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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(152) अगस्त्य-संहिता

अब बतलाएँ कि इस संसार में कर्म के लिए न्यायोपार्जित धन कहाँ से
मिलेगा? यज्ञ में कर्म के मर्मज्ञ ऋत्विक् क्या यजमान का उपकार करते हैं?
क्व च तिष्ठन्ति मन्त्राश्च नियमाध्यापिता पुनः।
अधीतानि यमेनापि सम्यग् वा पाठनं कुतः।।5।।
कथमेवंविधं कर्मफलं साधकमिष्यते।
फिर नियमपूर्वक पढ़ाये गये मन्त्र कहाँ है? कोई यम का पालन करते हुए
पढ़ना भी चाहे, तो सम्यक् रूप से किससे पढ़े? तब इस प्रकार किये गये कर्म भला
कैसे इष्टसाधक हो सकेगा?
यदर्थसाधकत्वेन यच्च यस्य प्रचोदितम् ।।6।।
तत्रैवोक्तं प्रयत्नेन व्यङ्गं चेत् तदसाधनम् ।¹
जो कर्म जिस प्रयोजन के लिए साधन के रूप में कहा गया है, वही कर्म
अपने अंग के लोप हो जाने पर असाधन हो जाता है।
( लोक में नियम है- एकदेशविकृतमनन्यवत्। अर्थात् यदि कुत्ते की पूँछ
कटी हो, तब भी उसे कुत्ता ही कहेंगे, उसकी संज्ञा नहीं बदलती है, किन्तु कर्म के
साथ यह विडम्बना है कि इसका एक अंग भी छुट जाये, तो वह साधन नहीं
असाधन हो जाता है।)
कर्तुं कारयितुं वापि ब्रह्मा विष्णुमहेश्वरः ।।7।।
न शक्नोतीति¹ मे बुद्धिर्विहितं विधिवत् स्वयं।
को वान्ये विधिवत् कर्म कृत्वेष्टं साधयेत् फलम्² ।।8।।
सभी अंगों के साथ विधिवत् कर्म करने और कराने में तो ब्रह्मा, विष्णु
और महेश भी समर्थ नहीं होंगे, यह मेरी बुद्धि कहती है। तब दूसरा कौन है, जो
स्वयं विधिवत् कर्म कर अभीष्ट फल पा सकेगा?
कर्म कर्ता कृतिश्चैव साधनानि बहून्यपि।
एतत्साध्यं फलं तेन सुखी भवति देहवान् ।।9।।
कर्ता, कर्म, कृति और अनेक प्रकार के साधनों के द्वारा मनुष्य को कर्मफल
मिलता है, जिससे वह सुखी होता है।
तेषां न्यूनातिरिक्ताभ्यां अतथा चोदिता सती।
विपरीतफलस्यैव³ दात्री स्यात् कृतिरुज्जसा।।10।।

  1. घ. न शक्तोस्तीति। 2. घ. पुनः।

एकविंशोऽध्यायः (153)
कर्मों में न्यूनता और अधिकता हो जाने के कारण शास्त्रानुसार सम्पन्न न
होने से कर्म शीघ्र ही विपरीत फल देने लगता है।
निर्मलीकरणं कर्म वदन्ति ह्यपि चेतसः।
तत्फलानर्थिभिः सम्यग्विहितं तदनुष्ठितम्।।11।।
कर्म के फल की प्राप्ति की कामना न रखनेवाले साधकों द्वारा भलीभाँति
जो कर्म किया जाता है, वह चित्त को शुद्ध करने की प्रक्रिया है, ऐसा लोग कहते हैं।
योगाभ्यासदशायाञ्च तन्नित्यं कर्म नित्यशः।
नैमित्तिकनिमित्तेषु काम्यं नैव समाचरेत् ।।12।।
योगाभ्यास करते समय नित्यकर्म प्रतिदिन करना चाहिए और नैमित्तिक
के लिए किये जानेवाले कर्म के साथ काम्य कर्म नहीं करना चाहिए।
सम्यगुत्पन्नवैराग्यो यदा भवति देहवान्।
तदा सर्वं परित्यज्य कर्म मोक्षाय कल्पते।।14।।
भलीभाँति वैराग्य हो जाने पर प्राणी जब स्वयं को देहधारी समझता है,
अर्थात् आत्मा से भिन्न शरीर का अस्तित्व मानने लगता है, तब वह सभी कर्मों
का त्यागकर मोक्ष की इच्छा करने लगता है।
योगाभ्यासरततः शान्तो निर्धूताशेषकल्मषः।
ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति परिव्राडेव नेतरः।।15।।
सर्वात्मना परित्यागो नास्त्यन्येषामतस्ततः।
योगाभ्यास में लीन होकर सभी पापों को जलाकर शान्तचित्त ब्रह्मज्ञानी
परिव्राजक ब्रह्म ही हो जाता है, अन्य नहीं; क्योंकि अन्य लोग हर प्रकार से त्याग
नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
ब्रह्मचारिगृहारण्यवासिनां योगिनामपि।।16।।
सर्वात्मनामृतत्वेन ब्रह्मीभावो यतः परम्।¹
गृहस्थों और वानप्रस्थियों में तथा योगियों में जो ब्रह्मचारी होते हैं, वे
सभी प्रकार से अमरत्व से पूर्ण होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं।
परित्यक्तात्मदेहादिपत्नीपुत्रादिमानितः ।।17।।
स्वं देहमपि योऽमेध्यं विण्मूत्रमपि चिन्तयेत्।
यतिरुत्पन्नवैराग्यो ब्रह्मेति ब्रह्मवित्तमः।।18।।

