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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(38) अगस्त्य-संहिता

अध्याय से यदि अगस्त्य-संहिता का अन्त रहता तो अन्त में ग्रन्थ समाप्ति की
पुष्पिका रहती, नमस्क्रियात्मक या आशीर्वादात्मक मंगलाचरण होता। साथ ही
पत्रांक दुबारा लिखा गया है। पत्र संख्या 35 की वर्द्धित छाया यहाँ प्रमाण के लिए
प्रस्तुत है-
[चित्र: पाण्डुलिपि का अंश - पत्र संख्या ३५]
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उक्त पाण्डुलिपि पूर्ण एवं स्वतन्त्र है तथा
पाण्डुलिपियों के बंडल में इसके साथ इसी लिपिकार की दूसरी पाण्डुलिपि रहने के
कारण बाद में किसी ने भ्रमवशात् लगातार पत्रांक डाल दिया है।
इस अध्याय में सीताजी की स्तुति है, जो काव्यात्मकता की दृष्टि से इतनी
उच्च कोटि की रचना है कि इसे आगमशास्त्र के अन्तर्गत न रखकर विशुद्ध भक्ति-
काव्य की कोटि में रखना अपेक्षित होगा।
आचार्य बलदेव उपाध्याय ने 'वैष्णव सम्प्रदायों का साहित्य एवं सिद्धान्त'
ग्रन्थ में इस अंश का विवेचन 'जानकी-स्तवराज' के नाम से किया है तथा इसे
रामोपासना की परम्परा में रसिक-सम्प्रदाय का स्वतन्त्र एवं मान्य ग्रन्थ माना है।
आचार्यजी ने उक्त ग्रन्थ में 'जानकी-स्तवराज' के जिस 49वें श्लोक को उद्धृत
किया है, वह वर्तमान पाण्डुलिपि में 54वें श्लोक के रूप में उपलब्ध है।
यद्यपि यहाँ भी इसे आगमशास्त्र के अन्तर्गत सम्मिलित करने का अथक
प्रयास किया गया है और सम्पूर्ण स्तुति को श्रुति, संकर्षण के संवाद के रूप में
योजित कर शिव के मुख से यह स्तुति करायी गयी है। इस स्तुति में सीता के
पादादिकेशान्तवर्णन है। पादादिकेशान्तवर्णन के द्वारा स्तुति की परम्परा भक्ति-
काव्यों में प्रसिद्ध रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित विष्णुपादादिकेशान्त
वर्णन प्रसिद्ध है। अतः इसे परवर्ती कवि की रचना मानना उचित होगा।

१. सुतीक्ष्ण-अगस्त्य संवाद व राम-उपासना विधान

प्रस्तावना (39)

'अगस्त्य-संहिता का प्रतिपाद्य विषय
'अगस्त्य-संहिता' आगम शास्त्र की परम्परा में रामोपासना का प्रतिनिधि
ग्रन्थ है। इसमें रामोपासना के कर्मकाण्ड का विस्तार से प्रतिपादन है, जिसे गृहस्थों
के लिए भोग एवं मोक्ष दोनों का प्रदाता कहा गया है। कर्मकाण्ड के अन्तर्गत
षोडशोपचार, पंचोपचार, एकादशोपचार पूजा विधि का वर्णन किया गया है। इस
कर्मकाण्ड के अन्तर्गत नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य, तीनों में हवन-कर्म को
अनिवार्य माना गया है। यह 'अगस्त्य-संहिता' की परम्परा की विशेषता है। इस
ग्रन्थ में गार्हस्थ्य-धर्म को भी महिमा-मण्डित किया गया है तथा सांसारिक भोग
को मोक्ष का बाधक न मानकर मोक्ष का साधक माना गया है, बशर्ते कि भोग,
भोग्य और भोक्ता तीनों के रूप में श्रीराम को स्थापित कर भोग किया जाये
और देवता के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना विकसित रहे। इस सम्पूर्ण समर्पण
तथा अनन्या भक्ति की महिमा 'अगस्त्य-संहिता' में सर्वत्र गायी गयी है। इस
संहिता में केवल 'भक्त्या' शब्द का प्रयोग 33 स्थलों पर मिलता है, जो कर्मकाण्ड
में भी भक्ति की सहभागिता को व्यक्त करता है।
इस कर्मकाण्ड को जहाँ गृहस्थों के लिए अनिवार्य बतलाया गया है, वहाँ
यतियों, संन्यासियों के लिए इसे हेय मानते हुए कहा गया है कि यतिगण किसी भी
साधन से पूजा न करें, क्योंकि ये साधन हिंसा के बिना सम्भव नहीं हैं और
यतियों के लिए अहिंसा परम धर्म है। यतियों के लिए योग-पद्धति का विवरण
दिया गया है, जिसके माध्यम से अष्टाङ्ग योग का पालन करते हुए योगी ब्रह्मस्वरूप
श्रीराम में विलीन होकर मुक्त जाते हैं। योग-मार्ग का पालन गृहस्थों के लिए
असम्भव मानकर गृहस्थों को इस पथ पर नहीं चलने का सुझाव देते हुए कहा गया
है कि यति धर्म में यदि आसक्ति पाप का कारण होता है, तो गार्हस्थ्य-धर्म में
अनासक्ति भी पाप है। यदि गृहस्थ हैं, तो सांसारिक विषयों से अनासक्ति नहीं
दिखाएँ और यदि वैराग्य उत्पन्न हो जाने के कारण यति-धर्म में प्रवृत्त हैं, तो
आसक्ति न रखें। दोनों ही स्थितियाँ पाप के कारण हैं।
गृहस्थों के लिए केवल ज्ञान को भी श्रेयस्कर नहीं बतलाया गया है। केवल
ज्ञान हो जाने से, जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान हो जाने से गृहस्थ को न तो
मुक्ति मिल सकती है न ही इस संसार में सुख मिल सकता है। अतः गृहस्थ को
निष्काम भाव से दान, जप, हवन, पूजन, भजन कीर्तन आदि करते हुए जीव और
ब्रह्म की एकता का ज्ञान करना चाहिए।

(40) अगस्त्य-संहिता
अगस्त्य-संहिता उपासना का शास्त्रीय-ग्रन्थ है, अतः इसमें कर्म के भी
निष्काम और सकाम कर्म के भेदों का सांगोपांग विवेचन किया गया है। यहाँ तक
कि मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, भ्रामण आदि लौकिक सिद्धियों के लिए
भी श्रीराम के मन्त्र का प्रयोग करने की विधि विस्तार से बतलायी गयी है। किन्तु
उस स्थल के अन्त में स्पष्ट हिदायत दे दी गयी है कि इन कर्मों के करने से मोक्ष दूर
होता चला जायेगा और वे साधक भूत, प्रेत और पिशाच की योनियों में चले
जायेंगे। पुनर्जन्म लेकर बार-बार कीट आदि रूप में सांसारिक कष्ट भोगेंगे।
अतः साधक को चाहिए कि वे ऐसे सकाम कर्म से विरत रहें।
अपनी उन्नति के लिए सकाम कर्म को भी बुरा नहीं माना गया है।
सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए सकाम कर्म करने में बुराई नहीं है, किन्तु इसमें
भी दोष दिखाया गया है कि इससे मोक्ष मिलने में बाधा मिलेगी, क्योंकि एक कार्य
के दो फल की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अन्ततः निष्काम कर्म की श्रेष्ठता हर तरह
से यहाँ प्रतिपादित है, जिससे ईश्वर की कृपा पाकर साधक भोग और मोक्ष दोनों
का अधिकारी हो जाता है।
यहाँ प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषय-वस्तु संक्षिप्त रूप से प्रदर्शित किया
जा रहा है-
प्रथम अध्याय
अगस्त्य-संहिता का प्रारम्भ महामुनि अगस्त्य और सुतीक्ष्ण के वार्तालाप
की भूमिका से हुआ है। दण्डकारण्य में नर्मदा के तट पर सुतीक्ष्ण का आश्रम था।
एक दिन वहाँ अगस्त्य का आगमन हुआ, तो अतिथि सत्कार के बाद सुतीक्ष्ण ने
पूछा कि मैंने अपने जीवन में कई यज्ञ किए, प्रभूत दक्षिणा दी, दान दिया, फिर
तपस्या भी की, किन्तु अब भी मैं काम, क्रोध आदि से पीड़ित हूँ। अब मुझे ऐसा
उपाय बतलाएँ, जिससे मैं इस संसार के सागर को पार कर सकूँ।
इस प्रश्न के उत्तर के रूप में महामुनि अगस्त्य ने शिव और पार्वती की
एक कथा सुनायी, जिसमें पार्वती द्वारा इसी प्रश्न पर भगवान् शिव ने संसार के
सागर को पार करने का उपाय बतलाया था। यहाँ शिव सर्वप्रथम संसार की
विभीषिका का वर्णन करते हैं कि माया से ग्रस्त मनुष्य कैसे बार-बार पृथ्वी पर
जन्म लेते हैं और फिर अपकर्म कर पुनः रौरव नरक में जा गिरते हैं। अथवा,
कुछ लोग वशीकरण, आकर्षण आदि तान्त्रिक क्रियाओं को करते हुए वर्णाश्रम
धर्म का विचार न कर मांस, रक्त, मदिरा का अर्पण कर कर्मकाण्ड सम्पन्न करते

