१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
खण्ड ४ मन्त्र ३ ३२३
होना) इन षट् साधनों द्वारा ही जानना चाहिए। इसी प्रकार दम (इन्द्रियदमन), दान और दया इन तीनों की
ओर दृष्टि रखनी चाहिए। ऐसा करने वाले का प्राण उत्क्रमण नहीं करता (अर्थात् अन्यत्र नहीं जाता), वरन् इस
आत्मतत्त्व में ही विलीन हो जाता है और ब्रह्म होकर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ २-३ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानकधा विकसितं
हृदयस्य दश छिद्राणि भवन्ति येषु प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ १ ॥
हृदय के मध्यभाग में रक्त वर्ण के मांस पिण्ड के बीच वह सूक्ष्म आत्म-तत्त्व विद्यमान है। वह कुमुद
(रात्रि में विकसित होने वाले कुमुद पुष्प) के समान श्वेतवर्ण वाला और अनेक प्रकार से विकसित हुआ है।
हृदय में दस छिद्र होते हैं, जिनके अन्दर प्राण निवास करते हैं ॥ १ ॥
[ ऋषि स्थूल हृदय के मध्य में स्थित पिण्ड में आत्मतत्त्व के होने की बात कहते हैं। वर्तमान विज्ञान के अनुसार
हृदय में स्थित पेसमेकर, के साथ इसकी संगति बैठती है। हृदय की धड़कन का मूल स्पंदन वहीं से उभरता है, जिसे जीव
चेतना द्वारा उद्भूत स्पंदन ही कहा जा सकता है। हृदय में १० छिद्रों की बात स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों संदर्भों में सिद्ध होती
है। हृदय की धड़कन के साथ प्राण संचरित होते हैं, ५ प्राण एवं ५ उपप्राण कुल दस प्रकार के प्राणों का संचरण हृदय
से होता है, यह सूक्ष्म व्याख्या हुई। स्थूल हृदय में भी १० छिद्र इस प्रकार पाये जाते हैं-दाहिने ऑरिकल में शरीर के ऊपरी
भाग से आने वाले रक्त का छिद्र सुपीरियर वैनाकोवा तथा २. नीचे से आने वाले के लिए इन्फीरियर वैनाकोवा ३. दाहिने
आरि० से दाहिने वेंट्रिकल का छिद्र, ४. दायें वेंट्रिकल से फेफड़ों से रक्त जाने का मार्ग 'ट्रंक्स', ५, ६. बायें फेफड़े से बायें
आरि० में प्रवेश के दो मार्ग; ७,८. दायें फेफड़े से रक्त प्रवेश के दो मार्ग, ९. बायें आरि० से बायें वेंट्रि० सें रक्त जाने का
मार्ग एवं १०. बायें वेंट्रिकल से शरीर पोषण के लिए रक्त से भेजने का मार्ग ।]
स यदा प्राणेन सह संयुज्यते तदा पश्यति नद्यो नगराणि बहूनि विविधानि च यदा
व्यानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवांश्च ऋषींश्च यदाऽपानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति
यक्षराक्षसगन्धर्वान्यदोदानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवलोकान्देवान्स्कन्दं जयन्तं चेति
यदा समानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवलोकान्धनानि च यदा वैरम्भेण सह संयुज्यते
तदा पश्यति दृष्टं च श्रुतं च भुक्तं चाभुक्तं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति ॥ २ ॥
यह जीव (जाग्रदवस्था में) जब प्राण के साथ संयुक्त होता है, तब बहुत सी नदियों और विविध प्रकार
के नगरों को देखता है। जब व्यान के साथ संयुक्त होता है, तब देवों और ऋषियों का दर्शन करता है। जब
अपान के साथ संयुक्त होता है, तब यक्ष, राक्षस और गन्धर्वों का दर्शन करता है। जब उदान के साथ संयुक्त
होता है, तब देवलोकों, देवों और जयन्त को देखता है। जब समान के साथ संयुक्त होता है, तब देवलोकों और
धन का दर्शन करता है। जब वैरम्भ के साथ संयुक्त होता है, तब देखे हुए को, सुने हुए को, खाये हुए को,
बिना खाये हुए को, सत् और असत् सभी को देखता है ॥ २ ॥
अथेमा दश दश नाड्यो भवन्ति। तासामेकैकस्या द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः शाखा
नाडीसहस्राणि भवन्ति यस्मिन्नयममात्मा स्वपिति शब्दानां च करोत्यथ यद्द्वितीये स कोशे
स्वपिति तदेमं च लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान्विजानाति स संप्रसाद इत्याचक्षते
प्राणः शरीरं परिरक्षति हरितस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य श्वेतस्य नाड्यो रुधिरस्य पूर्णाः ॥३॥
इस हृदय की दस-दस अर्थात् सौ नाड़ियाँ होती हैं। इनमें से प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार नाड़ी -
३२४ सुबालोपनिषद्
शाखायें होती हैं। इस प्रकार हजारों नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें यह आत्मा शयन करता है और शब्दों की क्रिया
करता है। द्वितीय कोश में जब आत्मा शयन करता है, तब इह लोक और परलोक का दर्शन करता है, समस्त
शब्दों को जानता है, उस स्थिति में इसे संप्रसाद कहते हैं। प्राण शरीर की रक्षा करता है। ये नाड़ियाँ हरित वर्ण,
नीले, पीले, लाल और श्वेत वर्ण के रक्त से अभिपूरित हैं (अर्थात् वात, पित्तादि रसों से पूर्ण हैं) ॥ ३ ॥
अथात्रैतद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमित्रानेकधा विकसितं यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तथा
हिता नाम नाड्यो भवन्ति हृदयाकाशे परे कोशे दिव्योऽयमात्मा स्वपिति यत्र सुप्तो न कंचन
कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति न तत्र देवा न देवलोका यज्ञा न यज्ञा वा न माता न
पिता न बन्धुर्न बान्धवो न स्तेनो न ब्रह्महा तेजस्कायममृतं संलिल एवेदं सलिलं वनं भूयस्तेनैव
मार्गेण जाग्राय धावति सम्राडिति होवाच ॥ ४ ॥
इस शरीर में स्थित सूक्ष्म हृदय कमल, रात्रि में खिलने वाले कुमुद के सदृश श्वेत वर्ण का है, जो
अनेक प्रकार से विकास को प्राप्त हुआ है। एक बाल को हजार हिस्सों में चीर दिया जाए, इतनी पतली हिता
नामक नाड़ियाँ होती हैं। हृदयाकाश परम कोश है, जिसमें यह दिव्य आत्म तत्त्व निवास करता है। जब यह
निद्रा की अवस्था में होता है, तो किसी प्रकार की कामना नहीं करता और न ही कोई स्वप्न देखता है। वहाँ न
कोई देवता है, न देवलोक है, न यज्ञ है, न उसकी क्रियाएँ हैं। उस स्थिति में (वह) न माता है, न पिता है, न
बन्धु है, न बान्धव है, न चोर है, न ब्रह्म हत्यारा है। वह (आत्मा) तेजस्वरूप है, अमृत है। जल ही जल है, वन
के समान है। इस मार्ग से आत्मा जाग्रदवस्था की ओर दौड़ता हैं, सम्राट् (जिसका अन्तःकरण ज्ञान से
प्रकाशित हो चुका है, ऐसे अनुभवित्त्वान् व्यक्ति) ने ऐसा कहा है ॥ ४ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
इस खण्ड में ज्ञानेन्द्रियों, अन्तःकरण एवं कर्मेन्द्रियों के माध्यम से आत्मा की सक्रियता का विवेचन किया गया
है। इस प्रकरण में जो आत्मा से सम्बद्ध है, उसे अध्यात्म, भौतिक सृष्टि से सम्बद्ध को अधिभूत तथा देव शक्तियों से सम्बद्ध
को अधिदैवत कहा गया है। जीवन की विभिन्न धाराओं की व्याख्या इन्हीं तीनों विशेषणों के संदर्भ में की गयी है-
स्थानानि स्थानिभ्यो यच्छति नाडी तेषां निबन्धनं चक्षुरध्यात्मं द्रष्टव्यमधिभूतमादित्य-
स्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चक्षुषि यो द्रष्टव्ये य आदित्ये यो नाड्यां यः प्राणे यो
विज्ञाने य आनन्दे यो हृदयाकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मा-
नमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १ ॥
(इस प्रकार जाग्रत् आदि कोशत्रय में निवास करने वाला) आत्मा उन-उन स्थानों में रहने वालों को
स्थान प्रदान करता है। नाड़ी उनका मूल साधन है। चक्षु अध्यात्म है। देखा जाने वाला (द्रष्टव्य) पदार्थ अधिभूत
है और आदित्य अधिदैवत है। नाड़ी उसका मूल कारण है। जो चक्षु इन्द्रिय में, द्रष्टव्य पदार्थ में, आदित्य में,
नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और इस सम्पूर्ण शरीर में संचरण करता है, यह आत्मा
है। उस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए, जो अजर, अमर, अभय, अशोक और अनन्त है ॥ १ ॥
[नाड़ी को अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत का मूलकारण कहा गया है। दृष्टि का विकास और विलय उससे
सम्बद्ध नाड़ी में होता है, यह स्पष्ट है। जिस प्रकार आत्मा के स्थान शरीर में विभिन्न नाड़ियाँ हैं, वैसे ही अधिभूत के लिए
प्रकृति में तथा अधिदैवत के लिए विराट् पुरुष में नाड़ियाँ हैं। आगे नवम खण्ड में स्पष्ट किया गया है कि आदित्य आदि
खण्ड ५ मन्त्र ९ ३२५
