१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
मन्त्र ४० २१
मायारूप उपाधि से युक्त, जगत् का कारणरूप सर्वज्ञत्व आदि लक्षणों से युक्त, परोक्ष रूप से शबल
(अर्थात् मायावेष्टित) ब्रह्म जो सत्यादि स्वरूप वाला है, वही 'तत्' शब्द से विख्यात है ॥३०॥
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः। अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः ॥३१॥
जो 'मैं' शब्द तथा प्रत्यय का आश्रय स्वरूप प्रतीत होता है, जिसका ज्ञान अन्तःकरण से मिथ्या है, वह
(जीव) 'त्वम्' शब्द से जाना जाता है ॥३१॥
मायाविद्ये विहायैव उपाधी परजीवयोः। अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्म विलक्ष्यते ॥ ३२ ॥
ब्रह्म एवं जीव की क्रमशः माया और अविद्या-यह दो ऐसी उपाधियाँ हैं, जिनका परित्याग कर देने से
अखण्ड सच्चिदानंद परब्रह्म ही भासित होता है (दिखाई पड़ता है) ॥ ३२ ॥
इत्थं वाक्यैस्तदर्थानुसंधानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या संभावितत्वानुसंधानं मननं तु तत् ॥ ३३ ॥
इस प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों द्वारा उनके (जीव और ब्रह्म के एकत्व का) अर्थ और
अनुसंधान करना 'श्रवण' है और जो कुछ सुना गया है, उसके अर्थ पर युक्तिपूर्वक विचार-विमर्श करके
अनुसंधान करना 'मनन' है ॥ ३३ ॥
ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत् । एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते ॥३४॥
श्रवण और मनन द्वारा सन्देह रहित हुए अर्थ में चित्त को स्थापित करके एकतानत्व प्राप्त करना-यह
'निदिध्यासन' है॥ ३४॥
[ ध्वनि का ऊँचा-नीचा, पैना या भारी होना उसके दोलन (फ्रीक्वेंसी) पर निर्भर करता है। समान दोलन वाले
साज जब एक साथ बजते हैं, तो उसके स्वर एक दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। इसे ध्वनि दोलन का सुसंयोग (रैजोनेन्स
ऑफ फ्रीक्वेंसी) कहते हैं। एकतानत्व का अर्थ यहाँ भावात्मक सुसंयोग (रैजोनेन्स) जैसा कुछ होना चाहिए।]
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥ ३५ ॥
इसके पश्चात् ध्याता और ध्यान का परित्याग करके ध्येय में ही चित्त को स्थापित करें। वायुरहित स्थान
में रखे दीपक की तरह जब चित्त निश्चल बन जाए, यही समाधि है ॥ ३५ ॥
वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचराः । स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थिताः ॥ ३६॥
समाधि की अवस्था में वृत्तियाँ केवल आत्मगोचर होती हैं, इसके कारण प्रतीत नहीं होतीं; किन्तु
समाधि में से उठे हुए साधक की उन उन्नत वृत्तियों का स्मरण द्वारा अनुमान लगाया जाता है ॥ ३६ ॥
अनादाविह संसारे संचिताः कर्मकोटयः । अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मो विवर्धते ॥ ३७॥
इस अनादि जगत् में करोड़ों कर्म एकत्र हो जाते हैं, किन्तु समाधि के द्वारा उनका विलय हो जाता है और
शुद्ध धर्म की वृद्धि होती है ॥ ३७ ॥
धर्ममेघमिमं प्राहुः समाधिं योगवित्तमाः । वर्षत्येष यथा धर्मामृतधाराः सहस्रशः ॥ ३८ ॥
उत्तम कोटि के योगवेत्ता इस समाधि को 'धर्ममेघ' कहते हैं, क्योंकि वह मेघ के समान ही धर्मामृत
रूप सहस्रों धाराओं की वर्षा करती है ॥ ३८ ॥
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते । समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये ॥ ३९ ॥
वाक्यमप्रतिबद्धं सत्प्राक्परोक्षावभासते। करामलकवद्बोधमपरोक्षं प्रसूयते ॥ ४० ॥
(जब) इस समाधि के द्वारा वासना का जाल पूर्णरूपेण लय की प्राप्त हो जाता है एवं जब पुण्य-पाप
नामवाला कर्मसमूह समूल रूप से विनष्ट हो जाता है, तब (तत्त्वमसि आदि) वाक्यों के माध्यम से पहले परोक्ष
ज्ञान प्रतिभासित होता है और बाद में (वह) हस्तामलकवत् अपरोक्ष बोध (तत्त्वज्ञान) की प्रकट करता है ॥
२२ अध्यात्मोपनिषद्
वासनानुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदावधिः । अहंभावोदयाभावो बोधस्य परमावधिः ॥ ४१ ॥
(जब) भोगने योग्य पदार्थ की उपस्थिति में भी वासना उदित न हो, तब वैराग्य की स्थिति जान लेनी
चाहिए और जब अहं भाव के उदय का अभाव हो जाए अर्थात् जब वैसी (अहंकार होने योग्य) परिस्थिति बन
जाने पर भी अहं न आये, तब ज्ञान की परम स्थिति जाननी चाहिए ॥ ४१ ॥
लीनवृत्तेरनुत्पत्तिर्मर्यादोपरतेस्तु सा । स्थितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमश्नुते ॥ ४२ ॥
लीन वृत्तियाँ पुनः उदित न हों, तो वह उपरति की स्थिति समझनी चाहिए। इस स्थिति वाला यति
'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है, जो सदा आनन्दानुभूति करता रहता है ॥ ४२ ॥
ब्रह्मण्येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिष्क्रियः । ब्रह्मात्मनोः शोधितयोरेकभावावगाहिनि ॥ ४३ ॥
निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते। सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥४४॥
जिसका आत्मतत्त्व एकमात्र ब्रह्म में ही विलीन हुआ हो, वह निर्विकार और निष्क्रिय हो जाता है। ब्रह्म
और आत्मा के एकत्व के अनुसंधान में लीन हुई वृत्ति जब विकल्प रहित (ऊहापोह रहित) और मात्र चैतन्यं
रूप बन जाती है, तब उसे प्रज्ञा कहते हैं। वह (प्रज्ञा) जिसमें सर्वदा विद्यमान रहती है, वह 'जीवन्मुक्त'
कहलाता है ॥ ४३-४४ ॥
देहेन्द्रियेष्वहंभाव इदंभावस्तदन्यके। यस्य नो भवतः क्वापि स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ ४५ ॥
शरीर और इन्द्रियों में जिसका अहं भाव न हो तथा इनके अतिरिक्त अन्य पदार्थों पर भी जिसका ममत्व
न हो, वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ४५ ॥
न प्रत्यग्ब्रह्मणोर्भेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः । प्रज्ञया यो विजानाति स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ ४६ ॥
जो जीव और ब्रह्म में तथा ब्रह्म और सृष्टि में भेद बुद्धि नहीं रखता, वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ४६ ॥
साधुभिः पूज्यमानेऽस्मिन्पीड्यमानेऽपि दुर्जनैः । समभावो भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते ॥ ४७ ॥
सज्जनों द्वारा पूजे जाने पर और दुर्जनों द्वारा ताड़ित किये जाने पर भी जिसमें समभाव बना रहे, वह
जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ ४७ ॥
विज्ञातब्रह्मतत्त्वस्य यथापूर्वं न संसृतिः । अस्ति चेन्न स विज्ञातब्रह्मभावो बहिर्मुखः ॥ ४८ ॥
जिसके द्वारा ब्रह्म तत्त्व जान लिया गया है, संसार के प्रति उसकी दृष्टि पूर्ववत् नहीं रहती। इसलिए यदि
वह संसार को पूर्व के समान ही देखता है, तो यह जानना चाहिए कि वह अभी तक ब्रह्म भाव को समझा नहीं
है और बहिर्मुख है ॥ ४८ ॥
सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते । फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो नहि कुत्रचित् ॥४९॥
जब तक सुख आदि का अनुभव होता है, तब तक इसे प्रारब्ध भोग मानना चाहिए, क्योंकि कोई भी
फल पूर्व में क्रिया करने के कारण ही उदित होता है। बिना क्रिया के कोई फल नहीं मिलता ॥ ४९ ॥
अहं ब्रह्मेति विज्ञानात् कल्पकोटिशतार्जितम्। संचितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्रकर्मवत् ॥५०
जिस प्रकार जाग्रत् हो जाने पर स्वप्न रूप कर्म विनष्ट हो जाता है, उसी प्रकार 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान हो
जाने पर करोड़ों कल्पों से अर्जित (संचित) कर्म विलीन (नष्ट) हो जाते हैं ॥ ५० ॥
स्वमसङ्गमुदासीनं परिज्ञाय नभो यथा। न श्लिष्यते यतिः किंचित्कदाचिद्भाविकर्मभिः ॥ ५१ ॥
योगी आकाश के सदृश अपने को असङ्ग और उदासीन जानकर भावी कर्मों में किञ्चित् भी लिप्त नहीं
होता ॥ ५१ ॥
मन्त्र ६४ २३
न नभो घटयोगेन सुरागन्धेन लिप्यते। तथाऽऽत्मोपाधियोगेन तद्धर्मैर्नैव लिप्यते ॥ ५२ ॥
जिस प्रकार सुरा कुम्भ में स्थित आकाश, सुरा की गन्ध से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर रूपी
उपाधि के साथ संयुक्त रहने पर भी आत्मा उसके गुण-धर्मों से प्रभावित नहीं होता ॥ ५२ ॥
ज्ञानोदयात्पुराऽऽरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। अदत्त्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टबाणवत् ॥ ५३ ॥
जिस प्रकार छोड़ा हुआ बाण निर्धारित लक्ष्य को बेधता ही है, उसी प्रकार ज्ञानोदय होने से पूर्व (अज्ञान
की स्थिति में) किये गये कर्म का फल अवश्य मिलता है अर्थात् ज्ञान उत्पन्न हो जाने से पूर्व जो कृत्य किये गये
थे, उनका फल ज्ञान उत्पन्न हो जाने से विनष्ट नहीं होता ॥ ५३ ॥
व्याघ्रबुद्ध्या विनिर्मुक्तो बाणः पश्चात्तु गोमतौ। न तिष्ठति भिनत्त्येव लक्ष्यं वेगेन निर्भरम् ॥ ५४
बाघ समझकर (उसे मारने के लिए) छोड़ा गया बाण यह जान लेने पर कि 'यह बाघ नहीं गाय है',
रुकता नहीं और वेगपूर्वक लक्ष्य वेध करता ही है, उसी प्रकार ज्ञान हो जाने पर भी पूर्वकृत कर्म का फल
मिलता ही है ॥ ५४ ॥
अजरोऽस्म्यमरोऽस्मीति य आत्मानं प्रपद्यते। तदात्मना तिष्ठतोऽस्य कुतः प्रारब्धकल्पना ॥ ५५ ॥
