१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ६६
त्रिकोणं तत्पुरं वन्हेरोधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ।
समाधौ परमं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ॥१०॥
ब्रह्मरंध्र के महापथ में सहस्र दल-कमल है। प्रथम चक्र
'आधार' है और दूसरा स्वाधिष्ठान है। यह योनि स्थान में दोनों के
मध्य में स्थित है और 'कामरूप' कहा जाता है। 'काम'
नाम का चार दल का कमल गुदा स्थान में है। उसके मध्य में सिद्धों
द्वारा बन्दना की गई 'काम' नाम की योनि है और उसके मध्य में
पश्चिम की तरफ मुख वाला महालिङ्ग स्थित है ॥६-८॥ नाभि में
मणि के समान आकार वाले (मणिपुर) को जो जानता है,
वही योगी है। तप्त सुवर्ण के समान चमक वाला, विद्युत धारा के
सदृश्य सुप्रकाशित, तीन कोण युक्त वह्नि का स्थान मेढ़ के नीचे
स्थित है। वहां पर समाधि में विश्वतोमुख अनन्त परमज्योति
दिखाई देती है ॥६-१०॥
तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातो म विद्यते ।
सबशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥११॥
स्वाधिष्ठानाश्रयादस्मान्मेढ्रमेवाभिधीयते ।
तन्तुना मणिवत्प्रोतो योऽत्र कन्दः सुषुम्नया ॥१२॥
तन्नाभिमण्डले चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् ।
द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते ॥१३॥
तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्वं न विन्दति ।
ऊर्ध्वं मेढ्रादधोनाभेः कन्दयोनिः खगाण्डवत्॥१४॥
तत्र नाड्यः समुत्पन्ना सप्तन्नाणिः द्विसप्ततिः ।
तेषु नाडीसहस्रे षुद्विसप्ततिरुदाहृता ॥१५॥
योगाभ्यास द्वारा उसे देख लेने पर आवागमन से छुटकारा हो
जाता है। प्राण को 'स्व' कहा जाता है और वह स्वधिष्ठान के