भी उनसे सम्बद्ध विराट् नाड़ियों से ही उद्भूत और उन्हीं में विलीन होते हैं। ]
श्रोत्रमध्यात्मं श्रोतव्यमधिभूतं दिशस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः श्रोत्रे यः
श्रोतव्ये यो दिक्षु यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मि-
न्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ २ ॥
इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय भी अध्यात्म है, श्रोतव्य शब्द अधिभूत है और दिशाएँ अधिदैवत हैं। इन तीनों
का मूल कारण नाड़ी है। श्रोत्र में, श्रोतव्य शब्द में, दिशाओं में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में,
हृदयाकाश में और सम्पूर्ण शरीर के अन्दर जो संचरित होता है, वह आत्मा है। इसी की उपासना करनी
चाहिए। यह जरारहित, मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित और अनन्त है ॥ २ ॥
नासाध्यात्मं घ्रातव्यमधिभूतं पृथिवी तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो नासायां यो
घ्रातव्ये यः पृथिव्यां यो नाड्यां .........नन्तम् ॥ ३ ॥
(उपर्युक्त के समान ही) नासिका अध्यात्म है, घ्रातव्य (सूँघने के विषय) अधिभूत हैं और पृथिवी अधि
दैवत है। नाड़ी उनका मूल स्थान है। जो नासिका में, घ्रातव्य गन्ध में, पृथिवी में, नाड़ी में....अनन्त है ॥ ३ ॥
जिह्वाध्यात्मं यो रसयितव्यमधिभूतं वरुणस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो जिह्वायां
यो रसयितव्ये यो वरुणे यो नाड्यां ...........नन्तम् ॥ ४॥
(इसी प्रकार) जिह्वा अध्यात्म है, स्वादिष्ट पदार्थ अधिभूत हैं और वरुण अधिदैवत है। नाड़ी इनका
मूल स्थान है। जो जिह्वा में, स्वाद लेने के रस में, वरुण में और नाड़ी में ..............अनन्त है ॥ ४॥
त्वगध्यात्मं स्पर्शयितव्यमधिभूतं वायुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यस्त्वचि यः
स्पर्शयितव्ये यो वायौ यो नाड्यां...........नन्तम् ॥ ५ ॥
(इसी प्रकार) त्वचा अध्यात्म है, स्पर्श योग्य वस्तु अधिभूत है और वायु अधिदैवत है। नाड़ी इनका
मूल स्थान है। जो त्वगिन्द्रिय में, स्पर्श किये गये पदार्थ में, वायु में और नाड़ी में ..............अनन्त है ॥ ५ ॥
मनोऽध्यात्मं मन्तव्यमधिभूतं चन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो मनसि यो मन्तव्ये
यश्चन्द्रे यो नाड्यां ...........नन्तम् ॥ ६ ॥
(इसी प्रकार) मन भी अध्यात्म है, मन्तव्य (मन का विषय) अधिभूत है, चन्द्रमा अधिदैवत है। नाड़ी
इनका मूल स्थान है। जो मन में, जो मन्तव्य में, जो चन्द्रमा में, जो नाड़ी में ............अनन्त है ॥ ६ ॥
बुद्धिरध्यात्मं बोद्धव्यमधिभूतं ब्रह्मा तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो बुद्धौ यो
बोद्धव्ये यो ब्रह्मणि यो नाड्यां............. नन्तम् ॥ ७॥
(इसी प्रकार) बुद्धि अध्यात्म है, बोद्धव्य (बुद्धि का विषय) अधिभूत है, ब्रह्मा अधिदैवत हैं और
नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो बुद्धि में, बोद्धव्य में, ब्रह्मा में, जो नाड़ी में .............. अनन्त है ॥ ७ ॥
अहंकारोऽध्यात्ममहंकर्तव्यमधिभूतं रुद्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं योऽहंकारे
योऽहंकर्तव्ये यो रुद्रे यो नाड्यां........... नन्तम् ॥ ८ ॥
अहंकार अध्यात्म है, अहंकर्तव्य (अहं का विषय) अधिभूत है, रुद्र अधिदैवत हैं और नाड़ी इनका
मूल स्थान है। जो अहंकार में, अहं के विषय में, रुद्र में, नाड़ी में ..........................अनन्त है ॥ ८ ॥
चित्तमध्यात्मं चेतयितव्यमधिभूतं क्षेत्रज्ञस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चित्ते
३२६ सुबालापानषद
यश्चेतयितव्ये यः क्षेत्रज्ञे यो नाड्यां............ नन्तम् ॥ ९ ॥
(इसी प्रकार) चित्त अध्यात्म है, चेतयितव्य (चिन्तन का विषय) अधिभूत है, उसमें क्षेत्रज्ञ अधिदैवत
है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो चित्त में, चेतयितव्य में, क्षेत्रज्ञ में, नाड़ी में ....................अनन्त है ॥ ९ ॥
वागध्यात्मं वक्तव्यमधिभूतमग्निस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो वाचि यो वक्तव्ये
योऽग्नौ यो नाड्यां.............नन्तम् ॥ १० ॥
(उपर्युक्त की तरह ही) वाक् (वाणी) अध्यात्म है, वक्तव्य अधिभूत है और अग्नि अधिदैवत हैं।
नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो वाणी में, वक्तव्य में, अग्नि में, नाड़ी में .....................अनन्त है ॥ १० ॥
हस्तावेध्यात्ममादातव्यमधिभूतमिन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो हस्ते य
आदातव्ये य इन्द्रे यो नाड्यां............ नन्तम् ॥ ११ ॥
(इसी प्रकार) दोनों हाथ अध्यात्म हैं, ग्रहणीय पदार्थ अधिभूत हैं, इन्द्र अधिदैवत हैं तथा नाड़ी इनका
मूल स्थान है। जो हाथ में, ग्रहण करने के विषय में, इन्द्र में, नाड़ी में ................ अनन्त है ॥ ११ ॥
पादावध्यात्मं गन्तव्यमधिभूतं विष्णुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पादे यो
गन्तव्ये यो विष्णौ यो नाड्यां.............. नन्तम् ॥ १२ ॥
(इसी तरह) दोनों पैर अध्यात्म हैं, गन्तव्य अधिभूत है, विष्णु अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूलस्थान है।
जो पैर में, गन्तव्य में, विष्णु में, नाड़ी में..........................अनन्त है ॥ १२ ॥
पायुरध्यात्मं विसर्जायितव्यमधिभूतं मृत्युस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पायौ
यो विर्जयितव्ये यो मृत्यौ यो नाड्यां ................नन्तम् ॥ १३ ॥
(उपर्युक्त जैसा) पायु (गुदा) अध्यात्म है, विसर्जायितव्य (विसर्जन करने का विषय) अधिभूत है और
मृत्यु अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो गुदा में, विसर्जनीय में, मृत्यु में, नाड़ी में ...अनन्त है ॥१३॥
उपस्थोऽध्यात्ममानन्दयितव्यमधिभूतं प्रजापतिस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं य उपस्थे
य आनन्दयितव्ये यः प्रजापतौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य
एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥१४
इसी प्रकार उपस्थेन्द्रिय अध्यात्म है, आनन्दयितव्य (आनन्द का विषय) अधिभूत है और प्रजापति
अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो उपस्थ (जननेन्द्रिय) में, जो आनंद के विषय में, जो प्रजापति में,
जो नाड़ी में, जो प्राण में, जो विज्ञान में, जो आनन्द में, जो हृदयाकाश में और जो इस सम्पूर्ण शरीर में संचरित
होता है, वही यह आत्मा है। इस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए। यह जरा रहित, मरण रहित,
भयरहित, शोकरहित और अनन्त है ॥ १४ ॥
एष सर्वज्ञ एष सर्वेश्वर एष सर्वाधिपतिरेषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य सर्वसौख्यैरूपा-
स्यमानो न च सर्वसौख्यान्युपास्यति वेदशास्त्रैरुपास्यमानो न च वेदशास्त्राण्युपास्यति
यस्यान्नमिदं सर्वं न च योऽन्नं भवत्यतः परं सर्वनयनः प्रशास्तान्नमयो भूतात्मा प्राणमय
इन्द्रियात्मा मनोमयः संकल्पात्मा विज्ञानमयः कालात्याऽऽनन्दमयो लयात्मेकत्वं नास्ति द्वैतं
कुतो मर्त्य नास्त्यमृतं कुतो नान्तःप्रज्ञो न बहिःप्रज्ञो नोभयतःप्रज्ञो न प्रज्ञानघनो न प्रज्ञो
नाप्रज्ञोऽपि नो विदितं वेद्यं नास्तीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति
खण्ड ६ मन्त्र ४ ३२७
वेदानुशासनम् ॥ १५ ॥
यह (तुर्यातिरिक्त) ईश्वर सर्वज्ञ है, यह सर्वेश है, सर्वाधिपति है, अन्तर्यामी है और यही सबका उत्पत्ति
स्थान है। समस्त सुखों के द्वारा यही उपास्य है, पर यह समस्त सुखों की उपासना नहीं करता। यह वेद और
शास्त्रों का भी उपास्य है, पर यह वेद और शास्त्रों की उपासना नहीं करता। सभी अन्न इसके हैं, पर यह किसी
का अन्न नहीं है। इसके अतिरिक्त यह सभी का नेत्र, सब को आज्ञा देने वाला, अन्नमय भूतों (प्राणियों) की
आत्मा, प्राणमय इन्द्रियों की आत्मा, मनोमय संकल्प स्वरूप, विज्ञानमय कालरूप, आनन्दमय और लयात्मक
है। उसमें अद्वैत (एकत्व) नहीं है, तो द्वैत कहाँ हो सकता है ? वह मर्त्य नहीं है, तो अमृत कैसे हो सकता है ?