'मैं अजर और अमर हूँ', इस प्रकार अपने आत्मरूप को जो स्वीकार कर लेता है, वह आत्मरूप में ही
स्थित रहता है, फिर उसे प्रारब्ध कर्म की कल्पना ही कैसे हो सकती है॥ ५५॥
प्रारब्धं सिद्ध्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः। देहात्मभावो नैवेष्टः प्रारब्धं त्यज्यतामतः ॥ ५६ ॥
प्रारब्ध कर्म उसी समय सिद्ध होता है, जब देह में आत्मभाव होता है; परन्तु देह में आत्मभाव रखना इष्ट
नहीं है। अस्तु, देह के ऊपर आत्म बुद्धि का परित्याग करके प्रारब्ध कर्म का परित्याग करना चाहिए ॥ ५६ ॥
प्रारब्धकल्पनाप्यस्य देहस्य भ्रान्तिरेव हि ॥ ५७ ॥ अध्यस्तस्य कुतस्तत्त्वमसत्यस्य कुतो जनिः।
अजातस्य कुतो नाशः प्रारब्धमसतः कुतः ॥ ५८ ॥
देह के प्रति भ्रान्ति ही प्राणी के प्रारब्ध की परिकल्पना है और आरोपित अथवा भ्रान्त धारणा से जो
कल्पित हो, वह सत्य कैसे हो सकता है? जो सत्य नहीं है, उसका जन्म कहाँ से हो और जिसका जन्म नहीं है,
उसका विनाश कैसे हो ? अस्तु, जो असत् है, उसका प्रारब्ध कर्म कैसे बने ? ॥ ५७-५८ ॥
ज्ञानेनाज्ञानकार्यस्य समूलस्य लयो यदि। तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान् ॥ ५९ ॥
यदि अज्ञान (देहासक्ति आदि ) का पूर्ण विलय ज्ञान में हो जाये, तो फिर देह का अस्तित्व ही कैसे रह
सकता है, ऐसी शंका जड़ (स्थूल) बुद्धि वाले ही करते हैं ॥ ५९ ॥
समाधातुं बाह्यदृष्ट्या प्रारब्धं वदति श्रुतिः। न तु देहादिसत्यत्वबोधनाय विपश्चिताम् ॥ ६० ॥
बहिर्मुखी दृष्टि वाले (अज्ञानियों) को समझाने के लिए श्रुति प्रारब्ध की बात कहती है। ज्ञानियों के लिए
या देहादि की सत्यता प्रकट करने के लिए प्रारब्ध का उल्लेख नहीं किया गया है ॥ ६० ॥
परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमविक्रियम्। सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्ययम् ॥ ६१ ॥
प्रत्यगेकरसं पूर्णमनन्तं सर्वतोमुखम्। अहेयमनुपादेयमनाधेयमनाश्रयम् ॥ ६२ ॥
निर्गुणं निष्क्रियं सूक्ष्मं निर्विकल्पं निरञ्जनम्। अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम् ॥ ६३ ॥
तत्समृद्धं स्वतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनीदृशम्। एकमेवाद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ ६४ ॥
वस्तुतः परिपूर्ण, आदि-अन्तरहित, अप्रमेय, विकाररहित, सद्घन, चिद्घन, नित्य, आनन्दघन, अव्यय,
प्रत्यग्, एकरस, पूर्ण, अनन्त, सब ओर मुख वाला, त्याग और ग्रहण न करने वाला, किसी आधार के ऊपर न
२४ अध्यात्मोपनिषद्
रहने वाला और किसी का आश्रय भी न लेने वाला, निर्गुण, क्रियारहित, सूक्ष्म स्वरूप, निर्विकल्प, दोष-दुर्गुण
रहित, अनिरूप्य (जिसका निरूपण नहीं किया जा सकता, ऐसे स्वरूप वाला), मन और वाणी द्वारा अगोचर,
सत्समृद्ध, (सतोगुण की अधिकता वाला) स्वतः सिद्ध, शुद्ध, बुद्ध, अनीदृश (जिसकी किसी के साथ तुलना
न की जा सके) - वह एक ही अद्वैत रूप ब्रह्म है, उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है॥ ६०-६४॥
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डितम्। ससिद्धः ससुखं तिष्ठन् निर्विकल्पात्मनात्मनि ॥
इस प्रकार अपनी अनुभूति से स्वयं ही अपनी आत्मा को अखण्डित जानकर (तू) सिद्ध हो और
निर्विकल्प (विकल्प रहित) आत्मा से अपने को सुख पूर्ण स्थिति में प्रतिष्ठित कर ॥ ६५॥
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत्। अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ ६६ ॥
(गुरु के इस उपदेश से शिष्य को ज्ञान हो गया और वह कहने लगा -) जिस जगत् को अभी मैंने देखा
था, वह कहाँ चला गया ? किसके द्वारा वह हटा लिया गया ? वह कहाँ लीन हो गया ? बहुत आश्चर्य का विषय
है कि अभी तो वह मुझे दिखाई पड़ रहा था, क्या वह अब नहीं है? ॥६६॥
किं हेयं किमुपादेयं किमन्यत्किं विलक्षणम्। अखण्डानन्दपीयूषपूर्ण ब्रह्ममहार्णवे ॥ ६७ ॥
अखण्ड आनन्द रूप पीयूष से पूरित ब्रह्म रूप सागर में अब मेरे लिए क्या त्याग करने योग्य है? क्या
ग्रहण करने योग्य है? अन्य कुछ है भी क्या ? यह कैसी विलक्षणता है? ॥ ६७ ॥
न किंचिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम्। स्वात्मनैव सदानन्दरूपेणास्मि स्वलक्षणः ॥ ६८
यहाँ मैं न कुछ देखता हूँ, न सुनता हूँ और न ही कुछ जानता हूँ; क्योंकि मैं सदा आनन्द रूप से अपने
आत्मतत्त्व में ही स्थित हूँ और स्वयं ही अपने लक्षण वाला हूँ ॥ ६८ ॥
असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमहं हरिः। प्रशान्तोऽहमनन्तोऽहं परिपूर्णश्चिरन्तनः ॥ ६९ ॥
मैं सङ्ग रहित हूँ, अङ्ग रहित हूँ, चिह्न रहित और स्वयं हरि हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, अनन्त हूँ, परिपूर्ण और
चिरन्तन अर्थात् प्राचीन से प्राचीन हूँ ॥ ६९ ॥
अकर्त्ताऽहमभोक्ताऽहमविकारोऽहमव्ययः। शुद्धो बोधस्वरूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः ॥ ७० ॥
मैं अकर्त्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, अविकारी और अव्यय हूँ। मैं शुद्ध बोधस्वरूप और केवल सदाशिव हूँ॥
एतां विद्यामपान्तरतमाय ददौ। अपान्तरतमो ब्रह्मणे ददौ। ब्रह्मा घोराङ्गिरसे ददौ। घोराङ्गिरा
रैक्वाय ददौ। रैक्वो रामाय ददौ। रामः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददावित्येतन्निर्वाणानुशासनं वेदानुशासनं
वेदानुशासनमित्युपनिषत् ॥ ७१ ॥
यह विद्या (सदाशिव) गुरु ने अपान्तरतम नामक (देवपुत्र) ब्राह्मण को दी थी। अपान्तरतम ने ब्रह्मा को
दी थी। ब्रह्मा ने घोर आङ्गिरस को दी। घोर आङ्गिरस ने रैक्व को दी। रैक्व ने राम (परशुराम) को दी। राम ने
समस्त प्राणियों के लिए प्रदान की। यह निर्वाण (प्राप्त करने) का अनुशासन है, वेद का अनुशासन है और वेद
का आदेश है। इस प्रकार यह उपनिषद् (रहस्य विद्या) पूर्ण हुई ॥ ७१ ॥
ॐ पूर्णमदः ............ इति शान्तिः ॥
॥ इत्यध्यात्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ अवधूतोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय है। इस उपनिषद् में सांकृति की जिज्ञासा का समाधान करते हुए भगवान्
दत्तात्रेय अवधूत स्थिति के स्वरूप और महत्ता का वर्णन करते हैं। अवधूत स्थिति में किस प्रकार श्रेष्ठ तत्त्व के
समाहित होने से व्यक्ति धन्य हो जाता है, इसका वर्णन भी किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे परमात्मन् ! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन
करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक
दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या-द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न ! (हमारे) त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक,
आध्यात्मिक) तापों का शमन हो, अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो।
अथ ह सांकृतिर्भगवन्तमवधूतं दत्तात्रेयं परिसमेत्य पप्रच्छ। भगवन्कोऽवधूतस्तस्य का
स्थितिः किं लक्ष्म किं संसरणमिति। तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः ॥१॥
अक्षरत्वाद्धरेण्यत्वाद्वधूतसंसारबन्धनात्। तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते ॥ २ ॥
सांकृति ने भगवान् दत्तात्रेयजी के समीप जाकर पूछा- 'हे भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति
किस तरह की होती है ? उसका लक्षण किस प्रकार का होता है ? तथा उसका संसार (सांसारिक व्यवहार)
किस प्रकार का होता है?' उनके इन प्रश्नों को सुनकर परम कृपालु भगवान् दत्तात्रेयजी ने कहा- जो अक्षर -
अर्थात् अविनाशी (भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसार रूपी बन्धनों से रहित हो तथा 'तत्त्वमसि' आदि
वाक्यों के लक्ष्यार्थ बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत (अक्षर का 'अ', वरेण्य का 'व', धूतसंसारबन्धन का
'धू' तथा तत्त्वमस्यादि लक्ष्य का 'त' लेने से 'अवधूत') कहा जाता है ॥ १-२ ॥
यो विलङ्घ्याश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा ।
अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते ॥ ३ ॥
जो योगी पुरुष आश्रम एवं वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मा में ही सदैव स्थित रहता हो, वह
वर्णाश्रम रहित योगी पुरुष 'अवधूत' कहा जाता है ॥ ३ ॥
तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षतः ।
प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते ॥४॥
उस (योगी) का प्रिय (ब्रह्म) ही सिर है, 'मोद' दायाँ बाजू और 'प्रमोद' बायाँ बाजू है तथा 'आनन्द'
मध्य आत्मा है। उसकी (आत्मा की) स्थिति गाय के पैर के सदृश (चार-प्रिय, मोद, प्रमोद एवं आनन्द रूप)
हो जाती है ॥ ४ ॥
[ यही प्रकरण तैत्तिरीयोपनिषद् ( २.५ ) में भी आया है । ]
२६ अवधूतोपनिषद्
गोवालसदृशं शीर्षे नापि मध्ये न चाप्यधः। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छाकारेण कारयेत्।
एवं चतुष्पदं कृत्वा ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५॥
उस सिर (हर्ष) में, अधः (मोद-प्रमोद) में तथा मध्य (आनन्द) में आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए
