१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ] [ २६१
यथा सुषुप्तिर्बालानां यथा भावस्तथा भवेत् ।
न सदा मथनं शस्तं मासे समाचरेत् ॥४७
सदा रसनया योगी मार्गं न परिसंक्रमेत् ।
एवं द्वादशवर्षान्ते संसिद्धिर्भवति ध्रुवं ॥४८
शरीरे सकलं विश्वं पश्यत्यात्माविभेदतः ।
ब्रह्माण्डोऽयं महामार्गो राजदन्तोर्ध्वकुण्डली ॥४९
इति ॥
इस प्रकार तीन वर्ष तक करने से जीभ ब्रह्म द्वार में प्रवेश कर
जायगी । जब वह प्रवेश कर जाय तब उसका विधिपूर्वक मंथन
आरम्भ करना चाहिए ॥ ४२ ॥ कोई साधक बिना मन्थन के ही
खेचरी करते हैं । जिनको खेचरी मन्त्र सिद्ध हो चुका है वे ऐसा कर
सकते हैं ॥ ४३ ॥ तो भी जप और मन्थन दोनों करने से फल शीघ्र
प्राप्त होता है । मन्थन के लिये सुवर्ण, चाँदी अथवा लोहे की शलाका
के सिरे पर दुग्धयुक्त तन्तु लगाकर उसे नाक के भीतर डाले । फिर
प्राण को हृदय में निरोध करके सुखासन पर बैठकर, आंखों को
भ्रुकुटी स्थान में लगाकर धीरे-धीरे मन्थन करे । छः मास तक इस
प्रकार मन्थन करने से उसका प्रभाव दिखलाई पड़ने लगता है
॥ ४४-४६ ॥ तब उसकी अवस्था इस प्रकार की होती है जैसी
बालक की सुषुप्ति अवस्था में । मन्थन नित्य नहीं करना चाहिये
वरन् महीने में एक बार करना होता है । इसी प्रकार जिह्वा को
बार-बार ब्रह्मारन्ध्र में प्रविष्ट न करे । इस प्रकार बारह वर्ष अभ्यास
करने पर सिद्धि निश्चित रूप से होती है ॥ ४७-४८ ॥ उस समय योगी
करने समस्त विश्व अपने भीतर दिखाई देने लगता है, क्योंकि
जीभ के ब्रह्मारन्ध्र तक जाने के मार्ग में ही ब्रह्माण्ड की स्थिति
है ॥ ४६ ॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