१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० ] [ षष्ठ अध्याय
द्वैताद्वैतसमुद्भूतैर्जगन्निर्माणलीलया ।
परमात्ममयी शक्तिरद्वैतैव विजृम्भते ॥६२
सर्वातीतपदालम्बी परिपूर्णैकचिन्मयः ।
नोद्वेगी न च तुष्टात्मा संसारे नावसीदति ॥६३
प्राप्तकर्मकरो नित्यं शत्रुमित्रसमानदृक् ।
ईहितानीहितैर्मुक्तो न शोचति न काङ्क्षति ॥६४
सर्वस्याभिमतं वक्ता चोदितः पेशलोक्तिमान् ।
आशयज्ञश्च भूतानां संसारे नावसीदति ॥६५
पूर्वा दृष्टिमवष्टभ्य ध्येयेत्यागविलासिनीम् ।
जीवन्मुक्ततया स्वस्थो लोके विहर विज्वरः ॥६६
अन्तः संत्यक्तसर्वाशो वीतरागो विवासनः ।
बहिः सर्वसमाचारो लोके विहर विज्वरः ॥६७
बहिः कृत्रिमसंरम्भो हृदि संरम्भवर्जितः ।
कर्ता बहिरकर्तान्तर्लोके विहर शुद्धधीः ॥६८
त्यक्ताहंकृतिराश्वस्तमतिराकाशशोभनः ।
अगृहीतकलाङ्काङ्को लोके विहर शुद्धधीः ॥६९
आत्मा के नाम से बोला जाने वाला शून्य ही प्रकृति, माया,
शिव, पुरुष, ईशान, नित्य एवम् ब्रह्मज्ञान है । परब्रह्म के सम्बन्धित अद्वैत
शक्ति ही द्वैत दिखाई देती है और अद्वैत द्वारा प्रकट पदार्थों से विश्व
निर्माण की माया करती हुई बढ़ती है । जो पुरुष विश्व प्रपञ्च से दूर
आत्मवाद में स्थित रहकर सन्तोष-असन्तोष न करते हुए परिपूर्ण चिन्मय
अवस्था में रहते हैं वे सांसारिक विषाद में कभी नहीं पड़ते । हे पुत्र !
तुम समस्त आशाओं का त्याग करते हुये वासना शून्य होकर राग-रहित
और ताप-रहित होकर दिखावे के रूप में सभी सांसारिक व्यवहारों को
करो । बाह्य क्रोध का रूपक बनाते हुए भी भीतर से क्रोध-हीन बन
जाओ तथा बाहर से कर्त्ता परन्तु भीतर से अकर्त्ता बने रहो । इस प्रकार