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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 572 में से

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पृष्ठ 342

३३४ ] [रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
विजयश्च सुराष्ट्रश्च राष्ट्रवर्धन एव च ।
अशोको धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चैभिरावृतः ॥३७
ततः सहस्रहग्वह्निर्धर्मज्ञो वरुणोऽनिलः ।
इन्द्रीशधालनन्ताश्च दशभिश्चैभिरावृतः ॥३८
बहिस्तदायुधैः पूज्यो नीलादिभिरलंकृतः ।
वसिष्ठवामदेवादिमुनिभिः समुपासितः ॥३९
इसके पश्चात् सुग्रीव ने अपने वानरों को बुलाकर कहा—
वीरो ! तुम से कोई दिशा छिपी हुई नहीं है । अतः तुम शीघ्र ही यहाँ
से जाकर श्री सीता जी की खोज करो । आज ही लौट कर इसकी
सूचना भगवान् श्रीराम को सुनाओ । फिर हनुमान जी समुद्र को
लांघकर लङ्का में जा पहुंचे । वहाँ उन्होंने सीताजी को देखा
और अनेक राक्षसों को मारकर लंका को जला डाला । फिर वे लौट-
कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और उनको सब समाचार
सुनाया । उस समय श्रीराम को अत्यन्त क्रोधावेश हुआ और
वानरों को साथ लेकर लङ्का की ओर चल पड़े । लंका पर
आक्रमण करने के लिए उसका निरीक्षण किया गया और फिर युद्ध
छिड़ गया । लङ्कापति रावण का भाई कुम्भकर्ण मारा गया । फिर
इन्द्रजीत और रावण भी युद्ध में मारे गये । तब विभीषण
को लङ्का का राज्य देकर श्रीराम ने सीता जी को अपने वामाङ्ग में
प्रतिष्ठित किया और सब वानरों को साथ लेकर अयोध्या की ओर चल
पड़े । भगवान् श्रीराम अयोध्या के राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित
हो गये । उन धनुर्धर राम का स्वभाव ही प्रसन्न रहने का है । वे सब
प्रकार के अलंकारों से अलंकृत हैं । उनके दक्षिण हाथ में
ज्ञानमयी मुद्रा और वाम हाथ में तेज को प्रकाशित करने वाली
धनुर्मयी मुद्रा स्थित है । इस प्रकार द्विभुज रूपधारी श्रीराम स्वयं