वह न अन्तःप्रज्ञ है और न बाह्यप्रज्ञ है। वह दोनों (अन्तर और बाह्य) में भी प्रज्ञ नहीं है। वह प्रज्ञानघन नहीं
है, न प्रज्ञ (बहुत जानने वाला) ही है, न अप्रज्ञ (बिना जानने वाला) होकर भी इसे कुछ जानना शेष है। इसके
अतिरिक्त निर्वाण के लिए और कोई उपदेश (अनुशासन) नहीं है अर्थात् मोक्ष के लिए यही अनुशासन है।
यही वेद की शिक्षा व अनुशासन है ॥ १५ ॥
॥ षष्ठःखण्डः ॥
नैवेह किंचनाग्र आसीदमूलमनाधारा इमाः प्रजाः प्रजायन्ते ॥ १ ॥
सृष्टि के पूर्व इस संसार में कुछ भी नहीं था। यह निर्मूल और निराधार था, (उसी से) इस प्रजा का
आविर्भाव हुआ ॥ १ ॥
चक्षुश्च द्रष्टव्यं च नारायणः श्रोत्रं च श्रोतव्यं च नारायणो घ्राणं च घ्रातव्यं च नारायणो
जिह्वा च रसयितव्यं च नारायणस्त्वक् च स्पर्शयितव्यं च नारायणो मनश्च मन्तव्यं च नारायणो
बुद्धिश्च बोद्धव्यं च नारायणोऽहंकारश्चाहंकर्तव्यं च नारायणश्चित्तं च चेतयितव्यं च नारायणो
वाक् च वक्तव्यं च नारायणो हस्तौ चादातव्यं च नारायणःपादौ च गन्तव्यं च नारायणः
पायुश्च विसर्जयितव्यं च नारायण उपस्थश्चानन्दयितव्यं च नारायणो धाता विधाता कर्ता
विकर्ता दिव्यो देव एको नारायणः ॥ २ ॥
चक्षु और द्रष्टव्य नारायण हैं, श्रोत्र और श्रोतव्य नारायण हैं, घ्राण शक्ति और घ्रातव्य नारायण हैं, जिह्वा
और रस लेने का विषय नारायण हैं, त्वचा और स्पर्शयितव्य नारायण हैं, मन और मन्तव्य (मन का विषय)
नारायण हैं, बुद्धि और बुद्धि का विषय नारायण हैं, अहंकार और अहंकर्तव्य नारायण हैं, चित्त और चिन्तन
नारायण हैं, वाक् और वक्तव्य नारायण हैं, हाथ और दातव्य (देने का विषय) नारायण हैं, पैर और गन्तव्य
नारायण हैं, पायु (गुदा) और विसर्जयितव्य नारायण हैं, उपस्थ और आनन्दयितव्य (आनन्द का विषय)
नारायण हैं। नारायण ही धाता (धारण कर्ता), विधाता, कर्त्ता, विकर्ता (विशिष्ट रूप से रचना करने वाला)
और एकमात्र दिव्य देव हैं ॥ २ ॥
आदित्या रुद्रा मरुतो वसवोऽश्विनावृचो यजूंषि सामानि मन्त्रोऽग्निराज्याहुतिर्नारायण
उद्भवः संभवो दिव्यो देव एको नारायणः ॥ ३ ॥
आदित्य, रुद्र, वायु, वसु, अश्विनीकुमार, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदादि के मन्त्र, अग्नि और घृत की
आहुति भी नारायण ही हैं। यही नारायण एक, दिव्य, देव और सभी के उत्पत्ति रूप हैं ॥ ३ ॥
माता पिता भ्राता निवासः शरणं सुहृद्गतिर्नारायणः ॥ ४ ॥
३२८ सुबालोपनिषद्
नारायण ही माता-पिता, भाई, निवास, शरण, मित्र तथा गति (सद्गति) हैं ॥ ४ ॥
विराजा सुदर्शनाजितासौम्यामोधामृतासत्यामध्यमानासीराशिशुरासुरासूर्या-
भास्वतीविज्ञेयानि नाडीनामानि दिव्यानि ॥ ५ ॥
नारायण ही विराजा, सुदर्शना, जिता, सौम्या, अमोघा (मोघा), कुमारा, अमृता, सत्या, मध्यमा, नासीरा,
शिशुरा, असुरा, सूर्या, भास्वती—इन दिव्य नाड़ियों के रूप में हैं ॥ ५ ॥
गर्जति गायति वाति वर्षति वरुणोऽर्यमा चन्द्रमाः कालः कविर्धाता ब्रह्मा प्रजापतिर्मघवा
दिवसाश्चार्धदिवसाश्च कलाः कल्पाश्चोर्ध्वं य दिशश्च सर्वं नारायणः ॥ ६ ॥
जो गरजता है, गाता है, (वायु रूप होकर) बहता है, बरसता है, जो वरुण, अर्यमा, चन्द्रमा, काल,
कवि, धाता, प्रजापति, ब्रह्मा, मघवा (इन्द्र), दिवस, अर्ध दिवस, कलाएँ, कल्प, ऊर्ध्वभाग, दिशाएँ और सभी
कुछ है, वे सब नारायण ही हैं ॥ ६ ॥
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति। तद्विष्णोः
परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते ।
विष्णोर्यत्परमं पदम् । तदेतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ ७॥
यह जो कुछ वर्तमान में है, जो पूर्व में हो चुका है और जो आगे भविष्य में होगा, वह सब पुरुष
(परमेश्वर) ही है। इस अमर जीव-जगत् के भी वही स्वामी हैं। जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी
वही स्वामी हैं। वही विष्णु का परम पद है, जिसे विद्वज्जन सदैव देखते हैं। यह अन्तरिक्ष में फैले हुए चक्षु के
समान है। क्रोधित न होने वाले तथा सतत जाग्रत् रहने वाले विप्रगण इसका साक्षात्कार करते हैं, यही विष्णु
का परम पद है। यही निर्वाण का उपदेश है, यही वेद का अनुशासन है। यही वेद की सीख है ॥ ७ ॥
॥ सप्तमः खण्डः ॥
अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यो यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे संचरन्
यं पृथिवी न वेद। यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे संचरन्यमापो न विदुः । यस्य तेजः शरीरं
यस्तेजोन्तरे संचरन् यं तेजो न वेद। यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे संचरन् यं वायुर्न वेद।
यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे संचरन् यमाकाशो न वेद। यस्य मनः शरीरं यो मनोन्तरे
संचरन् यं मनो न वेद। यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे संचरन् यं बुद्धिर्न वेद। यस्याहंकारः
शरीरं योऽहंकारमन्तरे संचरन् यमहंकारो न वेद। यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे संचरन् यं
चित्तं न वेद। यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे संचरन् यमव्यक्तं न वेद। यस्याक्षरं शरीरं
योऽक्षरमन्तरे संचरन् यमक्षरं न वेद। यस्य मृत्युः शरीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्न वेद।
स एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः ॥ १ ॥
जो शरीर के अन्दर हृदय रूपी गुहा में निवास करता है, वह आत्मा अज, एक और नित्य है। उसका
शरीर पृथिवी है, जो पृथिवी में संचरित होता है; पर पृथिवी जिसे नहीं जानती। जल जिसका शरीर है, जो जल
में संचरित होता है; पर जल जिसे नहीं जानता। तेज जिसका शरीर है, जो तेज में संचरित होता है; पर तेज जिसे
नहीं जानता। वायु जिसका शरीर है, वायु में जो संचरित होता है; पर वायु जिसे नहीं जानता। आकाश जिसका
शरीर है, जो आकाश में संचरित होता है; पर आकाश जिसे नहीं जानता। मन जिसका शरीर है, जो मन में
खण्ड ९ मन्त्र १ ३२९
संचरित होता है; पर मन जिसे नहीं जानता । बुद्धि जिसका शरीर है, जो बुद्धि में संचरित होता है; पर बुद्धि
जिसे नहीं जानती। अहंकार जिसका शरीर है, जो अहंकार में संचरित होता है; पर अहंकार जिसे नहीं जानता।
चित्त जिसका शरीर है, जो चित्त में संचरित होता है; पर चित्त जिसे नहीं जानता। अव्यक्त जिसका शरीर है, जो
अव्यक्त में सञ्चरित होता है; पर अव्यक्त जिसे नहीं जानता। अक्षर जिसका शरीर है, जो अक्षर में संचरित
होता है; पर अक्षर जिसे नहीं जानता। मृत्यु जिसका शरीर है, जो मृत्यु में संचरित होता है; पर मृत्यु जिसे नहीं
जानती, वे सर्वभूतों के अन्तरात्मा, विनष्ट पाप वाले, एक, दिव्य, देव, नारायण हैं ॥ १ ॥
एतां विद्यामपान्तरतमाय ददावपान्तरतमो ब्रह्मणे ददौ ब्रह्मा घोराङ्गिरसे ददौ घोराङ्गिरा
रैक्वाय ददौ रैक्को रामाय ददौ रामः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददावित्येवं निर्वाणानुशासनमिति
वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥
यह विद्या (नारायण ने) अपान्तरतम नामक ब्राह्मण (अति प्राचीन काल के सिद्ध ब्राह्मण) की दी थी।
अपान्तरतम ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने घोराङ्गिरस को, घोराङ्गिरस ने रैक्व को, रैक्व ने राम की और राम ने समस्त
भूतों को प्रदान की। इस प्रकार यह निर्वाण का अनुशासन है, वेद का अनुशासन है और वेद की शिक्षा है ॥२॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
अन्तःशरीरे निहितो गुहायां शुद्धः सोऽयमात्मा सर्वस्य मेदोमांसक्लेदावकीर्णे शरीर-
मध्येऽत्यन्तोपहते चित्रभित्तिप्रतीकाशे गान्धर्वनगरोपमे कदलीगर्भवनिःसारे जलबुद्बुदव-
च्चञ्चले निःसृतमात्मानमचिन्त्यरूपं दिव्यं देवमसङ्गं शुद्धं तेजस्कायमरूपं सर्वेश्वरमचि-
न्त्यमशरीरं निहितं गुहायाममृतं विभाजमानमानन्दं तं पश्यन्ति विद्वांसस्तेन लये न पश्यन्ति ॥१
सभी शरीरों के अन्दर हृदय रूपी गुहा में यह शुद्ध आत्मा निवास करता है। शरीर तो मेद, मांस और
रक्त से अभिपूरित है, जो अत्यन्त नश्वर और चित्रभित्ति (चित्रस्थ दीवार) के समान गन्धर्व नगर तुल्य, केले
के गर्भ की तरह निस्सार, जल के बुलबुले की तरह चञ्चल है; किन्तु उससे परे रहने वाला आत्मा
अचिन्त्यरूप, दिव्य, प्रकाशवान्, असङ्ग, शुद्ध, तेजःस्वरूप, अरूप, सर्वेश्वर, अचिन्त्य और अशरीर है। हृदय
रूपी गुहा में निवास करने वाला वह (आत्मा) अमृत और देदीप्यमान है। विद्वान् उसको आनन्दरूप में देखते
हैं और उसमें विलय हो जाने के पश्चात् उससे भिन्न कुछ भी नहीं देखते ॥ १ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ हैनं रैक्वः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वेऽस्तं गच्छन्तीति । तस्मै स होवाच चक्षुरेवाप्येति
यच्चक्षुरेवास्तमेति द्रष्टव्यमेवाप्येति यो द्रष्टव्यमेवास्तमेत्यादित्यमेवाप्येति य आदित्यमेवास्त-
मेति विराजमेवाप्येति यो विराजमेवास्तमेति प्राणमेवाप्येति यः प्राणमेवास्तमेति
विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति
यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तन्निर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १ ॥
इसके पश्चात् रैक्व ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया-हे भगवन् ! ये समस्त पदार्थ किसमें अस्त होते हैं ? (यह
सुनकर) घोराङ्गिरस ने रैक्व को उत्तर दिया-जो पदार्थ चक्षु के प्रति प्राप्त (प्रकट) होते हैं (दिखाई देते हैं), वे
चक्षु (अपने अन्तर्यामी) में ही अस्त हो जाते हैं। जो द्रष्टव्य पदार्थ आदित्य के प्रति प्रकट होता है, वह आदित्य
