१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ अथर्वशिर उपनिषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें सात कण्डिकाएँ हैं। कण्डिका क्र० १,२,३ में देवगणों
द्वारा रुद्र रूप में परमात्म-सत्ता के साक्षात्कार का वर्णन और उनकी स्तुति है। उन्हें आदिकारण रूप; भूत,
भविष्यत्, वर्तमान; पुरुष-अपुरुष-स्त्री, क्षर-अक्षर, गोप्य-गुह्य कहा गया है, वे ही चराचर जगत् को उनकी
विशेषताओं से विभूषित करने वाले हैं। उन्हें ही ॐ तथा अ, उ, म् से भी परे कहा गया है। कण्डिका क्र. ४,
५ में उन्हें प्रणव रूप कहते हुए उनकी विशेषताओं, क्षमताओं और उपासना का महत्त्व बताया गया है। छठवीं
कण्डिका में उन्हीं से सत, रज, तम आदि गुणों एवं मूल क्रियाशील तत्त्व ‘आपः’ की उत्पत्ति तथा उससे सृष्टि
के विकास का वर्णन है। सातवीं कण्डिका में उपनिषद् के अध्ययन का महत्त्व प्रदर्शित किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ँ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न ऽ इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे देव ! हम कानों से कल्याणकारी बातें सुनें, आँखों से कल्याणकारी (दृश्य) देखें, हम हृष्ट-पुष्ट अंगों
और शरीर से ईश्वर द्वारा प्रदत्त पूरी आयु देवहित कार्यों में बिताएँ। महान् कीर्ति सम्पन्न देवराज इन्द्र हमारा
कल्याण करें। सर्वज्ञाता पूषा देवता हमारा कल्याण करें। अरिष्टनेमि (जिसकी गति अवरुद्ध न की जा सके),
तार्क्ष्य (गरुड़) तथा बृहस्पतिदेव हमारा कल्याण करें। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
देवा ह वै स्वर्गं लोकमायँस्ते देवा रुद्रमपृच्छन्को भवानिति। सोऽब्रवीदहमेकः प्रथममासं
वर्तामि च भविष्यामि च नान्यः कश्चिन्मत्तो व्यतिरिक्त इति। सोऽन्तरादन्तरं प्राविशत् दिशश्चान्तरं
प्राविशत् सोऽहं नित्यानित्योऽहं व्यक्ताव्यक्तो ब्रह्माहमब्रह्माहं प्राञ्चः प्रत्यञ्चोऽहं दक्षिणाञ्च
उदञ्चोऽहं अधश्चोर्ध्वं चाहं दिशश्च प्रतिदिशश्चाहं पुमानपुमान् स्त्रियश्चाहं गायत्र्यहं सावित्र्यहं
सरस्वत्यहं त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप् चाहं छन्दोऽहं गार्हपत्यो दक्षिणाग्निराहवनीयोऽहं सत्योऽहं गौरहं
गौर्यहमृगहं यजुरहं सामाहमथर्वाङ्गिरसोऽहं ज्येष्ठोऽहं श्रेष्ठोऽहं वरिष्ठोऽहमापोऽहं तेजोऽहं
गुह्योऽहमरण्योऽहमक्षरमहं क्षरमहं पुष्करमहं पवित्रमहमग्रं च मध्यं च बहिश्च पुरस्ताज्ज्यो-
तिरित्यहमेव सर्वे मामेव स सर्वे स मां यो मां वेद स देवान्वेद स सर्वांश्च वेदान्साङ्गानपि ब्रह्म
ब्राह्मणैश्च गां गोभिर्ब्राह्मणान्ब्राह्मण्येन हविर्हविषा आयुरायुषा सत्येन सत्यं धर्मेण धर्मं तर्पयामि
स्वेन तेजसा। ततो ह वै ते देवा रुद्रमपृच्छन् ते देवा रुद्रमपश्यन्। ते देवा रुद्रमध्यायंस्ततो
देवा ऊर्ध्वबाहवो रुद्रं स्तुन्वन्ति ॥ १ ॥
१० अथर्वशिर उपनिषद्
एक समय देवताओं ने स्वर्गलोक में जाकर रुद्र से पूछा- आप कौन हैं? रुद्र ने उत्तर दिया- मैं एक हूँ,
भूतकाल हूँ, वर्तमान काल हूँ और भविष्यत्काल भी मैं ही हूँ। मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जो अन्तर
के भी अन्तर में विद्यमान है, जो समस्त दिशाओं में सन्निविष्ट है, वह मैं ही हूँ। मैं ही नित्य और अनित्य, व्यक्त
और अव्यक्त, ब्रह्म और अब्रह्म हूँ। मैं ही प्राची (पूर्व) और प्रतीची (पश्चिम), उत्तर और दक्षिण, ऊर्ध्व और
अधः आदि दिशाएँ तथा विदिशाएँ हूँ। पुमान् (पुरुष), अपुमान् (अपुरुष) और स्त्री भी मैं ही हूँ। मैं ही
गायत्री, सावित्री और सरस्वती हूँ। त्रिष्टुप्, जगती और अनुष्टुप् आदि छन्द भी मैं ही हूँ। मैं गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि
और आहवनीय अग्नि हूँ। मैं सत्य, गौ, गौरी, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ और वरिष्ठ हूँ। आपः और तेजस् भी मैं ही हूँ। ऋग्वेद,
यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद भी मैं ही हूँ। अक्षर-क्षर, गोप्य (छिपाने योग्य) और गुह्य (छिपाया हुआ) भी
मैं हूँ। अरण्य, पुष्कर (तीर्थ), पवित्र मैं हूँ। अग्र, मध्य, बाह्य और पुरस्ताद् (पूर्व) आदि दसों दिशाओं में
अवस्थित और अनवस्थित ज्योतिरूप शक्ति मुझे ही मानना चाहिए और सब कुछ मुझमें ही व्याप्त जानना
चाहिए। इस प्रकार जो मुझे जानता है, वह समस्त देवों और अङ्गों सहित समस्त वेदों को जानता है। मैं गौओं
को गोत्व से, ब्राह्मणों को ब्राह्मणत्व से, हवि को हविष्य से, आयु को आयुष्य से, सत्य को सत्यता से, धर्म को
धर्म तत्त्व से तृप्त करता हूँ। यह सुनकर देवगणों ने रुद्र को देखा और उनका ध्यान करने लगे। तत्पश्चात्
भुजाएँ उठाकर इस प्रकार स्तुति की ॥ १ ॥
ॐ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च ब्रह्मा तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च
विष्णुस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च स्कन्दस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ३ ॥ यो
वै रुद्रः स भगवान्यश्चेन्द्रस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्चाग्निस्तस्मै वै नमो
नमः ॥ ५ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च वायुस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ६ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च
सूर्यस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ७ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च सोमस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८ ॥ यो वै
रुद्रः स भगवान्ये चाष्टौ ग्रहास्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्ये चाष्टौ
प्रतिग्रहास्तस्मै वै नमो नमः ॥ १० ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च भूस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ११ ॥
यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च भुवस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १२ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च
स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १३ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च महस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १४ ॥ यो
वै रुद्रः स भगवान्या च पृथिवी तस्मै वै नमो नमः ॥ १५ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्चान्तरिक्षं
तस्मै वै नमो नमः ॥ १६ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्या च द्यौस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १७ ॥ यो वै
रुद्रः स भगवान्याश्चापस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १८ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च तेजस्तस्मै वै
नमो नमः ॥ १९ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्चाकाशं तस्मै वै नमो नमः ॥ २० ॥ यो वै रुद्रः स
भगवान्यश्च कालस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २१ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च यमस्तस्मै वै नमो
नमः ॥ २२ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यश्च मृत्युस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २३ ॥ यो वै रुद्रः स
भगवान्यच्चामृतं तस्मै वै नमो नमः ॥ २४ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च विश्वं तस्मै वै नमो
नमः ॥ २५ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च स्थूलं तस्मै वै नमो नमः ॥ २६ ॥ यो वै रुद्रः स
भगवान्यच्च सूक्ष्मं तस्मै वै नमो नमः ॥ २७ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च शुक्लं तस्मै वै नमो
नमः ॥ २८ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च कृष्णं तस्मै वै नमो नमः ॥ २९ ॥ यो वै रुद्रः स
मन्त्र ३ ११
भगवान्यच्च कृत्स्नं तस्मै वै नमो नमः ॥ ३० ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च सत्यं तस्मै वै नमो
नमः ॥ ३१ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च सर्वं तस्मै वै नमो नमः ॥ ३२ ॥ ॥ २ ॥
हे भगवान् रुद्र ! आप ब्रह्मा स्वरूप हैं, आपको नमन है। हे भगवान् रुद्र ! आप विष्णु स्वरूप हैं, आपको
नमस्कार है। हे भगवान् रुद्र ! आप स्कन्द रूप हैं, आपको नमन है। आप इन्द्र स्वरूप, अग्नि स्वरूप, वायु
स्वरूप और सूर्य स्वरूप हैं, आपको नमन है। हे भगवान् रुद्र ! आप सोम स्वरूप हैं, अष्टग्रह स्वरूप, प्रतिग्रह
स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप भूः स्वरूप, भुवः स्वरूप, स्वः स्वरूप और महः स्वरूप हैं, आपको
नमन है। हे रुद्र भगवान्! आप पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः और आकाश रूप हैं, आपको नमस्कार है। हे रुद्र
भगवान् ! आप विश्वरूप, स्थूलरूप, सूक्ष्मरूप, कृष्ण और शुक्ल स्वरूप हैं, आपको नमन है। आप सत्यरूप
और सर्वरूप हैं, आपको बारम्बार नमन है॥ २॥
भूस्ते आदिर्मध्यं भुवस्ते स्वस्ते शीर्षं विश्वरूपोऽसि ब्रह्मैकस्त्वं द्विधा त्रिधा बद्धस्त्वं
शान्तिस्त्वं पुष्टिस्त्वं हुतमहुतं दत्तमदत्तं सर्वमसर्वं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च
त्वम्। अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्। किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु
धूर्तिरमृत मर्त्यस्य च।
हे रुद्र भगवान्! भूः, भुवः और स्वः लोक क्रमशः आपके नीचे, मध्य और शीर्ष के लोक हैं। आप
विश्वरूप हैं और एक मात्र ब्रह्म हैं; किन्तु भ्रमवश दो और तीन संख्या वाले प्रतीत होते हैं। आप वृद्धि स्वरूप,
शान्तिस्वरूप, पुष्टिरूप, हुत-अहुतरूप, दत्तरूप-अदत्तरूप,सर्वरूप-असर्वरूप, विश्व-अविश्वरूप, कृतरूप-
अकृतरूप, पर-अपररूप और परायणरूप हैं। आपने हमें (देवों को) अमृत स्वरूप सोमपान कराकर
अमृतत्व प्रदान किया है। हम ज्योति स्वरूप होकर ज्ञान को प्राप्त हुए हैं। अब कामादि शत्रु हमें क्षति नहीं
पहुँचा सकते। आप मर्त्यो (मनुष्यों) के लिए अमृत तुल्य हैं।
[सोम स्थूल ही नहीं, सूक्ष्म दिव्य ज्ञान रूप भी है। सोम रूप ज्ञान को आत्मसात् करके साधक स्वयं ज्योतित हो
जाता है। तब दिव्य ज्ञान के साथ स्वाभाविक रूप से योग होता है और कामादि विकार प्रभावी नहीं हो पाते।]
सोमसूर्यं पुरस्तात् सूक्ष्मः पुरुषः। सर्वं जगद्धितं वा एतदक्षरं प्राजापत्यं सौम्यं सूक्ष्मं
पुरुषमग्राह्यमग्राह्येण भावं भावेन सौम्यं सौम्येन सूक्ष्मं सूक्ष्मेण वायव्यं वायव्येन ग्रसति स्वेन
तेजसा तस्मा उपसंहर्त्रे महाग्रासाय वै नमो नमः। हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
हे देव ! आप सोम (चन्द्र) और सूर्य से भी पूर्व उत्पन्न सूक्ष्म पुरुष हैं। आप सम्पूर्ण जगत् का हित करने
वाले, अक्षर रूप, प्राजापत्य (प्रजापतियों द्वारा स्तुत्य), सूक्ष्म, सौम्य पुरुष हैं, जो अपने तेज से अग्राह्य को
अग्राह्य से, भाव को भाव से, सौम्य को सौम्य से, सूक्ष्म को सूक्ष्म से, वायु को वायु से ग्रस लेते हैं, ऐसे
महाग्रास करने वाले आप (रुद्र भगवान्) को नमस्कार है। सभी हृदयों में देवगण, प्राण और आप विराजते हैं।
[मनुष्य के अन्तस् में जीवन ऊर्जारूप प्राणों, दिव्य संवेदना रूप देवगणों तथा आत्म चेतन रूप में परमात्मा का
आवास ऋषि अनुभव करते हैं। उन्हें उनसे सम्बन्धित अनुशासनों के माध्यम से सक्रिय एवं फलित किया जा सकता है।]
हृदि त्वमसि यो नित्यं तिस्रो मात्राः परस्तु सः। तस्योत्तरतः शिरो दक्षिणतः पादौ य
उत्तरतः स ओङ्कारः य ओङ्कारः स प्रणवो यः प्रणवः स सर्वव्यापी यः सर्वव्यापी सोऽनन्तो
योऽनन्तस्तत्तारं यत्तारं तत्सूक्ष्मं यत्सूक्ष्मं तच्छुक्लं यच्छुक्लं तद्वैद्युतं यद्वैद्युतं तत्परं ब्रह्म यत्परं
ब्रह्म स एकः य एकः स रुद्रो यो रुद्रः स ईशानो य ईशानः स भगवान महेश्वरः ॥ ३ ॥
१२ अथर्वशिर उपनिषद्
. हृदय में विराजते हुए (वह) आप तीनों मात्राओं (अ, उ, म्) से परे हैं। (हृदय के) उत्तर में उसका
सिर है, दक्षिण में पाद हैं, जो उत्तर में विराजमान है, वही ओंकार है। ओंकार को ही 'प्रणव' कहते हैं और
प्रणव ही सर्वव्यापी है। वह सर्वव्यापी प्रणव ही अनन्त है। जो अनन्त है, वही तारक स्वरूप है। जो तारक है,
वही सूक्ष्म स्वरूप है। जो सूक्ष्म स्वरूप है, वही शुक्ल है। जो शुक्ल (प्रकाशित) है, वही विद्युत् (विशेष रूप
से द्युतिमान्) है। जो विद्युत् है, वही परब्रह्म है। जो परब्रह्म है, वही एक रूप है। जो एक रूप है, वही रुद्र है।
जो रुद्र है, वही ईशानरूप है। जो ईशान है, वही भगवान् महेश्वर है ॥ ३ ॥
[ऋषि यहाँ 'स्व'-जीव चेतना, ईश- नियामक चेतना तथा महेश्वर-परमात्म चेतना तीनों की एकरूपता का
आभास करा रहे हैं।]
अथ कस्मादुच्यत ओङ्कारो यस्मादुच्चार्यमाण एव प्राणानूर्ध्वमुत्क्रामयति तस्मादुच्यते
ओङ्कारः। अथ कस्मादुच्यते प्रणवः यस्मादुच्चार्यमाण एव ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसो ब्रह्म
ब्राह्मणेभ्यः प्रणामयति नामयति च तस्मादुच्यते प्रणवः। अथ कस्मादुच्यते सर्वव्यापी
यस्मादुच्चार्यमाण एव सर्वान् लोकान् व्याप्नोति स्नेहो यथा पललपिण्डमिव
शान्तरूपमोतप्रोतमनुप्राप्तो व्यतिषिक्तश्च तस्मादुच्यते सर्वव्यापी। अथ कस्मादुच्यतेऽनन्तो
यस्मादुच्चार्यमाण एव तिर्यगूर्ध्वमधस्ताच्चास्यान्तो नोपलभ्यते तस्मादुच्यतेऽनन्तः। अथ
कस्मादुच्यते तारं यस्मादुच्चार्यमाण एव गर्भजन्मव्याधिजरामरणसंसारमहाभयात्तारयति त्रायते
च तस्मादुच्यते तारम्। अथ कस्मादुच्यते शुक्लं यस्मादुच्चार्यमाण एव क्लन्दते क्लामयते च
तस्मादुच्यते शुक्लम्। अथ कस्मादुच्यते सूक्ष्मं यस्मादुच्चार्यमाण एव सूक्ष्मो भूत्वा
शरीराण्यधितिष्ठति सर्वाणि चाङ्गान्यभिमृशति तस्मादुच्यते सूक्ष्मम्। अथ कस्मादुच्यते वैद्युतं
यस्मादुच्चार्यमाण एवाव्यक्ते महति तमसि द्योतयते तस्मादुच्यते वैद्युतम्। अथ कस्मादुच्यते
परं ब्रह्म यस्मात्परमपरं परायणं च बृहद्बृहत्या बृंहयति तस्मादुच्यते परं ब्रह्म। अथ कस्मादुच्यते
एको यः सर्वान्प्राणान्संभक्ष्य संभक्षणैनाजः संसृजति विसृजति च। तीर्थमेके व्रजन्ति तीर्थमेके
दक्षिणाः प्रत्यञ्च उदञ्चःप्राञ्चोऽभिव्रजन्त्येके तेषां सर्वेषामिह संगतिः। साकं स एको भूतश्चरति
प्रजानां तस्मादुच्यत एकः। अथ कस्मादुच्यते रुद्रः यस्मादृषिभिर्नान्यैर्भक्तैर्द्रुतमस्य
रूपमुपलभ्यते तस्मादुच्यते रुद्रः। अथ कस्मादुच्यते ईशानः यःसर्वान्देवानीशते
ईशनीभिर्जननीभिश्च परम शक्तिभिः। अभि त्वा शूर नोनुमो दुग्धा इव धेनवः। ईशानमस्य
जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुष इति तस्मादुच्यत ईशानः। अथ कस्मादुच्यते भगवान्महेश्वरः
यस्माद्भक्ताज्ञानेन भजन्त्यनुगृह्णाति च वाचं संसृजति विसृजति च सर्वान्भावान्यरित्यज्या-
त्मज्ञानेन योगैश्वर्येण महति महीयते तस्मादुच्यते भगवान्महेश्वरः। तदेतद्रुद्रचरितम्॥४॥
ॐकार किस कारण से कहा जाता है ? यह इसलिए कहा जाता है कि ॐकार उच्चारित करने में श्वास
(प्राणों) को ऊपर की ओर खींचना पड़ता है। प्रणव इसलिए कहा जाता है कि इसका उपयोग (उच्चारण)
ऋक्, यजुः, साम, अथर्वाङ्गिरस और ब्राह्मणों को प्रणाम करने के लिए किया जाता है। इसीलिए इसका नाम
'प्रणव' ऐसा हुआ है। इसे सर्वव्यापी क्यों कहा जाता है ? इसलिए कि जिस प्रकार तिल में तेल विद्यमान
(सं व्याप्त) है, उसी प्रकार यह अव्यक्त रूप से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, इसी कारण 'सर्वव्यापी' ऐसा कहा
मन्त्र ४ १३
जाता है। इसका नाम अनन्त इसलिए है कि इस 'शब्द' का उच्चारण करते हुए ऊपर-नीचे और तिरछे कहीं
भी इसका अन्त प्रतीत नहीं होता। 'तारक' नाम इसलिए दिया गया है कि यह गर्भ, जन्म, व्याधि, वृद्धावस्था
और मरण से युक्त संसार के भय से तारने वाला है। इसका नाम 'शुक्ल' इसलिए है कि यह स्व प्रकाशित है,
अन्यों के लिए प्रकाशक है। इसे 'सूक्ष्म' इस कारण कहा जाता है कि इसका उच्चारण करने पर यह सूक्ष्म
स्वरूप होकर स्थावर आदि सभी शरीरों में अधिष्ठित होता है। इसे 'वैद्युत' कहने का कारण यह है कि इसका
उच्चारण करने से घोर अन्धकार (अज्ञान) की स्थिति में भी समग्र काया (स्थूल, सूक्ष्म, कारण आदि) विशेष
रूप से द्युतिमान् हो जाती है। परब्रह्म कहने का कारण यह है कि वह पर, अपर और परायण (इन तीनों)
बृहत् (व्यापक घटकों) को बृहत्या (विशालता के माध्यम से) व्यापक बनाता है।
[ ऋषि द्वारा परमात्म-सत्ता को परब्रह्म कहने का तात्पर्य प्रकट किया गया है- पर+ब्रह्म के संयोग से परब्रह्म बना
है। जो पर (अव्यक्त) है तथा जो अपर (व्यक्त) है, वे एक दूसरे के परायण-एक दूसरे के प्रति जागरूक-परस्पर पूरक
हैं। इस भाव को प्रथम पद 'पर' से प्रकट किया गया है। जो बृहत्-विशाल है तथा विशालता (संकीर्णता से मुक्तभाव)
से सभी घटकों को व्यापकता प्रदान करता है, उसके लिए दूसरा पद 'ब्रह्म' प्रयुक्त किया गया है।]
इसे (ब्रह्म को) एक इसलिए कहा जाता है कि यह समस्त प्राणों का भक्षण करके 'अज' स्वरूप
होकर उत्पत्ति और संहार करता है। समस्त तीर्थों में वह 'एक' ही (तत्त्व) विद्यमान है। अनेक लोग पूर्व,
पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के विभिन्न तीर्थों में परिभ्रमण करते हैं। वहाँ भी उनकी सद्गति का कारण वह एक
ही (तत्त्व) है। समस्त प्राणियों में एक रूप में निवास करने के कारण उस तत्त्व को 'एक' कहते हैं। 'रुद्र'
इसलिए कहा जाता है कि इसके स्वरूप का ज्ञान ऋषियों को सहज ही हो सकता है। सामान्य जनों को इसका
ज्ञान हो सकना कठिन है। 'ईशान' क्यों कहते हैं, इसलिए कि वह समस्त देवों और उनकी शक्तियों पर अपना
प्रभुत्व (ईशत्व) रखता है। (सो हे रुद्र!) आप शूर की हम उसी प्रकार स्तुति करते हैं, जिस प्रकार दुग्ध प्राप्त
करने के लिए गौ को प्रसन्न किया जाता है। ( हे रुद्र!) आप ही इन्द्र रूप होकर स्थावर-जंगम संसार के ईश
और दिव्य दृष्टि सम्पन्न हैं, इसी कारण आपको 'ईशान' नाम से सम्बोधित किया जाता है। आपको भगवान्
महेश्वर क्यों कहते हैं? इसलिए कि जो भक्तजन ज्ञान पाने के लिए आपका भजन करते हैं और आप उन पर
कृपा-वर्षण करते हैं, वाक् शक्ति का प्रादुर्भाव करते हैं, साथ ही समस्त भावों का परित्याग करके आत्मज्ञान
और योग के ऐश्वर्य से अपनी महिमा में स्थित रहते हैं, इसीलिए आपको 'महेश्वर' कहा जाता है। इस प्रकार
इस रुद्र के चरित का वर्णन हुआ ॥ ४ ॥
एषो ह देवः प्रदिशो नु सर्वाःपूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः
प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः। एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्मै य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः।
प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोप्ता। यो योनिं
