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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 572 में से

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पृष्ठ 493

देव्युपनिषत् [ ४८५
अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधाम्यहम् ।
विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ॥५
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ।
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनामहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् ॥६
मम योनिरप्स्वन्तःसमुद्रे य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति ॥७
देवी के समीप जाकर सभी देवताओं ने निवेदन किया—'महा-
देवि ! अपने सम्बन्ध में बताओ कि तुम कौन हो ?' ॥१॥
देवी ने उत्तर दिया—'मैं ब्रह्म स्वरूपिणी हूँ। यह कार्य-कारण
रूप, प्रकृति-पुरुषात्मक विश्व मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द
रूपिणी तथा अ नन्द-रहित रूप वाली हूँ। मैं विज्ञानमयी और अविज्ञान
रूप हूँ। मैं ज्ञातव्य ब्रह्म तथा ब्रह्म से परे भी हूँ। मैं पञ्चीकृत अथवा
अपञ्चीकृत महाभूत हूँ। दिखाई पड़ने वाला यह सम्पूर्ण विश्व मैं ही
हूँ। विद्या-अविद्या, वेद-अवेद, अजा और अनजा मैं ही हूँ। मैं नीचे
भी हूँ, ऊपर भी हूँ, अगल-बगल में भी मैं ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं
के रूप में संचार करने वाली हूँ। आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में
भ्रमण करती रहती हूँ। मैं ही मित्रावरुण, इन्द्राग्नि और अश्विद्वय की
पालिका हूँ। सोम, पूषा, भग और त्वष्टा को मैं ही धारण करती हूँ।
तीनों लोकों को आक्रान्त करने के उद्देश्य से पदक्षेप करने वाले विष्णु
ब्रह्मा और प्रजापति के धारण करने वाली हूँ। देवताओं के लिए हवि-
वाहक और सोमाभिषव वाले यजमान के निमित्त हवियुक्त धनों को
धारण करती हूँ। मैं उपासकों के लिए धन-दायिनी, ज्ञानवती,
यज्ञों में नायिका तथा सम्पूर्ण विश्व की अधीश्वरी हूँ। विश्व के
पिता रूप आकाश को परमात्मा के ऊपर मैं ही प्रकट करती हूँ। मेरा
स्थान आत्मरूप की धारयित्री बुद्धि वृत्ति में है। इस प्रकार जानने
वाला ज्ञानी पुरुष दिव्य सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ २-७ ॥