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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

चतुर्थोऽध्यायः (15)
अथ चतुर्थोऽध्यायः
पार्वत्युवाच
योगीन्द्रं वन्द्यचरणद्वन्द्वानन्दैकलक्षण।
कथमेनमुपास्त्यैव मुक्तिं सर्वेऽपि भेजिरे।।1।।
तदेतद् ब्रूहि देवेश यद्यस्ति करुणा मयि।
पार्वती बोलीं- हे देवेश! आपके चरणकमल की वन्दना सभी करते हैं और
आप एकमात्र आनन्दस्वरूप हैं। यदि मेरे ऊपर करुणा हो, तो कृपा कर यह
बतलाइये कि योगियों के राजा श्रीराम की कैसी उपासना कर सब लोगों ने मुक्ति
पायी थी।
ईश्वर उवाच
हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यमनघे शृणु।।2।।
यज्ज्ञात्वा मुच्यते मोहाद् दौर्भाग्यव्याधिसाध्वसात्।
भद्रे तदभिधास्यामि तत्सारग्राहिणी भव।।3।।
भगवान् शिव ने कहा- हे निष्कलुष देवि! हिरण्यगर्भ भगवान् विष्णु का जो
सिद्धान्त है, उसका रहस्य सुनो। इसे जानकर दुर्भाग्य और व्याधियों को मिटाते
हुए लोग संसार के मोह का भी त्याग कर देते हैं। हे भद्रे! मैं वह रहस्य बतला रहा
हूँ; उसके मूलतत्त्व को ग्रहण करो।
पूर्वं ब्रह्मा तपस्तेपे कल्पकोटिशतत्रयम्।
मुनीन्द्रैर्बहुभिः सार्द्धं दुर्द्धर्षानशनव्रतम्।।4।।
प्राचीन काल में ब्रह्मा ने तीन सौ करोड़ वर्ष तक निराहार रहकर बहुत
सारे मुनिश्रेष्ठ के साथ तपस्या की।
पुरस्कृत्याग्निमध्यस्थस्तदाराधनतत्परः ।
आदरातिशयेनास्य नैरन्तर्येर्चनादिना।।5।।
अग्नि के मध्य में रहकर और विष्णु को समक्ष में रखकर आदरपूर्वक
लगातार पूजा-अर्चना करते हुए वे आराधना करते रहे।
चिराय देवदेवोऽपि प्रत्यक्षमभवत्तदा।
किञ्च पुण्यातिरेकेण सर्वेषां तस्य च प्रिये।।6।।

(16) अगस्त्य-संहिता
बहुत दिनों के बाद पुण्य की वृद्धि के कारण ब्रह्मा तथा अन्य सभी मुनियों
के सामने देवों के स्वामी भगवान् विष्णु प्रकट हुए।
नवनीलाम्बुदश्यामः सर्वाभरणभूषितः।
शङ्खचक्रगदापद्मजटामुकुटशोभितः ।।7।।
भगवान् नवीन एवं नीले मेघ के समान श्यामल वर्ण के थे, उनके शरीर
पर सभी गहने शोभित हो रहे थे तथा शंख, चक्र गदा, कमल, जटा और मुकुट से
वे सुशोभित थे।
किरीटहारकेयूररत्नकुण्डलमण्डितः ।
संतप्तकाञ्चनप्रख्यपीतवासोयुगावृतः ।।8।।
मुकुट, हार, बाजूबन्द, रत्न के कुण्डल से वे विभूषित थे और तपे हुए सोने
के समान पीले रंग के जोड़े वस्त्र उनके शरीर पर थे।
तेजोमयः सोमसूर्य्यविद्युदुल्काग्निकोटयः ।
मिलित्वाविर्भवन्तीव प्रादुरासीत्पुरः प्रभुः ।।9।।
भगवान् इस प्रकार सामने प्रकट हुए जैसे करोड़ों चन्द्रमा, सूर्य, बिजली,
उल्का और अग्नि एक साथ मिलकर प्रकट हुए हों।
स्तम्भीभूय तदा ब्रह्मा क्षणं तस्थौ विमोहितः ।
तुष्टाव मुनिभिः सार्द्धं प्रणम्य च पुनः पुनः।। 10।।
कुछ देर तक तो ब्रह्मा घबराकर खम्भे की तरह ठिठक गये। पुनः मुनियों
के साथ बार बार उन्हें प्रणाम कर स्तुति करने लगे।
धन्योऽस्मि कृतकृत्योस्मि कृतार्थोस्मीह बन्धुभिः।
प्रसन्नोऽसीह भगवन् जीवितं सफलं मम ।।11।।
हे भगवन्! आज मैं अपने बन्धुओं के साथ धन्य हो गया; आज मेरे सभी
कार्य सम्पन्न हो गये। हे भगवन्! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं, इससे मेरा जीवन सफल
हो गया।
कथं स्तोष्यामि देवेश भगवन्निति चिन्तयन्।
ऋग्यजुःसामवेदैश्च शास्त्रैर्बहुभिरादरात् ।।12।।
साङ्गैर्मन्वादिभिर्धर्मप्रतिपादनतत्परैः ।
तुष्टावेश्वरमभ्यर्च्य सन्तुष्टो मुनिभिः सह।।13।।
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चतुर्थोऽध्यायः (17)
'हे देवेश! मैं कैसे आपकी स्तुति करूँगा' यह सोचते हुए मुनियों के साथ
सन्तुष्ट होकर ब्रह्मा ने वेदांग सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अन्य अनेक शास्त्र,
मनुस्मृति आदि धर्म को बखानने वाले शास्त्रों से भगवान् की अर्चना कर उनकी
स्तुति की-
त्वमेव विश्वतश्चक्षुर्विश्वतोमुख उच्यसे।
विश्वतोबाहुरेकः सन् विश्वतः स्यात्तथा परः।।14।।
जनयन् भूर्भुवर्लोकौ स्वर्लोकं सर्वशासकः।
अक्षिभ्यामपि बाहुभ्यां कर्णाभ्यां भुवनत्रयम् ।।15।।
पद्भ्यां च नासिकाभ्यां¹ च सर्वं सर्वत्र पश्यसि।
समाधत्से शृणोष्येतत् सर्वं गच्छसि सर्वकृत्।।16।।
जिघ्रस्येवं न ते किञ्चिदविज्ञातं प्रभोस्त्विह।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्वमेव ननु केशवः।।17।।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
पृथिव्यप्तेजसां रूपं मरुदाकाशयोरपि।।18।।
कार्यं कर्ता कृतिर्देव कारणं केवलं परम्।
अणोरणीयान् महतो महीयान् मध्यतः स्वयंम्।।19।।
मध्योऽसि निर्विकल्पोऽसि कस्त्वं देवावगच्छति।
हे भगवन्! आपके नेत्र सभी दिशाओं में हैं; आपके मुख भी सभी दिशाओं
में हैं तथा आपकी बाहें भी सभी ओर फैली हुई हैं, फिर भी आप संसार से परे हैं।
आप दोनों आँखों, बाहुओं और कानों, पैरों और नासिकाओं से भूलोक, भुवर्लोक,
और स्वर्गलोक इन तीनों को उत्पन्न कर सब पर शासन करते हैं, सभी जगहों पर
सब कुछ देखते-सूँघते हैं; सब कुछ सुनकर उनका समाधान करते हैं और सारे
कार्य करते हैं। हे प्रभो! ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे आप जानते न हों। आप ही
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं तथा केशव भी आप ही हैं। पुरुष रूप में आपके हजारों
शिर हैं, हजारों नेत्र हैं तथा हजारों पैर हैं। हे देव!, पृथ्वी, जल, अग्नि के तथा
मरुत् और आकाश स्वरूप आप हैं। आप ही करने योग्य, करनेवाले, किये गये
पदार्थ तथा क्रिया के परम साधन भी आप ही हैं। हे देव! आप अणु से भी सूक्ष्म
और महत् से भी महान् हैं और उनके बीच में भी आप ही हैं; आपका विकल्प कोई
नहीं है; आपको भला कौन जान सकता है?'