योनिमधितिष्ठत्येको येनेदं संचरति विचरति सर्वम्। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां
शान्तिमत्यन्तमेति। क्ष्मां हित्वा हेतुजालस्य मूलं बुद्ध्या संचितं स्थापयित्वा तु रुद्रे
रुद्रमेकत्वमाहुः। शाश्वतं वै पुराणमिषमूर्जेन पशवोऽनुनामयन्तं मृत्युपाशान्। तदेतेनात्मनेतेनार्ध-
चतुर्थमात्रेण शान्तिं संसृजति पाशविमोक्षणम्। या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन
यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्राह्मं पदम्। या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णा वर्णेन
यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम्। या सा तृतीया मात्रा ईशानदेवत्या कपिला वर्णेन
यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम्। या साऽर्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्याऽव्यक्तीभूता खं
१४ अथर्वशिर उपनिषद्
विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत्पदमनामयम् तदेतमुपासीत
मुनयोऽर्वाग्वदन्ति न तस्य ग्रहणमयं पन्था विहित उत्तरेण येन देवा यान्ति येन पितरो येन
ऋषयः परमपरं परायणं चेति। बालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यम्। तमात्मस्थं
ये नु पश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिर्भवति नेतरेषाम्। यस्मिन्क्रोधं यां च तृष्णां क्षमां च तृष्णां
हित्वा हेतुजालस्य मूलम्। बुद्ध्या संचितं स्थापयित्वा तु रुद्रे रुद्रमेकत्वमाहुः। रुद्रो हि शाश्वतेन
वै पुराणेनेषमूर्जेण तपसा नियन्ता। अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति
भस्म व्योमेति भस्म सर्वः ह वा इदं भस्म मन एतानि चक्षूंषि भस्मानि यस्माद्व्रतमिदं पाशुपतं
यद्भस्मनाङ्गानि संस्पृशेत्तस्माद्ब्रह्म तदेतत्पाशुपतं पशुपाशविमोक्षणाय ॥ ५ ॥
एक ही ऐसा देवता है, जो समस्त दिशाओं में निवास करता है। सर्वप्रथम उसी का आविर्भाव हुआ।
वही मध्य और अन्त में स्थित है। वही उत्पन्न होता है और आगे भी उत्पन्न होगा। प्रत्येक में वही संव्यास हो
रहा है। अन्य कोई नहीं, केवल एक रुद्र ही इस लोक का नियमन (नियंत्रण) कर रहा है। समस्त प्राणी उसी
के अन्दर निवास करते हैं और अन्ततः सबका उसी में विलय भी होता है। विश्व का उद्भव और संरक्षण-
कर्त्ता भी वही है, जो समस्त जीवों में संव्यास हो रहा है और समस्त प्राणी जिसमें संव्यास हो रहे हैं, उस
'ईशान' देव के ध्यान से मनुष्य को परम शान्ति का लाभ मिल सकता है। समस्त प्रपञ्चों के हेतु भूत-अज्ञान
का परित्याग करके संचित कर्मों को बुद्धि के द्वारा रुद्र में अर्पित करके परमात्मा का एकत्व प्राप्त होता है।
जो शाश्वत और पुराण पुरुष अपनी सामर्थ्य से अन्न आदि प्रदान करके प्राणियों को मृत्युपाश से मुक्त
करता है। वही आत्मज्ञान प्रदान करने वाला ॐ चतुर्थ मात्रा से शान्ति प्रदाता और बन्धन मुक्ति प्रदाता है। उन
रुद्रदेव की प्रथम मात्रा ब्रह्मा की है, जो लाल वर्ण की है, उसके नियमित ध्यान से ब्रह्मपद प्राप्त होता है। दूसरी
मात्रा विष्णु की है, जो कृष्ण वर्ण की है, उसके नियमित ध्यान से विष्णु पद की प्राप्ति होती है। तृतीय मात्रा
ईशान की है, जिसका वर्ण पीला है, उसका ध्यान करने से ईशान पद की प्राप्ति होती है। जो अर्ध चतुर्थ मात्रा
है, वह समस्त देवों के रूप में अव्यक्त होकर आकाश में विचरण करती है, वह शुद्ध स्फटिक मणि के वर्ण
की है, जिसके ध्यान से मुक्ति प्राप्त होती है। मनीषियों का कहना है कि इस अर्ध मात्रा की उपासना ही उचित
है; क्योंकि इससे कर्मों के बन्धन कट जाते हैं। इस उत्तरायण (उत्तरी मार्ग) से ही देव, पितर और ऋषिगण
गमन करते हैं। यही पर, अपर तथा परायण मार्ग है। बाल के अग्रभाग के तुल्य, सूक्ष्म रूप से हृदय में निवास
करने वाले, विश्वरूप, देवरूप, समस्त उत्पन्न हुए लोगों को जानने वाले श्रेष्ठ परमात्मा को जो ज्ञानी जन अपने
अन्दर देखते हैं, वे ही शान्ति प्राप्त करते हैं, अन्य किसी को वह शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। तृष्णा, क्रोध आदि
हेतु समूह के मूल का परित्याग करके संचित कर्मों का बुद्धिपूर्वक रुद्र में स्थापन करने से रुद्र से एकत्व प्राप्त
होता है। रुद्र ही शाश्वत और पुराण (प्राचीन) हैं। अस्तु, वे अपनी शक्ति और तप से सबके नियंत्रक हैं। अग्नि,
वायु, जल, स्थल (भूमि) और आकाश ये सभी भस्म रूप हैं। भगवान् पशुपति (बंधन से बँधे प्राणियों के
स्वामी) की भस्म का जिसके अङ्ग में स्पर्श नहीं हुआ, वह भी भस्म के समान ही है। इस प्रकार पशुपति रुद्र
की ब्रह्मरूप-भस्म पशु (प्राणियों) के बन्धनों को काटने वाली है ॥ ५ ॥
[पदार्थ अपने रूप में इसलिए रहता है कि उसमें कणों को जोड़े रहने वाली प्रवृत्ति (बाइन्डिंग टैण्डेन्सी) सक्रिय
होती है। भस्म बनने पर उसका वह रूप समाप्त हो जाता है; क्योंकि उसकी वह बाँधे रहने वाली क्षमता समाप्त हो जाती
है। पशुपति के रूप में वही आदि सत्ता जीव को काया के साथ बाँधे रहती है तथा ब्रह्मरूप में वही सत्ता बाँधे रहने की
प्रवृत्ति से मुक्त रहती है, इसीलिए परब्रह्म को रूप, गुण के बन्धन से मुक्त भस्मरूप कहा गया है।]
मन्त्र ६ १५
योऽग्नौ रुद्रो योऽप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध आविवेश। य इमा विश्वा भुवनानि चक्लृपे
तस्मै रुद्राय नमोऽस्त्वग्नये। यो रुद्रोऽग्नौ यो रुद्रोऽप्स्वन्तर्यो रुद्र ओषधीर्वीरुध आविवेश। यो
रुद्र इमा विश्वा भुवनानि चक्लृपे तस्मै रुद्राय वै नमो नमः। यो रुद्रोऽप्सु यो रुद्र ओषधीषु यो
रुद्रो वनस्पतिषु। येन रुद्रेण जगदूर्ध्वं धारितं पृथिवी द्विधा त्रिधाधर्ता धारिता नागा येऽन्तरिक्षे
तस्मै रुद्राय वै नमो नमः। मूर्धानमस्य संसीव्याथर्वा हृदयं च यत्। मस्तिष्कादूर्ध्वं प्रेरयन्
पवमानोऽधि शीर्षतः। तद्वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुज्झितः। तत्प्राणोऽभिरक्षति
शिरोऽन्तमथो मनः। न च दिवो देवजनेन गुप्ता नचान्तरिक्षाणि न च भूम ऽइमाः। यस्मिन्निदं
सर्वमोतप्रोतं यस्मादन्यन्न परं किंचनास्ति। न तस्मात्पूर्वं न परं तदस्ति न भूतं नोत भव्यं
यदासीत्। सहस्रपादेकमूर्धा व्यासं स एवेदमावरीवर्ति भूतम्। अक्षरात्संजायते कालः
कालाद्व्यापक उच्यते। व्यापको हि भगवान्रुद्रो भोगायमानो यदा शेते रुद्रस्तदा संहार्यते
प्रजाः। उच्छ्वसिते तमो भवति तमस आपोऽप्स्वङ्गुल्या मथिते मथितं शिशिरे शिशिरं मध्यमानं
फेनो भवति, फेनादण्डं भवत्यण्डाद्ब्रह्मा भवति, ब्रह्मणो वायुः वायोरोंकार ॐकारात्सावित्री
सावित्र्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति। अर्चयन्ति तपः सत्यं मधु क्षरन्ति यद्ध्रुवम्। एतद्धि
परमं तप आपो ज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों नम इति ॥ ६ ॥
जो रुद्र, अग्नि और जल में निवास करते हैं। वे ही ओषधियों और वनस्पतियों में भी प्रविष्ट हो गये हैं।
जिनके द्वारा यह समस्त विश्व उत्पन्न हुआ है, उन अग्नि रूप रुद्र को नमन है। जो रुद्रदेव, अग्नि, ओषधियों तथा
वनस्पतियों में वास करते हैं और जिनके द्वारा विश्व और समस्त भुवनों का सृजन किया जाता है, उन्हें
नमस्कार है। जो रुद्रदेव जल, वनस्पतियों और ओषधियों में विराजमान हैं, जिनके द्वारा यह समस्त जगत्
धारण किया गया है, जो रुद्र द्विधा (शिव और शक्ति) तथा त्रिधा (सत्, रज, तम) से इस पृथिवी को
संचालित करते हैं, जिनने नागों (बादलों) को अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित कर रखा है, उन्हें नमन है। भगवान् रुद्र
की प्रणवरूप मूर्धा की उपासना करने वाले अथर्वा की उच्च स्थिति प्राप्त करते हैं और उपासना न करने वाले
निम्न स्थिति में ही रहते हैं। समस्त देवताओं का सामूहिक स्वरूप रुद्र भगवान् का सिर ही है। उनका प्राण मन
और मस्तक का रक्षक है। पृथिवी, आकाश अथवा स्वर्ग का संरक्षण करने में देवता स्वयं समर्थ नहीं हैं। सभी
कुछ रुद्र भगवान् में ही समाहित है, उनसे परे कुछ भी नहीं है, उनसे पूर्व भी कुछ नहीं था। उनसे पूर्व
भूतकाल में और उनसे आगे (भविष्यत्काल) में भी कुछ नहीं है। सहस्रपद और एक मस्तक वाले रुद्र
समस्त भूतों में संव्यास हैं।
[रुद्र का संकल्प निर्धारण एक ही है। अस्तु, उन्हें एक सिर वाला कहा गया है। उनकी गतिशीलता के हजारों
पक्ष हैं, इसलिए उन्हें सहस्रपाद कहा गया है।]
अक्षर से काल की उत्पत्ति होती है और काल से वह व्यापक कहलाता है। व्यापक और शोभायमान
रुद्र जब शयन करने लगते हैं, तब समस्त प्रजा (प्राणि समुदाय) का संहार हो जाता है। जब भगवान् रुद्र श्वास
लेते हैं, तो तम उत्पन्न हो जाता है। तम से आपः तत्त्व का प्रादुर्भाव होता है। उस आपः को (रुद्र द्वारा) अपनी
अङ्गुली द्वारा मथे जाने पर शिशिर (आपः तत्त्व का जमा हुआ गाढ़ा रूप) उत्पन्न होता है। उस शिशिर के मथे
जाने पर फेन उत्पन्न होता है, फेन से अण्डा और अण्डे से ब्रह्मा का प्रादुर्भाव होता है। तत्पश्चात् ब्रह्मा से वायु
और वायु से ओंकार, ओंकार से सावित्री प्रकट होती हैं। सावित्री से गायत्री और गायत्री से लोकों का उद्भव
१६ अथर्वशिर उपनिषद्
होता है। जब वे (रुद्र) तप करते हैं, तब सत्यरूपी मधु क्षरित होता है, जो शाश्वत होता है। यह परम तप है।
आपः, ज्योतिः, रस, अमृत, ब्रह्म, भूः, भुवः और स्वः रूप परब्रह्म को नमस्कार है ॥ ६ ॥