प्रस्तावना (41)
हैं, वे भूत, प्रेत, पिशाच या ब्रह्मराक्षस की योनि में जन्म लेते हैं। भगवान् शिव
की उक्ति पर सहमत होती हुई देवी पार्वती जब कहतीं हैं कि इस धर्म से किसी का
भी उपकार नहीं होनेवाला है, तब शिव पार्वती के साथ परिहास करते हुए पूर्वपक्ष
के रूप में कहते हैं कि मैं तीनों लोकों का अन्तक हूँ, इसलिए हिंसा मुझे प्रिय है,
मुझे जो मांस अर्पित करते हैं वे मेरे प्रिय हैं।' बहुत परिहास हो जाने पर अन्त में
भगवान् सिद्धान्त प्रकट करते हैं कि सच तो यह है कि हिंसकों के लिए इस संसार
को पार करना असम्भव है।'
द्वितीय अध्याय
पार्वती द्वारा मुक्ति का उपाय पूछने पर भगवान् परमेश्वर के वास्तविक
स्वरूप की व्याख्या करते हैं और आश्रम के अनुसार उपासना पर जोर देते हुए
उस परमेश्वर का ध्यान करने का उपदेश करते हैं। यज्ञ, वेदाध्ययन, अतिथि
पूजन, गुरुशिष्य परम्परा का पालन, दान आदि गृहस्थों और ब्रह्मचारियों के लिए
करणीय है।
तृतीय अध्याय
इस अध्याय के आरम्भ में पार्वती सबके लिए परमेश्वर की उपासना के
मार्ग की जिज्ञासा करतीं है। इसके उत्तर में भगवान् शंकर परमेश्वर के द्वारा
अवतार लेने का वर्णन कर रामावतार की विस्तृत चर्चा करते हैं। भगवान्
श्रीराम स्वयं नारायण के अवतार हैं, श्रीसीता लक्ष्मीस्वरूपा हैं और शेषावतार
लक्ष्मण हैं, शंख और चक्र के अवतार भरत और शत्रुघ्न हैं तथा वानर सभी देव
के अवतार हैं। ऐसे श्रीराम की आराधना के अनेक मार्ग हैं। कुछ लोग पंचाग्नि
व्रत, चान्द्रायण उपवास आदि से आराधना करते हैं तो कोई 'राम', 'राम' जप
कर अमरत्व प्राप्त करते हैं। कुछ लोग गार्हस्थ्य धर्म का पालन करते हुए भगवान्
की सेवा कर उन्हें प्रसन्न करते हैं। इस अध्याय में उपासना की अनेक विधियाँ
वर्णित हैं।
चतुर्थ अध्याय
पार्वती द्वारा जिज्ञासा करने पर भगवान् शिव हिरण्यगर्भ-सिद्धान्त का
प्रतिपादन करते हैं। यहाँ एक कथा है कि एकबार जब ब्रह्मा ने तीन सौ करोड़
वर्ष तक निराहार रहकर तपस्या की, तब स्वयं भगवान् विष्णु प्रकट हुए। ब्रह्माजी
भाव-विह्वल होकर उनकी स्तुति की। प्रसन्न होकर भगवान् ने ब्रह्माजी से वर

(42) अगस्त्य-संहिता
माँगने के लिए कहा तो ब्रह्माजी ने दुर्भाग्य और दरिद्रता से ग्रस्त प्रजा के उद्धार
का उपाय पूछा। साथ ही ब्रह्मा ने पूछा कि मनुष्यों और भक्तों के लिए कौन
उपाय है, जिससे उन्हें शरीर के अन्त होने पर शान्ति मिले। इसपर भगवान् विष्णु
ने ब्रह्मा को षडक्षर मन्त्र ‘ॐ रामाय नमः’ का सांगोपांग उपदेश किया।
पंचम अध्याय
इस षडक्षर मन्त्र के प्रथम उपदेशक ब्रह्मा हुए। सुतीक्ष्ण के प्रश्न पर
अगस्त्य ने आगे की कथा बतलायी कि ब्रह्मा द्वारा उपदिष्ट इस मन्त्र से जब
पार्वती भी उपासना करने लगीं, तब उनके मन में ज्ञान का उदय हुआ और
पुनर्जन्म के विना भगवान् शंकर को संसार के विनाश की आशंका होने लगी। तब
उन्होंने पार्वती को गार्हस्थ्य धर्म का पालन करते हुए पूजा सामग्रियों से प्रतिदिन
श्रीराम की आराधना का उपदेश किया और कहा कि गृहस्थ केवल ज्ञान से इस
संसार में और परलोक में कल्याण नहीं प्राप्त कर सकता है उसे दान, होम आदि
भी करना चाहिए। आसक्त परिव्राजक और विरक्त गृहस्थ दोनों कुम्भीपाक
नरक प्राप्त करते हैं, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती है। अतः जो गृहस्थ हैं वे पुष्प,
चन्दन, अक्षत, नैवेद्य आदि से सगुण राम की उपासना करें। किन्तु इस विधि से
वानप्रस्थी और यति को उपासना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूजा के साधन
हिंसा का त्याग कर प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यदि वानप्रस्थी और यति
गृहस्यों की तरह इन साधनों से पूजा करते हैं, तो वे 'आरूढपतित' कहलायेंगे।
षष्ठ अध्याय
इस अध्याय से अगस्त्य और सुतीक्ष्ण की वार्ता के रूप में तुलसी-माहात्म्य
का विस्तृत वर्णन है, जिसमें तुलसी वृक्ष का दल, मंजरी, काष्ठ आदि प्रत्येक अंग
का आध्यात्मिक महत्त्व बतलाया गया है तथा तुलसी-माला धारण करने का
विधान किया गया है। तुलसी वृक्ष लगाने से भी भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति
वर्णित है।
सप्तम अध्याय
यहाँ अगस्त्य मुनि एक कथा कहते है कि एकबार भगवान् शंकर देवी
पार्वती के साथ वाराणसी में निवास करने लगे तो सभी देवता वहीं आकर जम
गये। अब भगवान् शिव को चिन्ता हुई कि ये देवगण तो मेरी उपासना करते हैं,
इन्हें मैं मुक्ति कैसे प्रदान करूँ। इसी समय ब्रह्माजी वहाँ पधारे तो भगवान् ने
यही जिज्ञासा उनसे की। तब ब्रह्मा ने उन्हें भी षडक्षर मन्त्रराज का उपदेश
Rarest Archiver

