१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसीतोपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो
अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः
शान्तिः शान्तिः ।
शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से
कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते
रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे
भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने
वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे
गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें !
ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति ॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् का सीता किं रूपमिति ॥१
स होवाच प्रजापतिः सा सीतेति—
मूलप्रकृतिरूपत्वात् सा सीता प्रकृतिः स्मृता ।
प्रणवप्रकृतिरूपत्वात् सा सीता प्रकृतिरुच्यते ॥२
सीता इति त्रिवर्णात्मा साक्षान्मायामया भवेत् ।
विष्णुः प्रपञ्चबीजं च माया ईकार उच्यते ॥३
सकारः सत्यममृतं प्राप्तिः सोमश्च कीर्त्यते ।
तकारस्तारलक्ष्म्या च वै राजामृतकरः स्मृतः ॥४