में ही विलीन हो जाता है। जो आदित्य, विराजा (सुषुम्ना नामक नाड़ी का ही एक नाम) के प्रति प्रकट होता है,
३३० सुबालोपनिषद्
वह विराजा में ही विलीन हो जाता है। जो विराजा प्राण के प्रति प्रकट होती है, वह प्राण में ही विलीन हो जाती
है। जो प्राण, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। जो विज्ञान, आनन्द के प्रति प्रकट
होता है, वह आनन्द में ही अस्त होता है। जो आनन्द, तुरीय के प्रति प्रकट होता है, वह तुरीय में ही अस्त होता
है। वह तुरीय अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म को प्राप्त होता है॥ १॥
[जिस-जिस संज्ञा वाली नाड़ियाँ मनुष्य में होती हैं, वे सभी मूलतः विराट् पुरुष में भी होती हैं, जिस तरह विराट्
पुरुष-परमात्मा का अंश आत्मा है, वैसे ही नाड़ियाँ भी विराट् के नाड़ी तंत्र की अंग हैं। आदित्य आदि देवों का प्राकट्य
और विलय उन्हीं के प्रति कहा गया है। आगे के मंत्रों में भी अधिदेवता का विलय जिन नाड़ियों में कहा गया है, वे सभी
विराट् की नाड़ियाँ ही मान्य हैं।]
श्रोत्रमेवाप्येति यः श्रोत्रमेवास्तमेति श्रोतव्यमेवाप्येति यः श्रोतव्यमेवास्तमेति
दिशमेवाप्येति यो दिशमेवास्तमेति सुदर्शनामेवाप्येति यः सुदर्शनामेवास्तमेत्यपानमेवाप्येति
योऽपानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्त-
निर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ २ ॥
इसी प्रकार जो श्रोत्र के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोत्र में ही अस्त होता है। जो श्रोत्र, श्रोतव्य के प्रति प्रकट
होता है, वह श्रोतव्य में ही अस्त होता है। जो श्रोतव्य, दिशाओं के प्रति प्रकट होता है, वह दिशाओं में ही अस्त
होता है। जो दिशाएँ, सुदर्शना के प्रति प्रकट होती हैं, वे सुदर्शना में ही अस्त होती हैं। जो सुदर्शना, अपान के
प्रति प्रकट होती है, वह अपान में ही अस्त होती है। जो अपान विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही
अस्त होता है। वह विज्ञान अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में विलीन हो जाता है॥ २॥
नासामेवाप्येति यो नासामेवास्तमेति घ्रातव्यमेवाप्येति यो घ्रातव्यमेवास्तमेति
पृथिवीमेवाप्येति यः पृथिवीमेवास्तमेति जितामेवाप्येति यो जितामेवास्तमेति व्यानमेवाप्येति
यो व्यानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच ॥ ३ ॥
इसी प्रकार जो पदार्थ नासिका के प्रति (गन्धरूप में) प्रकट होते हैं, वे नासिका में ही अस्त होते हैं। जो
नासिका, घ्रातव्य (सूँघे जाने योग्य) पदार्थों के प्रति प्रकट होती है, वह घ्रातव्य में ही अस्त हो जाती है। जो
घ्रातव्य, पृथिवी के प्रति प्रकट होता है, वह पृथिवी में ही विलीन हो जाता है। जो पृथिवी, जिता नामक नाड़ी
के प्रति प्रकट होती है, वह जिता में ही अस्त होती है। जो जिता, व्यान के प्रति प्रकट होती है, वह व्यान में ही
विलीन हो जाती है। जो व्यान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही विलुप्त हो जाता है। वह विज्ञान,
अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में लय हो जाता है ॥ ३ ॥
जिह्वामेवाप्येति यो जिह्वामेवास्तमेति रसयितव्यमेवाप्येति यो रसयितव्यमेवास्तमेति
वरुणमेवाप्येति यो वरुणमेवास्तमेति सौम्यामेवाप्येति यः सौम्यामेवास्तमेत्युदानमेवाप्येति
य उदानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच ॥ ४ ॥
इसी प्रकार जो पदार्थ जिह्वा के प्रति प्रकट होते हैं, वे जिह्वा में ही विलीन हो जाते हैं। जो जिह्वा,
रसयितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह रसयितव्य में ही विलीन हो जाती है। जो रसयितव्य, वरुण को प्राप्त
होता है, वह वरुण में ही विलीन हो जाता है। जो वरुण, सौम्या नामक नाड़ी को प्राप्त होता है, वह सौम्या में
ही विलीन हो जाता है। जो सौम्या, उदान के प्रति प्रकट होती है, वह उदान में ही अस्त हो जाती है। जो उदान,
विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही लय हो जाता है। वह विज्ञान अमृत, भयरहित, शोकरहित,
अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ ४॥
खण्ड ९ मन्त्र ८ ३३१
त्वचमेवाप्येति यस्त्वचमेवास्तमेति स्पर्शयितव्यमेवाप्येति यः स्पर्शयितव्यमेवास्तमेति
वायुमेवाप्येति यो वायुमेवास्तमेति मोघामेवाप्येति यो मोघामेवास्तमेति समानमेवाप्येति यः
समानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ ५ ॥
जो पदार्थ त्वचा को प्राप्त होते हैं, वे त्वचा में ही विलीन हो जाते हैं। जो त्वचा, स्पर्शायितव्य के प्रति प्रकट
होती है, वह स्पर्शायितव्य में ही अस्त हो जाती है। जो स्पर्शायितव्य, वायु को प्राप्त होता है, वह वायु में ही विलीन
हो जाता है। जो वायु मोघा के प्रति प्रकट होती है, वह मोघा नामक नाड़ी में ही विलीन हो जाती है। जो मोघा,
समान के प्रति प्राप्त होती है, वह समान में ही अस्त हो जाती है। जो समान, विज्ञान को प्राप्त होती है, वह विज्ञान
में ही अस्त हो जाती है। वह अमर, अभय, अशोक, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है ॥५॥
वाचमेवाप्येति यो वाचमेवास्तमेति वक्तव्यमेवाप्येति यो वक्तव्यमेवास्तमेत्य-
ग्रिमेवाप्येति योऽग्निमेवास्तमेति कुमारामेवाप्येति यः कुमारामेवास्तमेति वैरम्भमेवाप्येति यो
वैरम्भमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.............. होवाच ॥ ६ ॥
जो पदार्थ वाक् को प्राप्त होते हैं, वे वाक् में ही अस्त होते हैं। जो वाक्, वक्तव्य को प्राप्त होती है, वह
वक्तव्य में ही अस्त होती है। जो वक्तव्य, अग्नि को प्राप्त होता है, वह अग्नि में ही विलीन हो जाता है। जो अग्नि,
कुमारा नामक नाड़ी को प्राप्त होती है, वह कुमारा में ही विलीन हो जाती है। जो कुमारा, वैरम्भ को प्राप्त होती
है, वह वैरम्भ में ही अस्त हो जाती है। जो वैरम्भ, विज्ञान को प्राप्त होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह
विज्ञान अमर, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है ॥ ६ ॥
हस्तमेवाप्येति यो हस्तमेवास्तमेत्यादातव्यमेवाप्येति य आदातव्यमेवास्तमे-
तीन्द्रमेवाप्येति य इन्द्रमेवास्तमेत्यमृतामेवाप्येति योऽमृतामेवास्तमेति मुख्यमेवाप्येति यो
मुख्यमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत....................... होवाच ॥ ७ ॥
(ऐसा कहने के पश्चात् उन घोराङ्गिरस ने पुनः कहना प्रारम्भ किया कि) जो हाथ को प्राप्त कर लेता है,
वह हाथ में ही विलीन हो जाता है। यह हाथ, लेने योग्य पदार्थ के प्रति गमन करता है, अतः यह लेने वाले
पदार्थ में ही लीन होता है, यह पदार्थ, इन्द्र के प्रति प्रस्थान करता है, इस कारण से यह इन्द्र में ही विलीन हो
जाता है, यह इन्द्र, अमृता नाड़ी के प्रति जाता है, इस कारण यह अमृता में ही अस्त हो जाता है, यह अमृता,
मुख्य के पास जाती है, अतः मुख्य में ही अस्त हो जाती है, यह मुख्य, विज्ञान के पास जाता है, इस कारण से
विज्ञान में ही अपने को विलीन कर लेता है और यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण यह
अमर, निर्भय, अशोक एवं अन्तरहित तथा बीजविहीन तुरीयावस्था को ही प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥
पादमेवाप्येति यः पादमेवास्तमेति गन्तव्यमेवाप्येति यो गन्तव्यमेवास्तमेति
विष्णुमेवाप्येति यो विष्णुमेवास्तमेति सत्यामेवाप्येति यः सत्यामेवास्तमेत्यन्तर्याममेवाप्येति
योऽन्तर्याममेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद्.............. होवाच ॥ ८ ॥
(इसी प्रकार) जो पैर के प्रति गमन करता है, वह पैर में ही विलीन होता है, यह पैर, गन्तव्य स्थान की
ओर प्रस्थान करता है, इस कारण से यह गन्तव्य स्थान में विलीन हो जाता है, यह गन्तव्य स्थान विष्णु के प्रति
जाता है, इस कारण से यह विष्णु में ही विलीन हो जाता है, यह विष्णु, सत्या नाड़ी की ओर प्रस्थान करता है,
इसलिए यह सत्या नाड़ी में ही अपने को विलीन कर लेता है, यह सत्या, अन्तर्याम की ओर गमन करती है,
इसलिए यह अन्तर्याम में ही लय ही जाती है, यह अन्तर्याम, विज्ञान की ओर गमन करता है, इसलिए यह
३३२ सुबालोपनिषद्
विज्ञान में ही विलय हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के समक्ष जाता है, इस कारण से यह मृत्युरहित,
भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ ८ ॥
पायुमेवाप्येति यः पायुमेवास्तमेति विसर्जंयितव्यमेवाप्येति यो विसर्जंयितव्य-
मेवास्तमेति मृत्युमेवाप्येति यो मृत्युमेवास्तमेति मध्यमामेवाप्येति यो मध्यमामेवास्तमेति
प्रभञ्जनमेवाप्येति यः प्रभञ्जनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद्.......... होवाच ॥ ९॥
(ऐसा कहने के अनन्तर फिर उन्होंने कहा-) जो गुदा को प्राप्त करता है, वह गुदा में ही विलय को
पाता है, यह गुदा, विसर्जन योग्य मल त्याग को प्राप्त करता है, अतः यह त्यागने योग्य में ही विलय को प्राप्त
करता है, यह मलत्याग, मृत्यु को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्यु में ही विलीन हो जाता है,यह मृत्यु,
मध्यमा नाड़ी को प्राप्त करती है, इसलिए यह मध्यमा में ही विलीन होती है,यह मध्यमा, प्रभञ्जन नामक वायु
को प्राप्त करती है, अतः यह प्रभञ्जन वायु में ही विलय को प्राप्त होती है,यह प्रभञ्जन वायु विज्ञान को प्राप्त
होती है, इस कारण प्रभञ्जन वायु का अस्त विज्ञान में ही होता है। यह विज्ञान, तुरीय के पास जाता है, इसलिए