(आत्मा नहीं मानना चाहिए, तो किसे मानना चाहिए, इस पर कहते हैं कि) गोवाल (गौ की पूँछ) सदृश उस
ब्रह्म की पुच्छ प्रतिष्ठा है, उस ब्रह्म को इसी पुच्छाकार में जानना चाहिए। इस प्रकार ब्रह्म को भलीप्रकार जानकर
वे (योगीपुरुष) परमगति को प्राप्त करते हैं॥ ५॥
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः॥ ६॥
अमरत्व की प्राप्ति न तो विभिन्न कर्मों के द्वारा, न प्रजा के द्वारा और न ही धन के द्वारा होती है। एक मात्र
त्याग के द्वारा ही अमरत्व को प्राप्त किया जा सकता है॥ ६॥
स्वैरं स्वैरविहरणं तत्संसरणम्। साम्बरा वा दिगम्बरा वा । न तेषां धर्माधर्मौ न मेध्यामेध्यौ।
सदा सांग्रहण्येष्ट्याश्वमेधमन्तर्यागं यजते। स महामखो महायोगः॥ ७॥
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना ही उन योगियों का संसार है। उनमें से कितने ही तो
वस्त्रों को धारण करते हैं और कितने ही दिगम्बर अर्थात् बिना वस्त्रों के ही रहते हैं। उन योगियों के लिए न कुछ
धर्म है और न ही कुछ अधर्म है, पवित्र एवं अपवित्र आदि भी कुछ नहीं है। (इन्द्रियों को वश में करने के रूप
में) सदा संग्रह की दृष्टि से वे (योगीजन) अन्तःकरण में (आत्मा का ध्यान रूप) अश्वमेध यज्ञ किया करते हैं।
यही उनका महायज्ञ और महायोग है॥ ७॥
[अन्तः स्थित परमात्म चेतना में बहिर्मुखी व्यक्त शक्ति धाराओं को समर्पित कर देना-विसर्जित कर देना ही
आन्तरिक अश्वमेध कहा गया है। इसे ही महायज्ञ या महायोग भी कहा गया है।]
कृत्स्नमेतच्चित्रं कर्म। स्वैरं न विगायेत्तन्महाव्रतम्। न स मूढवल्लिप्यते॥ ८॥
इस प्रकार उन योगियों का सम्पूर्ण चरित्र आश्चर्य युक्त होता है। उनके इस प्रकार के चित्र-विचित्र कर्मों
की निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही उनका महाव्रत है। वे अज्ञानी मनुष्यों की भाँति (पाप-पुण्यादि में)
लिप्त नहीं होते। वे सदैव निर्लिप्त भाव से इच्छानुसार विचरण करते रहते हैं॥ ८॥
यथा रविः सर्वरसान्प्रभुङ्क्ते हुताशनश्चापि हि सर्वभक्षः।
तथैव योगी विषयान्प्रभुङ्क्ते न लिप्यते पुण्यपापैश्च शुद्धः॥ ९॥
जिस प्रकार सूर्य सभी प्रकार के रसों को ग्रहण करता है तथा अग्नि सभी कुछ भक्षण कर लेता है, उसी
प्रकार योगी पुरुष विषयादि भोगों का उपभोग करता हुआ भी शुद्ध होने के कारण पाप-पुण्यादि का भागीदार
नहीं बनता॥ ९॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ १०॥
जिस प्रकार चारों ओर से परिपूर्ण होने पर भी अचल प्रतिष्ठा (स्थिति) वाले समुद्र में जल प्रविष्ट होता
है, वैसे ही योगी पुरुष सभी विषय-भोगों के रहने पर भी अचल रहता है और शान्ति को प्राप्त करता है। विषय-
भोगों की इच्छा करने वाला कामना युक्त मनुष्य वैसी शान्ति नहीं प्राप्त करता॥ १०॥
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥११॥
अतः सत्य बात तो यह है कि किसी का (निरोध) लय नहीं है, किसी की उत्पत्ति नहीं है, कोई आबद्ध
मन्त्र १९ २७
(बँधा) हुआ नहीं है, कोई साधक नहीं है, कोई (मुमुक्षु) अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करने वाला नहीं है तथा कोई
मुक्त भी नहीं है, यही वास्तविक स्थिति है ॥ ११॥
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम् ॥ १२ ॥
तदेव कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया ॥ १३॥
परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया । अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः ॥ १४ ॥
सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् । व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा ॥१५
येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः । निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ॥१६
द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्तु किं मे स्यादन्यकल्पनात् । गुञ्जापुञ्जादि दह्नोत नान्यारोपितवह्निना ।
नान्यारोपितसंसार धर्मनेवमहं भजे ॥ १७ ॥
इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे
बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है। इस तरह से हर एक योग का
मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है। (इसके
पश्चात् वह ध्यान करता हुआ कहता है-) अज्ञानीजन पुत्रादि की इच्छा से अत्यन्त दुःखी होकर संसार के
आवागमन में फँसते रहे; किन्तु मैं तो परम आनन्द से परिपूर्ण हूँ, तब फिर कौन सी इच्छा के कारण इस संसार
में पुनः फँसूँ ? जिन्हें परलोक गमन की इच्छा हो, वे लोग चाहे उस इच्छा से भले ही कर्म किया करें; परन्तु मैं
समस्त लोकों का आत्मा हूँ, सर्वलोकमय बन गया हूँ, तो फिर मैं कोई भी कर्म क्यों करूँ। जिन लोगों को इस
बात का अधिकार हो, वे भले ही प्रवचन किया करें, चाहे वेदों को पढ़ाते रहें, किन्तु मुझे तो इसका अधिकार
ही नहीं; क्योंकि मैं तो निष्क्रिय (क्रिया रहित) हूँ। मैं निद्रा की, भिक्षा की, स्नान अथवा शौच आदि की तनिक
भी इच्छा नहीं करता। जो लोग द्रष्टा स्तर के हों, वे भले ही अन्य कोई कल्पना करें; परन्तु मुझे किसी अन्य की
कल्पना करने से कोई लाभ नहीं। अन्य लोग गुञ्जा (चिरमिरी) की लालिमा के कारण उसमें भले ही अग्नि को
प्रतिष्ठित करें, किन्तु इस अग्नि से गुञ्जा का ढेर नहीं जलता है। तब फिर मेरे अन्दर तो संसार के धर्म आरोपित
ही नहीं ९, इस कारण मैं किसी का भी भजन नहीं करता ॥ १२-१७॥
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन्कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥ १८ ॥
जो लोग तत्त्व को न जानते हों, वे भले ही कुछ भी श्रवण करें; किन्तु मैं (अवधूत) तो स्वयं ही तत्त्व को
जानने में समर्थ हूँ। फिर किस लिए श्रवण करूँ ? जो लोग संशय में पड़े हों, वे मनन करें। मुझे तो किसी भी
तरह का संशय ही नहीं है, इस कारण से मैं (अवधूत) मनन नहीं करता ॥ १८ ॥
विपर्यस्तो निदिध्यासे किं ध्यानमविपर्यये ।
देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥ १९ ॥
जिसको विपर्यास अर्थात् विपरीत ज्ञान हुआ हो, वह भले ही निदिध्यासन करे; परन्तु जहाँ पर विपर्यास
ही नहीं, वहाँ पर ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। शरीर को आत्मा मान लेने का विपर्यास मुझ (अवधूत)
को नहीं होता। इस कारण निदिध्यासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती ॥ १९ ॥
अहं मनुष्य इत्यादिव्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥ २० ॥
मैं मनुष्य हूँ, इस तरह का व्यवहार भी बिना विपर्यास (विपरीत ज्ञान) के नहीं होता। यह विपर्यास भी
दीर्घकाल से अभ्यास में पड़ी वासना के कारण ही होता है ॥ २० ॥
२८ अवधूतोपनिषद्
आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्मक्षये त्वसौ नैव शाम्येद्ध्यानसहस्रतः ॥ २१ ॥
प्रारब्ध कर्मों के विनष्ट होने पर ही यह व्यवहार निवर्तित (बन्द) होता है; किन्तु प्रारब्ध कर्मों का नाश
न हुआ हो, तब तक सहस्रों बार चिन्तन करने के बाद भी यह व्यवहार शान्त नहीं होता ॥ २१ ॥
विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद्ध्यानमस्तु ते । बाधिकर्मव्यवहृतिं पश्यन्ध्यायाम्यहं कुतः ॥ २२ ॥
यदि व्यवहार कर्म करने की इच्छा हो, तो तुम अपनी इच्छानुसार ध्यान करो; परन्तु मेरी दृष्टि में तो कर्मों
का कोई व्यवहार ही नहीं, तो मैं किसलिए ध्यान करूँ ॥ २२ ॥
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम ।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥ २३ ॥
मुझे विक्षेप अर्थात् चित्त की अस्थिरता होती ही नहीं, इस कारण से मुझे समाधि-अवस्था की जरूरत ही
नहीं पड़ती। जब यह मन विकारग्रस्त होता है, तब चित्त अस्थिर होता है और तभी समाधि की आवश्यकता
होती है। मैं तो नित्य ही अनुभव रूप हूँ। समाधि में मुझे और क्या कुछ भिन्न अनुभव हो सकता है ? ॥ २३ ॥
नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः ॥ २४ ॥
व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वाऽन्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥ २५
मुझे जो-जो करना है, वह-वह मैंने किया तथा जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह सदा ही प्राप्त करता रहा।
इस कारण लौकिक, शास्त्रीय या फिर अन्य किसी भी तरह का व्यवहार मुझे क्यों करना चाहिए ? अतः मैं
नहीं करता हूँ। मुझे किसी भी बात की लिप्तता नहीं है। सहज प्राकृतिक ढंग से जो होता है, उसी में रत रहता
हूँ ॥ २४-२५ ॥
अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥ २६ ॥
अथवा मैं कृत-कृत्य (पूर्णकाम) हूँ, तब भी साधारण लोगों पर अनुग्रह करने की इच्छा से यदि
शास्त्राज्ञानुसार मैं चलता हूँ, तो इसमें मेरी क्या हानि है ? ॥ २६ ॥
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक्तद्वत्पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥ २७ ॥
विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥२८ ॥
देवताओं की स्तुति-अर्चना, स्नान, शौच, भिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे। वाणी ॐकार रूपी
