
दिन का रूप है।
यह गायत्री छन्द में है। त्र्यहं के मध्य सवन की वाहक
गायत्री हैं। निविद् उसी छन्द में रक्खा जाता है जो वाहक
होता है, इसलिये निविद् को गायत्री में रक्खा है।
वैश्वदेव शस्त्र की प्रतिपद है :-
तत् सवितुर्वृणीमहे......( ५।८२।१)
और अनुचर है
अद्या नो देव सवितः ( ५।८२।४ )
यह रथन्तर दिन का रूप है जो पांचवां दिन है और यह
पांचवें दिन का रूप है।

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