  1. घ. पादाभ्यां नासिकाभ्यां च।

(18) अगस्त्य-संहिता

एवमेवादिबहुस्तोत्रैस्तुतः स परमेश्वरः ।।20।।
वैदिकैः कृपया विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत्।
इस प्रकार के वेदोक्त स्तोत्रों से जब ब्रह्मा ने भगवान् की स्तुति की, तब
विष्णु ने ब्रह्मा से कहा-
स्तुतस्तुष्टोऽस्मि ते ब्रह्मन् उग्रेण तपसाधुना।।21।।
वृणीष्व पदमिष्टं¹ ते दास्यामि कमलोद्भव।
इत्युक्तः सोऽब्रवीत् तेन विष्णुना प्रभविष्णुना।।22।।
'हे ब्रह्मा! मैं आपकी स्तुति और उग्र तपस्या से अब सन्तुष्ट हूँ। हे
कमलोद्भव! तुम्हे जो स्थान चाहिए वह माँगो; मैं तुम्हें दूँगा।' विष्णु के द्वारा इस
प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा बोले।
ब्रह्मोवाच
तुष्टोऽसि यदि देवेश दास्यं मे स्वीकरिष्यसि।
अभीष्टं देव देवेश यद्यस्ति करुणा मयि।।23।।
ब्रह्माजी बोले- हे देवेश! यदि आप सन्तुष्ट हैं और मेरे ऊपर यदि आपकी
करुणा है, तो मेरी इस दासता को स्वीकार करें, यह मैं चाहता हूँ।।
असौभाग्येन दारिद्र्यदुखेनाहं सुदुःखितः।।
एतेऽपि मुनयो देव माययात्यन्तदुःखिताः।।24।।
हे देव! मैं सुन्दर भाग्य से हीन तथा दरिद्रता के दुःख से दुःखी हूँ। ये
मुनिगण भी माया के फेर में अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं।
प्रतिभाति च दैवेन² सर्वमस्माकमीदृशम्।
किं करिष्यामि देवेश ब्रूहि मे पुरुषोत्तम।।25।।
हे पुरुषोत्तम! हमलोगों का सबकुछ इसी प्रकार से भाग्य के द्वारा प्रेरित
प्रतीत हो रहा है। ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ यह कहें।
कामक्रोधादिभिर्दुःखैर्दुष्टाः सर्वापि मम प्रजाः।
पूर्वार्जितैर्विशेषेण न कश्चिदवशिष्यते।।26।।
पूर्वजन्म में अर्जित कर्म से तथा काम, क्रोध आदि के दुःख से मेरी सारी
प्रजा दोषग्रस्त हो गयी है। ऐसा कोई नहीं है, जो इन दोषों से अछूता हो।

  1. क. यदभीष्टं। 2.ख. वेदेन।

चतुर्थोऽध्यायः (19)
— — — — — — — — — — — — — — — — — —
को वोपायो मनुष्याणां भक्तानां भक्तवत्सल ।
एतच्छरीरपातान्ते नः परं मुक्तिसिद्धये ।।२७।।
हे भक्तवत्सल भगवान्! मनुष्यों और भक्तों के लिए ऐसा कौन सा उपाय
है, जिससे हमें इस शरीर का अन्त होने पर मुक्ति मिले।
इहाप्यस्माकमैश्वर्यं वै दुष्टेष्टार्थसिद्धये¹।
एवमुक्तः स देवोऽस्मै भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ।।२८।।
किञ्चिद् विचार्य भगवान्² षडक्षरमुपादिशत् ।
स्वर्ग में भी हम देवों का ऐश्वर्य दोषपूर्ण इच्छित वस्तुओं की सिद्धि के लिए
हैं।” ऐसा कहने पर भगवान् ने कुछ सोचकर भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए
छह अक्षरों वाले मन्त्र का उपदेश किया।
एकैकं वर्णविन्यासं क्रमाच्चाङ्गानि षट् पुनः³।।२९।।
तद्विधिं विधये प्रादात् पञ्चमन्त्राक्षराणि च।
रहस्यं देवदेवोऽपि तं मिथः समबोधयत् ।।३०।।
हे मुनि! भगवान् ने भी उस षडक्षर मन्त्र एक एक कर वर्णविन्यास, क्रमशः
न्यास आदि छह अङ्ग उसकी विधि तथा रहस्य बतला दिया तथा पंचाक्षर मन्त्र का
भी उपदेश किया।
तस्य तत्प्राप्तिमात्रेण तदानीमेव तत्फलम् ।
सर्वाधिपत्यं सर्वज्ञं भावोऽप्यस्याभवन् तदा ।।३१।।
ब्रह्मा ने भी ज्यों ही उसे प्राप्त किया, उस मन्त्र का फल तत्काल ही मिल
गया। ब्रह्मा उसी क्षण सबके स्वामी बन गये तथा सारा ज्ञान उन्हें मिल गया।
किं चास्य भगवत्त्वं च यदिष्टं तदभूदपि।
सर्वेश्वरप्रसादेन तपसा किं न लभ्यते ।।३२।।
इतना ही नहीं, ब्रह्मा जो चाह रहे थे, वह उन्हें मिल गया; वे भगवान् भी
हो गये। भला सबके स्वामी भगवान् विष्णु की कृपा तथा तपस्या से क्या कुछ नहीं
मिल जाता!
मुनीनामपि सर्वेषां तदा ब्रह्मा तदाज्ञया।
उपादिदेश तत्सर्वं ततस्तु विष्णुरब्रवीत् ।।३३।।

