१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंगायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४५७
व्याकरण इसका पहला शिर, शिक्षा दूसरा, कल्प तीसरा, निरुक्ति
चौथा तथा ज्योतिष पांचवां शिर है ।
किस दिशा में, किस रङ्ग की अधिष्ठात्री देवियां स्थिति हैं ?
उनका विस्तार क्या है ? स्वर, लक्षण क्या है ? किन अक्षरों की वह
अधिष्ठातृ देवियां हैं ? कौन उनके ऋषि हैं ? कौन छन्द हैं ? कौन
शक्तियां हैं ? कौन तत्व हैं तथा कौन अवयव हैं ?
पूर्व में गायत्री जिसका रंग लाल है, मध्यम में ( दक्षिण में )
सावित्री, जिसका रंग सफेद है, पश्चिम में सरस्वती, जिसका वर्ण काला
है, स्थित हैं । ध्यान करने योग्य हैं ।
पृथिवी, आकाश तथा स्वर्ग इनके विस्तार स्थल निवास-
स्थान हैं ।
अकारोकारमकाररूपोदात्तादिस्वरात्मिका । सर्वा सन्ध्या
हंसवाहिनी ब्राह्मी । मध्यमा वृषभवाहिनी माहेश्वरी । पश्चिमा
गरुड़वाहिनी वैष्णवी । पूर्वाह्नकालिका सन्ध्या गायत्री कुमारी ।
रक्ता रक्ताङ्गी रक्तवासिनी रक्तगन्धमाल्यानुलेपनी पाशांकुशाक्ष-
मालाकमण्डलुवरहस्ता हंसारूढा ब्रह्मदैवत्या ऋग्वेदसहिता
आदित्यपथगामिनी भूमण्डलवासिनी । मध्याह्नकालिका सन्ध्या
सावित्री युवती श्वेताङ्गी श्वेतवासिनी श्वेतगन्धमाल्यानुलेपनी
त्रिशूलडमरुहस्ता वृषभारूढा रुद्रदैवत्या यजुर्वेदसहिता आदित्य-
पथगामिनी भुवर्लोके व्यवस्थिता । सायं सन्ध्या सरस्वती वृद्धा
कृष्णाङ्गी कृष्णवासिनी कृष्णगन्धमाल्यानुलेपनी शङ्खचक्रगदाभय-
हस्ता गरुडारूढा विष्णुदैवत्या सामवेदसहिता आदित्यपथगामिनी
स्वर्गलोकव्यवस्थिता ।
ये तीनों अकार, उकार तथा मकार रूप उदात्तादि स्व-
रात्मक हैं ।
प्रातःकालीन जो सन्ध्या है, वह हंस पर बैठने वाली ब्रह्मा के