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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 592 में से

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पृष्ठ 221

चौथा अध्याय
३९—देव विजय पाने के प्रयोजन से असुरों से लड़ने गये ।
अग्नि ने साथ देना न चाहा । देवों ने उससे कहा, “तू भी आ ।
तू हममें से एक है ।” अग्नि बोला, “बिना स्तुति कराये मैं नहीं
जाऊँगा । मेरी स्तुति करो ।” उन्होंने कहा “अच्छा ।” उन्होंने
उठ कर उसके सामने खड़े होकर उसकी स्तुति की । स्तुति किया
जाकर वह उनके साथ चल दिया । और तीन श्रेणी बना कर
उसने असुरों पर तीन पंक्तियों में विजय के लिये आक्रमण
किया ।
तीन श्रेणियां तीन छन्द हैं (गायत्री, त्रिष्टुभ् और जगती) ।
तीन पंक्तियाँ हैं तीन सवन (प्रातःसवन, मध्य सवन और तृतीय
सवन) । इससे असुरों को आशा से अधिक पराजय हुई ।
देवों ने असुरों को हरा दिया । जो इस रहस्य को समझता है
उसका पापी शत्रु स्वयं ही नष्ट हो जाता है ।
अग्निष्टोम गायत्री ही है । गायत्री में चौबीस अक्षर होते हैं
और अग्निष्टोम में चौबीस स्तोत्र* और शस्त्र हैं ।
*सामगों के १२ स्तोत्र और होताओं के १२ शस्त्र । एक-एक
स्तोत्र के लिये एक-एक शस्त्र । १२ शस्त्र यह हैं:—प्रातः सवन के पाँच,
अर्थात् आज्य, प्रउग, मैत्रावरुण शस्त्र, ब्राह्मणांच्छांसि, और अच्छावाक् ।
दोपहर के सवन के पाँच अर्थात् मरुत्वतीय, निष्केवल्य, मैत्रावरुण,
ब्राह्मणांच्छांसि, अच्छावाक् । सायं सवन के दो वैश्वदेव और अग्नि-
मारुत शस्त्र ।
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