  1. घ. वैदुष्ट्येष्टार्थसिद्धये। 2. घ. कृपया। 3. क. षण्मुने।
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(20) अगस्त्य-संहिता
तब भगवान् विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सभी मुनियों को इस मन्त्र का
उपदेश किया। तब विष्णु बोले-
ऋषिर्भावास्य मन्त्रस्य त्वं ब्रह्मन् सर्वमन्त्रवित्।
रामोऽहं देवता छन्दो गायत्री छन्दसां परा।।३४।।
हे ब्रह्मा! आप मन्त्रों के ज्ञाता हैं, अतः इस मन्त्र के ऋषि आप हों। मैं राम
इस मन्त्र का देवता हूँ तथा छन्दों में श्रेष्ठ गायत्री इस मन्त्र का छन्द होगा।
मान्तो¹ यान्तो भवेद्बीजं सर्वमाद्यफलप्रदम्।²
नमः शक्तितयोद्दिष्टो नमोऽन्तो मन्त्रनायकः।।३५।।
मकार (राम्) एवं यकार (रामाय) से अन्त होनेवाले इसके बीज-मन्त्र हों
तथा ‘नमः’ इस मन्त्र की शक्ति हो। इस प्रकार ‘नमः’ से अन्त होनेवाला यह
मन्त्रों में नायक बने।
रामाय मध्यमो ब्रह्मन् तस्मै सर्वं निवेदयेत्।
इह भुक्तिश्च मुक्तिश्च देहान्ते संभविष्यति।।३६।।
हे ब्रह्मा! इस मन्त्र के बीच में ‘रामाय’ यह पद रहेगा और उसी राम को
यह मन्त्र निवेदित करें। इससे संसार में भोग तथा देहान्त होने पर मोक्ष मिलेगा।
यदन्यदप्यभीष्टं स्यात् तत्प्रसादात् प्रजायते।
अनुतिष्ठादरेणैव निरन्तरमनन्यधीः।।३७।।
इसके अतिरिक्त भी यदि कोई इच्छा हो, तो श्रीराम की कृपा से पूरी
होगी। एकाग्रचित्त होकर लगातार इस मन्त्र का अनुष्ठान करें।
चिरं मद्गतचित्तस्तु मामेवाराधयेच्चिरम्।
मामेव मनसा ध्यायन् मामेवैष्यसि नान्यथा।।३८।।
बहुत दिनों तक मुझमें मन लगाकर, मेरा ही ध्यान करते हुए जो मेरी
उपासना करेंगे, वे मुझे ही पा लेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
तत्र तदेतद् विस्तार्य शिष्येभ्यो ब्रूहि गौरवम्।
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तत्रैव कमलेक्षणः।।३९।।
हे ब्रह्मा! संसार में इसीका विस्तार कर अपने शिष्यों से इस मन्त्र की
गरिमा का बखान करें।" ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान
हो गये।

  1. घ. सान्तो। 2. ख. भवेद्बीजमाद्यमाद्यफलप्रदम्।

पञ्चमोऽध्यायः (21)
प्रजापतिश्च भगवान् मुनिभिः सार्द्धमन्वहम् ।
अन्वतिष्ठद् विधानेन निक्षिप्याज्ञां सिरस्यथ ।। ४० ।।
तब भगवान् प्रजापति ब्रह्मा ने विष्णु की आज्ञा सिर पर चढ़ाकर मुनियों
के साथ विधानपूर्वक इस मन्त्र का अनुष्ठान किया।
ब्रह्मा तदानीं सर्वेषामुपदेष्टा बभूव ह।
आर्ये तवापि तेनैव सर्वाभीष्टं भविष्यति ।। ४१ ।।
हे देवी पार्वती! तब ब्रह्मा सबके लिए इस मन्त्र के उपदेशक हुए। इसी मन्त्र
से तुम्हारी भी सभी कामनाओं की पूर्ति होगी।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये ब्रह्मणा षडक्षरमन्त्रग्रहणम् नाम
चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।।
अथ पञ्चमोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
पुरातन पुराणज्ञ सर्वाख्यानार्थवित्तम।
ततः किमकरोद् विप्रश्रेष्ठागस्त्याम्बिका तदा ।। २ ।।
ईश्वरः केन रूपेण तामेतदवबोधयत्¹ ।
सुतीक्ष्ण बोले- हे विप्रों में श्रेष्ठ अगस्त्य! आप तो प्राचीन काल से हैं,
पुराणों के ज्ञाता हैं, सभी कथाओं के प्रयोजनों को आप भलीभाँति जानते हैं।
भगवान् शंकर ने इसके बाद किस प्रकार पार्वती को समझाया, यह कहें।
अगस्त्य उवाच
तदादि हृदये रामं निधाय कमलेक्षणा ।। ३ ।।
मुक्तये निश्चिनोति स्म तमनन्यपरायणा ।
अगस्त्य ने कहा- इस दिन से पार्वती श्रीराम में एकाग्रचित्त होकर अपने
हृदय में बसाकर मुक्ति के लिए मन बनाने लगी।
हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यश्रवणात् परम् ।। ४ ।।
कामादिग्रस्तता तस्याश्चिरमेव न्यवर्तत¹ ।

