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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 522

५१४ ] [ त्रिपुरोपनिषत्
के कारण सम प्रधान समान, शक्ति वाले, समान ओज वाले देव इसी
जन्म में जिन निष्कामों को दृष्टिगोचर हो जाया करते हैं उन्हें वह ब्रह्म
पद के दाता हो जाया करते हैं। उन दयालु शिव व शक्ति के मध्य
त्रिविध शरीर से विलक्षण जराहीन विश्वमाता शक्ति है ॥१४॥
जो कि निष्काम बुद्धि से अपने उपासकों की भावनाओं द्वारा
ज्ञान, विज्ञान, सम्यग् ज्ञान रूप हवि से तृप्त होकर अपने भक्तों पर
प्रसन्न हो विक्षेप रूपी आवरण के गल जाने पर शिव के साथ अपने
उपासक की आत्मस्वरूप बनकर अवशिष्ट रह जाती है। इस प्रकार
उपासक अपनी अज्ञ दृष्टि द्वारा कल्पित प्रपञ्च के उन्मनस्क होकर, सारे
विश्व के जो उत्पादक, पालक एवं संहारक हैं उन शिव में विश्वरूपता का
आपादन कर लेता है ॥१५॥
इस प्रकार जो यह महोपनिषत् इसे ऋक् आदि चार वेद और
अन्य चौसठ जो कलायें (विद्यायें) जिस अक्षय संविद् रूप को उदार
वाणी (शब्दों) द्वारा गाया करते हैं इत्थं भूत यह ब्रह्म विद्या ब्रह्ममात्र
पर्यसन्न (ब्रह्म साक्षात्कार जिसका अन्तिम तत्व है) सर्वोत्कृष्ट है ॥१६॥
इसका शरीर 'ॐ ह्रीं मों ह्रीम्' एतद् रूप है। अर्थात् चिद्
एवं चिच्छक्ति रूप है ॥ १७ ॥
॥ त्रिपुरोपनिषद् समाप्त ॥
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