१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३४ ] पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
न तस्य धर्मोऽधर्मश्च न निषेधो विधिर्न च ।
यदा ब्रह्मात्मकं सर्वं विभाति स्वत एव तु ॥२३
तदा दुःखादिभेदोऽयमाभासोऽपि न भासते ।
जगज्जीवादिरूपेण पश्यन्नपि परात्मवित् ॥२४
न तत्पश्यति चिद्रूपं ब्रह्मवस्त्वेव पश्यति ।
धर्मधर्मित्ववार्ता च भेदे सति हि भिद्यते ॥२५
इस प्रकार सब एक ही प्रकाश है और इसके सम्बन्ध में अधिक
कुछ कहने की अपेक्षा मौन श्रेष्ठ है । जिसको यह महान
ज्ञान स्वयं ही विदित हो गया है वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न
कुछ और है । उसको वर्ण भी नहीं है, आश्रम भी नहीं है,
धर्म भी नहीं है, अधर्म भी नहीं है, निषेध भी नहीं, विधि भी नहीं है ।
जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय दिखाई देता है, तो उसे यह
दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म का इस
प्रकार ज्ञान रखने वाला इस जीवादि रूप वाले जगत को
देखते हुए भी नहीं देखता । वह केवल चिद्रूप ब्रह्म को ही देखता है,
धर्म तथा धर्मों का विषय भेद के रहते हुये भिन्न है ॥२१—२५॥
भेदा [दोऽ] भेदस्तथा भेदाभेदः साक्षात्परात्मनः ।
नास्ति स्वात्मातिरेकेण स्वयमेवास्ति सर्वदा ॥२६
ब्रह्मव विद्यते साक्षाद्वस्तुतोऽवस्तुतोऽपि च ।
तथैव ब्रह्मविज्ज्ञानी किं गृह्णाति जहाति किम् ॥२७
अधिष्ठानमनौपम्यमवाङ् मनसगोचरम् ।
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् ॥२८
अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिदं तथा ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ॥२६