  1. घ. तामेव तदबोधयत्।

(22) अगस्त्य-संहिता

पार्वती के मन में काम आदि जो घर कर गये थे, हिरण्यगर्भ के सिद्धान्त
का रहस्य सुनने के बाद वे सब मिट गये।
ईश्वरस्तां प्रियां सम्यग्ज्ञानमात्रेच्छया स्थिताम् ।।५।।
न्यवर्त्तत ततो ज्ञात्वा संसारोच्छित्तिशङ्कया।
संसार के विनाश की आशंका से भगवान् शिव ने केवल ज्ञान की इच्छा
रखनेवाली पार्वती को रोक दिया।
तामब्रवीच्च भगवानीश्वरः सर्वरूपधृक् ।।६।।
मूलप्रकृतिरार्ये त्वं पुरुषोऽहं पुरातनः।
सभी रूपों को धारण करनेवाले भगवान् शिव ने कहा कि हे आर्ये! मैं
पुरातन पुरुष हूँ और तुम मूल प्रकृति हो।
कारणं जगदुत्पत्तेरावान्तदऽनवेक्षणम् ।।७।।
कुर्वहे स्यात्तदुच्छित्तिर्यदि किं तद्धितं तव।
कल्याणि मम किं तुल्यमावयोनं तु तत्परम् ।।८।।
हे कल्याणि! जगत् की उत्पत्ति के कारणस्वरूप हमदोनों हैं और हमदोनों
ही अन्त में (प्रलय-काल में) उसकी देखभाल छोड़ देते हैं, जिससे वह विनष्ट हो
जाता है। यदि हम इस संसार का विनाश कर देंगे (अर्थात् सभी प्राणियों को मोक्ष
मिल जाये तो संसार कैसे चलेगा) तो इससे तुम्हारा और मेरा क्या लाभ?
हमलोगों के समान या हमसे आगे भी कोई नहीं है।
कार्यं हि करणाभावे कुत्र सम्पद्यते वद।
आवयोः सम्भविष्यन्ति सतोः कल्याणि देवताः ।।९।।
हे आर्ये! कारण के अभाव कार्य कैसे होगा, यह तो कहो! हम दोनों के
अस्तित्व में रहने पर ही तो देवता भी उत्पन्न होंगे।
त्वत्प्रसादादिदं सर्वं न कदाचिद् गमिष्यति।
एवं च सति किं देवि सर्वं त्यक्तुमपेक्षसे ।।१०।।
न युक्तमेतत् किमपि त्यक्तुं² देव्यधुना त्वया।
तुम्हारी ही कृपा से तो यह सब है और कभी समाप्त भी नहीं होगा। इस
प्रकार क्या तुम सबकुछ छोड़ सकती हो! इसलिए हे देवी! इस समय सबकुछ छोड़
देना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।

  1. घ. व्यवर्तत। 2. घ. वक्तुं।
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पञ्चमोऽध्यायः (23)
इत्युक्ता साब्रवीद्देवी नीलोत्पलनिरीक्षणा ।।11।।
प्राणनाथाधुना किं मे कर्त्तव्यमिति साब्रवीत् ।
इयं सद्वासना मत्तो नैवोच्छिन्ना¹ भवेत्प्रभो ।।12।।
कदाचिदपि देवेश त्वं तथानुगृहाण माम्² ।
तब इस प्रकार कही गयी पार्वती ने कहा- हे प्राणनाथ! मुझे क्या करना
चाहिए, जिससे मेरे मन में आपके प्रति जो आसक्ति है, वह मुझसे कभी अलग न
हो। हे देवेश! यह बतलाकर मेरे ऊपर अनुग्रह करें।
तथोक्तः सोऽब्रवीदेनां महीध्रतनयां पुनः ।।13।।
श्रीरामाराधनं देवि तदर्थं ³ प्रतिवासरम्।
इस प्रकार कहने पर भगवान् शिव ने हिमालय की पुत्री पार्वती से कहा-
'हे देवि! इसलिए प्रतिदिन श्रीराम की आराधना करो।'
आराधयोपकरणैरन्यथा मा कृथाः प्रिये ।।14।।
एतेनैवाभयं किञ्चिदिहामुत्र भविष्यति।
कलौ संकीर्त्तनेनैव सर्वाघौघं व्यपोहति ।।15।।
आराधनेन साङ्गेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः।
किं वक्तव्यं प्रिये सर्वं मनसा चिन्तितं यतः ।।16।।
सामग्रियों से ही आराधना करो, दूसरे प्रकार से नहीं। इसी से इस संसार
में और परलोक में अभय मिलेगा; क्योंकि कलियुग में संकीर्तन और चन्दन, फूल,
अक्षत आदि से आराधना करने से ही सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। हे
प्रिये! जब तुमने मन में ठान ही लिया है, तो और क्या कहूँ।
एवमाराधनेनैव भवत्येव च नान्यथा।
न गृही ज्ञानमात्रेण परत्रेह च मंगलम् ।।17।।
प्राप्नोति चन्द्रवदने दानहोमादिभिर्विना।
इस प्रकार की आराधना करने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है; क्योंकि जो
गृहस्थ है, वह केवल ज्ञान प्राप्त कर इस संसार में और परलोक में दान, होम आदि
के बिना मंगल नहीं पाता है।
गृहस्थो यदि दानानि दद्यान्न जुहुयादपि ।।18।।

  1. घ. नैवोत्सन्ना। 2. घ. वै। 3. घ. तदमूं।

(24) अगस्त्य-संहिता

पूजयेद् विधिना नैव कः कुर्यादितदन्वहम्¹।
गृहस्थ यदि प्रतिदिन दान न करे, होम नहीं करे और विधिपूर्वक पूजा
नहीं करे, तो भला कौन करेगा?
न ब्रह्मचारिणो दातुमधिकारोऽस्ति भामिनि ।।19।।
गृहिभ्योऽन्यत्र सर्वेभ्यः को वा दास्यत्यपेक्षितम् ।
नारण्यवासिनां शक्तिर्न ते सन्ति कलौ युगे ।।20
हे भामिनि! ब्रह्मचारी को दान करने का अधिकार नहीं है। तब गृहस्थ
को छोड़कर कौन सबको दान देगा? वन में रहनेवाले वानप्रस्थियों को तो इस
कलियुग में दान करने की शक्ति ही नहीं है।
²परिव्राज्ज्ञानमात्रेण दानहोमादिभिर्विना ।
सर्व्वदुःखपिशाचेभ्यो मुक्तो भवति नान्यथा ।।21।।
परिव्राडविरक्तश्च विरक्तश्च गृही तथा।
कुम्भीपाके निमज्जेते³ तावुभौ कमलानने ।।22।।
संन्यासी तो केवल ज्ञान प्राप्त कर ही दान होम आदि के बिना भी सभी
दुःख रूपी पिशाच से मुक्त पा लेते हैं, दूसरे प्रकार से नहीं। यदि संन्यासी संसार
में आसक्त हो और गृहस्थ के मन में वैराग्य हो, तो दोनों कुम्भीपाक नरक में जा
डूबते हैं।
पुण्यस्त्रियो गृहस्थाश्च मङ्गलैर्मङ्गलार्थिनः⁴ ।।23।।
पूजोपकरणैः कुर्य्युर्द्द्युर्दनानि चार्हणम् ।
चन्दनागरुकस्तूरीकर्पूरैश्चैव चम्पकैः ।।24।।
पञ्चामृताभिषेकैश्च पुष्पैस्तामरसैरपि।
पुष्पमालैश्च बहुभिर्दुर्वाभिश्चाक्षतैः सह ।।25।।
नीलोत्पलैर्मल्लिकैश्च करवीरैश्च चम्पकैः ।
जातीप्रसूनैर्बिल्वैश्च पुन्नागैर्बकुलैरपि ।।26।।
कदम्बैः केतकीपुष्पैः करुणाशोककिंशुकैः ।
नागबाणादिपुष्पैश्च⁵ गन्धवद्भिर्मनोहरैः ।।27।।
प्रत्यग्रैः कोमलैश्चैव पूजयेयुः प्रयत्नतः ।
पल्लवैश्चैव पत्रैश्च जलस्थलसमुद्भवैः ।।28।।