वह मृत्युरहित, भयविहीन, अशोक, अनन्त एवं निर्बीज तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
उपस्थमेवाप्येति य उपस्थमेवास्तमेत्यानन्दयितव्यमेवाप्येति य आनन्दयितव्यमे-
वास्तमेति प्रजापतिमेवाप्येति यः प्रजापतिमेवास्तमेति नासीरामेवाप्येति यो नासीरामेवास्तमेति
कुर्मिरमेवाप्येति यः कुर्मिरमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत ........ होवाच ॥ १० ॥
(यह कहने के पश्चात् पुनः उन्होंने कहना प्रारंभ किया कि) जो उपस्थ को प्राप्त करता है, वह उपस्थ
में ही लीन हो जाता है और यह उपस्थ, आनन्द स्वरूप विषयों को प्राप्त करता है, इस कारण यह आनन्द में
विलय हो जाता है। यह आनन्द, प्रजापति के पास जाता है, इस कारण यह प्रजापति में विलीन हो जाता है। यह
प्रजापति, नासीरा नाड़ी को ओर प्रस्थान करता है, अतः यह नासीरा में ही विलीन हो जाता है। यह नासीरा,
कुर्मिर नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण से यह कुर्मिर नाड़ी में ही लय होती है। यह कुर्मिर विज्ञान
की ओर जाती है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान तुरीय को प्राप्त करता है, इस
कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकविहीन, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है ॥ १० ॥
मन एवाप्येति यो मन एवास्तमेति मन्तव्यमेवाप्येति यो मन्तव्यमेवास्तमेति चन्द्रमेवाप्येति
यश्चन्द्रमेवास्तमेति शिशुमेवाप्येति यः शिशुमेवास्तमेति श्येनमेवाप्येति यः श्येनमेवास्तमेति
विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ ११ ॥
(इसके बाद उन्होंने पुनः कहा कि) जो मन को प्राप्त करता है, वह मन में ही विलीन हो जाता है। यह
मन, विचारणीय विषय को प्राप्त करता है, इस कारण से यह विचारणीय विषयों में लीन हो जाता है, यह
विचारणीय, चन्द्रमा को तरफ गमन कर जाता है, इसलिए यह चन्द्रमा में ही लय हो जाता है, यह चन्द्रमा,
शिशु नाड़ी को ओर गमन करता है, इस कारण यह शिशु में ही विलीन हो जाता है, यह शिशु नाड़ी श्येन की
ओर गमन करती है, इस कारण वह श्येन में ही लय होती है, यह श्येन, विज्ञान को तरफ गमन करता है, इस
कारण से यह विज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण से
यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
बुद्धिमेवाप्येति यो बुद्धिमेवास्तमेति बोद्धव्यमेवाप्येति यो बोद्धव्यमेवास्तमेति
ब्रह्माणमेवाप्येति यो ब्रह्माणमेवास्तमेति सूर्यामेवाप्येति यः सूर्यामेवास्तमेति कृष्णामेवाप्येति
यः कृष्णामेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ १२ ॥
खण्ड ९ मन्त्र १५ ३३३
(ऐसा कहने के उपरान्त उन्होंने फिर कहा कि) जो बुद्धि को प्राप्त करता है, वह बुद्धि में ही विलीन हो
जाता है। यह बुद्धि, जानने योग्य विषयों की ओर प्रस्थान कर जाती है, इस कारण यह जानने योग्य विषयों में
ही विलीन हो जाती है। यह जानने का विषय, ब्रह्मा की ओर गमन कर जाता है, इसलिए यह ब्रह्मा में ही अस्त
हो जाता है, यह ब्रह्मा सूर्या नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय सूर्या में ही हो जाता है, यह सूर्या
कृष्ण को प्राप्त करती है, इसलिए यह कृष्ण में ही विलीन हो जाती है, यह कृष्ण, विज्ञान को प्राप्त करता है,
इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है और यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त हो जाता है, इस कारण यह
मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है ॥ १२ ॥
अहंकारमेवाप्येति योऽहंकारमेवास्तमेत्यहंकर्तव्यमेवाप्येति योऽहंकर्तव्यमेवास्तमेति
रुद्रमेवाप्येति यो रुद्रमेवास्तमेत्यसुरामेवाप्येति योऽसुरामेवास्तमेति श्वेतमेवाप्येति यः
श्वेतमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ १३॥
(इस प्रकार कहने के पश्चात् उन महर्षि ने कहा कि) जो अहंकार को प्राप्त करता है, वह अहंकार में
ही विलीन हो जाता है। यह अहंकार, कर्तव्य को प्राप्त करता है, इसलिए यह कर्त्तव्य में ही लय हो जाता है।
यह कर्तव्य, रुद्र को प्राप्त करता है, इस कारण इसका लय रुद्र में ही होता है, यह रुद्र, असुरा नाड़ी को प्राप्त
करता है, इसलिए इस रुद्र का विलय असुरा नाड़ी में ही हो जाता है। यह असुरा नाड़ी श्वेत को प्राप्त करती
है, अतः इस असुरा का विलय श्वेत में ही होता है। यह श्वेत, विज्ञान को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय
विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक,
अनन्त एवं अबीज तुरीय को ही प्राप्त होता है ॥ १३॥
चित्तमेवाप्येति यश्चित्तमेवास्तमेति चेतयितव्यमेवाप्येति यश्चेतयितव्यमेवास्तमेति
क्षेत्रज्ञमेवाप्येति यः क्षेत्रज्ञमेवास्तमेति भास्वतीमेवाप्येति यो भास्वतीमेवास्तमेति नागमेवाप्येति
यो नागमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य
आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तं
निर्बीजमेवाप्येति तदमृत.............. होवाच ॥ १४ ॥
(इस प्रकार कहने के बाद पुनः उन्होंने कहना शुरू किया कि) जो चित्त को प्राप्त कर लेता है, वह चित्त
में ही विलीन हो जाता है। यह चित्त, चिन्तन योग्य को पा लेता है, इस कारण यह चिन्तन करने योग्य में ही
लय हो जाता है। यह चिन्तन करने योग्य, क्षेत्रज्ञ को प्राप्त कर लेता है, इस कारण इसका विलय क्षेत्रज्ञ में ही
होता है। यह क्षेत्रज्ञ, भास्वती नाड़ी में गमन कर जाता है, इस कारण यह भास्वती नाड़ी में ही विलीन हो जाता
है। यह भास्वती, नाग वायु के पास जाती है, इस कारण यह नाग वायु में ही अस्त हो जाती है। यह नाग वायु,
विज्ञान की ओर जाती है, इस कारण यह विज्ञान में विलय हो जाती है। यह विज्ञान, आनन्द को प्राप्त कर लेता
है, इस कारण यह आनन्द में ही विलीन हो जाता है और वह आनन्द मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त
एवं निर्बीज तुरीय में जाता है, इस कारण से यह तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥
य एवं निर्बीजं वेद निर्बीज एव स भवति न जायते न म्रियते न मुह्यते न भिद्यते न दह्यते
न छिद्यते न कम्पते न कुप्यते सर्वदहनोऽयमात्मेत्याचक्षते ॥ १५॥
(उन घोराङ्गिरस जी ने पुनः कहा कि) जो भी मनुष्य इस तरह से निर्बीज रूपी तत्त्व को जान लेता है,
वह निर्बीज हो जाता है। वह अजन्मा हो जाता है, मृत्यु एवं मोह को भी नहीं प्राप्त करता। उसका भेदन नहीं
३३४ सुबालोपनिषद्
होता, जलता भी नहीं, छेदा भी नहीं जाता, कम्पायमान भी नहीं होता तथा कुपित भी नहीं होता है। इस प्रकार
सभी कुछ दग्ध करने वाली यह आत्मा ही है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओं का मत है॥ १५॥
नैवमात्मा प्रवचनशतेनापि लभ्यते न बहुश्रुतेन न बुद्धिज्ञानाश्रितेन न मेधया न वेदैर्न
यज्ञैर्न तपोभिरुग्रैर्न सांख्यैर्न योगैर्नाश्रमैर्नान्यैरात्मानमुपलभन्ते प्रवचनेन प्रशंसया व्युत्थानेन
तमेतं ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोऽनूचाना उपलभन्ते शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो
भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वस्यात्मा भवति य एवं वेद ॥ १६ ॥
यह आत्मा सैकड़ों तरह के प्रवचन करने मात्र से नहीं प्राप्त होता, अनेकों शास्त्रों का अध्ययन करने
से भी नहीं मिलता, बुद्धि तथा ज्ञान का सान्निध्य प्राप्त कर लेने से भी यह आत्मा प्राप्त नहीं होता। वैसे ही मेधा,
वेदों, यज्ञों, उग्र-तपश्वर्या, सांख्यज्ञान, योग, आश्रम अथवा अन्य दूसरे प्रयत्नों से भी वह आत्मा प्राप्त नहीं होता।
ब्रह्म में निष्ठा रखने वाला जो मनुष्य प्रवचन के द्वारा, प्रशंसा (गुरु सेवा) के द्वारा तथा व्युत्थान (सामान्य जीवन
क्रम से ऊपर उठकर) के द्वारा आत्मज्ञानपरक शास्त्रों का श्रवण करता हुआ शम, दम, उपरति एवं तितिक्षा में
स्थित होकर समाधिनिष्ठ हुआ आत्मा को आत्मा में ही देखता है, वही आत्म तत्त्व को प्राप्त कर पाता है। जो
भी मनुष्य इस तरह से आत्मतत्त्व को जानता है, वह सभी का आत्मा हो जाता है॥ १६॥
॥ दशमः खण्डः ॥
अथ हैनँ रैकः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति रसातललोकेष्विति
होवाच कस्मिन्न्रसातललोका ओताश्च प्रोताश्चेति भूर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्भूर्लोका ओताश्च
प्रोताश्चेति भुवर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्भुवर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति सुवर्लोकेष्विति
होवाच। कस्मिन्सुवर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति महर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्महर्लोका
ओताश्च प्रोताश्चेति जनोलोकेष्विति होवाच। कस्मिन् जनोलोका ओताश्च प्रोताश्चेति
तपोलोकेष्विति होवाच। कस्मिँस्तपोलोका ओताश्च प्रोताश्चेति सत्यलोकेष्विति होवाच।
कस्मिन्सत्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेष्विति होवाच। कस्मिन्प्रजापतिलोका
ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेष्विति होवाच। कस्मिन्ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति सर्वलोका
आत्मनि ब्रह्मणि मणय इवौताश्च प्रोताश्चेति स होवाच ॥ १ ॥
इसके बाद पुनः रैक मुनि ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया कि "हे भगवन्! किसमें सभी प्रतिष्ठित हैं?"
तदनन्तर उन घोराङ्गिरस ने कहना प्रारम्भ किया कि रसातल के लोकों में सभी कुछ रहता है। "यह रसातल
का लोक किसमें स्थित है?" तब उन्होंने कहा कि यह 'भू लोक' में स्थित है। यह भूलोक किसमें स्थित है?