प्रणव को भले ही जपती रहे, उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे, बुद्धि सदैव भगवान् विष्णु का चिन्तन भले
ही करती रहे या फिर भले ही (वह) ब्रह्मलीन रहे; किन्तु मैं तो केवल साक्षी रूप हूँ। मैं (अवधूत) इनमें से
किसी भी काम को कभी भी नहीं करता हूँ और न करवाता ही हूँ ॥२७-२८॥
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥ २९ ॥
मैं (अवधूत) कृत-कृत्य होने से पूर्ण तृप्त हूँ तथा जो कुछ भी मुझे प्राप्त करना था, वह सभी कुछ प्राप्त
कर लिया है। इस प्रकार से इस तृप्ति को ही मैं निरन्तर अपने मन में मानता रहता हूँ ॥ २९ ॥
• धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि ।
धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥ ३० ॥
मैं धन्य हूँ-धन्य हूँ; क्योंकि मैं नित्य, अविनाशी अपने आत्म-तत्त्व को सहज रूप से ही जानता हूँ। मैं
धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे ब्रह्म का आनन्द स्पष्टतया प्रकाश प्रदान करता है ॥ ३० ॥
मन्त्र ३६ २९
धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य। धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं
क्वापि ॥ ३१ ॥ धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित्। धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं
सर्वमत्र संपन्नम् ॥ ३२ ॥ धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तेर्मे कोपमा भवेल्लोके। धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो
धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥ ३३ ॥ अहो पुण्यमहो पुण्यं फलितं फलितं दृढम्। अस्य पुण्यस्य
संपत्तेरहो वयमहो वयम् ॥ ३४ ॥ अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम्। अहो शास्त्रमहो
शास्त्रमहो गुरुरहो गुरुः ॥ ३५ ॥
मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मैं अब इस नाशवान् संसार का दुःख बिलकुल भी नहीं देखता। मैं धन्य
हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरा अज्ञान कभी का (अर्थात् बहुत पहले ही) विनष्ट हो गया है। मैं धन्य हूँ- मैं धन्य
हूँ; क्योंकि मुझे अब कुछ भी करना शेष नहीं है। मैं धन्य हूँ-मैं धन्य हूँ; क्योंकि मुझे जो कुछ भी प्राप्त करना
है, वह सभी कुछ मैंने यहीं पर पहले ही प्राप्त कर लिया है। मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; क्योंकि मेरी तृप्ति की क्या
इस लोक में कोई उपमा है (अर्थात् कोई नहीं है)। मैं धन्य हूँ- मैं धन्य हूँ; मैं बारम्बार धन्य हूँ- धन्य हूँ। अहो
पुण्य! अहो पुण्य!! इस पुण्य की सफलता दृढ़तापूर्वक फलीभूत हुई है। धन्य हैं हम सब। अहो ज्ञान! अहो
ज्ञान!! अहो सुख! अहो सुख!! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र!! अहो गुरु! अहो गुरु!! (वास्तव में सफल होने के
कारण सब धन्यवाद के पात्र हैं) ॥ ३१-३५ ॥
इति य इदमधीते सोऽपि कृतकृत्यो भवति। सुरापानात्पूतो भवति। स्वर्णस्तेयात्पूतो
भवति। ब्रह्महत्यात्पूतो भवति। कृत्याकृत्यात्पूतो भवति। एवं विदित्वा स्वेच्छाचारपरो
भूयादोंसत्यमित्युपनिषत् ॥ ३६ ॥
इस प्रकार जो भी मनुष्य इस उपनिषद् का पाठ करता है, वह कृत-कृत्य हो जाता है। मदिरापान करने
वाला, सुवर्ण की चोरी करने वाला, ब्रह्महत्या करने वाला, कृत्याकृत्य (अर्थात् कार्य-अकार्य) करने वाला भी
इसका (भावनापूर्वक) पाठ करने से पवित्र (श्रेष्ठ प्रकृतियों वाला) हो जाता है। मनुष्य इसका पाठ करने मात्र
से पवित्र हो जाता है। मनुष्य इस तरह का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त अपनी इच्छानुसार (आत्म प्रेरणा से ही
श्रेष्ठता-पवित्रता की दिशा में) प्रवृत्त हो जाता है। ॐ (ब्रह्म) ही सत्य है, यही उपनिषद् है ॥ ३६ ॥
ॐ सह नाववतु.........इति शान्तिः ॥
॥ इति अवधूतोपनिषत् समाप्ता ॥
॥ आत्मपूजोपनिषद् ॥
इस उपनिषद् में काया में स्थित आत्म तत्त्व की-आत्मदेव की पूजा-उपासना की विधि समझायी
गयी है। जीवन के विभिन्न क्रिया-कलापों को ही पूजा-आराधना बना लेने का कौशल समझाया गया है, इसी
से मोक्ष प्राप्ति का कल्याणकारी पथ भी प्रशस्त होता है।
ॐ तस्य निश्चिन्तनं ध्यानम्। सर्वकर्मनिराकरणमावाहनम्। निश्चलज्ञानमासनम्।
समुन्मनीभावः पाद्यम्। सदामनस्कमर्घ्यम्। सदादीप्तिराचमनीयम्। वराकृतप्राप्तिः स्नानम्।
सर्वात्मकत्वं दृश्यविलयो गन्धः। दृगविशिष्टात्मानः अक्षताः। चिदादीप्तिः पुष्पम्। सूर्यात्मकत्वं
दीपः। परिपूर्णचन्द्रामृतरसैकीकरणं नैवेद्यम्। निश्चलत्वं प्रदक्षिणम्। सोऽहंभावो नमस्कारः।
परमेश्वरस्तुतिमौनम्। सदासन्तोषो विसर्जनम्। एवं परिपूर्णराजयोगिनः सर्वात्मकपूजोपचारः
स्यात्। सर्वात्मकत्वं आत्माधारो भवति। सर्वनिरामयपरिपूर्णोऽहमस्मीति मुमुक्षूणां
मोक्षैकसिद्धिर्भवति॥ इत्युपनिषत्॥
उस आत्म तत्त्व का सतत चिन्तन ही उसका ध्यान है। समस्त कर्मों का निराकरण ही आवाहन है।
अविचल ज्ञान ही उसका आसन है। उस आत्म तत्त्व के प्रति सदा उन्मुख रहना ही पाद्य है। उस ओर सदैव
मनोयोग ही अर्घ्य है। आत्मा की निरन्तर दीप्ति ही आचमन है। श्रेष्ठता की प्राप्ति ही उसका स्नान है। सर्वात्मक
दृश्य का विलय (शून्य-लयसमाधि) ही गन्ध है। विशिष्ट नेत्र (अन्तर्नेत्र) ही अक्षत हैं। चित् (चैतन्य) दीप्ति
ही पुष्प है। उस (आत्म तत्त्व) का सूर्यात्मकत्व ही दीपक है। पूर्ण चन्द्र और उसके अमृत रूपी रस का
एकीकरण ही नैवेद्य है। उसकी सुनियोजित गतिशीलता ही प्रदक्षिणा है। उसका सोऽहम् (मैं वही ब्रह्म हूँ)
भाव ही नमन है। मौन (अन्तर्मुखी) रहना ही उसकी स्तुति करना है। सदैव सन्तुष्ट रहना, उसका विसर्जन है।
इस प्रकार परिपूर्ण राजयोगी का सर्वात्मक पूजा-उपचार ही उस आत्म तत्त्व का आधार है। समस्त आधि-
व्याधियों से रहित मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ, ऐसा भाव रखने से ही मुमुक्षुओं (मोक्ष के अभिलाषियों) की मोक्ष प्राप्त करने
की अभिलाषा सिद्ध होती है। यही उपनिषद् (तत्त्वज्ञान) है।
॥ इति आत्मपूजोपनिषत् समाप्ता ॥
॥ आत्मबोधोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध है। इसे आत्मप्रबोधोपनिषद् भी कहते हैं। इसमें दो अध्याय हैं। प्रथम
अध्याय में ॐकार रूप नारायण को नमस्कार करते हुए हृदय को ब्रह्मपुर और स्वप्रकाशित कहा गया है। हृदय
में और सर्वत्र 'प्रज्ञारूप'-प्रज्ञानेत्र 'चेतन' का निवास बताया गया है। इस ज्ञान का महत्त्व तथा उसके प्रभाव से
नित्य ज्योतित अमरलोक में आवास प्राप्त होने की बात कही गयी है। दूसरे अध्याय में आत्म साक्षात्कार प्राप्त
कर चुके साधक की अनुभूतियों का उल्लेख है। गन्ने के रस में व्याप्त शक्कर और समुद्र की लहरों की उपमा
देकर ब्रह्म, जगत् और जीव की स्थितियाँ समझायी गयी हैं। आत्मानुभूति की इस अवस्था में सभी लौकिक
सम्बन्धों तथा भेदभावों का अस्तित्व समाप्त हो जाने और जीवन्मुक्तावस्था प्राप्त हो जाने की बात कही गयी है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्य एधि। वेदस्य म आणीस्थः
श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीते नाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु
तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हे परमात्मन्! मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। (हे परमात्मन्!) आप मेरे समक्ष
प्रकट हों। मेरे लिए वेद का ज्ञान लाएँ (प्रकट करें)। मैं पूर्वश्रुत ज्ञान को विस्मृत न करूँ। इस स्वाध्यायशील
प्रवृत्ति से मैं दिन और रात्रियों को एक कर दूँ (मेरा स्वाध्याय सतत चलता रहे)। मैं सदैव ऋत और सत्य
बोलूँगा। ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह (ब्रह्म) वक्ता (आचार्य) की रक्षा करे। त्रिविध ताप शान्त हों।
ॐ प्रत्यगानन्दं ब्रह्मपुरुषं प्रणवस्वरूपं अकार उकारो मकार इति त्र्यक्षरं प्रणवं
तदेतदोमिति। यमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्मसंसारबन्धनात्। ॐ नमो नारायणाय शङ्खचक्रगदाधराय
तस्मात् ॐ नमो नारायणायेति मंत्रोपासको वैकुण्ठभुवनं गमिष्यति ॥१॥
स्वयं अपने आप में आनन्द स्वरूप विराट् ब्रह्म पुरुष 'अकार-उकार-मकार' से युक्त यह तीन अक्षरों
वाला ॐकार रूप प्रणव का स्वरूप है। इसका जप करने से योगीजन सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।
शंख, चक्र एवं गदा को धारण करने वाले परमात्मा स्वरूप नारायण के लिए नमस्कार है। 'ॐ नमो नारायणाय'
नामक इस मन्त्र की उपासना करने वाला मनुष्य वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है॥ १ ॥
अथ यदिदं ब्रह्मपुरं पुण्डरीकं तस्मात्तडिदाभमात्रं दीपवत्प्रकाशम् ॥ २ ॥
जो यह हृदय रूपी कमल है, वही ब्रह्मपुर है। केवल अकेला वही क्षेत्र विद्युत् अथवा दीपक के सदृश
प्रकाशमान होता है ॥ २ ॥
[ आध्यात्मिक दृष्टि से भी हृदय क्षेत्र में दिव्य प्रकाश का बोध होता है तथा शरीर विज्ञान के अनुसार 'पेसमेकर'
में भी हृदय को संचालित करने वाले स्पन्दन स्वतः ही उभरते रहते हैं। इन्हीं काय विद्युत् स्पन्दनों का अंकन ई.सी. जी.