[ इस कण्डिका में आपः का अर्थ जल करना उचित नहीं है। वेद में आपः को सृष्टि का मूल क्रियाशील तत्त्व कहा
गया है। आपः की उसी अवधारणा से मन्त्र का भाव स्पष्ट होता है। इसी प्रकार शिशिर का अर्थ ऋतु विशेष यहाँ उचित
नहीं है। शिशिर का अर्थ जमा हुआ भी होता है, इसी भाव से मन्त्रार्थ स्पष्ट होता है। गाढ़े आपः तत्त्व को मथने से फेन
अर्थात् फूला हुआ पदार्थ पैदा होता है। वेद और विज्ञान दोनों इस तथ्य से सहमत हैं कि प्रारम्भिक मूल पदार्थ का घनत्व
अत्यधिक था। उसे फुलाकर हलका करने पर ही वह सृष्टि के योग्य बना। ब्रह्माण्ड फेन रूप ही है। इसी प्रकार अण्ड का
अर्थ अण्डा नहीं ब्रह्माण्ड ही उचित है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सृजनशील 'ब्रह्मा' का विकास होता है, तब दृश्य
सृष्टि बनती है। वायु से ओंकार की उत्पत्ति भी विवेक सम्मत है। ओंकार एक ध्वनि विशेष है। ध्वनि की उत्पत्ति वायु से
ही होती है। इसी क्रम से ऋषि ने सृष्टि के विकास के चरण स्पष्ट किये हैं।]
य इदमथर्वशिरो ब्राह्मणोऽधीते अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति अनुपनीत उपनीतो भवति
सोऽग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति स सूर्यपूतो भवति स सोमपूतो भवति स सत्यपूतो
भवति स सर्वपूतो भवति स सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति स सर्वैर्वेदैरनुध्यातो भवति स सर्वेषु तीर्थेषु
स्नातो भवति तेन सर्वैः क्रतुभिरिष्टं भवति गायत्र्याः षष्टिसहस्राणि जप्तानि भवन्ति
इतिहासपुराणानां रुद्राणां शतसहस्राणि जप्तानि भवन्ति। प्रणवानामयुतं जप्तं भवति। आ
चक्षुषः पङ्क्तिं पुनाति। आ सप्तमात्पुरुषयुगान्पुनातीत्याह भगवानथर्वशिरः सकृज्जप्त्वैव
शुचिः स पूतः कर्मण्यो भवति। द्वितीयं जप्त्वा गणाधिपत्यमवाप्नोति। तृतीयं जप्त्वाैवमेवानु-
प्रविशत्यों सत्यमों सत्यम् ॥ ७ ॥
जो ब्राह्मण इस अथर्वशिर उपनिषद् का अध्ययन करता है, वह श्रोत्रिय न हो, तो भी श्रोत्रिय हो जाता
है। अनुपवीत व्यक्ति, उपवीत सम्पन्न हो जाता है। वह अग्नि के समान, वायु के समान, सूर्य के समान, सोम
के समान और सत्य के समान पवित्र हो जाता है। वह समस्त देवों का ज्ञाता, समस्त वेदों का अध्येता और
समस्त तीर्थों का स्नातक हो जाता है, वह समस्त यज्ञों के पुण्य का फल तथा साठ हजार गायत्री मन्त्र के जप
का फल प्राप्त करता है। उसे इतिहास और पुराणों के अध्ययन का, एक लक्ष रुद्र के जप का तथा दस हजार
प्रणव के जप का प्रतिफल प्राप्त होता है। उसका दर्शन पाकर लोग पवित्र हो जाते हैं। वह अपने पूर्व की सात
पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। भगवान् ने कहा कि अथर्वशिर के एक बार के जप से साधक पवित्र होकर
कल्याण कर्म का अधिकारी बन जाता है। दूसरी बार जप करने से गाणपत्य पद प्राप्त करता है तथा तृतीय बार
जप करने से वह सत्यरूप ओंकार में प्रविष्ट हो जाता है। यह सत्यरूप ओंकार ही (त्रिकाल) सत्य है ॥ ७ ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः.............इति शान्तिः ॥
॥ इति अथर्वशिर उपनिषत्समाप्ता ॥
॥ अध्यात्मोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें अपने नाम के अनुरूप आत्म तत्त्व के साक्षात्कार का
विषय प्रतिपादित है। अज (अजन्मा) रूप में यह सभी चराचर घटकों में संव्याप्त है; किन्तु वे (प्राणी) इसे नहीं
जानते। यह समझाते हुए 'सोऽहम्' एवं 'तत्त्वमसि' आदि सूत्रों के आधार पर शरीर और विकारों से ऊपर
उठकर आत्म साधना में रत रहने का निर्देशन किया गया है। स्वप्न-सुषुप्ति आदि स्थितियों से ऊपर उठते हुए
निर्विकल्प समाधि अवस्था में परमात्म तत्त्व से एक रस होने की बात कही गयी है। इस समाधि अवस्था को
'धर्ममेघ' कहकर उसी में सभी वृत्तियों को लीन करके मुक्ति अवस्था पाने का सुझाव दिया गया है। जीवन्मुक्त
अवस्था का वर्णन करते हुए उस स्थिति में प्रारब्ध कर्म के भी समाप्त हो जाने की बात समझायी गयी है; लेकिन
यह स्पष्ट कर दिया गया है कि उक्त अवस्था पाने के पूर्व किए गये कर्मों का प्रारब्ध फल अवश्य भोगना पड़ता
है। इन्द्रिय वृत्तियों की तरह प्रारब्ध कर्म भी केवल देहाभिमानियों को ही बाँधते हैं। गुरु-अनुशासन का
अनुगमन करके शिष्य को ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर उसका क्या प्रतिफल प्राप्त होता है, इसका वर्णन करते हुए
इस औपनिषदीय ज्ञान के हस्तान्तरण की परम्परा बतायी गयी है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
'ॐ' रूप में जिसे अभिव्यक्त किया जाता है, वह परब्रह्म स्वयं में सब प्रकार से पूर्ण है और यह सृष्टि
भी स्वयं में पूर्ण है। उस पूर्ण तत्त्व में से इस पूर्ण विश्व की उत्पत्ति हुई है। उस पूर्ण में से यह पूर्ण निकाल लेने
पर भी वह शेष भी पूर्ण ही रहता है। आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ताप-सन्ताप शान्त हों।
अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यमस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे संचरन्
यं पृथिवी न वेद। यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे संचरन् यमापो न विदुः। यस्य तेजः शरीरं
यस्तेजोऽन्तरे संचरन् यं तेजो न वेद। यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे संचरन् यं वायुर्न वेद।
यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे संचरन् यमाकाशो न वेद। यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरे
संचरन् यं मनो न वेद। यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे संचरन् यं बुद्धिर्न वेद। यस्याहंकारः
शरीरं योऽहंकारमन्तरे संचरन् यमहंकारो न वेद। यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे संचरन् यं
चित्तं न वेद। यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे संचरन् यमव्यक्तं न वेद। यस्याक्षरं शरीरं
योऽक्षरमन्तरे संचरन् यमक्षरं न वेद। यस्य मृत्युः शरीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्न वेद। स
एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः। अहं ममेति यो भावो
देहाक्षादावनात्मनि। अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा ब्रह्मनिष्ठया ॥ १॥
शरीर के अन्दर स्थित हृदय रूपी गुहा में एक (अद्वितीय), अज (कभी जन्म न लेने वाला), नित्य
(शाश्वत) निवास करता है। पृथिवी इसका शरीर है, यह पृथिवी के अन्दर रहता है; किन्तु पृथिवी इस (अज)
को नहीं जानती। जल जिसका शरीर है, जो जल में निवास करता है, पर जल को उसका ज्ञान नहीं है। तेज
१८ अध्यात्मोपनिषद्
जिसका शरीर है, जो तेज के अन्तर्गत संचरित होता है, पर तेज जिसे (जिसका संचरित होना) नहीं जानता।
वायु जिसका शरीर है, जो वायु के अन्दर संचरित होता है, पर वायु जिसे नहीं जानता। आकाश जिसका शरीर
है, जो आकाश में संचरित होता है, पर आकाश जिसे नहीं जानता। मन जिसका शरीर है, जो मन में संचरित
होता है, पर मन जिसे नहीं जानता। बुद्धि जिसका शरीर है, जो बुद्धि में निवास करता है, पर बुद्धि जिसे जानती
नहीं। जिसका शरीर अहंकार है, जो अहंकार में निवास करता है, पर अहंकार जिसे जानता नहीं। चित्त जिसका
शरीर है, जो चित्त में संचरित होता है, पर चित्त जिसे जानता नहीं। अव्यक्त जिसका शरीर है, जो अव्यक्त में
संचरित होता है, पर अव्यक्त जिसे जानता नहीं। अक्षर जिसका शरीर है, जो अक्षर में संचरित होता है, पर अक्षर
जिसे जानता नहीं। जिसका शरीर मृत्यु है, जो मृत्यु में संचरित होता है, पर मृत्यु जिसे जानती नहीं-वही
सर्वभूतों में स्थित उनका अन्तरात्मा है, वह निष्पाप है और वही एक दिव्य देवनारायण है। शरीर और इन्द्रियादि
अनात्म विषय हैं। इनके विषय में 'मैं और मेरा का भाव' अध्यास (भ्रान्ति) मात्र है, इसलिए विद्वान् को चाहिए
कि वह ब्रह्मनिष्ठ (ब्रह्मज्ञान) के द्वारा इस अध्यास (भ्रान्ति) को दूर करे॥ १ ॥
ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम्। सोऽहमित्येव तद्वृत्त्या स्वान्यत्रात्ममतिं त्यजेत् ॥२
अपने को ही बुद्धि और उसकी वृत्ति का साक्षी मानकर स्वयं को प्रत्यगात्मा समझे। वह मैं ही हूँ। इस
'सोऽहम्' वृत्ति से अपने अतिरिक्त समस्त पदार्थों से आत्म बुद्धि का परित्याग कर दे॥ २॥
लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्। शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ ३
लोकानुर्वतन (संसार का अनुसरण) छोड़कर देहानुवर्तन भी त्याग देना चाहिए। देहानुवर्तन के पश्चात्
शास्त्रानुवर्तन भी त्याग दे, इसके बाद आत्म-अध्यास (आत्म-भ्रान्ति) का भी परित्याग कर देना चाहिए॥ ३॥
[ मनुष्य प्रारम्भ में लोक, देह, शास्त्र आदि के माध्यम से सत्यानुगमन का प्रयास करता है। जैसे-जैसे सत्य का
स्वरूप समझ में आता रहता है, वैसे-वैसे स्थूल आधारों का सहारा लेने की आवश्यकता घटती जाती है। इस तथ्य को
न समझने वाले लोग मर्यादाएँ तोड़ने लगते हैं। ऋषि का भाव मर्यादा त्याग नहीं, स्थूल आधारों से ऊपर उठने का है।]
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः ।
युक्त्या श्रुत्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सार्वात्म्यमात्मनः ॥ ४॥
सदा अपने आत्म स्वरूप में स्थित रहकर युक्ति, श्रुति (श्रवण) और स्वानुभूति द्वारा सबको अपना ही
