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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 251

प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् ] [ २४३
प्रादुर्भूत होने वाला विश्व तो तुरीयाग्नि में सभी आहुतियां हो जाता
है (विलीन हो जाता है) ॥१५॥
महानवोऽयं पुरुषो योऽङ्गुष्ठाग्रे प्रतिष्ठितः ।
तमद्भिः परिषिञ्चामि सोऽस्यान्ते अमृताय च ॥१६॥
अनादित्येष बाह्यात्मा ध्यायेताग्निहोत्रं जुहोति । सर्वेषा
मेव सूनुर्भवतु । अस्य यज्ञपरिवृता आहुतीर्होमयंति ॥१७॥
स्वे शरीरे यज्ञं परिवर्तयामीति । चत्वारोऽग्नयस्ते किं
कामरवंयाः ॥१८॥ तत्र सूर्याग्निर्नामि सूर्यमण्डलाकृतिः हसस्र-
रश्मिपरिवृत एकऋषिर्भूत्वा मूर्धनि तिष्ठति यस्मादुक्तो दर्शना-
ग्निर्नाम चतुराकृतिराहवनीयो भूत्वा मुखे तिष्ठति । शारीरोग्नि-
र्नाम जराप्रणुदा हविरवस्कन्दति अधचन्द्राकृतिर्दक्षाग्निर्भूत्वा
हृदये तिष्ठति । तत्र कोष्ठाग्निरिति-कोष्ठाग्निर्नामाश्चितपीतलीढ
स्वादितं सम्यग्व्यष्टयं विषचित्वा गार्हपतयो भूत्वा नाभ्यां तिष्ठति
॥ १८ ॥ प्रायश्चित्तयस्तवधस्तात्तिर्यक् तिस्रो हिमांशुः प्रभुः
प्रजननकर्मा ॥२०॥
“त प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम्” इस श्रुति के
अनुरोध से जो पैर के दोनों अँगूठों के आगे प्राण रूप से प्रतिष्ठित है
वह तू प्रतिक्षण अभिनव ( नया २ ) पुरुष होता है अर्थात्
नित्य नवीन रूप में रहता है। इस भोजन के (प्राशन के) अन्त में
अमृतत्व की प्राप्ति के लिये उस व्यापक अन्न जल द्वारा
सिञ्चित करता हूँ (अर्थात् उच्छ्वास निवास रूप से अभिषिक्त करता
हूँ ) तेरा अभिषेक करता हूँ ॥ १६ ॥ ये चेष्टा विशिष्ट है
अतः बाह्यात्मा इनका ध्यान करे। यह पुरुष प्रतिदिन प्राण रूपी
अग्निहोत्र करता है क्योंकि सभी तुझ परमात्मा (अग्निरूप)
का पुत्रवत् पोषण करते हैं अतः तू सब का पुत्र भी होता है, इस प्रकार