आदि यन्त्र करते हैं।]
ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः। ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युतः ॥ ३ ॥
देवकी पुत्र भगवान् कृष्ण ब्राह्मणों का हित चाहने वाले हैं, (वे) मधुसूदन ब्राह्मणों का सदा हित करने
वाले हैं, कमल के सदृश नेत्र वाले भगवान् विष्णु ब्राह्मणों के शुभचिन्तक हैं तथा वे अविनाशी भगवान् अच्युत
ब्राह्मणों के प्रिय हैं ॥ ३ ॥
३४ आत्मबोधोपनिषद्
विवेकयुक्तिबुद्ध्याहं जानाम्यात्मानमद्वयम्। तथापि बन्धमोक्षादिव्यवहारः प्रतीयते ॥ ११॥
मैं विवेक-बुद्धि से युक्त हूँ। मैं आत्मा को अद्वैत रूप में जानता हूँ, तब भी (शरीर रहते) बन्ध, मोक्ष
आदि व्यवहार वाला हूँ॥ ११॥
निवृत्तोऽपि प्रपञ्चो मे सत्यवद्भाति सर्वदा। सर्पादौ रज्जुसत्तेव ब्रह्मसत्तैव केवलम् ॥ १२॥
प्रपञ्चाधाररूपेण वर्ततेऽतो जगन्न हि। यथेश्कुरससंव्याप्ता शर्करा वर्तते तथा ॥ १३॥
अद्वयब्रह्मरूपेण व्याप्तोऽहं वै जगत्त्रयम्। ब्रह्मादिकीटपर्यन्ताः प्राणिनो मयि कल्पिताः ॥ १४ ॥
बुद्बुदादिविकारान्तस्तरङ्गः सागरे यथा। तरङ्गस्थं द्रवं सिन्धुर्न वाञ्छति यथा तथा ॥ १५॥
विषयानन्दवाञ्छा मे मा भूदानन्दरूपतः। दारिद्र्याशा यथा नास्ति संपन्नस्य तथा मम ॥ १६ ॥
ब्रह्मानन्दे निमग्नस्य विषयाशा न तद्भवेत्। विषं दृष्ट्वाऽमृतं दृष्ट्वा विषं त्यजति बुद्धिमान् ॥ १७॥
आत्मानमपि दृष्ट्वाह्मनात्मानं त्यजाम्यहम्। घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति ॥ १८ ॥
देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति। न मे बन्धो न मे मुक्तिर्न मे शास्त्रं न मे गुरुः ॥ १९ ॥
मेरी दृष्टि से प्रपञ्च निवृत्त (दूर) हो गया है, तब भी सर्वदा वह सत्य के सदृश प्रतिभासित होता है।
निश्चय ही सर्प आदि में जिस प्रकार रस्सी का अस्तित्व है, उसी प्रकार ही प्रपञ्च का भी अस्तित्व है। केवल
मात्र ब्रह्म सत्ता के आधार पर ही प्रपञ्च का व्यवहार है, यह जगत् तो है ही नहीं। जिस तरह शक्कर गन्ने के रस
में व्याप्त है, उसी तरह ही अद्वैत ब्रह्म आनन्द रूप में तीनों लोकों में विद्यमान है। जिस प्रकार सागर में बुलबुले
से लेकर तरंगें तक कल्पित हैं, उसी प्रकार मेरे द्वारा ब्रह्म से लेकर कीट पर्यन्त प्राणिमात्र कल्पित हैं। जिस तरह
समुद्र की तरंगों में रहने वाले जल की इच्छा नहीं करते, उसी तरह केवल आनन्द स्वरूप होने में मुझे विषयों
के आनन्द की कोई भी इच्छा नहीं रहती। जिस तरह सम्पत्ति से सम्पन्न व्यक्ति को दरिद्रता की कोई संभावना
नहीं रहती, उसी तरह ही ब्रह्म के आनन्द में निमग्न रहने वाले मुझको विषयों की कोई आशा नहीं रहती।
बुद्धिमान् पुरुष जिस प्रकार विष और अमृत को देख करके विष का परित्याग कर देता है, उसी प्रकार मैं
आत्मा को देख करके अनात्मा का परित्याग कर देता हूँ। जैसे घट (घड़े) को प्रकाश देने वाला सूर्य घड़े के
नष्ट होने से स्वयं नष्ट नहीं हो जाता, वैसे ही शरीर को प्रकाश देने वाला साक्षी-परमात्मा, शरीर के नष्ट होने पर
भी नष्ट नहीं होता। न मेरे लिए कोई बन्धन है और न ही मुक्ति, न मेरे लिए कोई शास्त्र है और न ही मेरा कोई
गुरु ॥ १२-१९॥
मायामात्रविकासत्वान्मायातीतोऽहमद्वयः । प्राणाश्चलन्तु तद्धर्मैः कामैर्वा हन्यतां मनः ॥२०॥
आनन्दबुद्धिपूर्णस्य मम दुःखं कथं भवेत्। आत्मानमञ्जसा वेद्मि क्वाप्यज्ञानं पलायितम् ॥२१॥
ये सब तो माया के विकास मात्र हैं तथा मैं (आत्मा) माया से परे स्वयं अद्वैत रूप हूँ। प्राण भले ही
निकल जायें और मन चाहे अपने धर्मों एवं कामनाओं से विनाश को प्राप्त हो जाये; परन्तु आनन्द एवं बुद्धि की
पूर्णता के कारण मुझे कैसे दुःख प्राप्त हो सकता है? मैं आत्मा को तो अनायास-सहज ही जानता हूँ, मेरा अज्ञान
न मालूम कहाँ पलायन कर गया है ॥ २०-२१ ॥
कर्तृत्वमद्य मे नष्टं कर्तव्यं वापि न क्वचित्। ब्राह्मण्यं कुलगोत्रे च नामसौन्दर्यजातयः ॥ २२॥
स्थूलदेहगता एते स्थूलाद्भिन्नस्य मे नहि। क्षुत्पिपासान्ध्यबाधिर्यकाम-क्रोधादयोऽखिलाः ॥२३॥
लिङ्गदेहगता एते ह्यलिङ्गस्य न सन्ति हि। जडत्वप्रियमोदत्वधर्माः कारणदेहगाः ॥२४॥
मन्त्र ३१ ३५
अब मेरा कर्तृत्व-भाव बिल्कुल नष्ट हो गया है तथा मुझे कुछ भी करना शेष नहीं है। ब्राह्मण कुल- गोत्र,
नाम की सुन्दरता एवं जाति का अस्तित्व तो मात्र स्थूल शरीर में ही होता है, मैं तो स्थूल पदार्थों से बिल्कुल
पृथक् हूँ। क्षुधा (भूख), पिपासा (प्यास), अन्धापन, बहरापन, काम-क्रोध आदि सभी तरह के धर्म-लिङ्ग
(चिह्न) आदि शरीर में स्थित रहते हैं, मैं तो इस लिंग शरीर से रहित हूँ। मुझमें इनमें से कोई भी विकार नहीं
है। जड़ता, प्रियता और आनन्द मनाना आदि कारण शरीर के धर्म हैं॥ २२-२४॥
न सन्ति मम नित्यस्य निर्विकारस्वरूपिणः। उलूकस्य यथा भानुरन्धकारः प्रतीयते ॥ २५ ॥
स्वप्रकाशे परानन्दे तमो मूढस्य जायते। चतुर्दृष्टिनिरोधेऽभ्रैः सूर्यो नास्तीति मन्यते ॥ २६ ॥
तथाऽज्ञानावृतो देही ब्रह्म नास्तीति मन्यते। यथामृतं विषाद्भिन्नं विषदोषैर्न लिप्यते ॥ २७ ॥
मैं तो नित्य और निर्विकार स्वरूप से युक्त हूँ, अतः ये (उपर्युक्त) सभी मेरे धर्म नहीं हैं। जैसे उलूक
(उल्लू) को सूर्य अन्धकार युक्त दिखाई देता है, वैसे ही मूढ़ (अज्ञानी) मनुष्य को स्वयं प्रकाश स्वरूप
परमानन्द में अज्ञान दृष्टिगोचर होता है। जैसे बादलों के कारण चारों ओर से दृष्टि के रुक जाने से लोग समझने
लगते हैं कि सूर्य नहीं है, वैसे ही मूढ़ता से आवृत प्राणी यह मान लेता है कि ब्रह्म है ही नहीं। जिस प्रकार से
अमृत विष से अलग है, इस कारण विष के दोषों से वह दूषित नहीं होता, उसी प्रकार मैं (आत्मा) जड़ से भिन्न
हूँ। अतः जड़ के दोषों का मुझमें स्पर्श नहीं होता ॥ २५-२७ ॥
न स्पृशामि जडाद्भिन्नो जडदोषान् प्रकाशतः। स्वल्पापि दीपकणिका बहुलं नाशयेत्तमः ॥२८॥
स्वल्पोऽपि बोधो निबिडं बहुलं नाशयेत्तथा। कालत्रये यथा सर्पो रज्जौ नास्ति तथा मयि ॥ २९
अहंकारादिदेहान्तं जगन्नास्त्यहमद्वयः। चिद्रूपत्वान्न मे जाड्यं सत्यत्वान्नानृतं मम ॥ ३० ॥
जैसे दीपकणिका अर्थात् दीपक की छोटी सी ज्योति भी बहुत बड़े अन्धकार को विनष्ट कर देती है,
वैसे ही थोड़े से ज्ञान का प्रकाश भी घने अन्धकार रूपी अज्ञान को विनष्ट कर देता है। जैसे रस्सी में तीनों कालों
में कभी भी सर्प नहीं है, वैसे ही अहंकार से लेकर शरीर तक का संसार मेरे अन्दर तीनों काल में नहीं है, मैं
तो केवल अद्वैत रूप में ही हूँ। मैं चैतन्य स्वरूप हूँ, इसलिए मुझ में जड़ता नहीं है। मैं सत्य स्वरूप हूँ, इस
कारण मुझ में झूठ नहीं है। मैं आनन्द स्वरूप हूँ ॥ २८-३० ॥
आनन्दत्वान्न मे दुःखमज्ञानाद्भाति सत्यवत्। आत्मप्रबोधोपनिषन्मुहूर्तमुपासित्वा न स पुनरावर्तते।
न स पुनरावर्तत इत्युपनिषत् ॥ ३१ ॥
आनन्द स्वरूप होने के कारण मुझ में दुःख नहीं हैं। ये सभी (जगत्प्रपंच) तो केवल अज्ञान से ही
प्रतिभासित होते हैं। इस आत्मप्रबोध उपनिषद् का जो व्यक्ति कुछ क्षण भी उपासना (साक्षात्कार प्राप्त) कर
लेता है, वह पुनः इस संसार में नहीं आता है, ऐसी यह उपनिषद् (रहस्य विद्या) है॥ ३१ ॥
ॐ वाङ्मे मनसि..................... इति शान्तिः ॥
॥ इत्यात्मबोधोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ आत्मोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। नाम के अनुसार इस उपनिषद् में आत्म तत्त्व की विभिन्न
स्थितियों-आत्मा, अन्तरात्मा एवं परमात्मा को स्पष्ट किया गया है। शरीर एवं इन्द्रियादि में सक्रिय चेतन को
आत्मा, प्रकृति के विभिन्न घटकों, पंचतत्त्वों आदि में संव्याप्त को अन्तरात्मा तथा इन सब घटकों से परे चेतन
प्रवाह को परमात्मा-ब्रह्म कहा गया है। सूर्य जैसे राहुग्रस्त दिखता है; पर होता नहीं, उसी प्रकार आत्मा भी
