ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] २८५
त्वं सोम क्रतुभिः ( १।६१।२ )
पिन्वन्त्यपो ( ऋ० १।६४।६ )
मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :-
नकिः सुदासो रथं पर्यासं न रीरमत् । इन्द्रो यस्याविता यस्य
मरुतो गमत्स गोमति व्रजे ॥ ( ऋ० ७।३२।१० )
इसमें 'पर्यस्त' है, यह तीसरे दिन का रूप है ।
मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :-
त्रयर्यमा मनुषो देवतात ( ऋ० ५।२९ )
इसमें 'त्रि' शब्द है । यह तीसरे दिन का रूप है ।
तीसरे दिन के वैरूप पृष्ठ यह हैं :-
यद्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्सहस्रं
सूर्या अनु न जात मष्ट रोदसी ॥
आ पप्रथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा । अस्माँ
अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिञ् चित्राभिरूतिभिः ॥ ( ऋ० ८।७०।५-६ )
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्धिधिषेय रदावसो
न पापत्वाय रासीय ॥
शिक्षेयमिन् महयते दिवे दिवे राय आ कुहचिद्विदे । नहि त्वदन्य-
न्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥ ( ऋ० ७।३२।१८-१६ )
यह रथन्तर दिन है । यह तीसरे दिन का रूप है ।
धाय्य वही हैं :- यद्वावान इत्यादि । "अभित्वा शूर
नोनुम" ( ऋ० ७।३२।२२-२३ ) पढ़कर इस दिन की योनि को
फेर देता है । क्योंकि यह दिन क्रम के अनुसार रथन्तर दिन
है । और रथंतर साम इसकी योनि है ।
साम प्रगाथ यह है :-
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्यच्छ मघवद्भ्यश्च
मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