ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०८ [ तीसरी पञ्चिका
कहावत है कि अच्छा सधा हुआ (सुहित) घोड़ा सवार
को आराम पहुँचाता है (सुधा)। यही हाल गायत्री का है।
गायत्री कहीं ठहरती नहीं है, ऊपर चली ही जाती है और
यजमान को स्वर्ग में पहुँचा देती है। अग्निष्टोम भी वैसा ही
है। वह भी बीच में नहीं ठहरता। ऊपर चला ही जाता है और
यजमान को स्वर्ग में पहुँचा देता है।
अग्निष्टोम संवत्सर है। संवत्सर में २४ पक्ष होते हैं और
अग्निष्टोम में २४ स्तोत्र और शस्त्र होते हैं। जैसे सभी जल
सागर को जाते हैं, इसी प्रकार सभी यज्ञ अग्निष्टोम में मिल
जाते हैं। (१)
४०—अगर दीक्षणीय इष्टि पूरी-पूरी हो गई तो और जो
कोई इष्टियां होती हैं सब अग्निष्टोम में आ जाती हैं। जब
वह इला कहता है तो इला में सभी पाकयज्ञ आ जाते हैं। वे
सब अग्निष्टोम में जाकर मिल जाते हैं।
सायं प्रातः अग्निहोत्र करता है। सायं प्रातः व्रत करता है।
स्वाहा कह कर अग्निहोत्र करता है। स्वाहा कह कर व्रत करता
है। स्वाहा युक्त अग्निहोत्र अग्निष्टोम में मिल जाता है।
प्रायणीय इष्टि में १५ सामिधेनियां दी जाती हैं। दर्शपूर्ण-
मास यज्ञ में भी १५ ही दी जाती हैं। इस प्रकार दर्शपूर्णमास
प्रायणीय में शामिल हैं। इस प्रकार दर्श पूर्णमास भी अग्निष्टोम
में शामिल है।
सोमराजा को खरीदते हैं। सोमराजा औषध है। बीमार
को औषध से ही चंगा करते हैं। सोम की खरीद में अन्य सब
औषध भी आ जाती हैं। इसलिये सब औषध भी अग्निष्टोम
में शामिल हैं।
आतिथ्य इष्टि में अग्नि का मंथन करते हैं। चातुर्मास्य