  1. घ. कः कुर्यात्तदनुग्रहम् । 2. घ. श्लोक सं. 21 अधिक है। 3. क. तु पच्येते । 4.
    घ. मङ्गले! मङ्गलार्थिनः । 4. घ. नागरङ्गादिपुष्पैश्च ।

पञ्चमः अध्यायः (25)
एवमादिभिरन्यैश्च पुष्पैर्बहुभिरन्वहम्।
सम्यक् सम्पाद्य यत्नेन शक्त्या भक्त्या रघूद्वहम्।।२९।।
इसलिए पुण्यमयी स्त्रियाँ और गृहस्थ जो मंगल चाहते हों, वे दान करें
और मांगलिक पूजा सामग्रियों चन्दन, अगरु, कस्तूरी, कर्पूर से पूजा करें; पंचामृत
से अभिषेक करें; फूलों की माला, दूर्वा, अक्षत से तथा चम्पा, तामरस (लालकमल),
नीलकमल, जूही, चम्पा, चमेली, नागकेसर, करवीर, वकुल, बेल का फूल, कदम्ब,
केतकी फूल, मल्लिका, अशोक, पलाश, नाग, बाण आदि सुन्दर, सुगन्धित फूलों
से अर्चना करें, जिनकी पंखुरियाँ आगे की ओर हों, कोमल हों, इनसे पूजा करें।
नये पल्लव, जल एवं स्थल पर उत्पन्न पत्रों से तथा इस प्रकार के अन्य पत्रों-पुष्पों
से प्रतिदिन शक्ति के अनुसार सभी सामग्रियाँ जुटाकर श्रीराम की पूजा करें।
त्रिकालमेककालं वा पूजयेयुरहर्निशम्।
¹कक्कोलैलापूगफलैस्तथाजातिफलैरपि ।
प्रत्याहृतैर्बहुविधैः पिष्टकैरिष्टसिद्धये ।।३०।।
दिन-रात, प्रातःकाल, मध्याह्नकाल एवं सन्ध्याकाल अथवा केवल प्रातःकाल
में कक्कोल, इलायची, सुपारी, जायफल आदि अनेक प्रकार के संगृहीत साधनों से
तथा चावल के पीठा से कामना की सिद्धि के लिए पूजा करें।
क्षीरनीराज्यपक्वैश्च फेनापूपवटादिभिः।
दध्योदनान्यपानीयैः सूपादिव्यञ्जनैरपि ।।३१।।
²वटीवटोपदंशादिपदार्थैर्बहुविस्तरैः ।
दूध, जल और घी में पकाये हुए फेना, फेन की तरह बनने वाला खाद्य
पदार्थ बतासा, घेबर आदि, बड़ी तथा दही, भात, अन्य पेय पदार्थ और दाल,
तरकारी, रोटी, गोलाकार खाद्य पदार्थ, चटनी या आचार आदि विभिन्न प्रकार
के खाद्य पदार्थों से पूजा करें।
आरातिकैर्धूपदीपैः³ षडावृत्त्योपकल्पितैः ।।३२।।
⁴शङ्खक्रगदापद्मगरुडान्तोपकल्पितैः ।
बहुभिर्दीपमालाभिरर्चयेयुरहर्निशम् ।।३३।।
धूप, दीप, आरती से छह बार शङ्ख, चक्र गदा, कमल, तथा गरुड़ की
प्रतिकृति बनाते हुए अनेक दीप मालाओं से दिन-रात पूजा करनी चाहिए।

  1. यह पंक्ति केवल घ. में। 2. घ. शाटीपटोपदंशादि (भोज्य पदार्थ के साथ वस्त्र
    अन्वित)। 3. घ. आरत्रिकै°। 4. घ. यह पंक्ति अनुपलब्ध।

(26) अगस्त्य-संहिता
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कङ्कोलैलापूगफलैस्तथा जातीफलैरपि।
कर्पूरचूर्णसहितैस्ताम्बूलैश्च सुवासितैः।।134।।
कंकल, इलायची, सुपारी, जायफल, कर्पूर के चूर्ण से सुगन्धित पान का
बीड़ा समर्पित कर पूजा करें।
महार्हेरर्हणां चक्रुः कल्याणार्थं तथान्वहम्।
स्वस्वशक्त्यनुसारेण सर्वं सम्पाद्य यत्नतः।।135।।
कल्याण के लिए प्राचीन काल में सन्तों ने इन श्रेष्ठ वस्तुओं से अपनी
शक्ति के अनुसार सब एकत्रित कर प्रतिदिन अर्चना की थी।
गृहस्थानां विधिरयं नैतरेषां शुभानने।
दद्युर्दानानि जुहुयुरर्चितेग्नौ सुखार्थिनः।।136।।
यह विधि केवल गृहस्थों के लिए है, अन्य के लिए नहीं। वे गृहस्थ सुख की
कामना से दान करें और पूजित अग्नि में हवन भी करें।
कल्याणं च वरारोहे रामार्पणधियान्वहम्।
हे पार्वती! श्रीराम को समर्पित करने की बुद्धि से इस प्रकार अर्चना कर
कल्याण होगा।
एवं गृहस्थनियमस्तथैव ब्रह्मचारिणाम्।।137।।
विधिमप्यनतिक्रम्य यथाशक्त्यनुसारतः।
यदि कुर्युः प्रयत्नेन पूजा तत्साधनैरिह¹।।138।।
सर्वं सम्पद्यते तेषां देवानां दुर्लभं च यत्।
यह गृहस्थों के लिए नियम है, किन्तु इस प्रकार ब्रह्मचारी भी किसी
विधान को छोड़े विना अपनी शक्ति के अनुसार यत्नपूर्वक यदि उन सामग्रियों से
इस संसार में पूजा करते हैं, तो उनकी भी सभी कामनाओं की सिद्धि होती है, जो
देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
कल्याणि शृणु मद्वाक्यं यदि कल्याणमिच्छसि।।139।।
राममाराधयाद्यादेर्यावज्जीवं यथाविधि।
एतेनैव वरारोहे कल्याणं तव सर्वदा।।140।।

