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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 337 में से

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पृष्ठ 228

त्रयोविंशोऽध्यायः (167)
प्रेमादिर्जायते लोके स्वस्मिन् वा स्वोपकारके।।10।।
न चेन्नैव समीचीनं यदन्यद् तद् विलोक्यते।
विलक्षणानि भूतानि तत्तत् कार्यं तथाविधम्।।11।।
स्वीये स्वस्मिन्निवाचारः कथं तत्परिशोधय।
इस संसार में स्वयं से अथवा अपना उपकार करनेवालों से प्रेम आदि हो
जाते हैं। यदि न हो तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे प्राणियों में भी ऐसा
देखा जाता है। ये प्राणी भी अजीब हैं। उनके वे प्रत्येक कार्य उन्हीं के जैसे होते
हैं। अपने से सम्बद्ध पदार्थों में अपने जैसा व्यवहार तथा उस व्यवहार का शोधन
कैसे होगा?
श्रुतिस्मृतिपुराणेषु सर्वत्र प्रतिपादितम्।।12।।
सर्वात्मनापि चैतन्यं सर्वमात्मनि नापरम्।
वेद, स्मृति और पुराणों में सर्वत्र यह प्रतिपादित किया गया है कि आत्मा
के कारण चैतन्य है और वह चैतन्य आत्मा में स्थित है, वह भिन्न नहीं है।
सुतीक्ष्ण उवाच
कथं तत्त्वज्ञ सर्वेषां नैवं रूपेण दृश्यते।
कदाचिदपि कस्यापि यथैतच्चेदृशं वद।।13।।
सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे तत्त्वज्ञानी अगस्त्य! इस प्रकार से सभी प्राणियों का
चैतन्य क्यों नहीं दिखाई पड़ता है? कभी कभी किसी की दृष्टि में जिस प्रकार
उपर्युक्त तथ्य प्रकट होते हैं, यह कहें।
अगस्त्य उवाच
लोके तत्तन्न जानाति यद्यदेवाभिमर्षितम्।
तत्तज्ज्ञानादृष्टहान्या तत्रैवान्तर्हितं तपः।।14।।
अगस्त्य बोले- इस संसार में जो विषय सम्पर्क में नहीं आते, उन विषयों
को लोग नहीं जान पाते हैं। उन विषयों के सम्पर्क से ज्ञान हो जाने पर तथा भाग्य
क्षीण हो जाने के कारण तप अर्थात् इन्द्रिय निग्रह आदि तिरोहित हो जाते हैं
अर्थात् जीव विषयों में रम जाता है।।