अज्ञानग्रस्त दिखता है; पर होता नहीं, यह कहकर ऋषि ने सूर्यग्रहण के तथ्य के साथ ही जीवन के तथ्य को
भी उजागर किया है। रस्सी में सर्पबोध तथा सर्प का केंचुली से मुक्त होने के उदाहरणों से संसार रूपी भ्रमों
और आत्मा की सहज मुक्तावस्था को समझाया गया है। ब्रह्म को सभी उपमाओं, सम्बोधनों और शब्दार्थों से
परे सिद्ध किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः .......................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद् )
अथाङ्गिरास्त्रिविधः पुरुषोऽजायतात्माऽन्तरात्मा परमात्मा चेति ॥ १-क ॥
अङ्गिरा (अंग, अंगी, अंग-ज्ञ आदि दृष्टि से) पुरुष (परमात्मा) त्रिविध 'आत्मा, अन्तरात्मा और
परमात्मा' रूप में प्रादुर्भूत (प्रकट) हुआ ॥ १-क॥
त्वक् चर्ममांसरोमाङ्गुष्ठाङ्गुल्यः पृष्ठवंशनखगुल्फोदरनाभिमेढ्रकट्यूरुकपोलश्रोत्र
भ्रूललाटबाहुपार्श्वशिरोधमनिकाऽक्षीणि भवन्ति जायते म्रियत इत्येष बाह्यात्मा ॥ १-ख ॥
(अब क्रमशः आत्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा का स्वरूप वर्णित कर रहे हैं-) जो त्वक् (त्वचा),
चर्म, मांस, रोम (बाल), अँगूठा, अँगुलियों, पीठ (पृष्ठभाग), नख, गुल्फ (टखनों), उदर (पेट), नाभि,
जननेन्द्रिय, कटि (कमर), जंघा, कपोल, भौंह, मस्तक, भुजाओं, पार्श्वभाग, सिर एवं आँखों आदि (स्थूल
शरीर) के माध्यम से जन्म-मरण के चक्र में घूमता है, वह आत्मा है ॥ १-ख ॥
अथान्तरात्मा नाम पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशेच्छाद्वेषसुखदुःखकाममोह विकल्पनादिभिः
स्मृतिलिङ्ग उदात्तानुदात्तह्रस्वदीर्घप्लुतस्खलितगर्जितस्फुटितमुदितनृत्तगीतवादित्रप्रलय
विजृम्भितादिभिः श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः पुराणन्याय -
मीमांसाधर्मशास्त्राणीति श्रवणघ्राणाकर्षणकर्मविशेषणं करोत्येषोऽन्तरात्मा ॥ १-ग ॥
अन्तरात्मा (दृश्य पदार्थों में अव्यक्त रूप से स्थित अन्तर्यामी चेतन) वह है, जो पृथ्वी, जल, सुख-दुःख
आदि (गुण), काम, मोह, तर्क-वितर्क आदि, स्मृति, लिंग, उदात्त, अनुदात्त, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत आदि (स्वर
भेद), स्खलित, गर्जित (मेघ शब्द), स्फुटित, मुदित, नृत्य, गीत, वादित (आदि ध्वनि रूप), प्रलय,
विजृम्भण (विकास) आदि के द्वारा श्रवण करने वाला, सूँघने वाला, रस लेने वाला, मनन करने वाला, जानने
वाला, कार्य करने वाला, विज्ञानात्मा, पुराण, न्याय, मीमांसा आदि जो धर्मशास्त्रों का ज्ञाता, श्रवण, घ्राण
(सूँघना), आकर्षण एवं कार्य विशेष को पूर्ण करता है ॥ १-ग ॥
३७ आत्मोपनिषद्
अथ परमात्मा नाम यथाक्षर उपासनीयः। स च प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधियो
गानुमानाध्यात्मचिन्तकं वटकणिका वा श्यामाकतण्डुलो वा वालाग्रशतसहस्रविकल्पनाभिः
स लभ्यते नोपलभ्यते न जायते न म्रियते न शुष्यति न क्लियते न दह्यति न कम्पते न भिद्यते न
छिद्यते निर्गुणः साक्षीभूतः। शुद्धो निरवयवात्मा केवलः सूक्ष्मो निष्कलो निरञ्जनो निर्विकारः
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धवर्जितो निर्विकल्पो निराकाङ् क्षः सर्वव्यापी सोऽचिन्त्यो निर्वर्ण्यश्च
पुनात्यशुद्धान्यपूतानि। निष्क्रीयस्तस्य संसारो नास्ति॥ १-घ॥
परमात्मा नाम से सम्बोधित अक्षर (अविनाशी या ॐकार रूप में) आराध्य है। वह (परमात्मा)
प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, योग, अनुमान, आत्मचिन्तन आदि के द्वारा; वट कणिका (वट
वृक्ष के सूक्ष्म बीज), श्यामाक-तण्डुल (सावाँ के सूक्ष्म चावल) तथा अत्यन्त सूक्ष्म बाल के अग्रभाग के
सैकड़ों-हजारों हिस्सों से भी अति सूक्ष्म; इस प्रकार से चिन्तन किया जाता हुआ प्राप्त भी होता है और नहीं भी
होता है। वह न कभी प्रकट होता है और न ही मरता है, न शुष्क होता है, न आर्द्र होता है, न चलायमान है, न
कम्पन करता है, न टूटता है, न स्थिर रहता है, वह तो गुणों से रहित, सर्व प्रमाण भूत, शुद्ध स्वरूप,
अवयवरहित आत्मा केवल, सूक्ष्म, निर्मल, निरंजन, विकारहीन, शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धहीन, ज्ञान से
रहित, कल्पना रहित, आकांक्षा से रहित, सर्वत्र व्याप्त, अचिन्त्य एवं इस प्रकार का परमात्मा है कि जिसका
ठीक-ठीक ज्ञान नहीं किया जा सकता। (वह) अशुद्ध-अपवित्र को शुद्ध-पवित्र करता है, वह क्रियारहित है,
उस परमात्मा का कोई संसार नहीं है अर्थात् संसार रहित है॥ १-घ॥
[संसार का अर्थ (संसरति इति संसारः) गतिशील या परिवर्तनशील होता है। परमात्मा एक रूप रहने वाला होने
से उसका कोई संसरण नहीं होता; इस भाव से उसे संसार रहित कहा गया है। अगले मन्त्रों में उस आत्म तत्त्व का स्वरूप
दृष्टिगत होने पर सब जगह उस परमात्मतत्त्व-ब्रह्म के ही भासित होने की बात कही गई है।]
आत्मसंज्ञः शिवः शुद्ध एक एवाद्वयः सदा। ब्रह्मरूपतया ब्रह्म केवलं प्रतिभासते॥ १-ङ॥
'आत्मा' नामक वह परमपवित्र, कल्याणकारी, एकमात्र, अद्वैत, ब्रह्मरूप होने के कारण केवल ब्रह्म ही
प्रतिभासित होता है॥ १-ङ॥
जगद्रूपतयाप्येतद्ब्रह्मैव प्रतिभासते। विद्याऽविद्यादिभेदेन भावाऽभावादिभेदतः॥ २॥
इस जगत् के रूप में ब्रह्म ही परिलक्षित होता है। विद्या-अविद्या, भाव-अभाव आदि के भेद से जो भी
दृष्टिगोचर होता है, वह अविनाशी ब्रह्म का ही रूप है॥ २॥
गुरुशिष्यादिभेदेन ब्रह्मैव प्रतिभासते। ब्रह्मैव केवलं शुद्धं विद्यते तत्त्वदर्शने॥ ३॥
गुरु एवं शिष्य आदि के भेद से ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है। वास्तव में यदि देखा जाए, तो यत्र-तत्र-
सर्वत्र वह शुद्ध प्रकाश स्वरूप ब्रह्म ही है॥ ३॥
न च विद्या न चाविद्या न जगच्च न चापरम्। सत्यत्वेन जगद्भानं संसारस्य प्रवर्तकम्॥ ४॥
वस्तुतः न तो विद्या है और न ही अविद्या है, न जगत् है और न ही अन्य कोई वस्तु सत्य है; लेकिन
सत्यरूप में जगत् का भान होना ही इस (संसार) का प्रवर्तक (इस प्रकृति का मूल कारण) है॥ ४॥
असत्यत्वेन भानं तु संसारस्य निवर्तकम्। घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः को न्वपेक्षते॥ ५॥
यह (संसार) असत्य है, यह भान होना ही इसका निवर्तक (मुक्तिदाता) है, जैसे सामने रखे हुए घट
(घड़े) के ज्ञान के लिए कोई भी अन्य नियम (प्रमाण) अपेक्षित नहीं है (वह तो प्रत्यक्ष ही है)॥ ५॥
मन्त्र १५ ३८
विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन्सति पदार्थधीः। अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते॥ ६॥
जिस प्रकार से प्रत्येक सामने स्थित पदार्थ का ज्ञान बिना ही प्रमाण के हो जाता है, ठीक उसी प्रकार
नित्य-सिद्ध यह आत्मा प्रमाणित (प्रत्यक्ष) होकर ही प्रतिभासित (प्रकाशित) होता है अर्थात् प्रत्येक वस्तु का
ब्रह्ममय रूप होने के कारण ब्रह्म के प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं रहती है॥ ६॥
न देशं नापि कालं वा न शुद्धिं वाप्यपेक्षते। देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम्॥ ७॥
जिस प्रकार देवदत्त आदि नाम के प्रति विज्ञानी (पुरुष) निरपेक्ष (पूर्ण आश्वस्त) हो जाता है, उसी प्रकार
वह (आत्मतत्त्व) देश, काल अथवा किसी भी तरह की पवित्रता की अपेक्षा नहीं रखता॥ ७॥
तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम्। भानुनेव जगत्सर्वं भास्यते यस्य तेजसा॥ ८॥
उसी प्रकार ब्रह्म को जानने वाले का ब्रह्माहम् (मैं ब्रह्म हूँ) ऐसा समझना ही ब्रह्म का साक्षात्कार
(प्रत्यक्षानुभूति) है। जिस तरह सूर्य से सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है, उसी तरह ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उस ब्रह्म
के तेज से प्रकाशित होता है॥ ८॥
अनात्मकमसत्तुच्छं किं नु तस्यावभासकम्। वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि।
येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत्॥ ९॥
उस ब्रह्म के प्रत्यक्ष सिद्धत्व में अन्य कोई साक्ष्य देना अनात्मक, असत् एवं तुच्छ है, उसका
अवभासक (बोध कराने वाला) कौन है? (अर्थात् कोई नहीं।) वेद, शास्त्र, पुराण एवं समस्त भूत (प्राणि-
जगत्) जिसके माध्यम से अर्थवान् हैं, वह (ब्रह्म) तो स्वयं प्रकाशित है॥ ९॥
क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि॥ १०॥ तथैव विद्वान् रमते निर्ममो
निरहं सुखी। कामान्निष्कामरूपी संचरत्येकचरो मुनिः॥ ११॥
जिस प्रकार बालक भूख अथवा शरीर की किसी भी तरह की पीड़ा-परेशानी को त्याग कर (अर्थात्
भूलकर) आकर्षक वस्तुओं (खिलौनों) के साथ क्रीड़ा करता रहता है, उसी प्रकार ही विद्वज्जन ममता-रहित,
अहंकाररहित, सुखी रहते हुए ब्रह्म में ही रमण किया करता है। वह (आत्मज्ञानी) सभी तरह की इच्छाओं से
मुक्त होकर मुनिरूप में एकान्तवासी होकर विचरण करता रहता है॥ १०-११॥
स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः। निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः॥ १२
स्वयं अपनी ही आत्मा से सदा सन्तुष्ट तथा अपने को सर्वत्र स्थित मानता हुआ (लौकिक दृष्टि से)
निर्धन भी सदैव सन्तुष्ट एवं असहाय भी अपने को महाबलवान् समझता है॥ १२॥
नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः। कुर्वन्नपि न कुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि॥ १३॥
वह किसी भी तरह का भोजन न ग्रहण करता हुआ भी नित्य तृप्त रहता है, देखने में असमान व्यवहार
करता हुआ भी सबको बराबर देखने वाला, कार्य करता हुआ भी काम न करता हुआ-सा तथा फल का
उपभोग करता हुआ भी भोगरहित माना जाता है॥ १३॥
मन्त्र क्र० १५-१६ में ऋषि यह बात स्पष्ट करते हैं कि सूर्य (ग्रहण या बादलों के कारण) अन्धकार ग्रस्त दिखता
भर है; किन्तु वास्तव में वह ग्रसित होता नहीं है। जन सामान्य को समझने के लिए कहे गये बाल सुलभ उदाहरणों के
आधार पर किसी को यह नहीं सोच लेना चाहिए कि शास्त्र विज्ञान सम्मत नहीं हैं-
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः। अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित्॥ १४॥
प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे। तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः॥ १५॥
३९ आत्मोपनिषद्
ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञात्वा वस्तुतल्लक्षणम्। तद्देहादिबन्धेष्व्यो विमुक्तं ब्रह्मवित्तमम् ॥ १६ ॥
पश्यन्ति देहिवन्मूढाः शरीराभासदर्शनात् । अहिनिर्व्वयनीवायं मुक्तदेहस्तु तिष्ठति ॥ १७ ॥
वह आत्मा शरीर में रहते हुए भी अशरीरी है, वह परिच्छिन्न (शरीर में आबद्ध) रहता हुआ भी सर्वत्र
गमनशील अर्थात् व्याप्त है। इसलिए शरीररहित उस ब्रह्मज्ञानी को कहीं पर भी प्रिय तथा अप्रिय ज्ञान स्पर्श
नहीं करता (अर्थात् वह आत्मा किसी को प्रिय या अप्रिय नहीं समझता), शुभ एवं अशुभ उसे स्पर्श भी नहीं
कर सकते। उसकी दृष्टि में सभी समान हैं। जिस प्रकार लोगों के द्वारा सूर्य राहु से ग्रसित न होने पर भी ग्रसित
मान लिया जाता है, लोग भ्रान्तिवश उसे ग्रसित मानते हैं; क्योंकि उन्हें वस्तु-स्थिति का पता नहीं होता। उसी
प्रकार शरीरादि के बन्धनों से मुक्त श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी को शरीरी के रूप में मानने वाले मूढ़ (वज्रमूर्ख) समझे जाते
हैं; वास्तव में वह ब्रह्मज्ञानी (आत्मा) साँप की केंचुली के सदृश शरीर से सर्वथा मुक्त रहता है ॥ १४-१७ ॥
इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किंचित्प्राणवायुना । स्रोतसा नीयते दारु यथानिम्नोन्नतस्थलम् ॥ १८ ॥
यह शरीर प्राण वायु के द्वारा ही इधर-उधर संचालित किया जाता है, जैसे झरने-नदी आदि के स्रोतों
द्वारा लकड़ियों को ऊपर-नीचे ले जाया जाता है ॥ १८ ॥
दैवेन नीयते देहो तथा कालोपभुक्तिषु । लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केव-लात्मना ॥१९॥
शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः । जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः ॥ २० ॥
जैसे दैव (भाग्य) के द्वारा देह कालोपभोग (सुख-दुःख आदि उपभोगों) में ले जाई जाती है, ऐसे जो
केवल अपनी आत्मा के सहारे लक्ष्य-अलक्ष्य की गति को त्यागकर स्थिर हो जाता है, वह (आत्मानुभूतियुक्त
साधक) ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ साक्षात् भगवान् शिव ही है। शिवस्वरूप वह कृतार्थ ब्रह्मज्ञानी जीवित रहते हुए भी
मुक्तावस्था को प्राप्त हो जाता है ॥ १९-२० ॥
उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव सद्ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् । शैलूषो वेषसद्भावाभावयोश्च यथा पुमान् ॥ २१ ॥
यह (आत्मा), उपाधि (शरीरादि) के विनष्ट हो जाने पर ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म में विलीन हो जाता है,
जिस तरह विविध वेश को धारण करने पर व्यक्ति नट आदि के रूप में समझा जाता है तथा अपने वास्तविक
रूप में आ जाने पर वही (पूर्व जैसा) व्यक्ति समझा जाता है ॥ २१ ॥
तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः सदा ब्रह्मैव नापरः । घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्वयम् ॥ २२ ॥
उसी तरह ही ब्रह्म को जानने वाला भी स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। केवल शरीरादि (वेश) के कारण
वह भिन्न प्रतीत होता है। वस्तुतः वह ब्रह्म ही है, उससे भिन्न अन्य और कुछ भी नहीं है। जैसे घट के फूट जाने
पर घट के अन्दर का आकाश-आकाश रूप ही हो जाता है ॥ २२ ॥
तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम् । क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ॥ २३ ॥
संयुक्तमेकतां याति तथाऽऽत्मन्यात्मविन्मुनिः। एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम् ॥२४॥
ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः। सदात्मकत्वविज्ञानदग्धाविद्यादिवर्ष्मणः ॥ २५ ॥
वैसे ही उपाधि अर्थात् शरीरादि के विलय हो जाने के पश्चात् ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म रूप ही
हो जाता है। जिस तरह दुग्ध में दुग्ध, तेल में तेल और जल में जल मिला देने पर एक हो जाते हैं; ठीक उसी
तरह आत्मज्ञानी मुनि एवं आत्मा की स्थिति भी एक ही है। इस प्रकार विदेह रूप कैवल्य-पद की प्राप्ति के
पश्चात् सन्मात्र अखण्डित विग्रहवान् ब्रह्मभाव की प्राप्ति करके पुनः संसारावर्तन (आवागमन) से मुक्त हो जाता
है; क्योंकि सदात्मकत्व विज्ञान से उसकी अविद्या दग्ध हो जाती है ॥ २३-२५ ॥
४० मन्त्र ३१
अमुष्य ब्रह्मभूतत्वादब्रह्मणः कुत उद्भवः । मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः ॥२६
ऐसे यति के ब्रह्मरूप हो जाने पर यह कैसे हो सकता है कि ब्रह्म का पुनः उद्भव हो। माया के द्वारा
रचित बन्धन और मोक्ष वस्तुतः उस ब्रह्म में नहीं हुआ करते ॥२६ ॥
यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासवनिर्गमौ । आवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ॥२७॥
जिस प्रकार निष्क्रिय रस्सी में सर्प का बोध हो जाने पर यदि वह (सर्पाभास) पुनः समाप्त हो जाता है,
तो फिर केवल-मात्र रस्सी ही आभासित होने लगती है। उसी प्रकार आवरण के सत् और असत् भाव को ही
बन्धन और मोक्ष कहना चाहिए ॥ २७ ॥
नावृतिर्ब्रह्मणःकाचिदन्याभावादनावृतम्। अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि ॥ २८ ॥
बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः । अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि ॥२९ ॥
ब्रह्म का कोई भी आवरक नहीं होता। वह अन्य के अभाव के कारण अनावृत है। वस्तु के होने या न