प्रस्तावना (43)

दिया। भगवान् शिव सौ मन्वन्तर तक इस मन्त्र का जप करते रहे। तब श्रीराम
प्रसन्न होकर प्रकट हुए। भगवान् शिव ने अपनी चिन्ता उनके सामने रखी तो
श्रीराम की कृपा से वहाँ बसनेवाले सभी लोग मुक्त होकर श्रीराम स्वरूप विष्णु में
विलीन हो गये। पुनः भक्तवत्सल भगवान् शिव ने कहा कि इस संसार में कहीं भी
किसी प्रकार जो मृत्यु को प्राप्त करते हैं, उन्हें कैसे मुक्ति मिलेगी? इसपर भगवान्
श्रीराम ने इस षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य कहा कि ब्रह्मा से या आपसे (शिव से) इस
मन्त्र को जो ग्रहण कर जप करेंगे या मुमूर्षु के दक्षिण कर्ण में यदि मन्त्र का उपदेश
करेंगे तो, मुक्ति मिल जाएगी। उसी दिन से वारणसी मुक्तिक्षेत्र कहलाने लगी।
अष्टम अध्याय
सुतीक्ष्ण ने पूछा कि इस मन्त्रराज का सर्वप्रथम उपदेश किसने किया तथा
कैसे यह पृथ्वी पर प्रतिष्ठित हुआ। अगस्त्य ने कहा कि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम अपने
पुत्र वसिष्ठ को यह मन्त्र दिया। वसिष्ठ ने वेदव्यास को तथा वेदव्यास ने अपने
शिष्य शौनक को सबसे पहले देकर अन्य शिष्यों को भी दिया। उस शौनक से मैंने
(अगस्त्य ने) यह मन्त्र लिया और मैं इसे सांगोपांग आपको सुना रहा हूँ।
इसी अध्याय में गुरु का लक्षण बतलाते हुए कहा गया है कि देवों के
उपासक, शान्त चित्तवाले, सांसारिक विषयों से विरक्त, अध्यात्म को जाननेवाले,
ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेवाले, वेद, शास्त्र आदि के ज्ञानी, उद्धार और संहार
दोनों करने में समर्थ, ब्राह्मणश्रेष्ठ, तन्त्रज्ञ, यन्त्र एवं मन्त्र के ज्ञाता, धर्म और
रहस्य के ज्ञाता, पुरश्चरण करनेवाले, सिद्धपुरुष, जिन्हें मन्त्र सिद्ध हों तथा जो
प्रयोगों का ज्ञान रखते हों, तपस्वी और सत्यवादी गृहस्थ गुरु कहलाते हैं।
शिष्य का भी लक्षण विस्तार से यहाँ वर्णित है कि चाण्डाल पर्यन्त सभी
व्यक्ति यहाँ अधिकारी हैं। धर्म में आस्था रखनेवाले, गुरु के भक्त, श्रद्धा के साथ
सीखने की इच्छा रखनेवाले, स्त्रियों के प्रति काम, क्रोध आदि से उत्पन्न दुःखों को
देखते हुए वैराग्य रखनेवाले, सभी प्रकार से संसार को पार करने की इच्छा
रखनेवाले, ब्राह्मण, धर्म और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले, निष्काम शिष्य होते हैं।
अथवा मन, वचन, कर्म, एवं धर्म से गुरु की नित्य सेवा करने वाले, क्षत्रिय, एवं
वैश्य शिष्य होते हैं। अपने वर्ण और आश्रम के लिए कथित धर्म के अनुसार कर्म
करनेवाले, सदा पवित्र रहनेवाले, पवित्र नियमों का पालन करनेवाले द्विजों की
सेवा करनेवाले, धार्मिक, शूद्र शिष्य होते हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ चाहे वे प्रतिलोम
विवाह से या अनुलोम विवाह से उत्पन्न हो, वे भी शिष्या हो सकतीं हैं।

(44) अगस्त्य-संहिता

अन्त में इस षडक्षर में ॐ, श्रीं, ऐं, क्लीं आदि अन्य बीज लगाकर
विभिन्न प्रकार के सकाम प्रयोगों का विवेचन किया गया है। मन्त्र के प्रकार तथा
कलशस्थापन-पूर्वक दीक्षा की विधि का संक्षिप्त संकेत है।
नवम अध्याय
इस अध्याय में श्रीराम के यन्त्र का विस्तृत विवेचन है तथा मालामन्त्रोद्धार
वर्णित है। यहाँ मालामन्त्र इस प्रकार है- ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय
रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः।
इसे चिन्तामणि-मंत्र भी कहा गया है। इस मालामन्त्र तथा 'श्रीं सीतायै नमः' इस
सीता मन्त्र से विलसित यन्त्र पर श्रीराम की पूजा कर के उसे धारण करने से
दारिद्र्य-दुःखनाश, सन्तान-प्राप्ति, ऐश्वर्य, विद्या, रोगशान्ति आदि अनेक सांसारिक
उद्देश्यों की प्राप्ति कही गयी है। दूसरे द्वारा किए गये अभिचार को रोकने में इसे
'वज्रपञ्जर' की संज्ञा दी गयी है।
दशम अध्याय
इस अध्याय में श्रीराम की सांगोपांग-अर्चना की विधि का वर्णन है।
इसके अनुसार श्रीराम के द्वार, पीठ पर स्थित अंग तथा परिवार देवताओं में
गणेश, सूर्य, शिव, क्षेत्रपाल, धात्री, ब्रह्मा, गंगा, यमुना, कुलदेवता, शंख, पद्म,
निधि, वास्तोष्पति, लक्ष्मी, गुरु सरस्वती, आधारशक्ति, कूर्म, नागाधिपति, पृथ्वी,
क्षीरसागर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी,
सत्या, ईशाना, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, हनुमान्, सुग्रीव, भरत विभीषण,
लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न, जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन,
अकोप, धर्मपाल, सुमन्त, वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गोतम, भरद्वाज, कौशिक,
वाल्मीकि, नारद, नल, नील, गवय गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि आदि देवों की
पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इनके प्रसन्न होने पर ही श्रीराम और श्रीसीता का
प्रसाद प्राप्त हो सकेगा।
इस अध्याय में एक नारदीय स्तोत्र है, जिसमें इन सभी देवों के प्रति
नमस्कार अर्पित किया गया है। इस स्तोत्र को प्रातःकाल पाठ करने से भोग और
मोक्ष दोनों की सिद्धि बतलायी गयी है। यहाँ इन देवों की पूजा पंचोपचार,
एकादशोपचार या षोडशोपचार से करने का संकेत किया गया है।

प्रस्तावना (45)