उन्होंने कहा- "यह भुवः लोक में प्रतिष्ठित है।" यह भुवर्लोक किसमें ओत-प्रोत है? तब उन्होंने बताया कि
"यह स्वर्लोक में स्थित है"। यह स्वर्लोक किसमें ओत-प्रोत है? उन्होंने उत्तर दिया कि "यह महर्लोक में
प्रतिष्ठित है।" यह महर्लोक किसमें ओत-प्रोत है?" (उत्तर) यह जनोलोक में प्रतिष्ठित है।" इस प्रकार उन
ऋषि ने पुनः कहा-यह जनोलोक किसमें ओत-प्रोत है?" (उत्तर) यह तपोलोक में स्थित है, ऐसा उन्होंने
कहा। (प्रश्न) यह तपोलोक किसमें ओत-प्रोत है? उन्होंने कहा कि यह सत्यलोक में स्थित है। यह सत्य
लोक किसमें ओत-प्रोत है? यह प्रजापति लोक में प्रतिष्ठित है, ऐसा उन्होंने कहा-"यह प्रजापति लोक
किसमें ओत-प्रोत है?" यह ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित है" ऐसा उन्होंने बताया। यह ब्रह्मलोक किसमें ओत-प्रोत
खण्ड ११ मन्त्र १ ३३५
है ? (यह अन्य किसी में ओत-प्रोत नहीं है) "समस्त लोक आत्म स्वरूप परब्रह्म में माला के दानों की भाँति
ओत-प्रोत हैं। इस प्रकार उन्होंने कहा" ॥ १ ॥
एवमेतान् लोकानात्मनि प्रतिष्ठितान्वेदात्मैव स भवतीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति
वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥
जो पुरुष इन सभी लोकों की आत्मा में ही स्थित रहता है, वह आत्मस्वरूप ही हो जाता है। इस तरह
यह निर्वाण (मोक्ष) विषय का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है एवं यही वेद की आज्ञा है ॥ २ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अथ हैनँ रैकः पप्रच्छ भगवन्त्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानमुत्सृ-
ज्यापक्रामतीति तस्मै स होवाच। हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं
कुमुदमवानेकधा विकसितं तस्य मध्ये समुद्रः समुद्रस्य मध्ये कोशस्तस्मिन्नाड्यश्चतस्रो भवन्ति
रमारमेच्छाऽपुनर्भवेति तत्र रमा पुण्येन पुण्यं लोकं नयत्यरमा पापेन पापमिच्छया यत्स्मरति
तदभिसंपद्यते अपुनर्भवया कोशं भिनत्ति कोशं भित्त्वा शीर्षकपालं भिनत्ति शीर्षकपालं
भित्त्वा पृथिवीं भिनत्ति पृथिवीं भित्त्वाऽपो भिनत्त्यपो भित्त्वा तेजो भिनत्ति तेजो भित्त्वा
वायुं भिनत्ति वायुं भित्वाकाशं भिनत्त्याकाशं भित्त्वा मनो भिनत्ति मनो भित्त्वा भूतादिं
भिनत्ति भूतादिं भित्त्वा महान्तं भिनत्ति महान्तं भित्त्वाव्यक्तं भिनत्यव्यक्तं भित्त्वाक्षरं भिनत्त्यक्षरं
भित्त्वा मृत्युं भिनत्ति मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणा-
नुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
इसके बाद रैक मुनि ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्! यह विज्ञानघन आत्मा जब शरीर से उत्क्रमण
करता है, तब किस जगह का परित्याग करके, किस रास्ते से बाहर की ओर प्रस्थान करता है ? यह सुनकर
घोरारङ्गिरस ने कहना प्रारम्भ किया कि "हृदय के मध्य भाग में मांस का लाल पिण्ड स्थित है। उस पिण्ड में
चन्द्रमा के द्वारा विकसित होने वाले कमलिनी पुष्प की भाँति शुभ्र श्वेत एक सूक्ष्मातिसूक्ष्म कमल विद्यमान है।
उस सूक्ष्म कमल का विभिन्न तरह से विकास हुआ है। उसके मध्य में समुद्र स्थित है, इस समुद्र के बीच में
कोश (स्थान विशेष) स्थित है। उसमें चार प्रकार की नाड़ियाँ-रमा, अरमा, इच्छा एवं अपुनर्भवा हैं। इनमें से
रमा नाड़ी पुण्य कृत्यों के माध्यम से पुण्य लोक में ले जाती है, अरमा नाड़ी पाप कृत्य के द्वारा पापलोक में
ले जाती है, इच्छा नाड़ी के द्वारा जिसको याद किया जाता है, उसको प्राप्त किया जाता है तथा अपुनर्भवा नाड़ी
के द्वारा इस हृदय के मध्य में स्थित कोश को खोला जाता है, कोश को खोलकर मस्तक के शीर्ष (ब्रह्मरन्ध्र)
को खोला जाता है, मस्तक के शीर्ष को खोलकर पृथिवी का भेदन करता है, पृथिवी का भेदन करने के पश्चात्
जल का भेदन करता है, जल का भेदन करने के बाद तेज (प्रकाश) को भेदता है, तेज का भेदन करने के
पश्चात् वायु का भेदन करता है, वायु को भेदकर आकाश को भेदता है, आकाश को भेदकर मन का भेदन
करता है, मन को भेदकर अहंकार का भेदन करता है, अहंकार का भेदन करने के पश्चात् वह महत्तत्त्व का
भेदन करता है, महत्तत्त्व को भेद कर प्रकृति को भेदता है, प्रकृति का भेदन करने के पश्चात् वह अक्षर का
भेदन करता है, अक्षर का भेदन करने के बाद वह मृत्यु का भेदन करता है और वह मृत्यु परमादिदेव
परमात्मा में ही एक रूप रहती है। इस एकाकार के पश्चात् सत्, असत् तथा सदसत् आदि कुछ भी नहीं रहता।
॥ द्वादशः खण्डः ॥
३३६ सुबालोपनिषद्
इस प्रकार से यह निर्वाण (मोक्ष) का अनुशासन है और यही वेद का अनुशासन है, वेद की आज्ञा है ॥ १ ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
ॐ नारायणाद्वा अन्नमागतं पक्वं ब्रह्मलोके महासंवर्तके पुनः पक्वमादित्ये पुनः पक्वं
क्रव्यादि पुनः पक्वं जालकिलक्लिन्नं पर्युषितं पूतमन्नमयाचितमसंक्लृप्तमश्रीयान्न कंचन
याचेत ॥ १ ॥
नारायण के द्वारा अन्न का आगमन हुआ है। वह (अन्न) महासंवर्तक (प्रलय काल में) ब्रह्म के लोक
में पका है, इसके बाद वह आदित्य (कालाग्नि) में पका है और इसके पश्चात् वह क्रव्यादि (कल्याण-
आवसथ्याग्नि) में पका है। पुनः (प्राणियों के द्वारा खाये जाने पर) जठराग्नि में पका है। इस गीले-बासी
(अन्न) को संन्यासी (कभी न खाये, अपितु) पवित्र, अयाचित (बिना माँगे हुए), असंकल्पित (किसी घर
विशेष से संकल्पपूर्वक न लेना) भिक्षा में प्राप्त अन्न को ही ग्रहण करे। इस तरह से संन्यासी को किसी से भी
अन्न की याचना नहीं करनी चाहिए ॥ १ ॥
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
बाल्येन तिष्ठासेद्बालस्वभावोऽसङ्गो निरवद्यो मौनेन पाण्डित्येन निरवधिकारतयोपलब्ध्येत
कैवल्यमुक्तं निगमनं प्रजापतिरुवाच महत्पदं ज्ञात्वा वृक्षमूले वसेत कुचेलोऽसहाय एकाकी
समाधिस्थ आत्मकाम आप्तकामो निष्कामो जीर्णकामो हस्तिनि सिंहे दंशे मशके नकुले
सर्पराक्षसगन्धर्वे मृत्यो रूपाणि विदित्वा न बिभेति कुतश्चनेति वृक्षमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि
न कुप्येत न कम्पेतोलपलमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेताकाशमिव
तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेत सत्येन तिष्ठासेत्सत्योऽयमात्मा ॥ १ ॥
(ज्ञानी के लिए) बाल्यकाल में ही सदैव बने रहने की कामना करना, बालकों जैसे स्वभाव वाला,
असंग (आसक्ति रहित) रहना एवं निरवद्य (बिना दोष के) रहना, मौन रहना तथा पाण्डित्य को प्राप्त करना,
अवधि रहित (वर्णाश्रम आदि से परे रहने वाले) अधिकार को प्राप्त करना, यही अन्तिम कैवल्य स्थिति
बतलायी गयी है। प्रजापति ने कहा कि श्रेष्ठ पद को जान लेने के बाद वृक्षों के नीचे निवास करना, जीर्ण वस्त्रों
को धारण करना, किसी की भी सहायता न प्राप्त करना तथा एकाकी ही समाधि अवस्था में लीन रहना
चाहिए। इस तरह से पुरुष आत्मा को प्राप्त करने की इच्छा वाला, पूर्णकाम एवं कामनाओं से रहित होता है।
उस पुरुष की समस्त इच्छाएँ जीर्ण-शीर्ण हो जाती हैं। फिर वह पुरुष हाथी, सिंह, डाँस, मच्छर, न्यौला, सर्प,
राक्षस या गन्धर्व आदि में मृत्यु का रूप समझकर किसी से भी भयभीत नहीं होता। वृक्ष की भाँति स्थिर रहने
की कामना करता रहता है। उसे यदि कोई काटकर नष्ट कर दे, तब भी वह क्रोधरहित रहता है, कम्पायमान
नहीं होता, कमल की तरह निर्लिप्त रहना चाहता है। अस्त्र-शस्त्रादि से छेदा भी जाये, तब भी क्रोधित न हो,
अपनी जगह पर स्थिर रहकर आकाश की तरह से वह (निर्लिप्त) रहना चाहता है। छिन्न-भिन्न कर देने पर
क्रोधित न हो, कंपित न हो, सदैव सत्य के प्रति आरूढ़ रहना चाहता है। यही आत्मा का सत्य रूप है ॥ १ ॥
सर्वेषामेव गन्धानां पृथिवी हृदयं सर्वेषामेव रसानामापो हृदयं सर्वेषामेव रूपाणां तेजो
हृदयं सर्वेषामेव स्पर्शानां वायुर्हृदयं सर्वेषामेव शब्दानामाकाशं हृदयं सर्वेषामेव गतीनामव्यक्तं
हृदयं सर्वेषामेव सत्त्वानां मृत्युर्हृदयं मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न
खण्ड १५ मन्त्र १ ३३७
सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥
समस्त गन्धों का हृदय पृथ्वी है, सभी तरह के रसों का हृदय जल है, समस्त रूपों का हृदय तेज
(प्रकाश) है, सभी स्पर्शों का हृदय वायु है, सभी प्रकार के शब्दों का हृदय आकाश है, समस्त गतियों का
हृदय अव्यक्त (प्रकृति) है, सभी तरह के सत्त्वों (प्राणियों) का हृदय मृत्यु है तथा वह मृत्यु परमादिदेव
परमात्मतत्त्व में एक रूप होकर रहता है। इसके बाद न सत् है, न असत् है और न ही सदसत् है। इस तरह
यह मोक्ष का उपदेश है, यही वेदों की शिक्षा है, वेदों का अनुशासन है ॥ २ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
पृथिवी वान्नमापोऽन्नादा आपो वान्नं ज्योतिरन्नादं ज्योतिर्वान्नं वायुरन्नादो
वायुर्वान्नमाकाशोऽन्नाद आकाशो वान्नमिन्द्रियाण्यन्नादानीन्द्रियाणि वान्नं मनोऽन्नादं मनो वान्नं
