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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 572 में से

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पृष्ठ 189

महोपनिषत् ] [ १८१
शुद्ध चित्त वाले होकर लोक में विचरण करो क्योंकि जो शत्रु-मित्र को
समान समझता और नित्य प्राप्त कर्म को करता है और जो इच्छा-
अनिच्छा से मुक्त है, जिसे न किसी वस्तु की कामना है और न हर्ष-शोक
है, प्रिय भाषी तथा सबके आशय का ज्ञाता है, वह इस संसार में कभी
शोक को प्राप्त नहीं होता । हे पुत्र ! अहङ्कार का त्याग कर कलङ्क
की कालिमा से सर्वथा बचे रहो और आकाश के समान निर्मल जीवन
वाले शुद्ध मन से स्वच्छन्द विचरण करो ॥ ६१-६६ ॥
उदारः पेशलाचारः स [पू] र्वाचारानुवृत्तिमान् ।
अन्तः सङ्गपरित्यागी बहिः संसारवानिव ॥७०
अन्तर्वैराग्यमादाय बहिराशोन्मुखेहितः ।
अयं बन्धुरयं नेति कलना लघुचेतसाम् ॥७१
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।
भवभावनया मुक्तं जरामरणवर्जितम् ॥७२
प्रशान्तकलनाऽऽरम्भं नीरागं पदमाश्रय ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः स्वच्छा निष्कामा विगतामया ॥७३
आदाय विहरन्नवं संकटेपु विमुह्यति ।
वैराग्येणाय शस्त्रेण महत्त्वादिगुणैरपि ॥७४
यत्नोपविहरार्थं तत् स्वयमेवोन्नयेन्मनः ।
वैराग्यात् पूर्णतामेति मनोनाशवशानुगम् ॥७५
आशया रिक्ततामेति शरदीव सरोऽमलम् ।
ममेव भुक्तविरसं व्यापारौघ पुनः पुनः ॥७६
दिवसे दिवसे कुर्वन् प्राज्ञः कस्मान्नं लज्जते ।
चिच्चैत्यकलितो बन्धस्तन्मुक्तो मुक्तिरुच्यते ॥७७
चिदचैत्याऽखिलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रहः ।
एतं निश्चयमादाय विलोकय धियेच्छया ॥७८