अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वांविशोऽध्यायः (161)
यथाग्निरनिलं प्राप्य स्वाकारमधिगच्छति ।।16।।
एवं शुक्रमयो जीवः शोणितं स्वस्य कर्मणा।
सम्प्राप्य योषितः सम्यग् वासनोभयदेहजः² ।।17।।
योषातः पुरुषोत्पन्नं मलाभ्यामपि तत्त्ववान्।
जैसे अग्नि हवा पाकर अपना स्वरूप प्राप्त करता है, उसी प्रकार शुक्रमय
जीव अपने कर्म के प्रभाव से योनि से निःसृत शोणित को पाकर वासना के कारण
स्त्री और पुरुष के शरीर से उत्पन्न होकर पुष्ट होने के कारण पुरुष से उत्पन्न दोनों
मलों (शुक्र और शोणित) से भी तत्त्व युक्त रहता है।
सोऽयं प्रविश्य गर्भान्तर्मरुदग्न्यद्भिरेत्र तु ।।18।।
क्लेद्यते क्वाथ्यते सम्यक् शुक्रशोणितवृद्धितः।
तत्सामान्येन जायन्ते नरनारीनपुंसकाः ।।19।।
शुक्र और शोणित की वृद्धि से उत्पन्न होकर यह गर्भ के भीतर प्रविष्ट
होकर वायु, अग्नि और जल के द्वारा भींगता है, उबलता है। इस तरह सामान्य
रूप से नर, नारी और नपुंसक जन्म लेते हैं।
सोऽयमेवंविधाकारो मातुर्गर्भे¹ प्रवर्तते।
प्रतिक्षणं प्रतिदिनं प्रतिमासं तथाविधः ।।20।।
घनीभूतस्तदत्रैव मातुर्भुक्तरसात्मवान्।
अङ्गुष्ठवदथायामी जलबुद्बुदवद् दिने ।।21।।
द्वितीयेऽप्येवमेवायं वर्द्धते प्रतिवासरे।
इस प्रकार इस प्रकार के आकार का यह जीव माता के गर्भ में प्रतिक्षण,
प्रतिदिन और प्रतिमास लगातार बढ़ता रहता है तथा माता के द्वारा खाये गये
रसों से स्वयं सम्पुष्ट होता हुआ यही गर्भ में ठोस होकर अँगूठे के आकार का जल
के बुलबुले के समान दिनानुदिन बढ़ता हुआ दूसरे मास में भी यह उसी प्रकार
प्रतिदिन बढ़ता है।
अवाङ्मुखोऽप्यावृत्ता नाडी काचिद् ऋजुर्भवेत् ।।22।।
तत्पक्षोभयसम्बन्धे द्वे अन्या सप्तनाडयः।
तासु या प्रथमं स्वस्याः सुषुम्णेति च गीयते ।।23।।
- घ. मत्यो गर्भे।