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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 572 में से

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पृष्ठ 76

६८ ] [ योगचूडामणि उपनिषद्
एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम् ।
षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपंचकम् ॥३॥
स्वदेहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् ।
चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षडदलम् ॥४॥
नाभौ दशदलं पद्मं हृदयं द्वादशारकम् ।
षोडशारं विशुद्धाख्यं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ॥५॥
ॐ । योगियों की हित कामना से ‘योगचूडामणि’ उपनिषद् को
कहता हूँ । यह कैवल्यपद और सिद्धियों का प्रदाता है और योगवेत्ताओं
द्वारा सेवित ( अभ्यासित ) है ॥ १ ॥ योग के छः अङ्ग कहे
गये हैं—आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ।
आसनों में प्रथम सिद्धासन है, दूसरा पद्मासन है । षट्चक्र,
षोडश आधार और पाँच आकाशों को जो अपनी देह के भीतर नहीं
देखता, उसको सिद्धि कहाँ हो सकती है ? इनमें आधार चक्र
(मूलाधार) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान में छः दल हैं, नाभि में
दश दल वाला और हृदय में बारह दल वाला पद्म है, फिर सोलह
पंखुड़ियों वाला विशुद्ध चक्र है और भ्रुकुटियों के मध्य दो दल का
चक्र है ॥२—५॥
सहस्रदलसंख्यातं ब्रह्मारन्ध्रे महापथि ।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥६॥
योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ।
कामाख्यं तु गुदस्थाने पङ्कजं तु चतुर्दलम् ॥७॥
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता ।
तस्य मध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥८॥
नाभौ तु मणिवद्विम्बं यो जानाति स योगवित् ।
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥९॥