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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

२४४ ] [प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्]
जो तू तेरी यह लोक आहुतियों का होम करता है ॥ १७ ॥ अपने
शरीर में यज्ञ की कल्पना की जाती है । इन शरीर निर्वर्त्य
अग्नियों की संख्या चार है । उनका स्वरूप अत्यन्त (सूक्ष्म छोटा)
है । ये सब अर्धमात्रिक मात्र हैं ॥ १८ ॥ इन चार में से सूर्याग्नि
नामक अग्नि जो कि सूर्य मण्डल की आकृति का है, हजारों अत्यन्त
तेजस्वी किरणों से युक्त व्यापक रूप होकर सिर में स्थित रहता है
जैसे कि प्रसिद्ध है ‘तुरीयं मूर्धिन संस्थितम्’ । क्योंकि यह
जीवात्मा सर्वज्ञ ईश्वर रूप में दीखता है, इसी कारण यह एक दर्शनाग्नि
कहलाता है जो कि बीज, विराड् आदि चार आकृति वाला
आहवनीय होकर (होम का आधार स्थल बनकर) मुख में रहता
है । (स्थूल शरीर का दाह करने वाली) शरीर अग्नि (हिरण्यगर्भ)
स्थूल शरीराश्रित जरादि (वृद्धावस्था) द्वारा क्षीण किया जाता
है स्थूल प्रपंच रूप हवि को ग्रसित करता है जो कि अर्धचन्द्र
की आकृति वाला दक्षिणाग्नि होकर सब प्राणियों के हृदय में
स्थिर रहता है । ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः प्राणायाम
समायुक्त। पंचाभ्यन्नं चतुर्विधम्’ इस रूप में सिद्ध ‘कोष्ठाग्नि’
है जो कि खाई, पी हुई, चाटी तथा आस्वादित वस्तु को भली भाँति
पकाकर गार्हपत्य रूप में नाभि स्थल में रहता है ॥ १९ ॥
प्रायः चित्तोपाधि स्वरूप विराड् आदि के नीचे प्रतिष्ठित वक्र, तीन
(पराग वृत्तियाँ) जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन तीन अवस्था के प्रकाशक
हिमांशु अर्थात् चिद्रूप चन्द्र सभी प्रकार प्रभु हैं । [समर्थ] है सब कुछ
प्रकाशित कर देने वाला है ॥२०॥
अस्य शारीरयज्ञस्य यूपरशनाऽशोभितस्य को यजमानः
का पत्नी के ऋत्विजः के सदस्याः कानि यज्ञपात्राणि कानि
हवींषि का वेदिः कान्तर्वेदिः को द्रोणकलशः को रथः
कः पशुः कोऽध्वर्युः को होता को ब्रह्मा को उद्गाता कः प्रति-