  1. घ. यतो भवेत्। 2. घ. एक श्लोक अनुपलब्ध।

(154) अगस्त्य-संहिता
ऐसे व्यक्ति, जो शरीर, पत्नी, पुत्र आदि का अभिमान छोड़ चुके हैं, उनमें
से अनन्य ब्रह्मचारी शरीर को अपवित्र मानते हुए उसे विष्ठा और मूत्र के समान
सोचें। तब वैराग्य उत्पन्न होने के कारण जो यति हो जाते हैं, वे ब्रह्मज्ञानियों में
श्रेष्ठ होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं।
२कर्मावकाशलेशोऽपि मोक्षे नास्ति ततो मुने।
परमार्थविदो नूनं विरक्तस्य सुचेतसः।।
परमार्थ को जाननेवाले, विरक्त एवं निर्मल चित्तवाले मनुष्यों के लिए
मोक्षमार्ग में कर्म के लिए थोड़ा सा भी स्थान नहीं है।
अमेध्यं दृश्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
कश्चित्किमर्थं यत्किञ्चित् कुर्याद् भ्रान्त इवात्मवान्।।19।।
यह स्थावर एवं जंगम रूप सम्पूर्ण जगत् ही अपवित्र दिखाई पड़ता है।
कोई प्राणी इस जगत् में जो कुछ भी है, उसका प्रयोजन जानकर तथा आत्मा का
ज्ञान पाकर भी कोई भ्रमित व्यक्ति के समान कर्म करता है।
को वामेध्यं परित्यक्तं पुनरङ्गे विनिक्षिपेत्।
विष्ठाशनः शूकरोऽपि न स्वविष्ठाशनो भवेत्।।20।।
कौन ऐसा प्राणी है, जो अपवित्र वस्तु का परित्याग कर उसे पुनः अपने
शरीर पर डाले! विष्ठा खानेवाला सूअर भी अपनी विष्ठा तो नहीं खाता है!
स्वेनासत्त्वेन मुक्तस्य स चिन्तां किं करिष्यति।
जगत्यभ्युदयार्थं यद् भवेत् कर्म तथाविधि।।21।।
एतत् तत्त्वविदो न्यूनं न भ्रान्तस्य कदाचन।
जो अपने असत्त्व रूप शरीर से मुक्त हो चुका है, उसे चिन्ता किस बात
की होगी? किन्तु इस संसार में अपनी उन्नति के लिए जो कर्म किये जाते हैं, वे
तत्त्वज्ञानियों के लिए न्यून होते हैं न कि भ्रान्त लोगों के लिए।
इन्द्रियाणि शरीरं च वर्तन्ते मनसा समम्।।22।।
विषयेष्वेव तोयानि स्वतो न्यूनस्थलेष्विव।
दुःखमुत्पादयन्त्येव तदानीमायतावपि।23।।
इन्द्रियाँ तथा शरीर मन के साथ संयुक्त होकर नीचे विषयों की ओर उसी
प्रकार गिरने लगते हैं, जैसे जल हमेशा नीचे की ओर बहता है। ऐसी स्थिति में
स्फीत स्थल में भी वे इन्द्रियाँ तथा शरीर दुःख ही उत्पन्न करते हैं।

  1. घ. दुःखकृद्।

एकविंशोऽध्यायः (155)
यो यस्य पापकृद्¹ वैरी स तस्येति स्थितिर्भवेत्।
तदन्ते वैरिणं ज्ञात्वा समीपेऽप्यपकारिणम् ॥ २४ ॥
स तेनैव हतो भूत्वा प्राणानपि विमुञ्चति ।
जो शत्रु है और पाप देनेवाला है, उसे लोग अपना (हित) बना लेते हैं,
यही विडम्बना की स्थिति है। किन्तु देहान्त के समय में प्राणी समीप में स्थित
अपकार करनेवाले शत्रु को जानकर भी उसी के द्वारा घायल होकर अपना प्राण
भी त्याग कर देता है।
अतो यत्नेन देहादीन् कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।। २५ ।।
शोधयेद् विधिवत् सम्यक् न च तैरभिभूयते ।
अतः यत्नपूर्वक देह आदि को कृच्छ्र एवं चान्द्रायण व्रत आदि के द्वारा
विधानपूर्वक सम्यक् प्रकार से शुद्ध करें, इससे वह साधक इन्द्रियों के द्वारा पराजित
नहीं होता है।
यदि तैरभिभूतः स्यात् स्वस्यापि प्रियमप्रियम् ॥ २६ ॥
न वेत्ति विषयाविष्टो नरकं प्रतिपद्यते ।
यदि वह शरीरादि से पराजित हो जाता है, तब अपन प्रिय और अप्रिय
भी नहीं जान पाता है और विषय में लिप्त होकर नरक का भागी बनता है।
ततः कर्मविपाकेन तरुगुल्मलतादिकम् ॥ २७ ॥
सम्प्राप्य कृमिकीटादिजन्तुत्वं प्रतिपद्यते ।¹
ग्रामारण्यपशुत्वं च यच्च यावच्चराचरम् ॥ २८ ॥
समुपेत्य विनष्टात्मा मानुष्यं प्रतिपद्यते ।²
ऐसा होने पर कर्म के परिणामस्वरूप वृक्ष, झुरमुट, लता आदि के रूप में
तथा कीड़े-मकोड़े के रूप में जन्तु का शरीर प्राप्त करता है। वह पालतू और
जंगली जानवर के रूप जन्म लेकर जितने स्थावर और जंगम प्राणी हैं, उसके रूप
में जन्म लेते हुए आत्मज्ञान के नष्ट हो जाने पर मनुष्य की योनि में जन्म लेते हैं।
ततः पुराकृतं स्वस्य दुःखदं कर्म विस्मरन् ॥ २९ ॥
करोत्यनिष्टं सततं हितं नैव समाचरेत् ।
ततोऽयन्नारकी भूत्वा पुनरेवं प्रपद्यते ॥ ३० ॥

  1. घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. मनुष्यत्वं प्रपद्यते ।

(156) अगस्त्य-संहिता
भूयो भूयोऽप्येवमेव चक्रवत्परिवर्तते।
तब पूर्वजन्म में अपने किये गये दुःखप्रद कर्मों को भूलते हुए हमेशा गलती
ही करता रहता है और कल्याणकारी कार्य नहीं करता है। तब वह जीव नरक
प्राप्त कर फिर इसी प्रकार उत्पन्न होता है। बार बार इसी प्रकार चक्र के समान
परिवर्तन होता रहता है।
विहितं च निषिद्धं च सः कर्म विदधीत वै।।31।।
संसारान्न निवर्तन्ते कदाचिदपि दुःखितः।
अतः शास्त्र में जिस कर्मकाण्ड का विधान किया गया है अथवा जिसे
निषिद्ध माना गया है, उन्हें जो करते हैं, वे दुःखी इस संसार से छुटकारा
नहीं पाते हैं।
न ज्ञानव्यतिरेकेण मुक्तये साधनान्तरम्।।32।।
सुतीक्ष्ण विद्यते तत्त्वज्ञाननिष्ठो भवानघ।
तद्योगेनैव भवति योगोऽप्यभ्यासपूर्वकः।।33।।
अभ्यासोऽपि यमाद्यैश्च जायते नान्यथा मुने।
अतः हे निष्पाप सुतीक्ष्ण! ज्ञान को छोड़कर मुक्ति का दूसरा साधन कुछ
भी नहीं है, अतः तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करो। यह ज्ञान योग से होगा तथा योग भी
अभ्यास करने से होगा। यह योगाभ्यास भी यम आदि का पालन करने से होगा
अन्य विधि से नहीं।
अधीत्य वेदशास्त्राणि¹ विरक्तैः सात्त्विकैश्च तैः।।34।।
यमादयोऽनुष्ठीयन्ते त्यक्तदेहाभिमानिभिः।
वेद और शास्त्रों का अध्ययन कर विरक्त और सात्त्विक प्रवृत्ति के लोगों
द्वारा अपने शरीर का अभिमान छोड़ देने पर यमादि का पालन किया जाता है।
स्वदेहाभिमानोऽपि तेषामेव न विद्यते।35।।
नित्यानित्यार्थतत्त्वज्ञाः शान्ताश्च यतयोऽपि ये।
यह नित्य है और यह अनित्य है, इसका जिन्हें ज्ञान हो गया है, ऐसे शान्त
यती को ही अपने शरीर का अभिमान नहीं रहता है।
मुक्तये न परो मार्गो मुक्तये न परन्तपः।।36।।
मुक्तये न परं ध्यानं ततोऽन्यन्नास्ति किञ्चन।