  1. घ. तत्साधनैरपि।

---------------- पञ्चमोऽध्यायः ---------------- (27)
हे कल्याणमयी पार्वती! यदि अपना कल्याण चाहती हो, तो मेरी बात
सुनो और इन साधनों से विधानपूर्वक आज से लेकर जीवन पर्यन्त श्रीराम की
आराधना करो। इसी से हमेशा तुम्हारा कल्याण होगा।
पुण्यस्त्रियो गृहस्थाश्च तथैव ब्रह्मचारिणः।
सगुणं राममाराध्य पूर्वोक्तैः साधनैरपि।।41।।
शक्त्या सम्पादितैः कैश्चित्पूजयेयुर्दिवानिशम्।
तेषां भुक्तिश्च मुक्तिश्च भवत्येव न चान्यथा।।42।।
पुण्य करनेवाली स्त्रियाँ, गृहस्थ पुरुष तथा ब्रह्मचारी शक्ति के अनुसार
एकत्रित पूर्वोक्त सामग्रियों से भी सगुण राम की पूजा दिन-रात करें, तो उन्हें
भोग और मोक्ष होगा ही, इसमें सन्देह नहीं।
वानप्रस्थाश्च यतयो यद्येवं कुर्युुरन्वहम्।
संसारान्न निवर्तन्ते विध्यतिक्रमदोषतः।।43।।
आरूढपतिता ह्येते भवेयुर्दुःखभाजनाः।
वन में रहनेवाले तथा संन्यासी यदि उपर्युक्त विधान से प्रतिदिन पूजा
करते हैं, तो उन्हें विधान का अतिक्रमण करने के दोष से संसार से मुक्ति नहीं
मिलेगी और वे आरूढपतित कहलायेंगे और दुःख के भागी होंगे।
अहिंसा परमो धर्मस्तेषामेषा न पद्धतिः।।44।।
न हिंसाव्यतिरेकेण लभ्यन्ते तानि तानि वै।
भावनाकल्पितैः पूजासाधनैरेव युज्यते।।45।।
उनके लिए अहिंसा परम धर्म हैं और हिंसा के बिना ये सामग्रियाँ उपलब्ध
नहीं हो सकतीं; यह पद्धति उनके लिए नहीं है। मन में पूजा-सामग्रियों की
भावना कर उनके लिए मानस-पूजन विहित है।
न बहिर्योग्ययुक्तानां मनस्तेषां प्रशस्यते।
एतच्छान्तधियामेव सेव्यसेवकरूपतः।।46।।
किन्तु बहिर्योग से युक्त जो गृहस्थ और ब्रह्मचारी है, उनके लिए यह
प्रशस्त है। यह शान्त बुद्धिवालों के लिए ही है, जो भगवान् को सेव्य और स्वयं को
सेवक मानते हैं।

(28) अगस्त्य-संहिता
ध्यानमप्यर्चनाद् भद्रैर्भद्रार्थफलदं यतः।
आत्मनस्तत्त्वचिन्ता तु तस्याप्यात्म¹चिन्तनम् ।।47।।
उभयोरैक्यचिन्ता तु पुनरावर्तयेन्न तु।
सुन्दर साधनों से अर्चना करने से आत्मा के तत्त्व का चिन्तन और तत्त्वों
की आत्मा का चिन्तन स्वरूप ध्यान श्रेष्ठ है, क्योंकि यह सुन्दर फल प्रदान करता
है। साथ ही, आत्मा का तत्त्व और तत्त्व की आत्मा इन दोनों की एकता का
चिन्तन करने से पुनर्जन्म नहीं होता है।
आत्मानं सततं रामं संभाव्य विहरन्ति ये।
न तेषां दुष्करं किंचिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।।48।।
जो हमेशा अपने को श्रीराम समझकर विहार करते हैं उनके लिए कोई
दुष्कर कार्य नहीं है और उस दुष्कर कार्य के कारण उत्पन्न होनेवाली विपत्ति नहीं
होती है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये सगुणोपासनम् नाम
पंचमोऽध्यायः ।।
अथ षष्ठोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
किमेतद् भगवन् ब्रूहि तव² मध्याङ्गुलिं रहः।
तत्किं पिबसि माहात्म्यं श्रीतुलस्याः क्वचित् सृतम्³ ।।1।।
सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे भगवान् अगस्त्य मुनि! आपकी अंगुलियों के बीच में
क्या छुपा हुआ है, यह तो बतलाइये! क्या आप श्रीतुलसी से निःसृत माहात्म्य का
पान कर रहे हैं?
अगस्तिरुवाच
शृणु वक्ष्यामि माहात्म्यं श्रीतुलस्याः प्रयत्नतः।
पूर्वमुग्रतपः कृत्वा वरं वव्रे मनस्विनी।।2।।

  1. घ. तस्यात्मनि विचिन्तयेत्। 2. ख. घ. हित्वा। 3. ख. स्थितम्।

षष्ठोऽध्यायः (29)
अगस्त्य बोले- सुनो, मैं श्रीतुलसी का माहात्म्य भली-भाँति कहता हूँ।
प्राचीन काल में मनस्विनी तुलसी ने उग्र तपस्या कर भगवान् से वर माँगा।
तुलसी सर्वपुष्पेभ्यो पत्रेभ्यो वल्लभा यतः।१।
विष्णोस्त्रैलोक्यनाथस्य रामस्य जनकात्मजा।।३।।
प्रिया तथैव तुलसी सर्वलोकैकपावनी।
जैसे श्रीराम के लिए जनकनन्दिनी श्रीसीता प्रिय हैं उसी प्रकार सभी
फूलों और पत्तियों में तुलसी भगवान् विष्णु को सबसे प्रिय हो और वह सभी
लोकों को पवित्र करती रहे।
तुलसीपत्रमात्रेण योऽर्चयेद्राममन्वहम्२ ।।४।।
स याति शाश्वतं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्लभम्।
अतः केवल तुलसी के पत्र से जो प्रतिदिन श्रीराम की पूजा करते हैं वे ऐसे
शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त करके हैं, जहाँ से फिर इस संसार में आना सम्भव
नहीं है।
नीलोत्पलसहस्रेण त्रिसन्ध्यं योऽर्चयेद्धरिम् ।।५।।
फलं वर्षसहस्रेण३ तदीयं नैव लभ्यते।
नीलकमल के हजार फूलों से तीनों सन्ध्या जो श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे
एक हजार वर्ष में भी वैसा फल प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
विद्वन् सर्वेषु पुष्पेषु पङ्कजं श्रेष्ठमुच्यते।।६।।
तत्पुष्पेष्वपि तन्माल्यं लक्षकोटिगुणं भवेत्।
हे विद्वान् सुतीक्ष्ण! सभी फूलों में कमल श्रेष्ठ है और कमल के फूलों में भी
उसकी माला लाखों करोड़ों गुना फलदायिनी होती है।
विष्णोः शिरसि विन्यस्तमेकं श्रीतुलसीदलम् ।।७।।
अनन्तफलदं विद्वन् मन्त्रोच्चारणपूर्वकम्।
किन्तु भगवान् विष्णु के शिर पर मन्त्रोच्चारण के साथ चढ़ाया गया एक
तुलसी का पत्र अनन्त फल देता है।
१. घ. तत। २. घ. ०विष्णुमन्वहम्। ३. घ. वर्षशतेनापि।