आत्म स्वरूप जानकर योगी पुरुष का मन (संकीर्ण भाव) विनष्ट होता है॥ ४॥
[ मन जब तक संकीर्णता से ग्रस्त रहता है, तब तक मेरे-तेरे के बचकाने भाव आते हैं। व्यक्तिगत संकीर्णता से
योगी का मन मुक्त हो जाता है, वह समष्टि मन का अंग बन जाता है।]
निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्न्रावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥ ५ ॥
निद्रा, लोकवार्ता, शब्दादि विषयों तथा आत्म विस्मृति का कभी अवसर न आने देकर आत्मा में आत्मा
का चिन्तन करना चाहिए॥ ५॥
मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमयं वपुः । त्यक्त्वा चण्डालवद्दूरं ब्रह्मीभूय कृती भव ॥ ६ ॥
माता और पिता के मल (मैल) से उत्पन्न हुए इस शरीर को, जिसमें मल और मांस भरा है, इसे
चाण्डाल के समान दूर करके (काया के साथ स्व के बोध को त्यागकर) ब्रह्मरूप होकर कृतार्थ हो॥ ६॥
घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परात्मनि। विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने ॥ ७॥
हे मुने ! महाकाश में घटाकाश के समान परमात्मा में आत्मा को विलीन (एकरूप) करके अखण्ड भाव
से सदैव शान्त रहो ॥ ७॥
मन्त्र १८ १९
स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना। ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत् ॥ ८ ॥
स्वप्रकाशित, स्वयंभू और अधिष्ठान (ब्रह्म) रूप होकर ब्रह्माण्ड और पिण्डाण्ड का भी विष्ठा पात्र के
समान परित्याग (उसके साथ स्वानुभूति का त्याग) कर देना चाहिए ॥ ८ ॥
चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्। निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा ॥ ९ ॥
शरीर के ऊपर आरूढ़ अहं बुद्धि को सदानन्द और चित्त स्वरूप आत्मा में लगाकर लिङ्ग (स्वज्ञानचिह्न)
को छोड़कर सर्वदा केवल आत्मरूप हो (जाओ) ॥ ९ ॥
यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तः पुरं यथा। तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भवानघ ॥ १० ॥
हे निष्पाप ! जिस प्रकार (छोटे से, किन्तु स्वच्छ) दर्पण में (विशाल) पुर (नगर) दिखाई देता है, उसी
प्रकार अपने को 'मैं ब्रह्म हूँ,' ऐसा जानकर कृतार्थ हो (जाये) ॥ १० ॥
अहंकारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते। चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः ॥ ११ ॥
अहंकार से मुक्त हुआ पुरुष आत्मस्वरूप को प्राप्त करता है। वह चन्द्रमा के समान विमल होकर पूर्ण
सदानन्द और स्वप्रकाश बनता है ॥ ११ ॥
क्रियानाशाद्भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः। वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥
(सांसारिक) क्रियानाश से चिन्ता विनष्ट होती है और चिन्तानाश से वासना का क्षय होता है। वासना का
विनष्ट हो जाना मोक्ष है और इसे ही जीवन्मुक्ति भी कहते हैं ॥ १२ ॥
सर्वत्र सर्वतः सर्वब्रह्ममात्रावलोकनम्। सद्भावभावनावार्ढ्याद्वासनालयमश्रुते ॥ १३ ॥
जो सर्वत्र सब तरफ सभी को मात्र 'ब्रह्म' रूप में देखता है और जिसकी सद्भावना दृढ़ हो गई है,
उसकी वासना का लय हो जाता है अर्थात् वासना विनष्ट हो जाती है ॥ १३ ॥
प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः ॥ १४ ॥
ब्रह्मनिष्ठा में कभी प्रमाद न करे, क्योंकि प्रमाद ही मृत्यु है (अपनी आत्मा के अनुसन्धान को छोड़कर
जीवन बिताना प्रमाद है), ऐसा विद्या के ज्ञाता (विद्यावान्) ब्रह्मवादी कहते हैं ॥ १४ ॥
यथाऽपकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति। आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम् ॥१५ ॥
जिस प्रकार शैवाल को पानी के ऊपर से कुछ हटा देने के बाद वह क्षण मात्र भी वहाँ नहीं ठहरती (और
पूर्ववत् पानी को ढक लेती है), उसी प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति भी यदि ब्रह्मनिष्ठा से थोड़ा भी हट जाये या दूर हो
जाये, तो माया उसे आवृत कर लेती है ॥ १५ ॥
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः। समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ ॥१६ ॥
जिसे जीवित स्थिति में ही कैवल्यावस्था प्राप्त हो गयी हो, वह विदेह (देहरहित) होने पर केवल (ब्रह्म)
ही रहेगा। इसलिए हे निष्पाप ! समाधिनिष्ठ होकर निर्विकल्प (विकल्परहित) बनो ॥ १६ ॥
अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा। समाधिनाऽविकल्पेन यदाऽद्वैतात्मदर्शनम् ॥ १७ ॥
जिस समय निर्विकल्प समाधि से अद्वैत आत्मा का दर्शन होता है, उसी समय हृदय की अज्ञान रूपा
ग्रन्थि का पूर्णरूपेण विनाश और विलय हो जाता है ॥ १७ ॥
अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन्। उदासीनतया तेषु तिष्ठेद्घटपटादिवत् ॥ १८ ॥
आत्मत्व अर्थात् आत्मभाव को दृढ़ करके, अहंकारादि का परित्याग करके उनसे उसी प्रकार से
उदासीन रहे, जिस प्रकार बरतन-वस्त्रादि के प्रति उदासीन भाव रखा जाता है ॥ १८ ॥
२० अध्यात्मोपनिषद्
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं मृषामात्रा उपाधयः । ततः पूर्णं स्वमात्मानं पश्येदेकात्मना स्थितम् ॥ १९ ॥
ब्रह्मा से स्तम्ब (तृण) पर्यन्त समस्त उपाधियाँ मिथ्या हैं, इसलिए सदा एक स्वरूप में अवस्थित रहने
वाले अपने पूर्ण आत्मा का ही सर्वत्र दर्शन करना चाहिए ॥ १९ ॥
स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुःस्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः । स्वयं विश्वमिदं सर्वं स्वस्मादन्यन्न किंचन ॥२०
स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु, स्वयं इन्द्र, स्वयं शिव, स्वयं विश्व और स्वयं ही यह सब कुछ है। स्वयं के
अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ २० ॥
स्वात्मन्यारोपिताशेषाभासवस्तुनिरासतः । स्वयमेव परंब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम् ॥ २१ ॥
अपनी आत्मा में समस्त वस्तुओं का आभास (रस्सी में सर्प की तरह) केवल आरोपित है, उसका
निराकरण (निरसन) कर देने से वह स्वतः पूर्ण, अद्वैत और अक्रिय (क्रियारहित) परब्रह्म बन जाता है ॥ २१ ॥
असत्कल्पो विकल्पोऽयं विश्वमित्येकवस्तुनि । निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ २२
एक ही आत्मा रूपी वस्तु में जो यह विकल्प (भेद) प्रतीत होता है, वह प्रायः मिथ्या है; क्योंकि
निर्विकार, निराकार और निर्विशेष में भेद ही कहाँ है ? ॥ २२ ॥
द्रष्टदर्शनदृश्यादिभावशून्ये निरामये । कल्पार्णव इवात्यन्तं परिपूर्णे चिदात्मनि ॥ २३ ॥
वह चैतन्य (आत्मा) द्रष्टा, दर्शन और दृश्य आदि भावों से शून्य है, जो निरामय (निर्दोष) तथा प्रलय -
कालीन सागर की तरह परिपूर्ण है ॥ २३ ॥
तेजसीव तमो यत्र विलीनं भ्रान्तिकारणम् । अद्वितीये परे तत्त्वे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥२४॥
जिस प्रकार अन्धकार प्रकाश में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार अद्वितीय परम तत्त्व में भ्रान्ति का
कारण भी विलुप्त हो जाता है। वह आत्मा अवयव रहित है, अस्तु, उसमें भेद कहाँ है ? ॥ २४ ॥
एकात्मके परे तत्त्वे भेदकर्त्ता कथं वसेत् । सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेदः केनावलोकितः ॥२५ ॥
एकात्मक परमतत्त्व में भेदकर्ता किस प्रकार रह सकता है ? सुषुप्तावस्था में सुख मात्र है, उसमें भेद
किसके द्वारा देखा गया है ॥ २५ ॥
चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन । अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि ॥ २६ ॥
इस विकल्प (भेद) का मूल कारण चित्त है। यदि चित्त न हो, तो कोई भी विकल्प नहीं है। अतः प्रत्यग्
रूप परमात्मा में अपने चित्त को समाधिस्थ (समाहित) कर दो ॥ २६ ॥
अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वस्वरूपतः । बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥ २७ ॥
अखण्डानन्द रूप आत्मा को अपना वास्तविक स्वरूप जानकर, सदा इस आत्मा में ही बाहर और
अन्दर आनन्द रस का आस्वादन, करो ॥ २७ ॥
वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् । स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् ॥२८ ॥
वैराग्य का फल बोध (ज्ञान) है, ज्ञान का फल उपरति (विषयों से विरत होना) है और उपरति का फल
आत्मानन्द के अनुभव से प्राप्त शान्ति है ॥ २८ ॥
यद्युत्तरोत्तराभावे पूर्वपूर्वं तु निष्फलम् । निवृत्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः ॥ २९ ॥
उपर्युक्त वस्तुओं में जो उत्तरोत्तर न हो, उससे पूर्व की वस्तु निष्फल है। विषयों से निवृत्ति ही परम तृप्ति
है और आत्मा का आनन्द स्वयं ही अनुपम है ॥ २९ ॥
मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः । पारोक्ष्यशबलःसत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिधः ॥ ३० ॥
मन्त्र ४० २१
मायारूप उपाधि से युक्त, जगत् का कारणरूप सर्वज्ञत्व आदि लक्षणों से युक्त, परोक्ष रूप से शबल
(अर्थात् मायावेष्टित) ब्रह्म जो सत्यादि स्वरूप वाला है, वही 'तत्' शब्द से विख्यात है ॥३०॥
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः। अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः ॥३१॥
जो 'मैं' शब्द तथा प्रत्यय का आश्रय स्वरूप प्रतीत होता है, जिसका ज्ञान अन्तःकरण से मिथ्या है, वह
(जीव) 'त्वम्' शब्द से जाना जाता है ॥३१॥