  1. घ. वेदशास्त्रार्थ।

द्वाविंशोऽध्यायः (157)
मुक्ति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं, दूसरा कोई तप नहीं, दूसरा कोई
ध्यान नहीं। इस ज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
यदि त्वमुपपद्यैव देहादौ ममतामपि।।37।।
त्यज कर्माखिलं सम्यक् यदि मुक्तिमपेक्षसे।
इस प्रकार, यदि मोक्ष चाहते हो, तो ज्ञान प्राप्त कर शरीर इन्द्रिय आदि के
प्रति ममता का त्याग करो और सभी कर्मों का भी त्याग करो।
जानीहि सम्यगात्मानमन्तरे त्वं निरन्तरम्।।38।।
मूलाधारे च हृदये द्वादशान्ते स्थितो हि सः।
यावदन्तर्बहिः सर्वं व्याप्य रामः प्रकाशते।।39।।
देहादिषु गतेष्वेकं स्वयमेवावशिष्यते।
ततस्त्वतः परं कञ्चिद् विद्यते न तपोधन।।40।।
आत्मा को भलीभाँति जानो और हमेशा उसे अपने अन्तःकरण में स्थित
जानो। वह परमात्मा मूलाधार, हृदय और द्वादश चक्र के अन्तस् में स्थित है।
भीतर बाहर जो कुछ भी है, उनमें श्रीराम व्याप्त होकर उन्हें प्रकाशित करते हैं।
शरीर आदि के नष्ट हो जाने पर भी एकमात्र श्रीराम शेष रह जाते हैं। हे
तपोधन सुतीक्ष्ण! इसलिए इसके ऊपर कुछ भी नहीं है। श्रीराम परम सत्ता हैं।
एवं च सति दुःखञ्च संसारोऽप्यस्थितो मुने।
यतित्वव्यतिरेकेण यो यतेत स मूढधीः।।41।।
दुःखात्यन्तनिवृत्तौ च विना वा ब्रह्मविद्यया।
सर्वात्मना हि सर्वेभ्यो विषयेभ्यो निवर्तनम्।।42।।
हे मुनि सुतीक्ष्ण! इस प्रकार श्रीराम को परम सत्ता के रूप में जान लेने
पर दुःखमय यह संसार अस्तित्वहीन हो जायेगा। यति धर्म के बिना जो भी इसके
लिए यत्न करते हैं, वे मूर्ख हैं। अथवा, ब्रह्मविद्या के बिना दुःखों की पूर्ण निवृत्ति
के लिए तथा हर प्रकार से सभी विषयों से छुटकारा पाने के लिए भी जो यत्न
करते हैं, वे मूर्ख हैं।
ब्रह्मविद्यासमायुक्तं यतित्वं मुक्तिसाधनम्।
तत्त्वतो न परं किञ्चित् साधनं मुक्तयेऽस्ति हि।।43।।

(158) अगस्त्य-संहिता

ब्रह्मविद्या से युक्त जो यति धर्म है, वह मुक्ति का साधन है। वस्तुतः इससे
आगे ऐसा कोई साधन नहीं है, जो मोक्ष के लिए हो।
अतस्तदयनं सर्वं मङ्गलं सर्वसिद्धिदम्।
यथा भागीरथी गङ्गा सागरेण समं गता ।।44।।
पुनाति पतितान् ब्रह्मविद्यापि भुवनत्रयम्।
इसलिए वह समस्त मंगलमय तथा सारी सिद्धि देनेवाला मार्ग है। जैसे
सगर के वंशज भगीरथ द्वारा लायी गयी गंगा पतितपावनी है, उसी प्रकार, ब्रह्म
विद्या तीनो लोकों को पवित्र करती है।
यतिदर्शनमात्रेण योगाभ्यासपरायण। ।।45।।
सम्यग् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ¹ निर्मली कुरुते जगत्।
हे योगाभ्यास में लीन सुतीक्ष्ण! हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! यतियों के दर्शनमात्र
से यह संसार पवित्र हो जाता है।
प्रायश्चित्तं पुनात्याशु यथा द्वादशवार्षिकम् ।।46।।
विधिवत् स्वीकृतं सम्यग् यतित्वं च तथा सताम्।
²अतः सर्वात्मना ब्रह्मकैवल्यं नित्यमभ्यसेत् ।।47।।
जिस प्रकार, बारह वर्ष तक का प्रायश्चित्त शीघ्र पवित्र करता है, उसी
प्रकार सज्जनों द्वारा आचरित विधानपूर्वक, शास्त्रानुमोदित सम्यक् यति धर्म पवित्र
करता है। अतः सभी प्रकार से ब्रह्म-कैवल्य का नित्य अभ्यास करना चाहिए।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये ब्रह्मविद्यानिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः।।
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच।
योगो नाम किमेतन्मे ब्रूहि योगविदां वर।
चेतसो विजयः केनोपायेन स्यान्मुनीश्वर।।1।।
सुतीक्ष्ण बोले- हे योगिराज! अगस्त्य! योग क्या है? यह मुझे बतलाएँ
और मन पर विजय कैसे मिलेगा?

  1. घ. ब्रह्मविदश्चैव। 2. घ. में अनुपलब्ध। 3. घ. स्यात्तथा ततः।

द्वांविंशोऽध्यायः (159)
अगस्त्य उवाच।
समीरणाः शरीरान्तर्निरुद्धा येन यत्नतः³।
मनोप्येवं निरुद्धः स्यात् तदात्मनि समीहते॥२॥
अगस्त्य बोले- 'जिस प्रकार के प्रयास से वायु शरीर के भीतर रोक लिए
जाते हैं, उसी प्रयत्न से मन भी आत्मा में समाहित हो जाता है।'
ज्ञानानन्दरसास्वादस्तस्मान्नैव निवर्त्तते।
अनायासेन मनसो निश्चलत्वमुपेक्षसे॥३॥
तदापानं समुत्कृष्य प्राणेनानीय योज्यताम्।
प्राणापानौ समौ कृत्वा¹ चित्तमप्यात्मनिस्थितम्॥४॥
सुखमास्वादयत्येव द्वादशार्णाब्जनिःसृतम्।
तदास्वादं परः शश्वत् कदाचिदपि न त्यजेत्॥५॥
ज्ञानानन्द के रस का स्वाद पा लेने पर मन आत्मा से फिर लौटता नहीं।
तब अनायास ही मन की निश्चलता की अपेक्षा होने लगती है। इसके बाद साधक
प्राणवायु को खींचकर अपान वायु को भी खींच लेता है और अन्यत्र मन को नहीं
लगाता है। तब प्राण और अपान वायु को समान कर चित्त को आत्मलीन कर
द्वादशदल कमल से निःसृत अमृत के स्वाद को चख लेता है। इस परम स्वाद को
एक बार पा लेने पर उसे कभी नहीं छोड़ता है।
आदावेतानि जानीहि शरीरोत्पत्तिकारणम्।
उत्पत्तिमथ संस्थानं क्रमं कर्त्तारमात्मनः॥६॥
सबसे पहले अपनी शरीरोत्पत्ति के ये कारण जानो। उत्पत्ति, स्थिति,
उसका क्रम और कर्त्ता को जानो।
अनादिरेव संसारोऽदृष्टमात्रं तु कारणम्।
विधिस्तदनुरूपेण विद्यते निग्रहान् किल॥७॥
स्वस्यादृष्टैश्च बहुधा नानारूपेण भेदिताः।
सर्वेषामपि संख्यातं तेषां नास्ति तपोनिधे॥८॥
आत्मानो बहवोऽनन्ताः श्रुतिरित्थमेवमब्रवीत्।
अपने अपने भाग्य के फल के कारण अनेक प्रकार के अनेक रूपों में पृथक्
किए गये जीव होते हैं। आत्मा के अनन्त रूप हैं- ऐसा श्रुति वचन है, इसलिए
सभी जीवों की संख्या निश्चित नहीं है।