(30) अगस्त्य-संहिता

पुष्पान्तरैरन्तरितं निर्म्मितं तुलसीदलैः ।।8।।
माल्यं मलयजालिप्तं दद्यात् श्रीराममूर्द्धनि।
दूसरे फूलों के बीच में तुलसीदल डालकर बनायी गयी तथा मलय चन्दन
से पोती गयी माला श्रीराम के मस्तक पर चढ़ानी चाहिए।
किं तस्य बहुभिर्यज्ञैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः ।।9।।
किं तीर्थसेवया दानैरुग्रेण तपसापि वा।
उनके लिए अनेक श्रेष्ठ दक्षिणा वाला यज्ञ, तीर्थ में निवास, दान तथा उग्र
तपस्या व्यर्थ है।
वाचं नियम्य चात्मानं मनो विष्णौ निधाय च ।।10।।
योऽर्चयेत् तुलसीमालैर्यज्ञकोटिफलं भवेत्।
भवाघकूपमग्नानामेतदुद्धारकाङ्कुशम्¹ ।।11।।
अपनी वाणी को संयमित कर तथा मन में भगवान् विष्णु को धारण कर
जो तुलसी की माला से पूजा करते हैं उन्हें करोड़ों यज्ञ करने का फल मिलता है।
यह संसार के पाप रूपी कूप में गिरे लोगों को निकालने के लिए झग्गर है।
पत्रं पुष्पं फलं चैव श्रीतुलस्याः समर्पितम्।
रामाय मुक्तिमार्गस्य द्योतकं सर्वसिद्धिदम् ।।12।।
श्रीराम को समर्पित श्रीतुलसी का पत्र, फूल तथा फल सभी सिद्धियाँ
प्रदान करते हैं और मुक्ति का मार्ग प्रकाशित करते हैं।
माल्यानि तनुते लक्ष्मीः कुसुमान्तरितानि ह।
तुलस्याः स्वयमानीय निर्मितानि तपोधन ।।13।।
हे तपोधन सुतीक्ष्ण! अपने से तोड़कर लाये गये तुलसी के पत्र को फूलों से
ढँककर बनायी गयी माला अर्पित से लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
²त्रयो वेदास्त्रयो देवास्तिस्रः सन्ध्यास्त्रयोऽग्नयः।
सदा कुर्वन्ति माङ्गल्यं तुलसी यस्य मस्तके ।।14।।
जो मस्तक पर तुलसी धारण करते हैं उनका कल्याण तीनों वेद, तीनों
देव, तीनों सन्ध्याएँ और तीनों अग्नियाँ करती हैं।

  1. घ. "मेतदुद्धारकारणं। 2. घ. दो पंक्तियाँ अनुपलब्ध।

षष्ठोऽध्यायः (31)
तुलसीवाटिका यत्र पुष्पान्तरशतैर्युता।
शोभते राघवस्तत्र सीतया सहितः स्वयम्।।15।।
जहाँ सैकड़ों प्रकार के फूलों से युक्त तुलसी का बाग है, वहाँ स्वयं श्रीराम
सीता के साथ विराजमान रहते हैं।
कौतुकं शृणु देवेशि विनिर्माल्ये च वह्निना।
तापिते नाशमायाति ब्रह्महत्यादिपातकम्।।16।।
हे देवेशि! यह आश्चर्य की बात सुनो कि निर्माल्य से तुलसीदल चुनकर जो
अग्नि में जलाते हैं, इससे ब्रह्महत्या आदि के पापों का नाश होता है।
आरोपयन्ति ये नित्यं स्वयमेव मनीषिणः।
वनत्वेन समावृत्य कण्टकैस्तुलसीतरून्।।17।।
अर्चनाय तदेवालं तन्नामाभ्यर्हितं ततः।
जो विद्वान् व्यक्ति नियमित रूप से स्वयं (रक्षा के लिए) काँटों की बाड़ से
घेरकर तुलसी-वन लगाते हैं, वही पूजा-अर्चना के लिए पर्याप्त है; उससे भी श्रेष्ठ
उनके नाम से युक्त तुलसी की प्रशंसा की गयी है।
शालग्रामशिलातीर्थं¹ तुलसीदलवासितम्।।18।।
ये पिबन्ति पुनस्तेषां स्तन्यपानं न विद्यते।
शालग्राम शिला का जल जो तुलसीदल से सुवासित है, उसका पान
करनेवालों को पुनः स्तनपान नहीं करना पड़ता अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं
होता।
गाङ्गेयमिव तोयेषु पूज्येष्विव रघूत्तमः।।19।।
सरोजमिव पुष्पेषु शस्यते तुलसीदलम्।
जलों में गंगाजल, पूजनीय देवों में श्रीराम और फूलों में कमल के समान
पत्रों में तुलसीदल प्रशस्त है।
सम्पूज्य भक्त्या विधिवद्रामं श्रीतुलसीदलैः।।20।।
भवान्तरसहस्रेषु दुःखग्राहाद् विमुच्यते।
तुलसीदल से श्रीराम की भक्ति और विधान से पूजा कर मनुष्य हजार
जन्मों तक दुःखरूपी ग्राह से मुक्त हो जाता है।

