१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 572 में से
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देव्युपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्ताक्षर्यो
अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः
शांतिः शांतिः ॥
शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों
से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते
रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें ।
महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे सब को जानने वाले पूषा
देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव
हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति,
शांति, शांति ॥
सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः काऽसि त्वं महादेवि ॥१
साऽब्रवीदहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं
जगच्छून्यं चाशून्यं च । अहमानन्दानानन्दाः । विज्ञानाविज्ञाने-
ऽहम् । ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये । इत्याहाथर्वणी श्रुतिः ॥२॥
अहम् पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् । वेदो-
ऽहमवेदोऽहम् । विद्याऽहमविद्याऽहम् । अजाऽहमनजाऽहम् ।
अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक चाहम् ॥३॥
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणावुभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहममश्विः
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi नावुभौ ॥४॥