  1. घ. युक्तौ।

(160) अगस्त्य-संहिता

संसारब्धेरनादित्वात् सम्यग्ज्ञानोदयावधि ।। ९ ।।
एतावदप्यहोऽनन्तदुःखमेवानुभूयते ।
अनादि होने के कारण इस संसार रूपी दुःख को भी तबतक जीव अनुभव
करता है, जबतक उसमें ज्ञान का उदय नहीं हो जाता।
उद्भिज्जान्याण्डजान्ये हुः स्वेदजानि विपश्चितः ।। १० ।।
जरायुजानि बहुधा चतुर्द्धा भेदितान्यपि।
उद्भिज, अण्डज, स्वेदज और जरायुज, ये चार प्रकारों में बँटे जीव अनेक
प्रकार से उत्पन्न होते हैं।
सम्यङ््महीमधिष्ठायोद्भिज्जायत इत्यथ ।। ११ ।।
पाञ्चभौतिकरूपाणि तृणादीनि तु तान्यथ।
पत्रपुष्पफलस्कन्धशाखाभेदेन बोधत ।। १२ ।।
अच्छी तरह पृथ्वि में रहने वाले तथा उसे भेदकर उगनेवाले पाँच भूतों के
स्वरूप तृण आदि भी जो हैं, वे भी शरीर रूप हैं, जिन्हें पत्र, पुष्प, फल, तना और
डाल के रूप में भिन्नता लिए जानो।
अण्डजान्यपि गोधादिरूपेणैषामवस्थितिः।
सुप्रसिद्धे च चान्यानि स्वेदजानि तपोनिधे ।। १३ ।।
यूकाकीटादिरूपाणि प्रक्षीयन्ते क्षणे क्षणे।
छिपकिली आदि के रूप में जिनकी अवस्थिति होती है, वे अण्डज हैं तथा
दूसरे स्वेद से उत्पन्न स्वेदज जूँ, कीड़े आदि रूप में क्षण क्षण नष्ट होते हैं। ये दोनों
रूप प्रसिद्ध हैं।
जरायुजान्यथोत्पत्तिं प्राप्नुवन्ति प्रभावतः ।। १४ ।।
स्वस्यादृष्टस्य पक्वस्य भुक्तिप्रक्षीणस्य चात्मनः।
स्त्रीपुंसोर्ग्राम्यधर्मेण जायेते शुक्रशोणिते ।। १५ ।।
तदुक्तरसरूपेण देहमस्य¹ प्रजायते।
अब जरायुजों के विषय में कहता हूँ कि अपने अदृष्ट का फल जब पक
जाता है और भोग शेष हो जाता है, तब उसके प्रभाव से जन्म लेते हैं। स्त्री और
पुरुष के संभोग से शुक्र और शोणित उत्पन्न होते हैं, उस कहे गये रस के रूप में
इसका शरीर उत्पन्न होता है।

१. घ. तत्त्वमस्य। २. घ. वाय्वग्निजलेदेहजः।

द्वांविशोऽध्यायः (161)
यथाग्निरनिलं प्राप्य स्वाकारमधिगच्छति ।।16।।
एवं शुक्रमयो जीवः शोणितं स्वस्य कर्मणा।
सम्प्राप्य योषितः सम्यग् वासनोभयदेहजः² ।।17।।
योषातः पुरुषोत्पन्नं मलाभ्यामपि तत्त्ववान्।
जैसे अग्नि हवा पाकर अपना स्वरूप प्राप्त करता है, उसी प्रकार शुक्रमय
जीव अपने कर्म के प्रभाव से योनि से निःसृत शोणित को पाकर वासना के कारण
स्त्री और पुरुष के शरीर से उत्पन्न होकर पुष्ट होने के कारण पुरुष से उत्पन्न दोनों
मलों (शुक्र और शोणित) से भी तत्त्व युक्त रहता है।
सोऽयं प्रविश्य गर्भान्तर्मरुदग्न्यद्भिरेत्र तु ।।18।।
क्लेद्यते क्वाथ्यते सम्यक् शुक्रशोणितवृद्धितः।
तत्सामान्येन जायन्ते नरनारीनपुंसकाः ।।19।।
शुक्र और शोणित की वृद्धि से उत्पन्न होकर यह गर्भ के भीतर प्रविष्ट
होकर वायु, अग्नि और जल के द्वारा भींगता है, उबलता है। इस तरह सामान्य
रूप से नर, नारी और नपुंसक जन्म लेते हैं।
सोऽयमेवंविधाकारो मातुर्गर्भे¹ प्रवर्तते।
प्रतिक्षणं प्रतिदिनं प्रतिमासं तथाविधः ।।20।।
घनीभूतस्तदत्रैव मातुर्भुक्तरसात्मवान्।
अङ्गुष्ठवदथायामी जलबुद्बुदवद् दिने ।।21।।
द्वितीयेऽप्येवमेवायं वर्द्धते प्रतिवासरे।
इस प्रकार इस प्रकार के आकार का यह जीव माता के गर्भ में प्रतिक्षण,
प्रतिदिन और प्रतिमास लगातार बढ़ता रहता है तथा माता के द्वारा खाये गये
रसों से स्वयं सम्पुष्ट होता हुआ यही गर्भ में ठोस होकर अँगूठे के आकार का जल
के बुलबुले के समान दिनानुदिन बढ़ता हुआ दूसरे मास में भी यह उसी प्रकार
प्रतिदिन बढ़ता है।
अवाङ्मुखोऽप्यावृत्ता नाडी काचिद् ऋजुर्भवेत् ।।22।।
तत्पक्षोभयसम्बन्धे द्वे अन्या सप्तनाडयः।
तासु या प्रथमं स्वस्याः सुषुम्णेति च गीयते ।।23।।

