१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२६ सुबालापानषद
यश्चेतयितव्ये यः क्षेत्रज्ञे यो नाड्यां............ नन्तम् ॥ ९ ॥
(इसी प्रकार) चित्त अध्यात्म है, चेतयितव्य (चिन्तन का विषय) अधिभूत है, उसमें क्षेत्रज्ञ अधिदैवत
है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो चित्त में, चेतयितव्य में, क्षेत्रज्ञ में, नाड़ी में ....................अनन्त है ॥ ९ ॥
वागध्यात्मं वक्तव्यमधिभूतमग्निस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो वाचि यो वक्तव्ये
योऽग्नौ यो नाड्यां.............नन्तम् ॥ १० ॥
(उपर्युक्त की तरह ही) वाक् (वाणी) अध्यात्म है, वक्तव्य अधिभूत है और अग्नि अधिदैवत हैं।
नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो वाणी में, वक्तव्य में, अग्नि में, नाड़ी में .....................अनन्त है ॥ १० ॥
हस्तावेध्यात्ममादातव्यमधिभूतमिन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो हस्ते य
आदातव्ये य इन्द्रे यो नाड्यां............ नन्तम् ॥ ११ ॥
(इसी प्रकार) दोनों हाथ अध्यात्म हैं, ग्रहणीय पदार्थ अधिभूत हैं, इन्द्र अधिदैवत हैं तथा नाड़ी इनका
मूल स्थान है। जो हाथ में, ग्रहण करने के विषय में, इन्द्र में, नाड़ी में ................ अनन्त है ॥ ११ ॥
पादावध्यात्मं गन्तव्यमधिभूतं विष्णुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पादे यो
गन्तव्ये यो विष्णौ यो नाड्यां.............. नन्तम् ॥ १२ ॥
(इसी तरह) दोनों पैर अध्यात्म हैं, गन्तव्य अधिभूत है, विष्णु अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूलस्थान है।
जो पैर में, गन्तव्य में, विष्णु में, नाड़ी में..........................अनन्त है ॥ १२ ॥
पायुरध्यात्मं विसर्जायितव्यमधिभूतं मृत्युस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पायौ
यो विर्जयितव्ये यो मृत्यौ यो नाड्यां ................नन्तम् ॥ १३ ॥
(उपर्युक्त जैसा) पायु (गुदा) अध्यात्म है, विसर्जायितव्य (विसर्जन करने का विषय) अधिभूत है और
मृत्यु अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो गुदा में, विसर्जनीय में, मृत्यु में, नाड़ी में ...अनन्त है ॥१३॥
उपस्थोऽध्यात्ममानन्दयितव्यमधिभूतं प्रजापतिस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं य उपस्थे
य आनन्दयितव्ये यः प्रजापतौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य
एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥१४
इसी प्रकार उपस्थेन्द्रिय अध्यात्म है, आनन्दयितव्य (आनन्द का विषय) अधिभूत है और प्रजापति
अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो उपस्थ (जननेन्द्रिय) में, जो आनंद के विषय में, जो प्रजापति में,
जो नाड़ी में, जो प्राण में, जो विज्ञान में, जो आनन्द में, जो हृदयाकाश में और जो इस सम्पूर्ण शरीर में संचरित
होता है, वही यह आत्मा है। इस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए। यह जरा रहित, मरण रहित,
भयरहित, शोकरहित और अनन्त है ॥ १४ ॥
एष सर्वज्ञ एष सर्वेश्वर एष सर्वाधिपतिरेषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य सर्वसौख्यैरूपा-
स्यमानो न च सर्वसौख्यान्युपास्यति वेदशास्त्रैरुपास्यमानो न च वेदशास्त्राण्युपास्यति
यस्यान्नमिदं सर्वं न च योऽन्नं भवत्यतः परं सर्वनयनः प्रशास्तान्नमयो भूतात्मा प्राणमय
इन्द्रियात्मा मनोमयः संकल्पात्मा विज्ञानमयः कालात्याऽऽनन्दमयो लयात्मेकत्वं नास्ति द्वैतं
कुतो मर्त्य नास्त्यमृतं कुतो नान्तःप्रज्ञो न बहिःप्रज्ञो नोभयतःप्रज्ञो न प्रज्ञानघनो न प्रज्ञो
नाप्रज्ञोऽपि नो विदितं वेद्यं नास्तीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति