१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 536, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें५२८ ] [ राधोपनिषत्
इन नामों का जो पाठ करता है वह जीवन्मुक्त हो जाता है,
ऐसा भगवान् ब्रह्माजी का कथन है ( यहाँ तक ह्लादिनी शक्ति—राधा
जी का वर्णन हुआ ) अब सन्धिनी शक्ति का वर्णन करते हैं कि यह
शक्ति धाम, भूषण, शय्या, आसन आदि और मित्र, सेवक रूप से
परिणाम को प्राप्त होती है। जो अनेक अवतारों का कारण है उस ज्ञान
शक्ति को ही क्षेत्रज्ञ-शक्ति कहते हैं। इच्छाशक्ति के अन्तर्भूत माया
शक्ति है। वह सत्-रज-तम आदि त्रय गुण रूप है और बहिरङ्ग होने
से जगत की कारणभूत है। यह माया ही अविद्या रूप से जीव को बंधन
में डालने वाली होती है। भगवान् की क्रिया-शक्ति ही लीलाशक्ति है।
जो इस उपनिषद् को पढ़ता है, वह अव्रती हो तो भी व्रती हो जाता है;
वह वायु के समान पवित्र हो जाता है, वह सर्व पवित्र हो जाता है,
वह राधाकृष्ण के प्रिय हो जाता है। जहाँ कहीं उसकी दृष्टि पड़ती है
वहां तक वह सबको पवित्र बना देती है। ॐ तत्सत्।
॥ राधोपनिषद् समाप्त ॥