  1. घ. मत्यो गर्भे।

(162) अगस्त्य-संहिता
वामाङ्गेडा पिङ्गला स्याद् दक्षिणस्था तथोत्तरा।
गान्धारी हस्तजिह्वा च सपुष्पालम्बुषास्तथा।।24।।
नीचे की ओर मुख करके वह जीव रहता है। इसके बाद चारों ओर
लिपटी हुई नाडी सीधी हो जाती है। वह दो भागों में बँट जाती है तथा अन्य सात
नाड़ियाँ भी उत्पन्न होती हैं। इन नाडियों में पहली अपनी नाड़ी है, जिसे सुषुम्णा
कहते हैं। वाम अंग में ईडा, दाहिने अंग में पिंगला, ऊपर में गांधारी, हस्तजिह्वा,
सपुष्पा एवं अलम्बुषा नाडियाँ होती है।
यशस्विनी शङ्खिनी च हूहूरिति दश क्रमात्।
या तासु मध्यमा तस्याः सुषुम्णायाः पृथक् पृथक्।।25।।
प्लवन्ति पञ्चपर्वाणि तेभ्यो लक्षत्रयं पुनः।
लक्षार्द्धञ्च शिरा जाताः शरीरं व्याप्नुवन्ति च¹।।26।।
इसके अतिरिक्त यशस्विनी, शंखिनी और हूहू ये मिलकर क्रमशः दस
नाड़ियाँ हैं। उनमें जो मध्यमा नामक नाड़ी उसकी स्थिति सुषुम्णा से पृथक् होती
है। इनमें पाँच गाँठें तैरती रहती हैं, जिनसे तीन लाख नाड़ियाँ उत्पन्न होती हैं
और पचास हजार शिराएँ उत्पन्न होकर शरीर में फैल जाती हैं।
देहेस्मिन् दश विज्ञेया जलस्याञ्जलयो मुने²।।
रसस्य नव षट्कैकैव पुरीषस्य प्रकीर्तिताः।।27।।
रक्तस्याञ्जलयोऽप्यष्टौ षट् श्लेष्माण उदाहृताः।
पित्तस्यापि तथा पञ्च मूत्रस्यापि शरीरके।।28।।
चत्वारोऽत्र वसायाश्च त्रयो द्वे मेदसस्तथा।
एकोऽर्द्धं चापि मज्जायाः रेतसस्तावदेव हि।।29।।
श्लेष्मौजसोप्येमेवमेभिर्देहो निबध्यते।
इस शरीर में दस जल के गढ़े होते हैं। रस के नौ तथा विष्ठा के छह गढ़े
होते हैं। रक्त के आठ गढ़े होते हैं, जिनमें छह छोटे होते हैं। पित्त के पाँच, मूत्र
के चार, वसा के तीन और मेद के दो गढे होते हैं। मज्जा का एक और आधा गढ़े
होते हैं और रेत के भी उतने ही होते हैं। श्लेष्मा और ओजस् के भी इतने ही
होते हैं। इन सबसे यह शरीर बँधा हुआ रहता है।

  1. घ. प्राप्नुवन्ति। 2. घ. जलस्य मुनिपुंगव।

द्वाबिंशोऽध्यायः (163)
— — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — —
दिने दिनेऽप्येवमेव वर्द्धतेऽङ्गं तपोनिधे।।30।।
पूर्वमाभिर्भवन्त्येव शिरःपादौ करावपि।
आधिः स्यान्महती तस्य षडङ्गेन्तरेष्वेव तु।।31।।
वागाक्षिनासिकाः कर्णत्वक्कपोलं च हनुद्वयम्।।
चिबुकं दन्तपंक्तिश्च जिह्वा चैवोपजिह्विका।।32।।
शिरःकेशास्तथा कण्ठं स्कन्धं कूर्परपाणयः।
नखांश्चाङ्गुलयः कक्ष उरः पार्श्वद्वयं तथा।।33।।
पृष्ठमप्युदरं नाभिः कटिस्फिचौ¹ गुदादिकम्।।
ऊरू च जानुनी जंघे पादावङ्गुलयस्तथा।।34।।
रोमाप्येतच्छरीरं तच्चर्मणाच्छादितं मुने।
हे तपोनिधि सुतीक्ष्ण! इस प्रकार क्रमशः अंग बढ़ते हैं। सबसे पहले शिर,
पैर और दोनों हाथ प्रकट होते हैं। इस प्रक्रिया छह अंगों के भीतर अत्यधिक कष्ट
होता है। अंगों में वाणी, आँख, नासिका, कान, त्वचा, कपोल, टुढी, चिबुक,
दन्तपंक्ति, जिह्वा, लबलबी, शिर के केश, कण्ठ, कन्धा, केहुनी, हाथ, नाखून,
अंगुलियाँ, दोनों काँख, छाती, दोनों पंजर, पीठ, उदर, नाभि, कमर, कूल्हा, गुदा
आदि, दोनों घुटने, दोनों जाँघें, पैरों की अंगुलियाँ और रोम, इन अवयवों से
शरीर बनता है और चर्म से ढँका रहता है।
बहिरन्तश्चरन्तोऽमी वायवश्चालयन्ति च।।35।।
देशाद् देशान्तरं देहे सप्तधातूनविद्रुतम्।
इस शरीर को बाहर भीतर चलते हुए वायु चलाते हैं। यही वायु शरीर में
तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक सातो धातुओं को भी चलाते हैं।
वायवः पंच देहस्थाः पृथगेव प्रकीर्तिताः।।37।।
प्राणाख्यो हृदये वायुरपानाख्यो गुदे स्थितः।
समानाख्योऽपि नाभौ स्यादुदानः कण्ठदेशतः।।38।।
आपादमस्तकं व्यानः समस्तं व्याप्य² तिष्ठति।
शरीर में स्थित पाँच वायु अलग अलग ही अवस्थित रहते हैं। 'प्राण'
नामक वायु हृदय में, 'अपान' नामक गुदा में 'समान' नामक नाभि में और
'उदान' नामक कण्ठस्थल में रहते हैं। 'व्यान' नामक वायु सिर से पैर तक सम्पूर्ण
शरीर में व्याप्त रहता है।

