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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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२५६ [ चौथी पञ्चिका
स्वर्ग लोक को जीत लेंगे परन्तु इस लोक में देर तक न ठहर
सकेंगे ।
त्रिष्टुभ् और जगती मिथुन के लिये मिला दिये जाते हैं,
पशु मिथुन हैं, छन्द पशु हैं । पशुओं की प्राप्ति के लिये ऐसा
किया जाता है । (७)
२१—जैसे पुरुष होता है वैसे ही विषुवान् सत्र है । इसका
पहला आधा दाहिने बाजू के समान है और पिछला आधा
बायें बाजू के समान । इसीलिये ( विषुवान् के बाद के छः मास
के कृत्य को ) उत्तर अर्थात् पिछला भाग कहते हैं ।
विषुवान् उस सिर के समान है जिसके दोनों बाजू बराबर
हों । पुरुष टुकड़ों-टुकड़ों से बना है । इसलिये ही सिर के मध्य
में एक जोड़ होता है ।
इस पर कहते हैं कि इस दिन विषुवत् का पाठ होना
चाहिये । यह विषुवान् उक्थ्यों का उक्थ है । विषुवान् विषवान्
( भूमध्य रेखा ) के समान है । ऐसा करने से विषुवान् के समान
हो जाता है और श्रेष्ठता को प्राप्त होता है ।
परन्तु इसको मानना नहीं चाहिये । साल भर तक इसका
पाठ होना चाहिये । यह शस्त्र वीर्य है । ऐसा करने से यजमान
साल भर तक वीर्यवान रहते हैं ।
जो बीज पाँच या छः मास में उग आवें वे यदि समय के
पहले ही उग आवें तो उनको कोई भोग नहीं सकता । इसी
तरह जो बीज दस मास में या एक साल में उत्पन्न होते हैं
उनको भोगते हैं ।
इसलिये विषुवान् शस्त्र को साल भर पढ़ना चाहिये । यह
संवत्सर ही है । जो इसको पाते हैं वह संवत्सर को प्राप्त
करते हैं ।
इसके द्वारा साल भर के पाप नष्ट हो जाते हैं ।