एकादश अध्याय
इस अध्याय में सकाम पूजन का प्रायोगिक विवरण है कि यजमान
स्नानादि से शरीर की बाह्यशुद्धि कर मातृका-न्यास से अन्तःशुद्धि करें। तब पूजा
की सामग्रियों को स्वच्छ कर शंख आदि की पूजा करें। तब वैष्णवन्यास, केशवादिन्यास
कर तत्त्वन्यास एवं मूर्तिपंजर-न्यास करें। इस प्रकार षडंग न्यास सम्पन्न कर बाह्य
पूजा की तैयारी करें। यहाँ वेदी, अष्टदलकमल, तोरण आदि की निर्माण-विधि
वर्णित है। यहाँ कहा गया है कि पुण्यमयी स्त्रियों और गृहस्थों के घिरे हुए स्थान
में गायन, वादन और नृत्य के साथ यह आराधना करें। पूजा में प्रयुक्त सामग्रियों
का स्थान निर्धारण तथा उनकी आकृति का विवेचन यहाँ किया गया है। इसी क्रम
में भूतशुद्धि, हस्तशोधन, पादशोधन आदि की दूसरी परिभाषा भी दी गयी है।
जैसे पूजा के लिए पत्र-पुत्र को भक्तिपूर्वक उठाना कर-शोधन है। श्रीराम की
कथा का श्रवण और उनके उत्सवों का दर्शन कर्ण एवं नेत्र की शुद्धि है।
द्वादशाध्याय
इस अध्याय में मातृका-न्यास का क्रम बतलाया गया है। 'अ' से 'ह' तक
के 52 वर्ण को अनुस्वार के साथ शरीर के प्रत्येक अंग में नियोजित करना
मातृकान्यास है। इसी में केशवकीर्त्यादि न्यास भी वर्णित है। साधक अपने शरीर
में बीजाक्षरों और देवताओं को व्यस्त कर देवत्व प्राप्त कर लेता है तथा उसका यह
पांचभौतिक शरीर पवित्र हो जाता है। इस सम्पूर्ण अध्याय में शरीर के विभिन्न
न्यासों का निरूपण किया गया है।
त्रयोदशाध्याय
इस अध्याय में पूजा के पात्रों को यथास्थान रखकर शंखपात्र में सामान्यार्घ्य-
स्थापन की विधि प्रारम्भ में बतलायी गयी है कि शंख को आधार पर रखकर
सूर्य, चन्द्र और अग्नि के बीज मन्त्र से तीनों मण्डलों की पूजा कर के शंख जल में
अंकुश मुद्रा से तीर्थों का आवाहन कर, शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा, गरुड़मुद्रा, सुरभिमुद्रा
आदि का प्रदर्शन कर देव का अभिषेक करें और उसी जल से यजमान अपने
शरीर एवं अन्य सामग्रियों को पवित्र करें। आगे पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदि की
स्थापना, स्नपन, धूप, दीप, नैवेद्य आदि का विस्तृत वर्णन है।
चतुर्दशाध्याय
इस अध्याय में हवन-विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसमें
विभिन्न प्रकार एवं परिमाग के कुण्डों का निर्माण, मेखला की संख्या, लम्बाई,

(46) अगस्त्य-संहिता
चौड़ाई एवं प्रकार का वर्णन है। जप की संख्या के आधार पर कुण्ड का परिमाण
निर्धारित किया गया है। हवन के अन्य उपकरण जैसे स्रुव एवं स्रुक् के लक्षण,
परिमाण एवं संक्षेप हवन में उसके अनुकल्प के रूप में पीपल का पत्ता बतलाया
गया है। इसके बाद कुण्ड के वायुकोण में चावल के पीठा से अष्टदल-कमल का
लेखन कर उसके विभिन्न दलों को विभिन्न वर्ण से बनाकर उसपर श्रीराम की
अर्चना का विधान किया गया है। पुनः अग्निस्थापन की विधि अग्न्या carry on/अग्न्या न य न/अग्न्या न य न -> अग्न्या न य न,
प्रोक्षण उपसारण, परिस्तरण आदि वर्णित है, किन्तु अपनी शाखा के गृह्यसूत्र में
उल्लिखित विधियों का आलम्बन करने की अनुशंसा सर्वत्र की गयी है। अग्नि के
संस्कार गर्भाधान से विवाह पर्यन्त कर के उस अग्नि में वैष्णव-चरु बनाने का
वर्णन है। उस चरु से अंग सहित सीताराम को हवि समर्पित कर के विनायकादि
अंग देवताओं को भी आहुति देने का विधान किया गया है। अन्त में ब्रह्म-
दक्षिणा, मार्जन, ब्राह्मण भोजन, चरुप्राशन आदि क्रियाएँ भी उल्लिखित हैं।
अध्याय के अन्त में एक महत्त्वपूर्ण निर्देश है कि नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों
प्रकार के कर्मों में हवन किया जाना चाहिए।
पंचदशाध्याय
इस अध्याय में श्रीराम की उपासना के क्रम में अनेक प्रकार के सकाम
हवनों की विधि का वर्णन किया गया है। इसमें कामना भेद से हविष्य सामग्री में
अन्तर बतलाया गया है। जैसे-
बिल्व-पुष्प - ऐश्वर्य
पलाश-पुष्प - मेधा, ज्ञान
चन्दन के जल से सुगन्धित जूही फूल के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने
से राजवशीकरण सिद्ध होता है। दूर्वा या गुरुच के साथ अक्षत मिलाकर हवन
करने से रोगनाश और दीर्घायु की बात कही गयी है। इस अध्याय में इस प्रकार
के अनेक प्रयोग हैं, जिनसे वशीकरण, उत्तम स्त्री की प्राप्ति, जगद्वशीकरण, सुख,
समृद्धि आदि की प्राप्ति होने की बात कही गयी है। अध्यायान्त में सिद्धान्त का
प्रतिपादन किया गया है कि सकाम भाव से जो उपासना करते हैं, उन्हें उसी
कामना की सिद्धि होती है, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती; क्योंकि एक कर्म के दो फल
नहीं हो सकते। फिर अन्त में निर्देश करते हैं कि श्रीराम का षडक्षर मन्त्र मुक्ति
देनेवाला है। इसका प्रयोग मारणादि कर्म में नहीं करना चाहिए; क्योंकि विद्वान्
तुच्छ खरगोश पर ब्रह्मास्त्र नहीं चलाया करते हैं।

प्रस्तावना (47)

षोडशाध्याय
इस अध्याय में षडक्षर मन्त्र के पुरश्चरण की विधि का वर्णन किया गया
है। इस मन्त्र के प्रतिदिन जप में छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ संख्या
बतलायी गयी है। इस अध्याय के अनुसार पुरश्चरण के पाँच अंग हैं- पूजन,
नित्य जप, तर्पण, होम एवं ब्राह्मण-भोजन। गुरु से प्राप्त मन्त्र की यह पंचागोपासना
पुरश्चरण कहलाती है। इस अध्याय में पुरश्चरण कर्त्ता के लिए हविष्यान्न भोजन
तथा वर्ज्य पदार्थों का उल्लेख है; पुरश्चरण किस स्थान पर किया जाना चाहिए,
इसका भी वर्णन है। यहाँ सम्पूर्ण आचार-संहिता का उल्लेख किया गया है, किन्तु
अन्त में प्रतिपादित किया गया है कि निष्काम भाव से इस पुरश्चरण को करने से
ईश्वर के साथ साक्षात्कार होगा। गृहस्थों के लिए ब्राह्मण भोजन अनिवार्य
बतलाया गया है, किन्तु अशक्त गृहस्थ एवं अन्य प्रकार के साधक भी जपसंख्या
को द्विगुणित कर इसकी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। इसी प्रकार, हवन, पूजा अथवा
तर्पण में भी अशक्त रहने पर उतनी संख्या में जप कर क्षतिपूर्ति कर सकते हैं।
अन्त में, इस पुरश्चरण से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति कही गयी है।

सप्तदशाध्याय
इस अध्याय में शिष्य की दीक्षा के अन्तर्गत अभिषेक की विधि का वर्णन
है। इसके आरम्भ दीक्षा के लिए शुभ मुहूर्तों का विधान तथा अपनी शाखा के
गृह्यसूक्त के अनुसार नान्दीमुख-श्राद्ध, स्वस्तिवाचन आदि का विधान किया है।
सूर्यग्रहण के दिन किसी भी मुहूर्त को देखने की आवश्यकता नहीं है। शिष्य कलश
की स्थापना कर ब्राह्मणों का वरण करें और वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रों से सुन्दर
सूक्तों को सुनते हुए विष्णु की पूजा करें। गुरु भी भूतशुद्धि, न्यास आदि के साथ
विष्णु-पूजन कर रात्रि में जागरण, कथालाप आदि करते हुए छह हजार मन्त्र जप
करते हुए रात्रि व्यतीत करें। दूसरे दिन पुनः भूतशुद्धि, न्यास, पूजन, जप आदि
सम्पन्न कर हवन करें। पूर्णाहुति के बाद शिष्य को प्राणायाम कराकर सुरास्त्वां०
इत्यादि मन्त्र से कलश के जल से अभिषेक करावें। तब शिष्य को नवीन वस्त्र,
चन्दन, आभूषण आदि से सज्जित कर षडंगन्यास करें। फिर शिष्य के मस्तक पर
हाथ रखकर 108 बार मन्त्र का जप करें। तब गुरु हाथ में जल लेकर उसे शिष्य
के हाथों में डाले और मन्त्र दें। शिष्य को विभवानुसार गुरु एवं उनके पुत्र, पत्नी
आदि को वस्त्र, आभूषण भोजन आदि देना चाहिए। गुरु को प्रसन्न कर उन्हें
विदा कर शिष्य स्वयं भोजन करे और अपने परिजनों को भोजन कराये। उसके
बाद प्रतिदिन शिष्य प्रातः, मध्याह्न एवं सन्ध्या में जप करे।