बुद्धिरन्नादा बुद्धिवन्नमव्यक्तमन्नादमव्यक्तं वान्नमक्षरमन्नादमक्षरं वान्नं मृत्युरन्नादो मृत्युर्वै परे
देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति
वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
पृथ्वी अन्न है, जल अन्न का भक्षण करने वाला है, जल अन्न है तथा ज्योति (तेज या अग्नि) अन्न का
भक्षण करने वाली है, ज्योति ही अन्न है, वायु अन्न का भक्षण करने वाली है, वायु ही अन्न है और आकाश
अन्न खाने वाला है, आकाश ही अन्न है तथा इन्द्रियाँ अन्न ग्रहण करने वाली हैं, इन्द्रियाँ ही अन्न हैं, मन अन्न
ग्रहण करने वाला है, मन ही अन्न है और बुद्धि अन्न ग्रहण करने वाली है, बुद्धि ही अन्न है तथा प्रकृति अन्न
ग्रहण करने वाली है, प्रकृति ही अन्न है और अक्षर अन्न को खाने वाला है, अक्षर ही अन्न है और मृत्यु अन्न
को ग्रहण करने वाली है। यह मृत्यु ही परमदेव परब्रह्म में एक रूप हो जाती है। इसके पश्चात् सत् नहीं है,
असत् भी नहीं है, सत्-असत् भी नहीं है। यही निर्वाण (मुक्ति) का उपदेश है, यही वेद का अनुशासन है,
यही वेद की शिक्षा है ॥ १ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
अथ हैनँ रैक्वः पप्रच्छ भगवन्त्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानं दहतीति
तस्मै स होवाच योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्प्राणं दहत्यपानं व्यानमुदानं समानं वैरम्भं
मुख्यमन्तर्यामं प्रभञ्जनं कुमारं श्येनं श्वेतं कृष्णं नागं दहति पृथिव्यापस्तेजोवाय्वाकाशं दहति
जागरितं स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयं च महतां च लोकं परं च लोकं दहति लोकालोकं दहति धर्माधर्मं
दहत्यभास्करममर्यादं निरालोकमन्तः परंदहति महान्तं दहत्यव्यक्तं दहत्यक्षरं दहति मृत्युं दहति
मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासन मिति
वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
इसके पश्चात् रैक्व मुनि ने घोराङ्गिरस से पुनः प्रश्न किया-" हे भगवन् ! यह विज्ञान स्वरूप आत्मा जब
शरीर से बाहर उत्क्रमण करता है, तब वह किसके द्वारा, किस स्थान को जलाता है ?'' ऐसा सुनकर उन
घोराङ्गिरस ने कहा- “वह विज्ञानघन आत्मा बाहर उत्क्रमण करता है,” तब सबसे पहले प्राण को, क्रमशः
अपान को, व्यान को, उदान को, समान को, वैरंभ को, मुख्य को, अन्तर्याम को, प्रभञ्जन को, कुमार को,
श्येन को, श्वेत को, कृष्ण को एवं नाग को दग्ध करता है। तत्पश्चात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश को
३३८ सुबालापानषद
दग्ध करता है, इसके बाद जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या, महानता के लोक तथा परलोक को भी दग्ध कर देता है,
तदनन्तर लोक एवं अलोक को दग्ध करता है, धर्म एवं अधर्म को दग्ध करता है, तत्पश्चात् बिना सूर्य के,
बिना मर्यादा के और बिना आलोक के वह सभी स्थलों को दग्ध कर देता है, उसके बाद महत्तत्त्व को दग्ध
कर देता है, प्रकृति को दग्ध करता है, अक्षर को दग्ध करता है तथा मृत्यु को भी दग्ध कर देता है। मृत्यु ही
परमादिदेव परमतत्त्व में एकाकार हो जाती है, उसके बाद न सत् है, न असत् और न ही सत्-असत् है।
यही निर्वाण (मुक्ति) का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है, यही वेद का अनुशासन है॥ १ ॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
सौबालबीजब्रह्मोपनिषन्नाप्रशान्ताय दातव्या नापुत्राय नाशिष्याय नासंवत्सररात्रोषिताय
नापरिज्ञातकुलशीलाय दातव्या नैव च प्रवक्तव्या। यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मन इत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति
वेदानुशासनम्॥ १ ॥
सौबाल (सुबाल सम्बन्धी) जिस ब्रह्म का बीज है, ऐसे इस उपनिषद् को अन्य किसी को नहीं प्रदान
करना चाहिए, जो अत्यधिक शान्त न हो, जो पुत्र न हो, जो शिष्य न हो तथा जो एक वर्ष तक पास में न रहा
हो। इस प्रकार से अनजान कुलशील वाले मनुष्य को भी नहीं प्रदान करना चाहिए और न ही उसे बताना
चाहिए। जिस व्यक्ति की परमात्मशक्ति के ऊपर तथा परमात्मा के सदृश ही गुरु के ऊपर परम श्रेष्ठ भक्ति हो,
उसी के लिए ये अर्थ (विशेष ज्ञान) बतलाये गये हैं तथा ऐसे ही महान् आत्मा को ये प्रकाशित करते हैं। यही
निर्वाण (मुक्ति) का आदेश है, यही वेदों की शिक्षा है तथा यही वैदिक अनुशासन है॥ १ ॥
ॐ पूर्णमदः ................................. इति शान्तिः ॥
॥ इति सुबालोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ स्वसवेद्यापानषद् ॥
'स्व'-आत्मतत्त्व का, संवेद्य-अनुभव प्राप्त करना, इस उपनिषद् का प्रयोजन है। इसमें एक ही मन्त्र
चार प्रखण्डों में विभक्त है। पहले प्रखण्ड में प्राणियों की उपमा जल बुद्बुद से दी गई है और कहा गया है,
जैसे जल का बुद्बुद जल में विलीन होकर जल के साथ एकाकार हो जाता है, उसी प्रकार प्राणियों का समूह,
अमृतसागर स्वरूप परब्रह्म में विलीन हो जाता है, परन्तु ऐसी स्थिति ज्ञान-प्राप्ति के बाद ही सम्भव होती है,
अधिकांशतया तो प्राणी अज्ञान से ही आवृत होते हैं।
दूसरे प्रखण्ड में बताया गया है कि सभी काल, कर्मात्मक और स्वभावात्मक होते हैं। यथार्थ में पाप-
पुण्य, अच्छा-बुरा कोई नहीं होता, केवल 'मत' (आत्मतत्त्व की निष्ठा) की ही यथार्थता है। इसमें परिनिष्ठित
व्यक्ति के लिए मोक्ष-नरक आदि कुछ भी नहीं होता।
तीसरे प्रखण्ड में तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट बताते हुए कहा गया है कि सामान्य जनों की इस मार्ग में
प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती। साकार उपासना प्रधान लोग अज्ञान में भटकते रहते हैं। तत्त्वज्ञानी को ब्रह्मा, विष्णु,
रुद्र तथा कुत्ते, गधे, बिल्ली में चैतन्यतत्त्व की दृष्टि से कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता।
अन्तिम चतुर्थ प्रखण्ड में सभी को आत्मतत्त्व सम्पन्न मानकर, सबकी सेवा करने का मर्म समझाया
गया है। अन्त में 'गुरु' की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि सब कुछ गुरु की कृपा से ही जाना जा सकता
है, उनसे बढ़कर कोई भी नहीं-यह तथ्य जानने वाला ही जीवन्मुक्त हो पाता है।
ॐ सर्वेषां प्राणिबुद्बुदानां निरंजनाव्यक्तामृतनिधौ विलयविलासः स्थितिर्विजृम्भते।
तेषामेव पुनर्भवं नो इहास्ति। स यथा मृत्पिण्डे घटानां तन्तौ पटानां तथैवेति भवति।
वस्तुतो नोपादानमत एव नोपादेयमत एव न निमित्तमत एव न विद्या न पुराणं नो वेदा
नेतिहासा इति न जगदिति न ब्रह्मा नो विष्णुः नाथ रुद्रो नेश्वरो न बिन्दुः नो कलेति अग्रे
मध्येऽवसाने सर्वं यथावस्थितं यथावस्थितज्ञानं तेषां नो भवत्यागमपुराणेतिहासधर्मशास्त्रेषु
धृताभिमानास्ते। यत्तानि तु मुग्धतरमुनिशब्दवाच्यैः जीवबुद्बुदैः रचितानीति भवन्ति। तत्र
ग्रामाण्यं तादृशानामेव। ते त्वज्ञानेनावृताः सयत्नेन गर्भास्तदप्येष श्लोको भवति। तदत्र श्लोको
भवति ॥ १-क ॥
ॐ प्राणिस্বরূপ बुलबुलों (पानी के बुलबुलों) का निरञ्जन और अव्यक्त अमृत के सागर परब्रह्म में
विलीन हो जाने की स्थिति प्रकट और सत्य है। यह अवश्य ही होती है। ब्रह्मलीन हो जाने वालों का
पुनरागमन नहीं होता। उनकी स्थिति मृत्तिकापिण्ड में कुम्भ की तरह और धागों में कपड़े की तरह हो जाती है।
वस्तुतः वह न उपादान है, न उपादेय और न निमित्त ही है। वह विद्या, पुराण, वेद, इतिहास भी नहीं है। न
जगत् है, न ब्रह्मा, न विष्णु, न रुद्र, न ईश्वर न बिन्दु और न कला ही है। आगे (आदि), मध्य और अन्त में
उन सबको (प्राणियों को) यथावस्थित ज्ञान नहीं होता, क्योंकि वे आगम, पुराण, इतिहास एवं धर्मशास्त्रों में
अभिमान धारण करने वाले होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि वे जीव मुनि द्वारा उच्चरित किये गये श्रेष्ठ वचनों
रूपी बुद्बुदों द्वारा विनिर्मित होते हैं। वहाँ (उस सन्दर्भ में) वैसों की ही प्रामाणिकता मान्य होती है। वे तो
३४० स्वसवेद्यापानषद
अज्ञान से आवृत हैं। बहुत प्रयत्न करने पर कुछ ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं, फिर भी यह उक्ति प्रसिद्ध है, कि वे सब
(जीव) अज्ञान युक्त हैं, मुग्धतर हैं ॥ १-क ॥
इह तेनाप्यज्ञानेन नो किञ्चित् । अथ यथावस्थितज्ञानेन किंचित् नेति यदस्ति तदस्ति
यन्नास्ति नास्ति तत् । कालकर्मात्मकमिदं स्वभावात्मकं चेति। न सुकृतं नो दुष्कृतम्। अत
एव सुमेरुदातारो गोदातारो वा गोघ्नैः ब्राह्मणघ्नैः सुरापानैः पश्यतोहरैः परोक्षहरैर्वा गुरुपापनिष्ठैः
सर्वपापनिष्ठैः समानास्त एते । तैश्च न गौः न ब्राह्मणः न सुरा न पश्यतोहरः न परोक्षहरः न
गुरुपापानि न लघुपापानि मत एव तन्निष्ठाः मत एव न निर्वाणं नो निरय इति तदप्येष श्लोको
भवति ॥ १-ख ॥
यहाँ उस अज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं है और उस यथावस्थित ज्ञान से भी कोई प्रयोजन नहीं है। जिसका