मायाविद्ये विहायैव उपाधी परजीवयोः। अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्म विलक्ष्यते ॥ ३२ ॥
ब्रह्म एवं जीव की क्रमशः माया और अविद्या-यह दो ऐसी उपाधियाँ हैं, जिनका परित्याग कर देने से
अखण्ड सच्चिदानंद परब्रह्म ही भासित होता है (दिखाई पड़ता है) ॥ ३२ ॥
इत्थं वाक्यैस्तदर्थानुसंधानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या संभावितत्वानुसंधानं मननं तु तत् ॥ ३३ ॥
इस प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों द्वारा उनके (जीव और ब्रह्म के एकत्व का) अर्थ और
अनुसंधान करना 'श्रवण' है और जो कुछ सुना गया है, उसके अर्थ पर युक्तिपूर्वक विचार-विमर्श करके
अनुसंधान करना 'मनन' है ॥ ३३ ॥
ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत् । एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते ॥३४॥
श्रवण और मनन द्वारा सन्देह रहित हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके एकतानत्व प्राप्त करना-यह
'निदिध्यासन' है॥ ३४॥
[ ध्वनि का ऊँचा-नीचा, पैना या भारी होना उसके दोलन (फ्रीक्वेंसी) पर निर्भर करता है। समान दोलन वाले
साज जब एक साथ बजते हैं, तो उसके स्वर एक दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। इसे ध्वनि दोलन का सुसंयोग (रैजोनेन्स
ऑफ फ्रीक्वेंसी) कहते हैं। एकतानत्व का अर्थ यहाँ भावात्मक सुसंयोग (रैजोनेन्स) जैसा कुछ होना चाहिए।]
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ ३५ ॥
इसके पश्चात् ध्याता और ध्यान का परित्याग करके ध्येय में ही चित्त को स्थापित करें। वायुरहित स्थान
में रखे दीपक की तरह जब चित्त निश्चल बन जाए, यही समाधि है ॥ ३५ ॥
वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचराः । स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थिताः ॥ ३६॥
समाधि की अवस्था में वृत्तियाँ केवल आत्मगोचर होती हैं, इसके कारण प्रतीत नहीं होतीं; किन्तु
समाधि में से उठे हुए साधक की उन उन्नत वृत्तियों का स्मरण द्वारा अनुमान लगाया जाता है ॥ ३६ ॥
अनादाविह संसारे संचिताः कर्मकोटयः । अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मो विवर्धते ॥ ३७॥
इस अनादि जगत् में करोड़ों कर्म एकत्र हो जाते हैं, किन्तु समाधि के द्वारा उनका विलय हो जाता है और
शुद्ध धर्म की वृद्धि होती है ॥ ३७ ॥
धर्ममेघमिमं प्राहुः समाधिं योगवित्तमाः । वर्षत्येष यथा धर्मामृतधाराः सहस्रशः ॥ ३८ ॥
उत्तम कोटि के योगवेत्ता इस समाधि को 'धर्ममेघ' कहते हैं, क्योंकि वह मेघ के समान ही धर्मामृत
रूप सहस्रों धाराओं की वर्षा करती है ॥ ३८ ॥
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते । समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये ॥ ३९ ॥
वाक्यमप्रतिबद्धं सत्प्राक्परोक्षावभासते। करामलकवद्बोधमपरोक्षं प्रसूयते ॥ ४० ॥
(जब) इस समाधि के द्वारा वासना का जाल पूर्णरूपेण लय की प्राप्त हो जाता है एवं जब पुण्य-पाप
नामवाला कर्मसमूह समूल रूप से विनष्ट हो जाता है, तब (तत्त्वमसि आदि) वाक्यों के माध्यम से पहले परोक्ष
ज्ञान प्रतिभासित होता है और बाद में (वह) हस्तामलकवत् अपरोक्ष बोध (तत्त्वज्ञान) की प्रकट करता है ॥
२२ अध्यात्मोपनिषद्
वासनानुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदावधिः । अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः ॥ ४१ ॥
(जब) भोगने योग्य पदार्थ की उपस्थिति में भी वासना उदित न हो, तब वैराग्य की स्थिति जान लेनी
चाहिए और जब अहं भाव के उदय का अभाव हो जाए अर्थात् जब वैसी (अहंकार होने योग्य) परिस्थिति बन
जाने पर भी अहं न आये, तब ज्ञान की परम स्थिति जाननी चाहिए ॥ ४१ ॥
लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा । स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते ॥ ४२ ॥
लीन वृत्तियाँ पुनः उदित न हों, तो वह उपरति की स्थिति समझनी चाहिए। इस स्थिति वाला यति
'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है, जो सदा आनन्दानुभूति करता रहता है ॥ ४२ ॥
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः । ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनि ॥ ४३ ॥
निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते। सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥४४॥
जिसका आत्मतत्त्व एकमात्र ब्रह्म में ही विलीन हुआ हो, वह निर्विकार और निष्क्रिय हो जाता है। ब्रह्म
और आत्मा के एकत्व के अनुसंधान में लीन हुई वृत्ति जब विकल्प रहित (ऊहापोह रहित) और मात्र चैतन्यं
रूप बन जाती है, तब उसे प्रज्ञा कहते हैं। वह (प्रज्ञा) जिसमें सर्वदा विद्यमान रहती है, वह 'जीवन्मुक्त'
कहलाता है ॥ ४३-४४ ॥
देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके। यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ ४५ ॥
शरीर और इन्द्रियों में जिसका अहं भाव न हो तथा इनके अतिरिक्त अन्य पदार्थों पर भी जिसका ममत्व
न हो, वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ४५ ॥
न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः । प्रज्ञया यो विजानाति स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ ४६ ॥
जो जीव और ब्रह्म में तथा ब्रह्म और सृष्टि में भेद बुद्धि नहीं रखता, वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ४६ ॥
साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन्पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः । समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ ४७ ॥
सज्जनों द्वारा पूजे जाने पर और दुर्जनों द्वारा ताड़ित किये जाने पर भी जिसमें समभाव बना रहे, वह
जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ४७ ॥
विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः । अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः ॥ ४८ ॥
जिसके द्वारा ब्रह्म तत्त्व जान लिया गया है, संसार के प्रति उसकी दृष्टि पूर्ववत् नहीं रहती। इसलिए यदि
वह संसार को पूर्व के समान ही देखता है, तो यह जानना चाहिए कि वह अभी तक ब्रह्म भाव को समझा नहीं
है और बहिर्मुख है ॥ ४८ ॥
सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते । फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो नहि कुत्रचित् ॥४९॥
जब तक सुख आदि का अनुभव होता है, तब तक इसे प्रारब्ध भोग मानना चाहिए, क्योंकि कोई भी
फल पूर्व में क्रिया करने के कारण ही उदित होता है। बिना क्रिया के कोई फल नहीं मिलता ॥ ४९ ॥
अहं ब्रह्मेति विज्ञानात् कल्पकोटिशतार्जितम्। संचितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्रकर्मवत् ॥५०
जिस प्रकार जाग्रत् हो जाने पर स्वप्न रूप कर्म विनष्ट हो जाता है, उसी प्रकार 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान हो
जाने पर करोड़ों कल्पों से अर्जित (संचित) कर्म विलीन (नष्ट) हो जाते हैं ॥ ५० ॥
स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा। न श्लिष्यते यतिः किंचित्कदाचिद्भाविकर्मभिः ॥ ५१ ॥
योगी आकाश के सदृश अपने को असङ्ग और उदासीन जानकर भावी कर्मों में किञ्चित् भी लिप्त नहीं
होता ॥ ५१ ॥
मन्त्र ६४ २३
न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते। तथाऽऽत्मोपाधियोगेन तद्धर्मैर्नैव लिप्यते ॥ ५२ ॥
जिस प्रकार सुरा कुम्भ में स्थित आकाश, सुरा की गन्ध से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर रूपी
उपाधि के साथ संयुक्त रहने पर भी आत्मा उसके गुण-धर्मों से प्रभावित नहीं होता ॥ ५२ ॥
ज्ञानोदयात्पुराऽऽरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। अदत्त्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत् ॥ ५३ ॥
जिस प्रकार छोड़ा हुआ बाण निर्धारित लक्ष्य को बेधता ही है, उसी प्रकार ज्ञानोदय होने से पूर्व (अज्ञान
की स्थिति में) किये गये कर्म का फल अवश्य मिलता है अर्थात् ज्ञान उत्पन्न हो जाने से पूर्व जो कृत्य किये गये
थे, उनका फल ज्ञान उत्पन्न हो जाने से विनष्ट नहीं होता ॥ ५३ ॥
व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ। न तिष्ठति भिनत्त्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् ॥ ५४
बाघ समझकर (उसे मारने के लिए) छोड़ा गया बाण यह जान लेने पर कि 'यह बाघ नहीं गाय है',
रुकता नहीं और वेगपूर्वक लक्ष्य वेध करता ही है, उसी प्रकार ज्ञान हो जाने पर भी पूर्वकृत कर्म का फल
मिलता ही है ॥ ५४ ॥
अजरोऽस्म्यमरोऽस्मीति य आत्मानं प्रपद्यते। तदात्मना तिष्ठतोऽस्य कुतः प्रारब्धकल्पना ॥ ५५ ॥
'मैं अजर और अमर हूँ', इस प्रकार अपने आत्मरूप को जो स्वीकार कर लेता है, वह आत्मरूप में ही
स्थित रहता है, फिर उसे प्रारब्ध कर्म की कल्पना ही कैसे हो सकती है॥ ५५॥
प्रारब्धं सिद्ध्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः। देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः ॥ ५६ ॥
प्रारब्ध कर्म उसी समय सिद्ध होता है, जब देह में आत्मभाव होता है; परन्तु देह में आत्मभाव रखना इष्ट
नहीं है। अस्तु, देह के ऊपर आत्म बुद्धि का परित्याग करके प्रारब्ध कर्म का परित्याग करना चाहिए ॥ ५६ ॥