  1. घ. स्फिकोपस्थ। 2. घ. समभिव्याप्य। 3. घ. कृकरो।

(164) अगस्त्य-संहिता
नागः कूर्मोऽथ कृकलो³ देवदत्तो धनञ्जयः ।। 39 ।।
वायवो दश देहेऽस्मिन् सप्तधातुषु संस्थिताः ।
सप्तैवान्येषु दोषेषु स्वेदक्लेदान्तगामिनः ।। 40 ।।
इसके अतिरिक्त सात धातुओं में नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय
ये पाँच वायु हैं। ये दश वायु शरीर में होते हैं। दूसरे दोष उत्पन्न करनेवाले सात
वायु हैं, जो पसीना और मूत्र के अंग में रहते हैं।
एवं शरीरमासाद्य प्रसूतिसमये भृशम् ।
स्वमातरं व्यथयन्नन्तमुदरे विनिवर्तते ।। 41 ।।
नवमे दशमे मासि शरवन्निःसरेदपि ।
पूयशोणितविण्मूत्रपरीताङ्गोऽथ सज्ज्वरः ।। 42 ।।
योनेरवनिमासाद्य क्लेशातिशयमोहितः ।
रोदित्यच्चैर्विषण्णः सन् विस्मरेच्च मनोगतम् ।। 43 ।।
इस प्रकार, शरीर प्राप्त कर जीव समय होने पर प्रसव के समय बार बार
अपनी माता को अनन्त कष्ट देता हुआ उसके उदर में पहुँच जाता है और नवम
या दशम मास तीर की तरह बाहर निकल जाता है, अर्थात् जन्म लेता है। मवाद,
शोणित, विष्ठा और मूत्र से लिपटा तथा तप्त शरीर वाला शीघ्र ही योनिद्वार से ही
जन्म लेकर अत्यधिक कष्ट से व्याकुल होकर जोर-जोर से रोता है और अपने मन
की सभी स्मृतियों को वह भूल भी जाता है।
अमृतत्वमनावृत्तिलक्षणं साध्यमात्मनः ।
तत्त्वज्ञानबहिर्भूतो भूयो भूयो विमोहितः ।। 44 ।।
आत्मानमपि विस्मृत्य बहिरेव प्रधावति ।
क्षुत्पिपासातुरो नित्यं स्तनमेव किलेच्छति ।। 45 ।।
अपने अभीष्ट, अमृत नामक मोक्षस्वरूप ब्रह्म को वह जीव भूल जाता है
और बाहर की ही ओर दौड़ पड़ता है; क्योंकि वह उस तत्वज्ञान से बहिर्भूत
होकर बार बार मोहित हो जाता है। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह स्तन
ही चाहता है।
दिने दिने वर्द्धमानः पक्षे मासि ऋतावपि ।
तत्तत्कालोक्तविषयैः सम्यगाविष्कृतो भवेत् ।। 46 ।।
पितृभ्यो बन्धुभिः सम्यक् कायो नित्यं प्रमोदितः ।

संवर्द्धितः शश्वदयं वर्षे वर्षे प्रयत्नतः ।।47।।
यद्धितं स्वस्य सततं तदानीमायतावपि।
तत्सर्वं सम्परित्यज्य बहिरेव प्रवर्त्तते ।।48।।
दिनानुदिन पक्ष मास और ऋतु के अनुसार बढ़ता हुआ वह उन उन समय
के लिए उक्त विषयों के द्वारा भली भाँति प्रकट हो जाता है। वह शरीरधारी
पिता, भाई के साथ प्रतिदिन प्रसन्न होता है। वह साल दर साल बढ़ता हुआ,
उसका जो हमेशा कल्याणकारी है, उस परमधाम तथा परमेश्वर का साथ छोड़कर
बाहर ही दौड़ता है।
यद्ययं सर्वमुत्सृज्य पश्येदात्मानमात्मनि।
एतावतेव संसारभवदुःखैर्विमुच्यते ।।49।।
यदि वह जीव सब कुछ छोड़कर आत्मा में अपने को देखे, तो इससे ही वह
संसार में जन्म लेने के दुःखों से मुक्त हो जाता है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये शरीरोत्पत्तिर्नाम
द्वाविंशतितमोऽध्यायः।।
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
अद्वैतानन्दचैतन्यशुद्धसत्त्वैकलक्षणः ।
बहिरन्तः सुतीक्ष्णात्र स्वयमात्मा प्रकाशते ।।1।।
अनाद्यसृष्टमेवात्र¹ कारणन्तत्र गोपते ।
न्यूनं वाप्यतिरिक्तं वा सर्वत्रापि तपोनिधे ।।2।।
हे सुतीक्ष्ण! अद्वैत, आनन्दस्वरूप, चैतन्यस्वरूप, शुद्ध, सत्त्व, आ एकत्व
इन छह लक्षणों वाली आत्मा स्वयं मनुष्य के भीतर और बाहर प्रकाशित रहती
है। इस आत्मा का कारण अनादि और अदृष्ट है, जो चाहे कम मात्रा में हो या
अधिक मात्रा में, सभी स्थितियों में आत्मा में प्रकाशित होती है।
आधिक्ये विषयैर्नित्यं बहिरेव प्रतीयते।
न्यूनेऽपि विषयात्यन्ता प्राप्या तस्माद् बहिर्भवेत् ।।3।।

  1. घ. अनाद्यसृष्टमेवात्र।

(166) अगस्त्य-संहिता

आत्मा के कारणों की अधिकता होने पर आत्मा विषयों के साथ बाह्य रूप
में प्रतीत होती है और कारणों की न्यूनता होने पर विषयादि के साथ संयुक्त
होकर उससे बाहर हो जाती है।
अतो जानीहि चात्मानमात्मन्येव निरन्तरम्।
आसक्तो विषयैर्नित्यं स्वस्यादृष्टोपकल्पितैः ।।4।।
यत्र यद्यत् प्रपञ्चेऽस्मिन् जङ्गमाजङ्गमात्मके।
तत्र सर्वत्र चैतन्यं तिष्ठत्येवं निरन्तरम् ।।5।।
इसलिए आत्मा को निरन्तर आत्मा में ही स्थित जानो, किन्तु अपने भाग्य
के कारण जीव इस मिथ्या विषयों के साथ आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति इस
स्थावर और जंगम रूप संसार में जहाँ जहाँ होती है, उन सभी जगहों पर निरन्तर
चैतन्य की सत्ता अवश्य होती है।
कार्यात्मना प्रपञ्चोऽयं चैतन्यं कारणात्मना।
अनुस्मृतं हि सर्वत्र भूतानाञ्चात्र भौतिके ।।6।।
स्वयमेवात्र चैतन्यं तस्मादन्यन्न किञ्चन।
यह प्राणियों का यह भौतिक संसार कार्य रूप है और चैतन्य कारण रूप
में सर्वत्र अनुभव किया जाता है। यहाँ स्वयं चैतन्य की सत्ता है और उससे परे
दूसरे कुछ भी नहीं है।
परमात्मा च जीवात्मा ब्रह्म सच्च तदोमिति ।।7।।
ज्ञानमानन्दमित्येत् सर्वं चैतन्यवाचकम्।
चैतन्यान्न परं किञ्चिद् दृश्यते सर्वजन्तुषु ।।8।।
परमात्मा, जीवात्मा, ब्रह्म, सत्, ॐकार, ज्ञान, आनन्द- ये सबके सब
चैतन्य के वाचक हैं। चैतन्य से परे सभी प्राणियों में कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता है।
प्रबुद्धस्याप्रमत्तस्य पृथिवीव घटादिषु।
अतः शुद्धं पृथिव्यादौ दृश्यते सर्वदेहिनाम् ।।9।।
अदृष्टं कल्पयेद्यत्र स्वीयं स्वस्मिन् भवेदिह।
जो प्रबुद्ध हैं और अहंकारी या पागल नहीं हैं, उनकी दृष्टि में जिस प्रकार
घट आदि में पृथिवी तत्त्व है, उसी प्रकार सभी प्राणियों के अन्तस्तत्त्व पृथ्वी आदि
पाँच तत्त्वों में दृष्टिगोचर होते हैं। अदृष्ट आत्मा की जहाँ कल्पना की जाती है,
वहाँ स्वयं में अपनी आत्मा होती है।