अस्तित्व है, उसका है। जिसका अस्तित्व नहीं है, उसका नहीं है। ये सभी काल-कर्मात्मक और स्वभावात्मक
हैं। पुण्य और पाप भी नहीं है। अतएव सुमेरु (स्वर्ण) दाता, गोदाता अथवा गोहन्ता, ब्राह्मणहन्ता, सुरापायी,
डाकू, चोर, गुरु (महान्) पापनिष्ठ तथा सर्वपापनिष्ठ ये सभी एक ही समान हैं। उनके लिए न गौ है, न ब्राह्मण
है, न शराब पीने वाला है, न डाकू है, न चोर है, न बड़े पाप हैं, न छोटे पाप हैं। उनके लिए तो (उनका) मत
सर्वोपरि है, क्योंकि मत में ही उनकी निष्ठा है। मोक्ष और नरक भी उनके लिए कुछ भी नहीं है। ऐसा इस श्लोक
का अर्थ है ॥ १-ख ॥
तत्त्वज्ञानं गुहायां निविष्टमज्ञानिकृतमार्गं सुष्ठु वदन्ति। ते तत्र साभिमाना वर्तन्ते ।
पुष्पितवचनेन मोहितास्ते भवन्ति । स यथातुरा भिषग्ग्रहणकाले बाला अपथ्याहितगुडादिना
जनन्या वञ्चिता इति नानादेवता गुरुकर्मतीर्थनिष्ठाश्च ते भवन्ति । केचिद्वयं वैदिका इति
वदन्ति। नान्येऽस्मभ्यम्। केचिद्वयं सर्वशास्त्रज्ञा इति। केचिद्वयं देवानुग्रहवन्तः। केचिद्वयं
स्वप्ने उपास्यदेवताभाषिणः। केचिद्वयं देवा इति। केचिद्वयं श्रीमद्रमारमणनलिनभृङ्गा इति ।
केचित्तु नृत्यन्तु। केचित्तु मूर्खा वयं परमभक्ता इति वदन्तो रुदन्ति पतन्ति च । ये केचन्नैते ते
सर्वेऽप्यज्ञानिनः । ये तु ज्ञानिनो भवन्ति ये तत्त्वज्ञानिनश्च तैस्तेषां को विशेषः। मत एव
केषाञ्चित्कैश्चिद्भेदः। मत एव यत्र विरिञ्चिविष्णुरुद्रा ईश्वरश्च गच्छन्ति तत्रैव श्वानो गर्दभाः
मार्जाराः कृमयश्च मत एव न श्वानगर्दभौ न मार्जारः न कृमिः नोत्तमाः न मध्यमाः न जघन्याः ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥१-ग ॥
तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट कहा गया है। अज्ञानियों द्वारा किये गये (ज्ञान हेतु अपनाये गये) मार्ग को
श्रेष्ठ कहा गया है; क्योंकि वे अभिमान सहित उस मार्ग पर चलते हैं। वे पुष्पित (मुग्ध) वचनों के द्वारा मोहित
हो जाते हैं। जिस प्रकार माताएँ बच्चों को दवा खिलाते समय अपथ्य गुड़ आदि मिलाकर उन्हें दवा खिलाती
हैं अर्थात् अपथ्य गुड़ का प्रलोभन देकर औषधि खिला देती हैं; उसी प्रकार अनेक देवों की उपासना, गुरुओं
के प्रति निष्ठा, तीर्थ सेवन और विभिन्न सत्कर्म करने वाले भी इन्हें (देवों आदि को) ठगते हैं अर्थात् उनके
उपर्युक्त कर्मों के पीछे भी उनकी यही इच्छा रहती है कि हमारी सद्गति हो। कुछ लोग हम वैदिक हैं, ऐसा
कहते हैं। अन्य लोग ऐसा नहीं कहते। कुछ अपने को समस्त शास्त्रों का ज्ञाता कहते हैं, कुछ अपने को देव
अनुग्रहवान् कहते हैं। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि हम स्वप्न में अपने उपास्य देवता द्वारा बताई गई बात बता
मन्त्र १-घ ३४१
देते हैं (जैसे लोग चोरी का सामान मिलने आदि के विषय में बता देते हैं।) कुछ लोग अपने को देवता बताते
हैं। कुछ कहते हैं कि हम भगवान् विष्णु रूपी कमल पर गुंजार करने वाले भ्रमर (अर्थात् वैष्णव) हैं। कुछ
(परम भक्त होने की) प्रसन्नता में नृत्य करें, तो करें। कुछ मूर्खजन अपने को परम भक्त बताते हुए रोते हैं और
पतित होते हैं। जो भी इस प्रकार के हैं, वे प्रायः सभी अज्ञानी हैं। जो ज्ञानी हैं और जो तत्त्वज्ञानी हैं, उनमें
परस्पर कौन वरिष्ठ (विशेष) है (अर्थात् कोई नहीं)। किन्हीं का किन्हीं से केवल मत में ही भेद दृष्टिगोचर
होता है। यह सर्वमान्य मत है कि जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर जाते हैं, वहीं कुत्ते, गधे, बिल्लियाँ और कृमि
भी जाते हैं। यह भी सर्वमान्य है कि कुत्ते, गधे, बिल्लियाँ और कृमि न उत्तम हैं, न मध्यम हैं और न नीच हैं
(सबका सृष्टि में अपना-अपना उपयुक्त स्थान है)। इस श्लोक का यही अर्थ हुआ॥ १-ग॥
न तच्छब्दः न किंशब्दः न सर्वे शब्दाः न माता नो पिता न बन्धुः न भार्या न पुत्रो न
मित्रं नो सर्वे तथापि साधकैरात्मस्वरूपं वेदितुमिच्छद्भिर्जीवन्मुमुक्षुभिः सन्तः सेव्याः। भार्या
पुत्रो गृहं धनं सर्वं तेभ्यो देयम्। कर्माद्वैतं न कार्यं भावाद्वैतं तु कार्यं। निश्चयेन सर्वाद्धैतं
कर्तव्यम्। गुरौ द्वैतमवश्यं कार्यम्। यतो न तस्मादन्यत्। येन सर्वमिदं प्रकाशितम्। कोऽन्यः
तस्मात्परः। स जीवन्मुक्तो भवति स जीवन्मुक्तो भवति। य एवं वेद। य एवं वेद ॥१-घ॥
इसलिए न 'तत्' शब्द है, न 'किम्' शब्द है (अर्थात् प्रश्न और उत्तर कुछ नहीं है) और न सभी शब्द
(अर्थात् अन्य कोई शब्द) हैं। न माता, न पिता, न बंधु, न पत्नी, न पुत्र, न मित्र और अन्य सब भी नहीं हैं, तो
भी साधकों को आत्म स्वरूप को समझने की आकांक्षा से और जीवन्मुक्त होने की आकांक्षा से सन्त सेवा
करनी चाहिए। स्त्री, पुत्र, धन, गृह सब कुछ उन्हें अर्पित कर देना चाहिए अर्थात् उनके निमित्त उनका मोह
छोड़ देना चाहिए। कर्माद्वैत नहीं भावाद्वैत करना चाहिए। निश्चित ही सर्वाद्धैत करना चाहिए। गुरु में द्वैत अवश्य
करना चाहिए, क्योंकि उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं है। उनके द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है
अर्थात् गुरु की कृपा से ही सब कुछ जाना जाता है। उनसे बढ़कर अन्य कौन है अर्थात् कोई नहीं। जो इस
तथ्य को सम्यक् रूप से जानता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है ॥१-घ॥
॥ इति स्वसंवेद्योपनिषत् समाप्ता ॥
॥ हंसोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २१ मन्त्र हैं। ऋषि गौतम एवं सनत्कुमार के
प्रश्नोत्तर रूप में यह उपनिषद् प्रकट हुई है। इसमें ऋषि गौतम द्वारा ब्रह्मविद्या की बात पूछे जाने पर सनत्कुमार
जी ने वह प्रसंग सुनाया, जो महादेव जी ने श्री पार्वती जी को सुनाया था।
यह बड़ा ही गुह्य ज्ञान है, जिसे महादेव ने शान्त (मनोनिग्रह युक्त), दान्त (इन्द्रियनिग्रह युक्त) और
गुरुभक्त को ही देने की बात कही है। वह हंस (जीवात्मा) सभी शरीरों में उसी प्रकार विद्यमान है, जैसे काष्ठ
में अग्नि और तिलों में तेल। उसकी प्राप्ति के लिए षट्चक्र वेधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। अष्टदल
कमल से उसकी वृत्तियों का साम्य बताते हुए शुद्ध स्फटिक मणि सदृश ब्रह्म का स्वरूप वर्णित किया है।
यही 'हंस' भी कहा जाता है। इसके ध्यान से नाद की उत्पत्ति कही गई है। जिसकी अनेक रूपों में अनुभूति
होती है। इसी की चरमावस्था में परब्रह्म से साक्षात्कार होता है। यही अवस्था समाधि की स्थिति है। इसी
स्थिति में शुद्ध-बुद्ध, नित्य, निरञ्जन, शान्त स्वरूप परब्रह्म के प्रकाशित होने का वेदानुवचन भी प्रसिद्ध है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः ................ इति शान्तिः । (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद् )
गौतम उवाच-भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । ब्रह्मविद्याप्रबोधो हि केनोपायेन जायते ॥
ऋषि गौतम ने (सनत्कुमार से) प्रश्न किया-हे भगवन् ! आप समस्त धर्मों के ज्ञाता और समस्त शास्त्रों
के विशारद हैं। आप यह बताने की कृपा करें कि ब्रह्म विद्या किस उपाय द्वारा प्राप्त की जा सकती है ॥ १ ॥
सनत्कुमार उवाच-विचार्य सर्वधर्मेषु मतं ज्ञात्वा पिनाकिनः ।
पार्वत्या कथितं तत्त्वं शृणु गौतम तन्मम ॥ २ ॥
सनत्कुमार ने कहा-हे गौतम ! महादेव जी ने समस्त धर्मों (उपनिषदों) के मतों को विचार कर श्री
पार्वती जी के प्रति जो भी कहा (व्याख्यान दिया) उसे तुम मुझसे सुनो ॥ २ ॥
अनाख्येयमिदं गुह्यं योगिने कोशसंनिभम्। हंसस्याकृतिविस्तारं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ३ ॥
यह गूढ़ रहस्य किसी अज्ञात (अनधिकारी) से नहीं बताना चाहिए। योगियों के लिए तो यह (ज्ञान)
एक कोश के समान है। हंस (परम आत्मा) की आकृति (स्थिति) का वर्णन भोग एवं मोक्षफल प्रदाता है ॥
अथ हंसपरमहंसनिर्णयं व्याख्यास्यामः ।
ब्रह्मचारिणे शान्ताय दान्ताय गुरुभक्ताय। हंसहंसेति सदा ध्यायन् ॥ ४ ॥
जो गुरुभक्त सदैव हंस-हंस (सोऽहम्, सोऽहम्) का ध्यान करने वाला, ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय तथा शान्त
मनःस्थिति (इन्द्रियों) वाला हो, उसके समक्ष हंस-परमहंस का रहस्य प्रकट करना चाहिए ॥ ४ ॥
सर्वेषु देहेषु व्यासो वर्तते । यथा ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव तं विदित्वा मृत्युमत्येति ॥ ५ ॥
जिस प्रकार तिल में तेल और काष्ठ में अग्नि संव्याप्त रहती है। उसी प्रकार समस्त शरीरों में व्याप्त होकर
यह जीव 'हंस-हंस' इस प्रकार जप करता रहता है। इसे जानने के पश्चात् जीव मृत्यु से परे हो जाता है ॥५॥
गुदमवष्टभ्याधाराद्वायुमुत्थाप्य स्वाधिष्ठानं त्रिः प्रदक्षिणीकृत्य मणिपूरकं गत्वा
अनाहतमतिक्रम्य विशुद्धौ प्राणान्निरुध्याज्ञामनुध्यायन्ब्रह्मरन्ध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोऽहमित्येव सर्वदा
पश्यत्यनाकारश्च भवति ॥ ६ ॥