(48) अगस्त्य-संहिता

इसी अध्याय में रामगायत्री का मन्त्रोद्धार तथा पुरश्चरण-विधि वर्णित
है। इस रामगायत्री के आदि में अनेक बीज-मन्त्र लगाकर काम्य प्रयोगों का भी
उल्लेख यहाँ किया गया है तथा तर्पण-विधि की वर्णित है।
अष्टादशाध्याय
अध्याय के आरम्भ में श्रीराम की पूजा-सामग्रियों का लक्षण बतलाया
गया है। जो पुष्प दूसरे देवता को नहीं चढ़ाया गया हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत
अथवा पीत वर्ण का हो, कीड़े आदि न लगे हों वे पुष्प श्रीराम की पूजा में विहित
है। सदावर्त नामक, शंख, जिसकी पीठ तथा मध्य भाग में कमल-नाल का चिह्न
हो, शुभ्र जल से पूर्ण हो, पूजन में प्रशस्त है। पाद्य, अर्घ्य आदि के पात्र ताम्बा
अथवा सुवर्ण का बना होना चाहिए। ये पूजा-साधन तीन प्रकार के होते हैं-
उत्तम मध्यम एवं अधम। पूजा कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार
शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिन्हें लोक में
निन्दित नही माना जाता हो।
आगे पूजन विधि के क्रम में विभिन्न मुद्राओं-आवाहनी, स्थापनी,
सन्निधीकरणी आदि का वर्णन है। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा
कर मुट्ठी बाँध लेने से संनिधीकरणी मुद्रा बनती है। इसी मुद्रा में यदि दोनों अंगूठे
अन्दर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। इसी प्रकार शंख, चक्र, गदा,
पद्म, धेनु, कौस्तुभ, श्रीवत्स, वनमाला, योनि आदि दश मुद्राओं के लक्षण दिये
गये हैं, जो देवार्चन में प्रशस्त हैं।
आगे यजमान के बैठने के भी आसनों का वर्णन किया गया है- स्वस्तिक,
वज्र, वीर, पद्म, योग, गोमुख आदि। इन आसनों के लक्षण यहाँ वर्णित हैं।
अध्याय के अन्त में निर्देश है कि जो विष्णुभक्त न हों, उन्हें ये सब रहस्य कहना
नहीं चाहिए।
एकोनविंशाध्यायः
इस अध्याय के आरम्भ में श्रीराम के षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य बतलाया
गया है। हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, सौर, शाक्त एवं वैष्णव मन्त्रों में श्रीराम का
मन्त्र श्रेष्ठ है। श्रीराम के भी अन्य मन्त्रों की अपेक्षा यह षडक्षर मन्त्र अनायास
फल देनेवाला है, अतः इसे मन्त्रराज कहा गया है। इसके जप और पुरश्चरण से
ब्रह्म-हत्यादि पाप नष्ट हो जाते हैं, भूत प्रेत, पिशाच, ग्रह और राक्षस सब भाग

(48) अगस्त्य-संहिता
इसी अध्याय में रामगायत्री का मन्त्रोद्धार तथा पुरश्चरण-विधि वर्णित
है। इस रामगायत्री के आदि में अनेक बीज मन्त्र लगाकर काम्य प्रयोगों का भी
उल्लेख यहाँ किया गया है तथा तर्पण-विधि की वर्णित है।
अष्टादशाध्याय
अध्याय के आरम्भ में श्रीराम की पूजा-सामग्रियों का लक्षण बतलाया
गया है। जो पुष्प दूसरे देवता को नहीं चढ़ाया गया हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत
अथवा पीत वर्ण का हो, कीड़े आदि न लगे हों वे पुष्प श्रीराम की पूजा में विहित
है। सदावर्त नामक, शंख, जिसकी पीठ तथा मध्य भाग में कमल-नाल का चिह्न
हो, शुभ्र जल से पूर्ण हो, पूजन में प्रशस्त है। पाद्य, अर्घ्य आदि के पात्र ताम्बा
अथवा सुवर्ण का बना होना चाहिए। ये पूजा-साधन तीन प्रकार के होते हैं-
उत्तम मध्यम एवं अधम। पूजा कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार
शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिन्हें लोक में
निन्दित नही माना जाता हो।
आगे पूजन विधि के क्रम में विभिन्न मुद्राओं-आवाहनी, स्थापनी,
सन्निधीकरणी आदि का वर्णन है। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा
कर मुट्ठी बाँध लेने से संनिधीकरणी मुद्रा बनतीं है। इसी मुद्रा में यदि दोनों अंगूठे
अन्दर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। इसी प्रकार शंख, चक्र, गदा,
पद्म, धेनु, कौस्तुभ, श्रीवत्स, वनमाला, योनि आदि दश मुद्राओं के लक्षण दिये
गये हैं, जो देवार्चन में प्रशस्त हैं।
आगे यजमान के बैठने के भी आसनों का वर्णन किया गया है- स्वस्तिक,
वज्र, वीर, पद्म, योग, गोमुख आदि। इन आसनों के लक्षण यहाँ वर्णित हैं।
अध्याय के अन्त में निर्देश है कि जो विष्णुभक्त न हों, उन्हें ये सब रहस्य कहना
नहीं चाहिए।
एकोनविंशाध्यायः
इस अध्याय के आरम्भ में श्रीराम के षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य बतलाया
गया है। हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, सौर, शाक्त एवं वैष्णव मन्त्रों में श्रीराम का
मन्त्र श्रेष्ठ है। श्रीराम के भी अन्य मन्त्रों की अपेक्षा यह षडक्षर मन्त्र अनायास
फल देनेवाला है, अतः इसे मन्त्रराज कहा गया है। इसके जप और पुरश्चरण से
ब्रह्म-हत्यादि पाप नष्ट हो जाते हैं, भूत प्रेत, पिशाच, ग्रह और राक्षस सब भाग

