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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 572 में से

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पृष्ठ 278

२७० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ योगकुण्डल्युपनिषत्
तृतीयोऽध्यायः
ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम्
पद्मज उवाच—
अमावस्या च प्रतिपत्पौर्णमासी च शंकर ।
अस्याः का वर्ण्यते संज्ञा एतदाख्याहि तत्त्वतः ॥१॥
प्रतिपद्दिनतोऽकाले अमावस्या तथैव च ।
पौर्णमास्यां स्थिरीकुर्यात्स च पन्था हि नान्यथा ॥२
कामेन विषयाकाङ्क्षी विषयात्काममोहितः ।
द्वावेव संत्यजेन्नित्यं निरञ्जनमुपाश्रयेत् ॥३
अपरं सत्यजेत्सर्वं यदिच्छेदात्मनो हितम् ।
शक्तिमध्ये मनः कृत्वा मनः शक्तेश्च मध्यगम् ॥४
मनसा मन आलोक्य तत्यजेत्परमं पदम् ।
मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थितिकारणम् ॥५
ब्रह्माजी बोले—मेलन मन्त्र इस प्रकार है—"ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् ।
हे शंकर ! अमावस्या, प्रतिपदा और पौर्णमासी का मूल आशय
क्या है ? ॥ १ ॥ प्रतिपदा से सूर्य का आशय है और पौर्णमासी से
चन्द्रमा का । अमावस्या का अर्थ सूर्य और चन्द्र दोनों का
अभाव है ॥ २ ॥ मनुष्य कामनाओं में ग्रसित होकर विषयाकांक्षी
होता है और विषय में पड़कर कामना बढ़ती जाती है । इसलिए शुद्ध
परमात्म भाव की प्राप्ति के लिए विषय और कामना दोनों का
त्याग करना और आत्मा में ध्यान लगाना ही आवश्यक है ॥ ३ ॥
जो अपने हित की इच्छा रखता हो उसे अन्य सब मिथ्या विषयों को
त्याग देना चाहिए और शक्ति में प्रवेश करके उसी में स्थित
रहना चाहिए ॥ ४ ॥ मन द्वारा मन को देखकर और समझकर उसका
त्याग करना ही परमपद है । उत्पत्ति और स्थिति का प्रधान बिन्दु
मन ही है ॥ ५ ॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi