सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

(40) अगस्त्य-संहिता
अगस्त्य-संहिता उपासना का शास्त्रीय-ग्रन्थ है, अतः इसमें कर्म के भी
निष्काम और सकाम कर्म के भेदों का सांगोपांग विवेचन किया गया है। यहाँ तक
कि मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, भ्रामण आदि लौकिक सिद्धियों के लिए
भी श्रीराम के मन्त्र का प्रयोग करने की विधि विस्तार से बतलायी गयी है। किन्तु
उस स्थल के अन्त में स्पष्ट हिदायत दे दी गयी है कि इन कर्मों के करने से मोक्ष दूर
होता चला जायेगा और वे साधक भूत, प्रेत और पिशाच की योनियों में चले
जायेंगे। पुनर्जन्म लेकर बार-बार कीट आदि रूप में सांसारिक कष्ट भोगेंगे।
अतः साधक को चाहिए कि वे ऐसे सकाम कर्म से विरत रहें।
अपनी उन्नति के लिए सकाम कर्म को भी बुरा नहीं माना गया है।
सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए सकाम कर्म करने में बुराई नहीं है, किन्तु इसमें
भी दोष दिखाया गया है कि इससे मोक्ष मिलने में बाधा मिलेगी, क्योंकि एक कार्य
के दो फल की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अन्ततः निष्काम कर्म की श्रेष्ठता हर तरह
से यहाँ प्रतिपादित है, जिससे ईश्वर की कृपा पाकर साधक भोग और मोक्ष दोनों
का अधिकारी हो जाता है।
यहाँ प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषय-वस्तु संक्षिप्त रूप से प्रदर्शित किया
जा रहा है-
प्रथम अध्याय
अगस्त्य-संहिता का प्रारम्भ महामुनि अगस्त्य और सुतीक्ष्ण के वार्तालाप
की भूमिका से हुआ है। दण्डकारण्य में नर्मदा के तट पर सुतीक्ष्ण का आश्रम था।
एक दिन वहाँ अगस्त्य का आगमन हुआ, तो अतिथि सत्कार के बाद सुतीक्ष्ण ने
पूछा कि मैंने अपने जीवन में कई यज्ञ किए, प्रभूत दक्षिणा दी, दान दिया, फिर
तपस्या भी की, किन्तु अब भी मैं काम, क्रोध आदि से पीड़ित हूँ। अब मुझे ऐसा
उपाय बतलाएँ, जिससे मैं इस संसार के सागर को पार कर सकूँ।
इस प्रश्न के उत्तर के रूप में महामुनि अगस्त्य ने शिव और पार्वती की
एक कथा सुनायी, जिसमें पार्वती द्वारा इसी प्रश्न पर भगवान् शिव ने संसार के
सागर को पार करने का उपाय बतलाया था। यहाँ शिव सर्वप्रथम संसार की
विभीषिका का वर्णन करते हैं कि माया से ग्रस्त मनुष्य कैसे बार-बार पृथ्वी पर
जन्म लेते हैं और फिर अपकर्म कर पुनः रौरव नरक में जा गिरते हैं। अथवा,
कुछ लोग वशीकरण, आकर्षण आदि तान्त्रिक क्रियाओं को करते हुए वर्णाश्रम
धर्म का विचार न कर मांस, रक्त, मदिरा का अर्पण कर कर्मकाण्ड सम्पन्न करते