(50) अगस्त्य-संहिता
लगता है, उसे मात्रा कहते हैं। पैंतालीस मात्रा का प्राणायाम उत्तम, तीस मात्रा
का मध्यम और पन्द्रह मात्रा का अधम होता है। सभी शुभ एवं अशुभ कर्मों के
आरम्भ और अन्त में प्राणायाम करना चाहिए। चार सौ प्राणायाम करने से
सैकड़ो महापाप मिट जाते हैं। प्राणायाम के बिना किए गये सभी निष्फल होते हैं।
आगे योग के शेष अंगों का वर्णन है। इस प्रकार आठो अंगों को पूरा कर
योगी सूर्यमण्डल का भेदन कर परमगति को प्राप्त करते हैं।
कर्म योग अथवा ज्ञान योग अथवा दोनों से सगुण अथवा निर्गुण राम की
आराधना कर योग के नियमों का पालन करता हुआ साधक भोग और मोक्ष
प्राप्त करते हैं। 'कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग मैं कल से आरम्भ करूँगा' यह सोचनेवाला
तो स्वयं अपनी आँखों में धूल झोंकता है। मानव शरीर में स्थित इन्द्रियाँ विष्ठा के
बीच रहनेवाले कीड़े से भी अधिक अपवित्र हैं। जो अपने शरीर पर विश्वास
करते हैं, वे मूर्ख हैं। ईश्वर ने केवल दुःख का अनुभव करने के लिए इस शरीर का
निर्माण किया है। सकाम कर्म करने से पुनर्जन्म अवश्यम्भावी है अतः सिद्धान्त
यही है कि फल प्राप्ति की कामना से कोई कर्म न करें।
एकविंशाध्याय
अध्याय के आरम्भ में पूर्व पक्ष के रूप में कर्म को भी मुक्ति का साधन
मानते हुए उसकी साधकता बतलायी गयी है, किन्तु कर्म को साधन मानने पर
क्या क्या विषमताएँ होती हैं उनका उल्लेख करते हुए कर्म की साधकता का
खण्डन किया गया है और अन्त में सिद्धान्त के रूप में कहा गया है कि ज्ञान के
बिना मुक्ति का दूसरा साधन नहीं है इस ज्ञान के साथ अष्टांग योग का मार्ग
अपना कर योगी मुक्त हो जाता है। हृदय में स्थित श्रीराम सर्वत्र प्रकाशित होते
हैं, जो शरीर के विनष्ट होने पर स्वयं अवशिष्ट रहते हैं। वस्तुतः ऐसे श्रीराम से
ऊपर कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान और अष्टांग योग का समन्वय वैराग्य और
यतित्व के बिना दुर्लभः है, अतः शास्त्रानुसार स्वीकृत यतित्व का आचरण करते
हुए हर प्रकार से ब्रह्म-कैवल्य का अभ्यास करना चाहिए।
द्वाविंशाध्याय
इस अध्याय के आरम्भ में सुतीक्ष्ण का प्रश्न है कि योग क्या है और किस
उपाय से चित्त को जीता जा सकता है। इसपर अगस्त्य कहते हैं कि जिस प्रयत्न
से शरीर के अन्तः में वायु का निरोध होता है उसी प्रयत्न से मन भी निरुद्ध
होकर आत्मलीन हो जाता है। प्राणवायु और अपानवायु समान कर चित्त को

प्रस्तावना (51)
आत्मा में स्थित कराकर द्वादशार चक्र से निःसृत अमृत को पाकर योगी अमरत्व
प्राप्त कर लेता है।
इस सिद्धान्त कथन के बाद इस अध्याय में शरीर की उत्पत्ति की प्रक्रिया
का वर्णन किया गया है, जो आयुर्वेद शास्त्र में उत्पत्ति-स्थान का विषय है।
सर्वप्रथम प्राणियों के चार प्रकार हैं- उद्भिज, अण्डज, स्वेदज तथा जरायुज।
उनके अतिरिक्त तृण, वृक्ष आदि भी पंचमहाभूतों से ही निर्मित हैं। अपने भाग्य
दुर्बल होने पर जरायुज शरीर प्राप्त करते हैं। स्त्री और पुरुष के ग्राम्यधर्म से शुक्र
और शोणित के सम्मेलन से इनके शरीर का निर्माण होता है। यह गर्भ में प्रविष्ट
होकर वायु, जल और अग्नि के प्रभाव से गीला होता है, उबलता है और धीरे
धीरे बढ़ता हुआ दशवें मास में जन्म लेकर रोने लगता है। मनुष्य का यह शरीर
विष्ठा और मूत्र से लिपटा हुआ अत्यन्त घृणित है। इस शरीर में ईडा, पिंगला,
सुषुम्णा, गान्धारी, हस्तजिह्वा, अलंबुषा आदि नाडियाँ होती हैं। पचास हजार
शिराएँ हैं, दस जल के स्थान हैं, रस के नौ स्थान हैं, जिनमें पुरुष में सात ही होते
हैं। रक्त के आठ, मूत्र के पाँच, वसा के चार, मेद के दो और मज्जा एवं रेत के एक
स्थान होते हैं। शरीर में दश वायु का संचार होता है- प्राण, अपान, समान,
उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवल एवं धनञ्जय। जब शिशु का जन्म होता
है, तो सर्वत्र दुःख ही भोगना पड़ता है।
इस अध्याय का यह शरीरोत्पत्ति-वर्णन मानव शरीर के प्रति आसक्ति से
विमुख करने के उद्देश्य से किया गया है।
त्रयोविंशाध्याय
इस अध्याय में ब्रह्मविद्या का निरूपण किया गया है। प्रारम्भ में अगस्त्य
परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अद्वैत, आनन्दमय, चैतन्य,
शुद्ध एक मात्र ईश्वर हैं, जो बाहर और भीतर प्रकाशित हैं। चैतन्य स्वरूप में
परमात्मा स्थावर और जंगम प्राणियों में निश्चित रूप से स्थित है। उस परमात्मा
को प्राणी जान नहीं पाते हैं, जिसके लिए अविद्या जिम्मेदार है। वह ज्ञानियों के
मन में भी परदा की तरह है। इस अविद्या के कारण ही प्राणियों में सुख और
दुःख की अनुभूति होती है। इस अविद्या का नाश होने पर साधक चैतन्य स्वरूप
परमात्मा का साक्षात् दर्शन कर लेता है।
यह स्थिति प्राणायाम से होती है। इसके लिए आधार-चक्र पर श्रीराम
का ध्यान कर पूरक क्रिया के योग से बाह्य स्थित चैतन्य को भीतर लेकर कुम्भक
कर शरीर के पूर्वोक्त दश प्रकार के वायु को एकीकृत करें। इन वायुओं को दृढ़

(52) अगस्त्य-संहिता

बाँधकर एक मुहूर्त के आधे समय अर्थात् 24 मिनट तक स्थिर रहकर मुख
खोलें। आगे के चरण में इस रुद्ध वायु से एक एक कर ग्रन्थियों का भेदन करें।
भूमध्य में स्थित द्विदत्त कमल से अमृत की टपकती हुई धारा का पान कर उसी
धारा में समस्त असत् को प्रवाहित कर साधक अमर हो जाता है। जब पाँचवीं
ग्रन्थि का भी भेदन सम्पन्न हो जाता है, तब शब्दब्रह्म से साक्षात्कार होने पर
सर्वज्ञता आ जाती है। आगे मूलाधार में स्थित वायु को सुषुम्णा नाडी के द्वारा
ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करायें। इससे यह जन्म सफल हो जाता है और मुक्ति मिल
जाती है। हे योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! यह सब संन्यास से होता है। यहीं मुक्ति का मार्ग
है, जो सभी दर्शनों में कहा गया है।
श्रीराम सत्य हैं, परब्रह्म हैं, राम से ऊपर कुछ भी नहीं है। यह रहस्य
अगस्त्य-संहित में कही गयी है। यह 'अगस्त्य-संहिता' अध्यात्म मार्ग की दीपशिखा
है। जिसके घर में यह पुस्तक पूजित है, वे सद्यः अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं, आयु,
आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्र प्रपौत्र आदि की वृद्धि होती है।
चतुर्विंशाध्याय
अध्याय के आरम्भ में अगस्त्य-संहिता में उक्त मार्ग को परम मार्ग मानते
हुए श्रीराम के माहात्म्य का वर्णन है। श्रीराम परम ज्योतिःस्वरूप हैं, इस संसार के
विस्तार की आत्मा हैं। वसिष्ठ, वामदेव, नारद आदि ऋषियों ने वेद, स्मृति, पुराण
आदि का अवलोकन कर यह निश्चय किया है कि श्रीराम यज्ञ स्वरूप हैं, जिससे
स्थावर और जंगम प्राणियों की उत्पत्ति हुई है। श्रीराम के मन्त्र शब्द प्रकाश
स्वरूप है और श्रीराम से ही इसकी भी उत्पत्ति हुई है, अतः इन मन्त्रों के जप से
भोग और मोक्ष दोनों मिल जाते हैं।
इस अध्याय में श्रीराम के अनेक मन्त्रों का निर्देश किया गया है। जिनमें
एकाक्षर मन्त्र 'राम्', द्व्यक्षर मन्त्र 'राम', षडक्षर मन्त्र ॐ रामाय नमः, क्लीं
रामाय नमः, ह्रीं रामाय नमः आदि विवेचित हैं। आगे 'राम' पद के साथ 'चन्द्र'
एवं 'भद्र' जोड़कर भी ह्रीं, श्रीं, क्लीं ॐ ये बीज पर्याय से लगाकर अनेक प्रकार
के मन्त्र होते हैं। इन मन्त्रों के ऋषि, ब्रह्मा, शिव और अगस्त्य हैं, छन्द गायत्री है,
देवता श्रीराम हैं, आदि और अन्त के बीज शक्तियाँ हैं तथा भोग और मोक्ष
प्रयोजन हैं। इन मन्त्रों में से किसी एक का न्यास सभी अंगों में करना चाहिए।
इसके बाद हृदय रूपी कमल के समान आँखोंवाले परात्पर पुरुष श्रीराम का ध्यान
कर मानस-पूजा कर एकान्त में जप करें। श्रीसीताराम की विलासमयी युगलमूर्ति
का ध्यान कर साधक भोग और मोक्ष पाते हैं। आगे जप, होम, अर्चना आदि