त्रयोविंशोऽध्यायः (167)
प्रेमादिर्जायते लोके स्वस्मिन् वा स्वोपकारके।।10।।
न चेन्नैव समीचीनं यदन्यद् तद् विलोक्यते।
विलक्षणानि भूतानि तत्तत् कार्यं तथाविधम्।।11।।
स्वीये स्वस्मिन्निवाचारः कथं तत्परिशोधय।
इस संसार में स्वयं से अथवा अपना उपकार करनेवालों से प्रेम आदि हो
जाते हैं। यदि न हो तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे प्राणियों में भी ऐसा
देखा जाता है। ये प्राणी भी अजीब हैं। उनके वे प्रत्येक कार्य उन्हीं के जैसे होते
हैं। अपने से सम्बद्ध पदार्थों में अपने जैसा व्यवहार तथा उस व्यवहार का शोधन
कैसे होगा?
श्रुतिस्मृतिपुराणेषु सर्वत्र प्रतिपादितम्।।12।।
सर्वात्मनापि चैतन्यं सर्वमात्मनि नापरम्।
वेद, स्मृति और पुराणों में सर्वत्र यह प्रतिपादित किया गया है कि आत्मा
के कारण चैतन्य है और वह चैतन्य आत्मा में स्थित है, वह भिन्न नहीं है।
सुतीक्ष्ण उवाच
कथं तत्त्वज्ञ सर्वेषां नैवं रूपेण दृश्यते।
कदाचिदपि कस्यापि यथैतच्चेदृशं वद।।13।।
सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे तत्त्वज्ञानी अगस्त्य! इस प्रकार से सभी प्राणियों का
चैतन्य क्यों नहीं दिखाई पड़ता है? कभी कभी किसी की दृष्टि में जिस प्रकार
उपर्युक्त तथ्य प्रकट होते हैं, यह कहें।
अगस्त्य उवाच
लोके तत्तन्न जानाति यद्यदेवाभिमर्षितम्।
तत्तज्ज्ञानादृष्टहान्या तत्रैवान्तर्हितं तपः।।14।।
अगस्त्य बोले- इस संसार में जो विषय सम्पर्क में नहीं आते, उन विषयों
को लोग नहीं जान पाते हैं। उन विषयों के सम्पर्क से ज्ञान हो जाने पर तथा भाग्य
क्षीण हो जाने के कारण तप अर्थात् इन्द्रिय निग्रह आदि तिरोहित हो जाते हैं
अर्थात् जीव विषयों में रम जाता है।।

(168) अगस्त्य-संहिता
बुभुत्सुः कर्मतत्त्वज्ञो दृष्टिमानप्रमादितः।
यदि पश्येत् परं ज्योतिरेकं सर्वत्र पश्यति।।15।।
कर्म के तत्त्वों को जाननेवाला भोग चाहनेवाला भी यदि सावधान होकर
दृष्टि रखते हुए देखे तो उस एकमात्र परम ज्योति का दर्शन सर्वत्र करेगा।
यद्यनन्यमनाः पश्येद्विद्रुक्षुर्विषयेष्वपि।
तच्चैतन्यं वरं पश्येन्नान्यत् किञ्चिदपि स्वयम्।।16।।
यदि चैतन्य का दर्शनाभिलाषी बिना दूसरी ओर ध्यान दिए विषयों में देखे
तो वही श्रेष्ठ चैतन्य स्वयं दिखाई पड़ेगा, दूसरा कुछ भी नहीं।
पापिष्ठाः क्रूरकर्माणस्ततो नित्यं बहिःकृताः।।
तत्तत्फलार्थिनः सर्वे कथं पश्यन्ति तद् वद।।17।।
जो पापी हैं, क्रूर कार्य करते हैं और इस कारण वे सदा बहिष्कृत रहते हैं
वे अपने क्रूर कर्म का भी फल चाहते हैं, वे कैसे चैतन्य को देखते हैं, यह कहिए।
करस्थं नैव जानाति पुमान् विषयनिश्चलः।
अत्यन्तान्तर्हितं वेत्ति विजिज्ञासुरतथाविधः।।18।।
विषयों में सदा आसक्त लोग अपनी हथेली पर स्थित उस परम ज्योति को
इस विधि से नहीं जान पाते और चैतन्य को जानने की इच्छा रखनेवाले उसे
अत्यन्त प्रच्छन्न मान लेते हैं।
पश्य सर्वात्मना सर्वं सर्वत्रापि तपोनिधे।
प्रकाशते स्वयं साक्षात् सच्चिदानन्दलक्षणः।।19।।
हे तपोनिधे! हर प्रकार से सबकुछ देखो कि हर जगह साक्षात् सत् चित्
और आनन्द स्वरूप भगवान् प्रकाशित हैं।
ततोऽस्ति न परं किञ्चिद् वासत् तत् तद् विलक्षणम्।¹
तत्तिरस्करिणीं प्राहुरविद्यां ज्ञानिनामपि।।20।।
उनसे परे कुछ भी नहीं है, असत् भी नहीं है, अपरिभाषित कोई तत्त्व नहीं
है। उस भगवान् और प्राणी के बीच ज्ञानियों में भी एक पर्दा है, जिसे अविद्या
कहते हैं।

  1. घ. ततोऽस्मान्न परं किञ्चिद् बाह्यमेतद्वि लक्षणम्।

त्रयोविंशोऽध्यायः (169)
व्यामोहयति चेतांसि विषयेषु बलान्मुने।
दृष्टा स्यात् सर्वजन्तूनां सुखदुःखादिलक्षणा। 1 ।।21।।
वह अविद्या चित्त को मोह में डालकर विषयों में जबरदस्ती लगाती
रहती है। सुख और दुःख इसी अविद्या का लक्षण है। यह अविद्या सभी प्राणियों में
देखी जाती है।
अदृष्टान्तर्हिताः सर्वे नापि सर्वत्र संस्थितम्।
पश्यन्ति पुरतः साक्षाच्चैतन्यं सर्वगोचरम् ।।22।।
इसी अदृष्ट अविद्या से ढके हुए सभी लोग सर्वत्र विद्यमान् और सामने में
स्थित सर्वगोचर चैतन्य को नहीं देख पाते हैं।
शुद्धिमानप्रमत्तो यः कदाचिद् विषयैरपि।
नैव प्रलोभितः साक्षादात्मानं परमीक्षते ।।23।।
जो शुद्ध आचरण करनेवाले और प्रमाद रहित हैं, उन्हें विषय कभी लुभा
नहीं पाते और वे परम आत्मा को साक्षात् देखते हैं।
एवंविधोऽपि यः कश्चित् सच्चिदानन्दलक्षणम्।
आत्मानं सर्वगं सम्यक् जानात्येव न संशयः ।।24।।
इस प्रकार भी कोई व्यक्ति सत् चित् और आनन्द-स्वरूप सबके द्वारा
प्राप्त करने योग्य आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
स जीवन्नेव मुक्तः स्याद्यद्येवं वायुमानयेत्।
बहिः सर्व समानीय चैतन्यं स्वगतं पुनः।।25।।
यदि मनुष्य अपने अन्दर अवस्थित वायु को रेचक क्रिया के द्वारा बाहर
लावे और चैतन्य को अपने अन्दर स्थापित करे तो इसी जीवन में मुक्त हो जाते हैं।
पूरकेनैव योगेन सर्वतः स्थितमन्ततः।
सम्यगाधाय चाधारे ध्यायेद् राममनन्यधीः।।26।।
प्राणायाम के अन्तर्गत पूरक के योग से (वायु को भीतर करते हुए) सर्वत्र
स्थित श्रीराम को अन्ततः आधार-चक्र पर स्थापित कराकर एकाग्र होकर ध्यान
करना चाहिए।
शरीरान्तर्गतं वायुं दशधा तत्र तत्र तु।
एकीकृत्य प्रयत्नेन कुम्भकेनैव योगतः 2 ।।27।।

