अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(18) अगस्त्य-संहिता
एवमेवादिबहुस्तोत्रैस्तुतः स परमेश्वरः ।।20।।
वैदिकैः कृपया विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत्।
इस प्रकार के वेदोक्त स्तोत्रों से जब ब्रह्मा ने भगवान् की स्तुति की, तब
विष्णु ने ब्रह्मा से कहा-
स्तुतस्तुष्टोऽस्मि ते ब्रह्मन् उग्रेण तपसाधुना।।21।।
वृणीष्व पदमिष्टं¹ ते दास्यामि कमलोद्भव।
इत्युक्तः सोऽब्रवीत् तेन विष्णुना प्रभविष्णुना।।22।।
'हे ब्रह्मा! मैं आपकी स्तुति और उग्र तपस्या से अब सन्तुष्ट हूँ। हे
कमलोद्भव! तुम्हे जो स्थान चाहिए वह माँगो; मैं तुम्हें दूँगा।' विष्णु के द्वारा इस
प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा बोले।
ब्रह्मोवाच
तुष्टोऽसि यदि देवेश दास्यं मे स्वीकरिष्यसि।
अभीष्टं देव देवेश यद्यस्ति करुणा मयि।।23।।
ब्रह्माजी बोले- हे देवेश! यदि आप सन्तुष्ट हैं और मेरे ऊपर यदि आपकी
करुणा है, तो मेरी इस दासता को स्वीकार करें, यह मैं चाहता हूँ।।
असौभाग्येन दारिद्र्यदुखेनाहं सुदुःखितः।।
एतेऽपि मुनयो देव माययात्यन्तदुःखिताः।।24।।
हे देव! मैं सुन्दर भाग्य से हीन तथा दरिद्रता के दुःख से दुःखी हूँ। ये
मुनिगण भी माया के फेर में अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं।
प्रतिभाति च दैवेन² सर्वमस्माकमीदृशम्।
किं करिष्यामि देवेश ब्रूहि मे पुरुषोत्तम।।25।।
हे पुरुषोत्तम! हमलोगों का सबकुछ इसी प्रकार से भाग्य के द्वारा प्रेरित
प्रतीत हो रहा है। ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ यह कहें।
कामक्रोधादिभिर्दुःखैर्दुष्टाः सर्वापि मम प्रजाः।
पूर्वार्जितैर्विशेषेण न कश्चिदवशिष्यते।।26।।
पूर्वजन्म में अर्जित कर्म से तथा काम, क्रोध आदि के दुःख से मेरी सारी
प्रजा दोषग्रस्त हो गयी है। ऐसा कोई नहीं है, जो इन दोषों से अछूता हो।
- क. यदभीष्टं। 2.ख. वेदेन।