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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 572 में से

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पृष्ठ 547

सूर्योपनिषत् [ ५३६
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि
जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा ॥ ३ ॥
नमस्त आदित्य । त्वमेव प्रत्यक्षं कर्मकर्ताऽसि । त्वमेव
प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं
रुद्रोऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्ष यजुरसि । त्वमेव
प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वाऽसि । त्वमेव सर्वं
छन्दोऽसि ॥ ४ ॥
• आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद्भूमिर्जायते । आदित्य-
दापो जायन्ते । आदित्याज्ज्योतिर्जायते । आदित्याद्व्योम दिशो
जायन्ते । आदित्याद्देवा जायन्ते । आदित्याद्वेदा जायन्ते ।
आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावादित्यो ब्रह्म ।
आदित्योऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहङ्काराः । आदित्यो वै व्यानः
समानोदानोऽपानः प्राणः । आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन-
घ्राणः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै
शब्दस्पर्शरूप रसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गा-
नन्दाः । आनन्दमयो विज्ञानमयो विज्ञानमय आदित्यः ॥ ५ ॥
अब सूर्य-सम्बन्धी अथर्ववेदीय मन्त्रों की व्याख्या की जाती है ।
इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, देवता सूर्य हैं । 'हंसः' 'सोऽहं'
अग्निनारायण युक्त बीज तथा हृल्लेखा शक्ति है । कीलक वियत् आदि
सृष्टि से संयुक्त है । इसका विनियोग चारों प्रकार की पुरुषार्थ-सिद्धि में
करते हैं । छः स्वरों पर प्रतिष्ठित बीज सहित षडाङ्ग रक्तकमल पर
स्थित, सात अश्वों से युक्त रथ पर आरूढ़, हिरण्यवर्ण, चार भुजाओं में
दो कमल, वरमुद्रा और अभयमुद्राधारी कालचक्र के विधायक सूर्य को
इस भांति जानने वाला ही ब्राह्मण है, ॥ १ ॥ जो सूर्य नारायण प्रणव
के अर्थभूत सत्-चित्-आनन्दमयं तथा भूः भुवः स्वः रूप से त्रैलोक्य रूप