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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 561

चाक्षुषोपनिषत् ] [ ५५३
के तेज रूप से स्थिर होओ । मेरी रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो ।
मेरे नेत्र-रोग को शीघ्र शान्त करो, शान्त करो । मुझे अपने स्वर्ण के
समान तेज के दर्शन कराओ । जिससे मैं अन्धा न होऊँ ऐसा उपाय
करो, उपाय करो । कल्याण करो । मेरे जितने ऐसे पाप हैं जिनके
द्वारा देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है उन सबको समूल नष्ट कर दो ।
नेत्रों को तेज देने वाले दिव्य स्वरूप भगवान् भास्कर को मेरा नमस्कार
है । करुणा करने वाले अमृतस्वरूप को मेरा नमस्कार है । सूर्य भगवान्
को नमस्कार है । नेत्रों के प्रकाश रूप सूर्य नारायण को नमस्कार है ।
आकाश में विहार करने वाले सूर्य को नमस्कार है । अत्यन्त श्रेष्ठ रूप
को नमस्कार, रजोगुणमय सूर्य को नमस्कार है । तमोगुण के आश्रय-
भूत सूर्य को नमस्कार है । हे प्रभो ! मुझे असत् से सत् की ओर ले
चलो, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृतत्व की ओर
ले चलो । उष्णता युक्त भगवान् सूर्य शुचि रूप हैं । हंस रूप भगवान्
सूर्य शुचि रूप तथा अप्रतिरूप हैं । जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्या का
पाठ नित्य करता है उसे नेत्रों से सम्बन्धित कोई रोग नहीं होता । उसके
कुल में कोई अन्धा नहीं होता । यह विद्या आठ ब्राह्मणों को उपदेशित
करने पर इसकी सिद्धि प्राप्त होती है ।
ॐ विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं
हिरण्मयं पुरुषं ज्योतिरूपं तपन्तम् ।
विश्वस्य योनिं प्रतपन्तमुग्रं
पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ।
ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिन्यहोवाहिनी
स्वाहा । ॐ वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियेमेधा ऋषयो नाध-
मानाः । अपध्वान्तमूर्णुहि पूर्द्धि चक्षुर्मु मुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान् ।
पुण्डरीकाक्षाय नमः । पुष्करेक्षणाय नमः । अमलेक्षणाय नमः ।
कमलेक्षणाय नमः । विश्वरूपाय नमः । महाविष्णवे नमः ।