प्रारब्धकल्पनाप्यस्य देहस्य भ्रान्तिरेव हि ॥ ५७ ॥ अध्यस्तस्य कुतस्तत्त्वमसत्यस्य कुतो जनिः।
अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः ॥ ५८ ॥
देह के प्रति भ्रान्ति ही प्राणी के प्रारब्ध की परिकल्पना है और आरोपित अथवा भ्रान्त धारणा से जो
कल्पित हो, वह सत्य कैसे हो सकता है? जो सत्य नहीं है, उसका जन्म कहाँ से हो और जिसका जन्म नहीं है,
उसका विनाश कैसे हो ? अस्तु, जो असत् है, उसका प्रारब्ध कर्म कैसे बने ? ॥ ५७-५८ ॥
ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि। तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान् ॥ ५९ ॥
यदि अज्ञान (देहासक्ति आदि ) का पूर्ण विलय ज्ञान में हो जाये, तो फिर देह का अस्तित्व ही कैसे रह
सकता है, ऐसी शंका जड़ (स्थूल) बुद्धि वाले ही करते हैं ॥ ५९ ॥
समाधातुं बाह्यदृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः। न तु देहादिसत्यत्वबोधनाय विपश्चिताम् ॥ ६० ॥
बहिर्मुखी दृष्टि वाले (अज्ञानियों) को समझाने के लिए श्रुति प्रारब्ध की बात कहती है। ज्ञानियों के लिए
या देहादि की सत्यता प्रकट करने के लिए प्रारब्ध का उल्लेख नहीं किया गया है ॥ ६० ॥
परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम्। सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्ययम् ॥ ६१ ॥
प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्तं सर्वतोमुखम्। अहेयमनुपादेयमनाधेयमनाश्रयम् ॥ ६२ ॥
निर्गुणं निष्क्रियं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम्। अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम् ॥ ६३ ॥
तत्समृद्धं स्वतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनीदृशम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ ६४ ॥
वस्तुतः परिपूर्ण, आदि-अन्तरहित, अप्रमेय, विकाररहित, सद्घन, चिद्घन, नित्य, आनन्दघन, अव्यय,
प्रत्यग्, एकरस, पूर्ण, अनन्त, सब ओर मुख वाला, त्याग और ग्रहण न करने वाला, किसी आधार के ऊपर न
२४ अध्यात्मोपनिषद्
रहने वाला और किसी का आश्रय भी न लेने वाला, निर्गुण, क्रियारहित, सूक्ष्म स्वरूप, निर्विकल्प, दोष-दुर्गुण
रहित, अनिरूप्य (जिसका निरूपण नहीं किया जा सकता, ऐसे स्वरूप वाला), मन और वाणी द्वारा अगोचर,
सत्समृद्ध, (सतोगुण की अधिकता वाला) स्वतः सिद्ध, शुद्ध, बुद्ध, अनीदृश (जिसकी किसी के साथ तुलना
न की जा सके) - वह एक ही अद्वैत रूप ब्रह्म है, उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है॥ ६०-६४॥
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम्। ससिद्धः ससुखं तिष्ठन् निर्विकल्पात्मनात्मनि ॥
इस प्रकार अपनी अनुभूति से स्वयं ही अपनी आत्मा को अखण्डित जानकर (तू) सिद्ध हो और
निर्विकल्प (विकल्प रहित) आत्मा से अपने को सुख पूर्ण स्थिति में प्रतिष्ठित कर ॥ ६५॥
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत्। अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ ६६ ॥
(गुरु के इस उपदेश से शिष्य को ज्ञान हो गया और वह कहने लगा -) जिस जगत् को अभी मैंने देखा
था, वह कहाँ चला गया ? किसके द्वारा वह हटा लिया गया ? वह कहाँ लीन हो गया ? बहुत आश्चर्य का विषय
है कि अभी तो वह मुझे दिखाई पड़ रहा था, क्या वह अब नहीं है? ॥६६॥
किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत्किं विलक्षणम्। अखण्डानन्दपीयूषपूर्ण ब्रह्ममहार्णवे ॥ ६७ ॥
अखण्ड आनन्द रूप पीयूष से पूरित ब्रह्म रूप सागर में अब मेरे लिए क्या त्याग करने योग्य है? क्या
ग्रहण करने योग्य है? अन्य कुछ है भी क्या ? यह कैसी विलक्षणता है? ॥ ६७ ॥
न किंचिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम्। स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि स्वलक्षणः ॥ ६८
यहाँ मैं न कुछ देखता हूँ, न सुनता हूँ और न ही कुछ जानता हूँ; क्योंकि मैं सदा आनन्द रूप से अपने
आत्मतत्त्व में ही स्थित हूँ और स्वयं ही अपने लक्षण वाला हूँ ॥ ६८ ॥
असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमहं हरिः। प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहं परिपूर्णश्चिरन्तनः ॥ ६९ ॥
मैं सङ्ग रहित हूँ, अङ्ग रहित हूँ, चिह्न रहित और स्वयं हरि हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, अनन्त हूँ, परिपूर्ण और
चिरन्तन अर्थात् प्राचीन से प्राचीन हूँ ॥ ६९ ॥
अकर्त्ताऽहमभोक्ताऽहमविकारोऽहमव्ययः। शुद्धो बोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः ॥ ७० ॥
मैं अकर्त्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, अविकारी और अव्यय हूँ। मैं शुद्ध बोधस्वरूप और केवल सदाशिव हूँ॥
एतां विद्यामपान्तरतमाय ददौ। अपान्तरतमो ब्रह्मणे ददौ। ब्रह्मा घोराङ्गिरसे ददौ। घोराङ्गिरा
रैक्वाय ददौ। रैक्वो रामाय ददौ। रामः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददावित्येतन्निर्वाणानुशासनं वेदानुशासनं
वेदानुशासनमित्युपनिषत् ॥ ७१ ॥
यह विद्या (सदाशिव) गुरु ने अपान्तरतम नामक (देवपुत्र) ब्राह्मण को दी थी। अपान्तरतम ने ब्रह्मा को
दी थी। ब्रह्मा ने घोर आङ्गिरस को दी। घोर आङ्गिरस ने रैक्व को दी। रैक्व ने राम (परशुराम) को दी। राम ने
समस्त प्राणियों के लिए प्रदान की। यह निर्वाण (प्राप्त करने) का अनुशासन है, वेद का अनुशासन है और वेद
का आदेश है। इस प्रकार यह उपनिषद् (रहस्य विद्या) पूर्ण हुई ॥ ७१ ॥
ॐ पूर्णमदः ............ इति शान्तिः ॥
॥ इत्यध्यात्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ अवधूतोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय है। इस उपनिषद् में सांकृति की जिज्ञासा का समाधान करते हुए भगवान्
दत्तात्रेय अवधूत स्थिति के स्वरूप और महत्ता का वर्णन करते हैं। अवधूत स्थिति में किस प्रकार श्रेष्ठ तत्त्व के
समाहित होने से व्यक्ति धन्य हो जाता है, इसका वर्णन भी किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे परमात्मन् ! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन
करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक
दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या-द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न ! (हमारे) त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक,
आध्यात्मिक) तापों का शमन हो, अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो।
अथ ह सांकृतिर्भगवन्तमवधूतं दत्तात्रेयं परिसमेत्य पप्रच्छ। भगवन्कोऽवधूतस्तस्य का
स्थितिः किं लक्ष्म किं संसरणमिति। तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः ॥१॥
अक्षरत्वाद्धरेण्यत्वाद्वधूतसंसारबन्धनात्। तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते ॥ २ ॥
सांकृति ने भगवान् दत्तात्रेयजी के समीप जाकर पूछा- 'हे भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति
किस तरह की होती है ? उसका लक्षण किस प्रकार का होता है ? तथा उसका संसार (सांसारिक व्यवहार)
किस प्रकार का होता है?' उनके इन प्रश्नों को सुनकर परम कृपालु भगवान् दत्तात्रेयजी ने कहा- जो अक्षर -
अर्थात् अविनाशी (भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसार रूपी बन्धनों से रहित हो तथा 'तत्त्वमसि' आदि
वाक्यों के लक्ष्यार्थ बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत (अक्षर का 'अ', वरेण्य का 'व', धूतसंसारबन्धन का
'धू' तथा तत्त्वमस्यादि लक्ष्य का 'त' लेने से 'अवधूत') कहा जाता है ॥ १-२ ॥
यो विलङ्घ्याश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा ।
अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते ॥ ३ ॥
जो योगी पुरुष आश्रम एवं वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मा में ही सदैव स्थित रहता हो, वह
वर्णाश्रम रहित योगी पुरुष 'अवधूत' कहा जाता है ॥ ३ ॥
तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षतः ।
प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते ॥४॥
उस (योगी) का प्रिय (ब्रह्म) ही सिर है, 'मोद' दायाँ बाजू और 'प्रमोद' बायाँ बाजू है तथा 'आनन्द'
मध्य आत्मा है। उसकी (आत्मा की) स्थिति गाय के पैर के सदृश (चार-प्रिय, मोद, प्रमोद एवं आनन्द रूप)
हो जाती है ॥ ४ ॥
[ यही प्रकरण तैत्तिरीयोपनिषद् ( २.५ ) में भी आया है । ]
२६ अवधूतोपनिषद्
गोवालसदृशं शीर्षे नापि मध्ये न चाप्यधः। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छाकारेण कारयेत्।
एवं चतुष्पदं कृत्वा ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५॥
उस सिर (हर्ष) में, अधः (मोद-प्रमोद) में तथा मध्य (आनन्द) में आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए
(आत्मा नहीं मानना चाहिए, तो किसे मानना चाहिए, इस पर कहते हैं कि) गोवाल (गौ की पूँछ) सदृश उस
ब्रह्म की पुच्छ प्रतिष्ठा है, उस ब्रह्म को इसी पुच्छाकार में जानना चाहिए। इस प्रकार ब्रह्म को भलीप्रकार जानकर
वे (योगीपुरुष) परमगति को प्राप्त करते हैं॥ ५॥
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः॥ ६॥
अमरत्व की प्राप्ति न तो विभिन्न कर्मों के द्वारा, न प्रजा के द्वारा और न ही धन के द्वारा होती है। एक मात्र
त्याग के द्वारा ही अमरत्व को प्राप्त किया जा सकता है॥ ६॥
