अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
पृष्ठ 85, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 85पूजयेद् विधिना नैव कः कुर्यादितदन्वहम्¹।
(24) अगस्त्य-संहिता
पूजयेद् विधिना नैव कः कुर्यादितदन्वहम्¹।
गृहस्थ यदि प्रतिदिन दान न करे, होम नहीं करे और विधिपूर्वक पूजा
नहीं करे, तो भला कौन करेगा?
न ब्रह्मचारिणो दातुमधिकारोऽस्ति भामिनि ।।19।।
गृहिभ्योऽन्यत्र सर्वेभ्यः को वा दास्यत्यपेक्षितम् ।
नारण्यवासिनां शक्तिर्न ते सन्ति कलौ युगे ।।20
हे भामिनि! ब्रह्मचारी को दान करने का अधिकार नहीं है। तब गृहस्थ
को छोड़कर कौन सबको दान देगा? वन में रहनेवाले वानप्रस्थियों को तो इस
कलियुग में दान करने की शक्ति ही नहीं है।
²परिव्राज्ज्ञानमात्रेण दानहोमादिभिर्विना ।
सर्व्वदुःखपिशाचेभ्यो मुक्तो भवति नान्यथा ।।21।।
परिव्राडविरक्तश्च विरक्तश्च गृही तथा।
कुम्भीपाके निमज्जेते³ तावुभौ कमलानने ।।22।।
संन्यासी तो केवल ज्ञान प्राप्त कर ही दान होम आदि के बिना भी सभी
दुःख रूपी पिशाच से मुक्त पा लेते हैं, दूसरे प्रकार से नहीं। यदि संन्यासी संसार
में आसक्त हो और गृहस्थ के मन में वैराग्य हो, तो दोनों कुम्भीपाक नरक में जा
डूबते हैं।
पुण्यस्त्रियो गृहस्थाश्च मङ्गलैर्मङ्गलार्थिनः⁴ ।।23।।
पूजोपकरणैः कुर्य्युर्द्द्युर्दनानि चार्हणम् ।
चन्दनागरुकस्तूरीकर्पूरैश्चैव चम्पकैः ।।24।।
पञ्चामृताभिषेकैश्च पुष्पैस्तामरसैरपि।
पुष्पमालैश्च बहुभिर्दुर्वाभिश्चाक्षतैः सह ।।25।।
नीलोत्पलैर्मल्लिकैश्च करवीरैश्च चम्पकैः ।
जातीप्रसूनैर्बिल्वैश्च पुन्नागैर्बकुलैरपि ।।26।।
कदम्बैः केतकीपुष्पैः करुणाशोककिंशुकैः ।
नागबाणादिपुष्पैश्च⁵ गन्धवद्भिर्मनोहरैः ।।27।।
प्रत्यग्रैः कोमलैश्चैव पूजयेयुः प्रयत्नतः ।
पल्लवैश्चैव पत्रैश्च जलस्थलसमुद्भवैः ।।28।।
- घ. कः कुर्यात्तदनुग्रहम् । 2. घ. श्लोक सं. 21 अधिक है। 3. क. तु पच्येते । 4.
घ. मङ्गले! मङ्गलार्थिनः । 4. घ. नागरङ्गादिपुष्पैश्च ।