प्रस्तावना (53)
करें। श्रीराम के मन्त्र उन्हीं के स्वरूप हैं, जिनका स्मरण और कीर्तन करने से
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र, सभी पापमुक्त हो जाते हैं। इसलिए सद्गुरु के
उपदेश से मण्डल में श्रीराम के मन्त्र का अनुष्ठान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
पंचविंशाध्याय
इस अध्याय में षडक्षर मन्त्र के अतिरिक्त जो श्रीराम के मन्त्र हैं, उनके
अनुष्ठान की विधि बतलायी गयी है। इस अध्याय में सर्वप्रथम पूजा-विधानों एवं
जपविधानों का त्याग कर भक्तिभाव से श्रीहरि के समक्ष कीर्तन, भजन, नामोच्चारण
आदि करके भी मुक्ति प्राप्त करने की बात कही गयी है। ऐसे भक्तों के लिए
दीक्षा और अन्य विधानों की व्यर्थता कही गयी है।
बाद में कहा गया है कि सभी मन्त्रों में षडक्षर मन्त्र श्रेष्ठ है, अतः अन्य
मन्त्रों के भी मूल विधान षडक्षर मन्त्र के समान है। दीक्षा-विधि में भी कोई
अन्तर नहीं है। पुरश्चर्या विधि की पूर्वोक्त ही है। इस अध्याय में सूर्यमण्डल के
मध्य में स्थित श्रीराम सीता एवं हनुमान् का ध्यान किया गया है। बाह्यपूजा की
विधि यहाँ संक्षेप में वर्णित है। यहाँ देवता को अर्घ्य नैवेद्यों का उल्लेख किया गया है।
षड्विंशाध्याय
इस अध्याय में रामनवमी व्रत का विस्तृत विवरण दिया गया है। चैत्र
शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में परमपुरुष श्रीराम कौशल्या के
गर्भ से उत्पन्न हुए। इस उपलक्ष्य में इस दिन उपवास, व्रत, रात्रि-जागरण करना
चाहिए तथा दूसरे दिन प्रातःकाल में दशमी तिथि में श्रीराम की पूजा कर ब्राह्मण-
भोजन कराना चाहिए। गाय, भूमि, तिल, सोना आदि दान करना चाहिए।
आगे श्रीराम की प्रतिमा की पूजा कर दान करने का विधान किया गया
है। रामनवमी से एक दिन पूर्व स्नानादि क्रिया कर श्रीराम के मन्त्र के साधक का
विधिपूर्वक वरण कर उन्हें आचार्य बनायें। फिर उन्हें स्नानादि कराकर नवीन
वस्त्र पहनाकर स्वयं भी श्वेत वस्त्रादि धारण कर आचार्य के मुख से रामकथा
सुनते हुए रात्रि में भूमि पर सोकर दूसरे दिन वेदी निर्माण कर अन्य विद्वानों के
मुख से स्वस्तिवाचन सुनते हुए उसी स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन करें तथा अन्त में
संकल्पपूर्वक उसके दान का संकल्प करें। आगे पूजन में प्रयुक्त चन्दन, कुंकुम
आदि के निर्माण की विधि वर्णित है। इस दिन नृत्य, उत्सव भजन-कीर्तन आदि
करते हुए दिन-रात व्यतीत करें। अगले दिन श्रीराम की विधिवत् पूजा कर

(54) अगस्त्य-संहिता
मूलमन्त्र से एक सौ आठ बार पायस से हवन करें। तब आचार्य को सन्तुष्ट कर
संकल्प लेकर वह स्वर्णप्रतिमा दान करें। तब दक्षिणा देकर आचार्य और ब्राह्मणों
को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करें। इससे अनेक जन्मों के पाप मिट जाते हैं
और तुलापुरुष आदि दान का फल मिलता है।
सप्तविंशाध्याय
रामनवमी के दिन प्रतिमा-दान से भिन्न कल्प का विधान किया गया है।
आरम्भ में पूर्व अध्याय का अनुकल्प है कि स्वर्ण प्रतिमा के दान करने में यदि
आर्थिक कठिनाई हो, तो एक पल के सोलहवें भाग के बराबर सुवर्ण की प्रतिमा
दान की जा सकती है।
दूसरा कल्प है कि नवमी के दिन व्रत कर रात्रि में जागरण कर भक्तिपूर्वक
श्रीराम का पूजन करें। दशमी तिथि को गाय, भूमि, तिल, हिरण्य आदि वित्त के
अनुसार दान करें। इस प्रकार जो रामनवमी का व्रत करते हैं, वे सभी पापों से
मुक्त हो जाते हैं। यह रामनवमी का व्रत नित्यकर्म है। अर्थात्, जो यह व्रत नहीं
करते, वे पाप के भागी होते हैं।
आगे इस अध्याय में कहा गया है कि दशम अध्याय में वर्णित विधि से
षोडशोपचार से विधिपूर्वक पूजन करें। इस दिन मौन व्रत धारण कर एकान्त में
रहते हुए श्रीराम-मन्त्र का जप उस पाप को नष्ट कर देता है, जो पाप बारह वर्षों
में भी नष्ट नहीं होता। रामनवमी के दिन प्रत्येक प्रहर में पूजा करनी चाहिए।
अष्टाविंशाध्याय
इस अध्याय में भी रामनवमी व्रत और उस दिन पूजन का माहात्म्य
बतलाया गया है। इस दिन उपवास, जागरण, पितृ-तर्पण करना चाहिए। जो
रामनवमी के दिन पितरों के निमित्तं तर्पण करते हैं, उनके पितर उसी क्षण विष्णु
के परमधाम को चले जाते हैं। इस दिन व्रत करने से तुलापुरुष दान का फल
मिलता है। रामनवमी का निर्णय करते हुए कहा गया है कि अष्टमीविद्धा नवमी
का त्याग वैष्णवों को करना चाहिए। नवमी में व्रत कर दशमी में पारणा करें।
इसी अध्याय में आगे सुतीक्ष्ण द्वारा पूछे जाने पर तत्त्व, जाप्य मन्त्र एवं
ध्यान का विस्तृत विवेचन किया गया है। यहाँ त्रिगुणातीत, निर्मल ज्योतिःस्वरूप
को तत्त्व मानकर 'श्रीराम' को परम जाप्य मन्त्र माना गया है। 'श्रीराम, राम,
राम' का जप जो करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं। इसके बाद
श्रीराम का ध्यान बतलाया गया है कि अयोध्या नगर में रत्नमण्डप पर कल्पतरु