स्वैरं स्वैरविहरणं तत्संसरणम्। साम्बरा वा दिगम्बरा वा । न तेषां धर्माधर्मौ न मेध्यामेध्यौ।
सदा सांग्रहण्येष्ट्याश्वमेधमन्तर्यागं यजते। स महामखो महायोगः॥ ७॥
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना ही उन योगियों का संसार है। उनमें से कितने ही तो
वस्त्रों को धारण करते हैं और कितने ही दिगम्बर अर्थात् बिना वस्त्रों के ही रहते हैं। उन योगियों के लिए न कुछ
धर्म है और न ही कुछ अधर्म है, पवित्र एवं अपवित्र आदि भी कुछ नहीं है। (इन्द्रियों को वश में करने के रूप
में) सदा संग्रह की दृष्टि से वे (योगीजन) अन्तःकरण में (आत्मा का ध्यान रूप) अश्वमेध यज्ञ किया करते हैं।
यही उनका महायज्ञ और महायोग है॥ ७॥
[अन्तः स्थित परमात्म चेतना में बहिर्मुखी व्यक्त शक्ति धाराओं को समर्पित कर देना-विसर्जित कर देना ही
आन्तरिक अश्वमेध कहा गया है। इसे ही महायज्ञ या महायोग भी कहा गया है।]
कृत्स्नमेतच्चित्रं कर्म। स्वैरं न विगायेत्तन्महाव्रतम्। न स मूढवल्लिप्यते॥ ८॥
इस प्रकार उन योगियों का सम्पूर्ण चरित्र आश्चर्य युक्त होता है। उनके इस प्रकार के चित्र-विचित्र कर्मों
की निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही उनका महाव्रत है। वे अज्ञानी मनुष्यों की भाँति (पाप-पुण्यादि में)
लिप्त नहीं होते। वे सदैव निर्लिप्त भाव से इच्छानुसार विचरण करते रहते हैं॥ ८॥
यथा रविः सर्वरसान्प्रभुङ्क्ते हुताशनश्चापि हि सर्वभक्षः।
तथैव योगी विषयान्प्रभुङ्क्ते न लिप्यते पुण्यपापैश्च शुद्धः॥ ९॥
जिस प्रकार सूर्य सभी प्रकार के रसों को ग्रहण करता है तथा अग्नि सभी कुछ भक्षण कर लेता है, उसी
प्रकार योगी पुरुष विषयादि भोगों का उपभोग करता हुआ भी शुद्ध होने के कारण पाप-पुण्यादि का भागीदार
नहीं बनता॥ ९॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ १०॥
जिस प्रकार चारों ओर से परिपूर्ण होने पर भी अचल प्रतिष्ठा (स्थिति) वाले समुद्र में जल प्रविष्ट होता
है, वैसे ही योगी पुरुष सभी विषय-भोगों के रहने पर भी अचल रहता है और शान्ति को प्राप्त करता है। विषय-
भोगों की इच्छा करने वाला कामना युक्त मनुष्य वैसी शान्ति नहीं प्राप्त करता॥ १०॥
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥११॥
अतः सत्य बात तो यह है कि किसी का (निरोध) लय नहीं है, किसी की उत्पत्ति नहीं है, कोई आबद्ध
मन्त्र १९ २७
(बँधा) हुआ नहीं है, कोई साधक नहीं है, कोई (मुमुक्षु) अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करने वाला नहीं है तथा कोई
मुक्त भी नहीं है, यही वास्तविक स्थिति है ॥ ११॥
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम् ॥ १२ ॥
तदेव कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया ॥ १३॥
परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया । अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः ॥ १४ ॥
सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् । व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा ॥१५
येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः । निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ॥१६
द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्तु किं मे स्यादन्यकल्पनात् । गुञ्जापुञ्जादि दह्नोत नान्यारोपितवह्निना ।
नान्यारोपितसंसार धर्मनेवमहं भजे ॥ १७ ॥
इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे
बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है। इस तरह से हर एक योग का
मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है। (इसके
पश्चात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के
आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार
में पुनः फँसूँ ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं
समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ। जिन लोगों को इस
बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार
ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ। मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक
भी इच्छा नहीं करता। जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की
कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को
प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है। तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित
ही नहीं ९, इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥ १२-१७॥
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन्कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥ १८ ॥
जो लोग तत्त्व को न जानते हों, वे भले ही कुछ भी श्रवण करें; किन्तु मैं (अवधूत) तो स्वयं ही तत्त्व को
जानने में समर्थ हूँ। फिर किस लिए श्रवण करूँ ? जो लोग संशय में पड़े हों, वे मनन करें। मुझे तो किसी भी
तरह का संशय ही नहीं है, इस कारण से मैं (अवधूत) मनन नहीं करता ॥ १८ ॥
विपर्यस्तो निदिध्यासे किं ध्यानमविपर्यये ।
देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥ १९ ॥
जिसको विपर्यास अर्थात् विपरीत ज्ञान हुआ हो, वह भले ही निदिध्यासन करे; परन्तु जहाँ पर विपर्यास
ही नहीं, वहाँ पर ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। शरीर को आत्मा मान लेने का विपर्यास मुझ (अवधूत)
को नहीं होता। इस कारण निदिध्यासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती ॥ १९ ॥
अहं मनुष्य इत्यादिव्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥ २० ॥
मैं मनुष्य हूँ, इस तरह का व्यवहार भी बिना विपर्यास (विपरीत ज्ञान) के नहीं होता। यह विपर्यास भी
दीर्घकाल से अभ्यास में पड़ी वासना के कारण ही होता है ॥ २० ॥
२८ अवधूतोपनिषद्
आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्मक्षये त्वसौ नैव शाम्येद्ध्यानसहस्रतः ॥ २१ ॥
प्रारब्ध कर्मों के विनष्ट होने पर ही यह व्यवहार निवर्तित (बन्द) होता है; किन्तु प्रारब्ध कर्मों का नाश
न हुआ हो, तब तक सहस्रों बार चिन्तन करने के बाद भी यह व्यवहार शान्त नहीं होता ॥ २१ ॥
विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद्ध्यानमस्तु ते । बाधिकर्मव्यवहृतिं पश्यन्ध्यायाम्यहं कुतः ॥ २२ ॥
यदि व्यवहार कर्म करने की इच्छा हो, तो तुम अपनी इच्छानुसार ध्यान करो; परन्तु मेरी दृष्टि में तो कर्मों
का कोई व्यवहार ही नहीं, तो मैं किसलिए ध्यान करूँ ॥ २२ ॥
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम ।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥ २३ ॥
मुझे विक्षेप अर्थात् चित्त की अस्थिरता होती ही नहीं, इस कारण से मुझे समाधि-अवस्था की जरूरत ही
नहीं पड़ती। जब यह मन विकारग्रस्त होता है, तब चित्त अस्थिर होता है और तभी समाधि की आवश्यकता
होती है। मैं तो नित्य ही अनुभव रूप हूँ। समाधि में मुझे और क्या कुछ भिन्न अनुभव हो सकता है ? ॥ २३ ॥
नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः ॥ २४ ॥
व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वाऽन्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥ २५
मुझे जो-जो करना है, वह-वह मैंने किया तथा जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सदा ही प्राप्त करता रहा।
इस कारण लौकिक, शास्त्रीय या फिर अन्य किसी भी तरह का व्यवहार मुझे क्यों करना चाहिए ? अतः मैं
नहीं करता हूँ। मुझे किसी भी बात की लिप्तता नहीं है। सहज प्राकृतिक ढंग से जो होता है, उसी में रत रहता
हूँ ॥ २४-२५ ॥
अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥ २६ ॥
अथवा मैं कृत-कृत्य (पूर्णकाम) हूँ, तब भी साधारण लोगों पर अनुग्रह करने की इच्छा से यदि
शास्त्राज्ञानुसार मैं चलता हूँ, तो इसमें मेरी क्या हानि है ? ॥ २६ ॥
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक्तद्वत्पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥ २७ ॥
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥२८ ॥
देवताओं की स्तुति-अर्चना, स्नान, शौच, भिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे। वाणी ॐकार रूपी
प्रणव को भले ही जपती रहे, उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे, बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले
ही करती रहे या फिर भले ही (वह) ब्रह्मलीन रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षी रूप हूँ। मैं (अवधूत) इनमें से
किसी भी काम को कभी भी नहीं करता हूँ और न करवाता ही हूँ ॥२७-२८॥
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥ २९ ॥
मैं (अवधूत) कृत-कृत्य होने से पूर्ण तृप्त हूँ तथा जो कुछ भी मुझे प्राप्त करना था, वह सभी कुछ प्राप्त
कर लिया है। इस प्रकार से इस तृप्ति को ही मैं निरन्तर अपने मन में मानता रहता हूँ ॥ २९ ॥
• धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि ।
धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥ ३० ॥
मैं धन्य हूँ-धन्य हूँ; क्योंकि मैं नित्य, अविनाशी अपने आत्म-तत्त्व को सहज रूप से ही जानता हूँ। मैं
धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे ब्रह्म का आनन्द स्पष्टतया प्रकाश प्रदान करता है ॥ ३० ॥