  1. घ. दृष्टा स्यात् सुखदुःखादाविच्छाद्वेषादिलक्षणा। 2. घ. यत्नतः।

(170) अगस्त्य-संहिता
——————————————————————
तत्रैव सुदृढं बद्ध्वा पवनं सात्मना समम्।
स्थित्वैवं तु मुहूर्ताद्धेर्मुन्मीलय मुखं मुने।।२८।।
शरीर के अन्दर में स्थित वायु को दश प्रकार से प्रयत्नपूर्वक कुम्भक द्वारा
एकीकृत कर वहीं पर दृढ़ रूप से वायु को आत्मा के साथ बाँधकर इस तरह आधा
मुहूर्त (24 मिनट) स्थिर रहें, तब मुख खोलें।
सुषुम्णायाः प्रयत्नेन सम्यक् सर्पमुखाकृतिः।
वायुना पूरकाभ्यासं कर्तव्यं साधयेत्ततः¹।।२९।।
ग्रन्थिभेदक्रमेणैव चैतन्यानि समीरणैः।
सुषुम्णा नाड़ी के प्रयत्न से सर्प के समान मुख की आकृति बनाकर वायु से
पूरक का अभ्यास करना चाहिए। तब ग्रन्थियों एक एक कर वायु से भेदन कर
विभिन्न स्तर के चैतन्यों की साधना करनी चाहिए।
उन्नीय पवनं यत्नात् कुर्यात् तन्मुखगोचरम्।।३०।।
चिद्घनानन्दचैतन्यसमीरस्तन्मुखागतः ² , ।
नयेदूर्ध्वं परन्नुन्नं³ पुनः पुनरपि स्वयम्।।३१।।
अभ्यासातिशयेनैव भिनत्यूर्ध्वमनन्यधीः।
वायु को खींचकर यत्नपूर्वक उसे मुखेन्द्रिय में संचारित करावें। यह चित्
स्वरूप और आनन्द स्वरूप चैतन्य रूप वायु तब मुख में आ जाती है। बार बार
धकेलते हुए उसे स्वयं ऊपर की ओर ले जायें। अतिशय अभ्यास करने से
एकाग्रचित्त साधक ऊपर मूर्द्धा का भेदन कर लेता है।
तत्परं परया⁴ तत्र निःसृतान्तरगोचरः।।३२।।
भूमौ वीरासनं बद्धमन्तरालं नयेदपि।
इसके बाद परा चक्र से निर्गत तथा बीच में स्थित पवन को वहाँ बीच में
लावें। भूमि पर वीरासन में बैठकर यह योग करें।
पुनर्यदिवमेवायं द्वितीयमपि भेदयेत्।।३३।।
तदन्तान्तर्गतो वायुः शरीरं चोर्ध्वमानयेत्।
फिर इसी प्रकार दूसरे चक्र का भी भेदन करना चाहिए। उस चक्र के
भीतर जाकर वायु शरीर को ऊपर उठाता है।
——————————————————————

  1. घ. कर्तव्यस्तेन। 2. ग. विधूतानन्द°, घ. विमलानन्द° । 3. घ. परं मूर्द्धनं। 4. घ.
    उद्धृत्यापूर्य्य तत्रैव।

त्रयोविंशोऽध्यायः (171)
— — — — — — — — — — — — — — — — — — — —
हृदयग्रन्थिभेदेन • सम्यगभ्यासयोगतः ।।34।।
तत्र सन्धिषु सम्बद्धं तत्ताल्वाद्यन्तगो मरुत्।
सम्यक् संशोध्य स्वं देहं भ्रूमध्यमुपसर्पति।।35।।
भलीभाँति अभ्यास करने पर हृदय की ग्रन्थि का भेदन करने से वहाँ
सन्धियों से होकर वायु तालु आदि प्रदेशों में संचरित होकर अपने शरीर का
संशोधन कर भ्रू-मध्य में चली जाती है।
तत्र स्याद् द्विद्ले पद्मे सुधानिधिरलौकिकम्।
अनृतं बाहयेत्तेन अमृतत्वाय कल्पते।।36।।
वहाँ द्विदल कमल में अमृत का अलौकिक खजाना है। इस अमृत के प्रवाह
में असत्य को प्रवाहित करावें अर्थात् उसका शोधन करें। इससे अमरत्व की प्राप्ति
होती है।
भेदेन पञ्चमस्येव पर्वणोऽधिगते पुनः।
शब्दब्रह्मापि निखिलं तेन¹ सर्वज्ञता भवेत् ।।37।।
पाँचवीं गाँठ के खुल जाने पर पर्वों का ज्ञान होने पर उनमें स्थित शब्दब्रह्म
की गाँठ खुल जाती है, तब वह सर्वज्ञ हो जाता है।
मूलाधारे स्थितं वायु सुषुम्नानाडिमध्यगम्।
तत्तद् ग्रन्थिविभेदेन ब्रह्मरन्ध्रं नयेदपि ।।38।।
मूलाधार में स्थित वायु जो सुषुम्णा नाडी से होकर गजरती है, उस वायु के
वेग से बीच में स्थित ग्रन्थियों को खोलते हुए वायु को ब्रह्मरन्ध्र में ले जायें।
पूर्वोक्ताभ्यासयोगेन द्वादशान्तर्गतं पुनः।
तदेव निखिलं ज्ञानं जन्मापि सफलं ततः।।39।।
पूर्वोक्त प्रकार से अभ्यास करते हुए द्वादशार चक्र तक जब वायु पहुँच
जाती है, तब समग्र ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे यह जन्म भी सफल हो
जाता है।
वैराग्येण तदप्येति त्यागेनैव हि तत्परम्।
संन्यासेनैव योगीन्द्र नान्यो मार्गोऽस्ति तस्य तु।।40।।


  1. ग. येन।
    Rarest Archiver