(55)
की जड़ में रत्न सिंहासन पर आसीन श्रीराम का ध्यान करें। यहाँ अष्टदल कमल
पर विभिन्न दलों में अंग, परिजन और परिवार देवताओं की स्थिति का वर्णन
कर षोडशोपचार-पूजन का विवरण दिया गया है। यहाँ उल्लेख है कि प्रत्येक
मास शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पौराणिक स्तोत्रों एवं वेदपाठ के साथ श्रीराम
की पूजा करनी चाहिए।
एकोनत्रिंशाध्याय
इस अध्याय के आरम्भ में न्यास को मन्त्र का कवच कहते हुए जप से पूर्व
न्यास का अनिवार्य विधान किया गया है कि केशवकीर्त्यादि-न्यास, तत्त्वन्यास,
परमहंसन्यास, प्रणवन्यास, मातृकान्यास आभ्यन्तरमातृकान्यास क्रमशः कर मन्त्र
का जप करें। यदि इन न्यासों को करने में अशक्त हों, तो केवल मन्त्र का भी जप
किया जा सकता है।
इस अध्याय में आगे श्रीराम के मन्दिर में प्रतिष्ठा के लिए शुभ दिन की
गणना की गयी है। चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्र, तारा आदि का बलाबल देखे
बिना श्रीराम की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। अथवा माघ शुक्ल नवमी को चन्द्रमा
और तारा शुभ होने पर करें। मार्गशीर्ष अथवा वैशाख की पूर्णिमा के दिन भी
मूल आदि दोष न होने पर प्रतिष्ठा करें। गोपाल कृष्ण की स्थापना के लिए
श्रावण, नृसिंह और केशव की प्रतिमा-स्थापन के लिए वैशाख एवं राम के लिए
चैत्र प्रशस्त मास है। भगवान् अनन्त की प्रतिमा भी माघ में स्थापित करें।
मन्दिर की वास्तु का विधान किया गया है कि मन्दिर के स्थान से काँटा,
ईंट, पत्थर आदि हटाकर वहाँ तबतक खोदें जबतक जल छूटने लगे। फिर पत्थर
और बालू से भरकर उस स्थान को दृढ़ कर पत्थर कूटकर ठोंक पीट कर दो हाथ
ऊँचा चबूतरा (भूमिका) बनावें। इसपर सुन्दर देवालय का निर्माण करें। इसके
चारों ओर गोपुर से युक्त प्राकार का निर्माण करावें। मन्दिर के गर्भगृह में दो
हाथ की चौकोर वेदी बनाकर पीठ के आगे हनुमान्, अग्निकोण में सुग्रीव, दक्षिण
में भरत, नैर्ऋत्य में विभीषण, उत्तर में शत्रुघ्न और ईशान कोण में जाम्बवान् का
अंकन करें एवं बीच में श्रीराम का अंकन करें। इस यन्त्र का अंकुरारोपण आदि
कर प्रतिष्ठापन करें और कुटुम्बवाले दरिद्र ब्राह्मण को यह मन्दिर दान करें।
त्रिंशाध्याय
इस अध्याय में दशाक्षर आदि मन्त्र का विधान किया गया है। तथा
प्रत्येक मन्त्र के लिए अलग-अलग ध्यान बतलाये गये हैं। आगे लक्ष्मण भरत,
शत्रुघ्न, हनुमान् इन अंग देवताओं के मालामन्त्र का विधान किया गया है। अन्त

(56) अगस्त्य-संहिता

में कहा गया है कि श्रीराम के अनेक मन्त्र हैं, उन मन्त्रों के साथ लक्ष्मण का मन्त्र
भी जपना चाहिए, तभी दशाक्षर आदि मन्त्रों की सिद्धि होगी। कौन मन्त्र किस
साधक के लिए अनुकूल होगा, इसकी विवेचना के क्रम में शत्रु और मित्र का जो
विचार किया जाता है, वह भी लक्ष्मण के मन्त्र में नहीं किया जाता है। इस प्रकार
श्रीराम के मन्त्र के साथ लक्ष्मण के मन्त्र का जो जप करते हैं, वे सभी पापों से
मुक्त होकर सभी कामनाओं को पाता है।
एकत्रिंशाध्याय
इस अध्याय में श्रीराम एवं लक्ष्मण के मन्त्रों के विविध प्रयोग संकलित
हैं। श्रीराम एवं लक्ष्मण के विभिन्न ध्यानों का स्मरण करते हुए षडक्षर मन्त्रराज के
जप करने से विभिन्न प्रकार की लौकिक सिद्धियों का प्रतिपादन किया गया
है। जैसे- अयोध्या में राज्याभिषिक्त श्रीराम का ध्यान करें और एकाग्र होकर
पचास हजार मन्त्र का जप कर अपने नष्ट राज्य को पावें। नागपाश से विमुक्त
श्रीराम का ध्यान करते हुए एकान्त में रहकर दस हजार जप कर बेड़ी के बन्धन
से मुक्त हो जाता है। हनुमानजी के द्वारा लायी गयी औषधियों से कष्ट से मुक्त
श्रीराम का ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से मनुष्य अपनी अपमृत्यु को
जीत लेता है। मेघनाद का वध करनेवाले श्रीलक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकाग्र
होकर जप करने से शीघ्र ही बहुत सारे दुर्जय शत्रुओं को जीत लेते हैं। शूर्पणखा
की नाक काटने के लिए उन्मुख श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एक हजार जप
करने से इन्द्र आदि को भी जीत लेते हैं। श्रीराम के चरणकमल की सेवा करने के
लिए द्वार बनाकर अवस्थित श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकान्त में जप करते
हुए साधक अनेक महारोगों को जीत लेते हैं।
यहाँ कहा गया है कि भौतिक सिद्धि के लिए श्रीराम के मन्त्रों का प्रयोग
पापकारक भी हो सकता है, किन्तु लक्ष्मण-मन्त्र का प्रयोग पापकारक नहीं होता
है। अतः विशेष रूप से लक्ष्मण की पूजा लौकिक सिद्धि के लिए करनी चाहिए।
द्वात्रिंशोऽध्याय
इस अध्याय में हनुमान् के कवच मन्त्र का पाठोद्धार का विवरण देते हुए
इसके जप करने से भूत, प्रेत, पिशाच आदि के दूर भागने की बात कही गयी है।
इस हनुमत्कवच में एक सौ वर्ण हैं और पचीस से अधिक शब्द हैं। इस मन्त्र के एक
हजार जप का पुरश्चरण श्रीराम अथवा शिव के मन्दिर में करना चाहिए। छोटे-
मोटे रोगों की शान्ति के लिए एक सौ आठ जप करना चाहिए। तीन दिन तक

(57)
जप करने से साधक संकटों से छुटकारा पा लेते हैं। भयंकर रोगों की शान्ति के
लिए एक हजार आठ जप करें। इस अध्याय में हनुमान् के माला मन्त्र का भी
विधान किया गया है तथा अनेक कामनाओं की सिद्धि के लिए जप से पूर्व अनेक
प्रकार के ध्यान बतलाये गये हैं। यही हनुमान् यन्त्र का वर्णन है तथा उसे ताबीज
में जड़कर पहनने का विधान है। आगे श्रीराम के यन्त्र और कवच का वर्णन
किया गया है। श्रीराम के यन्त्र में कुल मिलाकर इक्कीस कोष्ठ हैं। यह वज्रपंजर
नामक यन्त्र कहलाता है। आगे श्रीराम का कवच है, जिसका लेखन यन्त्र पर
करने का विधान किया गया है। इस यन्त्र पर पूजन कर इसे धारण करने से
शत्रुओं का शमन, सभी उपद्रवों का नाश, आयु, आरोग्य में वृद्धि, पुत्र-पौत्रादि में
वृद्धि तथा सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।