  1. घ. शालग्रामशिलातोयं।

(32) ----------------- अगस्त्य-संहिता -----------------
वर्णाश्रमेतराणां च पूजा यस्यैव साधनम्।।२१।।
अपेक्षितार्थदं नान्यज्जगतस्वपि तपोधन।
वर्णाश्रम धर्म से बहिर्भूत और केवल पूजा को ही मोक्ष का साधन
बनानेवाले अर्थात् (दान आदि के अनधिकारी) यतियों के लिए संसार में तुलसीदल
को छोड़कर कोई दूसरी वस्तु नहीं है, जिससे उन्हें इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो सके।
पूजायोग्यैर्दलैः पत्रैः पुष्पैर्योऽर्चयेद्धरिम्।।२२।।
यान्ति¹ न्यूनातिरिक्तानि कर्माणि सफलान्यहो।
न तस्य नरकक्लेशो योऽर्चयेत् तुलसीदलैः।।२३।।
पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठो सत्यं सत्यं न संशयः।
पूजा के योग्य दल, पत्र और पुष्प से जो श्रीहरि की पूजा करते हैं उनके
द्वारा पूजा-सामग्री में कमी या फालतू सामग्री के रहने पर भी कर्म सफल होते हैं।
जो तुलसीदल से पूजा करते हैं, उन्हें नरक का क्लेश नहीं होता, चाहे वे पापी हो
या निष्पाप हो; यह सत्य है, सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।
गङ्गातोयेन तुलसीदलयुक्तेन योऽर्चयेत्।
रामं निक्षिप्य शिरसि राममन्त्रेण सेचयेत्।।२४।।
निमील्य चक्षुषी धीरो हृदि रामं निधाय च।
असकृद् वा सकृद् वापि य एवमनुतिष्ठति।
ध्येयो भवति सर्वेषामयमेव विमुक्तये।।२५।।
तुलसीदल से युक्त गंगाजल से श्रीराम की पूजा करते हैं, उसे अपने शिर
पर धारण कर श्रीराम के मन्त्र से अभिषेक करते हैं, आँखों को धैर्यपूर्वक बंद कर
हृदय में श्रीराम को धारण करते हैं; ऐसा अनेक बार या एक बार भी अनुष्ठान
करते हैं, तो उनके ध्येय श्रीराम इसी से मोक्ष प्रदान करते हैं।
न सन्ति गुरवो यस्य नैव दीक्षाविधिः क्रमः।
रामरक्षां वदन्तो यः तुलसीदलमर्पयेत्।।२६।।
दीक्षान्तरशतेनापि नैतत्फलमवाप्यते।

  1. घ. तानि।

षष्ठोऽध्यायः (33)
जिनके कोई गुरु नहीं हैं, अथवा जिन्होंने दीक्षा भी नहीं ली है, न ही पूजा
की विधि एवं क्रम जानते हैं, वे भी यदि रामरक्षा-स्तोत्र का पाठ करते हुए
तुलसीदल अर्पित करते हैं, तो अन्य प्रकार की हजारों दीक्षा से भी ऐसा फल उन्हें
नहीं मिलेगा।
दीक्षितेष्वपि सर्वेषु रामदीक्षा तु उत्तमः।।27।।
न गुरुर्नैव कालश्च न देवान्तरपूजनम्¹।
तुलसीदलयुक्तं च रामार्चनमपेक्षते।।28।।
सभी प्रकार के दीक्षितों में श्रीराम की दीक्षा उत्तम है। इसके लिए न गुरु
न समय और न अन्य देवताओं की पूजा की अपेक्षा है केवल तुलसीदल से श्रीराम
की पूजा करनी चाहिए।
निर्माल्यतुलसीमालायुक्तो यद्यर्चयेद्धरिम्।
यद्यत्करोति तत्सर्वमनन्तफलदं भवेत्।।29।।
यदि कोई भगवान् को समर्पित निर्माल्य तुलसीदल को धारण कर श्रीहरि
की अर्चना करता है, तो वह जो जो कार्य करेगा उसे अनन्त फल मिलेगा।
यदि न्यूनं भवत्येव रामाराधनसाधनम्।
तुलसीपत्रमात्रेण युक्तं तत्परिपूर्यते।।30।।
यदि श्रीराम की पूजा-सामग्री में किसी वस्तु की कमी रहे, तो केवल
तुलसीदल डाल देने से पूर्ण हो जाता है।
शालग्रामशिलायाश्च गङ्गायाश्च तपोधन।
तुलस्याश्चैव माहात्म्यं नेष्टो वक्तुं हि विश्वसृक्।।31।।
हे तपोधन सुतीक्ष्ण! शालग्राम की शिला, गंगा और तुलसी का माहात्म्य
कहने में विश्व के निर्माता ब्रह्मा भी असमर्थ हैं।
भवभञ्जनमेतत्ते सर्वाभीष्टं प्रयच्छति।
नातः परतरं किञ्चित् पावनं विद्यते भुवि।।32।।
तुलसीदल पुनर्जन्म का नाश करनेवाला है तथा सभी कामनाओं की पूर्ति
करता है। संसार में इससे बढ़कर पवित्र दूसरा कुछ भी नहीं है।
यः कुर्यात् तुलसीकाष्ठैरक्षमालास्वरूपिणीम्।
कर्णमालां प्रयत्नेन कृतं तस्याक्षयं भवेत्।।33।।

  1. घ. देवान्तरसेवनम्।
    Rarest Archiver

(34) अगस्त्य-संहिता

जो तुलसी लकड़ी से रुद्राक्ष की तरह माला बनाकर कानों में धारण करते
हैं, उनके द्वारा किये गये कार्य कभी नष्ट नहीं होते।
संघृष्य तुलसीकाष्ठं यो दद्याद्राममूर्द्धनि।
कर्पूरागुरुकस्तूरीचन्दनं च न तत्समम्।।34।।
तुलसी की लकड़ी को घिसकर श्रीराम के मस्तक पर लगावें। यह कर्पूर,
अगुरु, कस्तूरी और चन्दन भी इसके समान नही है।
तुलसीविपिनस्यापि समन्तात्पावनं स्थलम्।
क्रोशमात्रं भवत्येव गाङ्गेयस्येव पावनम्।।35।।
तुलसी-वन के चारों ओर की भूमि भी पवित्र होती है, जैसे गंगा के तट
पर एक कोस तक की भूमि पवित्र होती है।
तुलस्या रोपिता सिक्ता दृष्टा स्पृष्टा तु पावयेत्।
आराधिता प्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदा।।36।।
तुलसी का वृक्ष रोपने से, सींचने से, दर्शन करने से स्पर्श करने से पवित्र
कर देता है और यत्नपूर्वक उसकी आराधना करने से सभी कामनाओं की पूर्ति
होती है।
चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमाणां विशेषतः।
स्त्रीणां च पुरुषाणां च पूजितेष्टं ददाति हि।।37।।
चारो वर्णों एवं आश्रमों के स्त्रियों एवं पुरुषों के द्वारा पूजित तुलसी
इच्छाओं की पूर्ति करती है।
प्रदक्षिणं भ्रमित्वा तु नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।
न तेषां दुरितं किञ्चित् प्रक्षीणमवशिष्यते।।38।।
जो तुलसी वृक्ष के दाहिने से घूमकर प्रतिदिन प्रणाम करते हैं उनके द्वारा
किये गये पाप कम होकर भी नहीं रहता अर्थात् समूल समाप्त हो जाता है।
अनन्यदर्शनाः प्रातर्ये पश्यन्ति तपोधन।
अहोरात्रकृतं पापं तत्क्षणात् प्रदहन्ति ते।।39।।
प्रातःकाल किसी दूसरी वस्तु को देखे बिना जो तुलसी का दर्शन करते हैं,
उनके द्वारा उस दिन और रात में किये गये पाप भस्मीभूत हो जाते हैं।