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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 414 में से

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पृष्ठ 19

मन्त्र १८ १९
स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना। ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत् ॥ ८ ॥
स्वप्रकाशित, स्वयंभू और अधिष्ठान (ब्रह्म) रूप होकर ब्रह्माण्ड और पिण्डाण्ड का भी विष्ठा पात्र के
समान परित्याग (उसके साथ स्वानुभूति का त्याग) कर देना चाहिए ॥ ८ ॥
चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्। निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा ॥ ९ ॥
शरीर के ऊपर आरूढ़ अहं बुद्धि को सदानन्द और चित्त स्वरूप आत्मा में लगाकर लिङ्ग (स्वज्ञानचिह्न)
को छोड़कर सर्वदा केवल आत्मरूप हो (जाओ) ॥ ९ ॥
यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तः पुरं यथा। तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भवानघ ॥ १० ॥
हे निष्पाप ! जिस प्रकार (छोटे से, किन्तु स्वच्छ) दर्पण में (विशाल) पुर (नगर) दिखाई देता है, उसी
प्रकार अपने को 'मैं ब्रह्म हूँ,' ऐसा जानकर कृतार्थ हो (जाये) ॥ १० ॥
अहंकारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते। चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः ॥ ११ ॥
अहंकार से मुक्त हुआ पुरुष आत्मस्वरूप को प्राप्त करता है। वह चन्द्रमा के समान विमल होकर पूर्ण
सदानन्द और स्वप्रकाश बनता है ॥ ११ ॥
क्रियानाशाद्भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः। वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥
(सांसारिक) क्रियानाश से चिन्ता विनष्ट होती है और चिन्तानाश से वासना का क्षय होता है। वासना का
विनष्ट हो जाना मोक्ष है और इसे ही जीवन्मुक्ति भी कहते हैं ॥ १२ ॥
सर्वत्र सर्वतः सर्वब्रह्ममात्रावलोकनम्। सद्भावभावनावार्ढ्याद्वासनालयमश्रुते ॥ १३ ॥
जो सर्वत्र सब तरफ सभी को मात्र 'ब्रह्म' रूप में देखता है और जिसकी सद्भावना दृढ़ हो गई है,
उसकी वासना का लय हो जाता है अर्थात् वासना विनष्ट हो जाती है ॥ १३ ॥
प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः ॥ १४ ॥
ब्रह्मनिष्ठा में कभी प्रमाद न करे, क्योंकि प्रमाद ही मृत्यु है (अपनी आत्मा के अनुसन्धान को छोड़कर
जीवन बिताना प्रमाद है), ऐसा विद्या के ज्ञाता (विद्यावान्) ब्रह्मवादी कहते हैं ॥ १४ ॥
यथाऽपकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति। आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम् ॥१५ ॥
जिस प्रकार शैवाल को पानी के ऊपर से कुछ हटा देने के बाद वह क्षण मात्र भी वहाँ नहीं ठहरती (और
पूर्ववत् पानी को ढक लेती है), उसी प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति भी यदि ब्रह्मनिष्ठा से थोड़ा भी हट जाये या दूर हो
जाये, तो माया उसे आवृत कर लेती है ॥ १५ ॥
जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः। समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ ॥१६ ॥
जिसे जीवित स्थिति में ही कैवल्यावस्था प्राप्त हो गयी हो, वह विदेह (देहरहित) होने पर केवल (ब्रह्म)
ही रहेगा। इसलिए हे निष्पाप ! समाधिनिष्ठ होकर निर्विकल्प (विकल्परहित) बनो ॥ १६ ॥
अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा। समाधिनाऽविकल्पेन यदाऽद्वैतात्मदर्शनम् ॥ १७ ॥
जिस समय निर्विकल्प समाधि से अद्वैत आत्मा का दर्शन होता है, उसी समय हृदय की अज्ञान रूपा
ग्रन्थि का पूर्णरूपेण विनाश और विलय हो जाता है ॥ १७ ॥
अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु संत्यजन्। उदासीनतया तेषु तिष्ठेद्घटपटादिवत् ॥ १८ ॥
आत्मत्व अर्थात् आत्मभाव को दृढ़ करके, अहंकारादि का परित्याग करके उनसे उसी प्रकार से
उदासीन रहे, जिस प्रकार बरतन-वस्त्रादि के प्रति उदासीन भाव रखा जाता है ॥ १८ ॥