होने के विषय में जो कुछ भी विश्वास किया जाता है,ये तो वस्तुतः बुद्धि के ही गुण हैं,उस नित्य वस्तु (अवि-
नाशी ब्रह्म) के नहीं। अतः माया के द्वारा प्रादुर्भूत होने वाले बन्धन और मोक्ष आत्मा में नहीं होते ॥ २८-२९ ॥
[ ऋषि यहाँ यह तथ्य बहुत स्पष्ट कर देते हैं कि बन्धन या मुक्ति आत्मा के लिए नहीं, बुद्धि के लिए है। मेरे-तेरे
में बुद्धि ही उलझती-सुलझती है, आत्मा तो सहज मुक्तावस्था में ही स्थित है। ]
निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरञ्जने । अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत्कल्पना कुतः ॥ ३० ॥
उस कलारहित, निष्क्रिय, शान्त, निष्पाप, निरञ्जन, अद्वितीय परमात्म तत्त्व में आकाश के भेदों की
भाँति (घटाकाश, महाकाश आदि) कल्पना कहाँ से हो सकती है ? ॥ ३० ॥
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ३१ ॥
सत्य तो यह है कि वह परब्रह्म न तो जन्म लेता है और न ही जन्मरहित है,न वह बन्धन में रहता है, न
ही साधक है, न ही वह मोक्ष की इच्छा वाला है और न ही वह मुक्त है (वह इन सबसे परे है।) ॥ ३१ ॥
[ जन्म लेने वाली काया के साथ वह प्रकट होता दीखता है, इसलिए वह जन्म रहित नहीं है, लेकिन जन्म तो
काया का होता है, चेतना का नहीं, पात्र बनते-टूटते हैं, उनमें रहने वाला जल तो पात्र के जन्म और क्षय से मुक्त है,
इसलिए अजन्मा है। इसी भाव से उसे न मुक्त कह सकते हैं, न अमुक्त, न मोक्षाकांक्षी। ]
ॐ भद्रं कर्णेभिः ....................इति शान्तिः ॥
॥ इत्यात्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ आरुण्युपनिषद् ॥
यह उपनिषद् सामवेदीय मानी जाती है। इसे आरुणिकोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है। इसमें
ऋषि आरुणि की वैराग्य जिज्ञासा के उत्तर में ब्रह्मा जी ने संन्यास में दीक्षित होने के सूत्र समझाये हैं। संन्यास
में प्रवेश के लिए ब्रह्मचारी, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ तीनों को ही अधिकृत किया गया है। संन्यासी के यज्ञ-
यज्ञोपवीत आदि कर्मकाण्ड के प्रतीकों के त्याग का बड़ा मार्मिक स्वरूप समझाया गया है। संन्यासी यज्ञ का
त्याग नहीं करता, स्वयं यज्ञरूप बन जाता है, वह ब्रह्मसूत्र त्यागता नहीं, उसका जीवन ही ब्रह्मसूत्र हो जाता है।
वह मंत्र त्यागता नहीं, उसकी वाणी ही मंत्र रूप हो जाती है। इन सब महत्त्वपूर्ण सूत्रों को अंतरंग जीवन में ही
धारण करने के कारण उसे संन्यासी अर्थात् सम्यक् रूप से धारण करने वाला कहा गया है। संन्यास ग्रहण
करने के स्थूल कर्मकाण्ड का भी उल्लेख किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं
ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥ ॐ शान्तिःशान्तिः शान्तिः ॥
मेरे समस्त अंग-अवयव वृद्धि को प्राप्त करें। वाणी, प्राण, नेत्र, कान, बल एवं सभी इन्द्रियाँ विकसित
हों। समस्त उपनिषदें 'ब्रह्म' हैं। मुझसे ब्रह्म का त्याग न हो तथा ब्रह्म हमारा परित्याग न करे, मेरा परित्याग न
हो-न हो। इस प्रकार ब्रह्म में निरत (लगे हुए) हमें उपनिषद्-प्रतिपादित धर्म की प्राप्ति हो। हमारे त्रिविध तापों
का शमन हो तथा हमें शान्ति प्राप्त हो।
ॐ आरुणिः प्रजापतेर्लोकं जगाम। तं गत्वोवाच। केन भगवन्कर्माण्यशेषतो
विसृजानीति। तं होवाच प्रजापतिस्तव पुत्रान्भ्रातृन्बन्ध्वादीञ्छिखां यज्ञोपवीतं यागं सूत्रं
स्वाध्यायं च भूर्लोकभुवर्लोकस्वर्लोकमहर्लोकजनोलोकतपोलोकसत्यलोकं चातलतला-
तलवितलसुतलरसातलमहातलपातालं ब्रह्माण्डं च विसृजेत्। दण्डमाच्छादनं चैव कौपीनं
च परिग्रहेत्। शेषं विसृजेदिति ॥ १॥
प्रजापति की उपासना करने वाले अरुण के पुत्र आरुणि ब्रह्मलोक में भगवान् ब्रह्माजी के समक्ष
उपस्थित हुए तथा प्रार्थना करते हुए पूछा-हे भगवन् ! मैं सभी कर्मों का किस तरह से परित्याग कर सकता हूँ।
तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा-हे ऋषे ! अपने पुत्र, स्वजन-सम्बन्धी, बन्धु-बान्धव आदि को यज्ञोपवीत, यज्ञ,
शिखा और स्वाध्याय को तथा भू लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, महः लोक, जनःलोक, तपःलोक, सत्यलोक
और अतल, तलातल, वितल, सुतल, रसातल, महातल तथा पाताल आदि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का परित्याग कर
देना चाहिए। मात्र दण्ड, आच्छादन के लिए वस्त्र एवं कौपीन (लँगोटी) को धारण करना चाहिए। शेष अन्य
सभी वस्तुओं का परित्याग कर देना चाहिए ॥ १ ॥
४२ आरुण्युपनिषद्
गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थो वा उपवीतं भूमावप्सु वा विसृजेत्। अलौकिकाग्नीनुदराग्नौ
समारोपयेत्। गायत्रीं च स्ववाच्यग्नौ समारोपयेत्। कुटीचरो ब्रह्मचारी कुटुम्बं विसृजेत्। पात्रं
विसृजेत्। पवित्रं विसृजेत्। दण्डांल्लोकाग्नीन् विसृजेदिति होवाच। अत ऊर्ध्वममन्त्रवदाचरेत्।
ऊर्ध्वगमनं विसृजेत्। औषधवदशनमाचरेत्। त्रिसंध्यादौ स्नानमाचरेत्। संधिं समाधावात्म -
न्याचरेत्। सर्वेषु वेदेष्वारण्यकमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदिति ॥ २ ॥
ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ हो या वानप्रस्थी सभी को (अपने-अपने आश्रमों में विहित) दिव्य अग्नियों को
अपने जठराग्नि में आरोपित कर लेना चाहिए। गायत्री को अपनी वाणी रूपी अग्नि में प्रतिष्ठित करे। यज्ञोपवीत
को पृथिवी पर अथवा जल में विसर्जित कर देना चाहिए। कुटी में निवास करने वाले ब्रह्मचारी को अपने
परिवार (कुटुम्ब) का परित्याग कर देना चाहिए, पात्र का त्याग करे एवं पवित्री (कुशा) को भी त्याग दे।
दण्ड और लौकिक अग्नि का भी त्याग करे, ऐसा ब्रह्माजी ने आरुणि से कहा। आगे उन्होंने कहा कि वह
मंत्रहीन की तरह आचरण करे। ऊर्ध्व (स्वर्गादि) लोकों में जाने की इच्छा भी न करे। औषधि की भाँति अन्न
ग्रहण करे तथा त्रिकाल संध्या-स्नान करे। संध्या काल में समाधिस्थ होकर परब्रह्म परमात्मा का अनुसंधान
करे, सभी वेदों में आरण्यकों की आवृत्ति करे अर्थात् पढ़े और मनन करे तथा उपनिषदों का बार-बार
अध्ययन करें ॥ २ ॥
खल्वहं ब्रह्मसूत्रं सूचनात्सूत्रं ब्रह्मसूत्रमहमेव विद्वांस्त्रिवृत्सूत्रं त्यजेद्विद्वान्य एवं वेद संन्यस्तं
मया संन्यस्तं मया संन्यस्तं मयेति त्रिरुक्त्वाऽभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। सखा मा
गोपायौजः सखायोऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारयेति। अनेन मन्त्रेण
कृतं वैणवं दण्डं कौपीनं परिग्रहेदौषधवदशनमाचरेदौषधवदशनं प्राश्नीयाद्यथालाभमश्नीयात्।
ब्रह्मचर्यमहिंसां चापरिग्रहं च सत्यं च यत्नेन हे रक्षतो ३ हे रक्षतो ३ हे रक्षत इति ॥ ३ ॥
निश्चय ही ब्रह्म का बोध कराने वाला सूत्र ब्रह्मसूत्र मैं स्वयं ही हूँ, ऐसा जानकर त्रिवृत्सूत्र (उपवीत) का
भी परित्याग कर दे। ऐसा जानने वाला विद्वान् ‘मया संन्यस्तम्' अर्थात् मैंने संन्यास ले लिया, मैंने सर्वस्व का
त्याग कर दिया, सब कुछ छोड़ दिया, ऐसा तीन बार कहे। इसके पश्चात् 'अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते'
(अर्थात् सभी हिंस्र और अहिंस्र प्राणियों को अभय प्राप्त हो, सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही विद्यमान है।) इत्यादि
मन्त्र से-हे दण्ड ! आप मेरे मित्र हैं, आप मेरे ओज की रक्षा करें। आप मेरे मित्र तथा आप ही वृत्रासुर का
विनाश करने वाले देवराज इन्द्र के वज्र हैं। हे वज्र ! आप हमें सुख प्राप्त करायें तथा हमें संन्यास धर्म से पथभ्रष्ट
करने वाला जो भी पाप हो, उसका निवारण करें; यह कहते हुए अभिमंत्रित बाँस का दण्ड और कौपीन
(लँगोटी) धारण करे। औषधि की तरह से भोजन ग्रहण करे, जो कुछ भी मिल जाए, उसे अल्पमात्रा में
औषधि समझ कर खाए। हे आरुणि ! संन्यास धर्म को ग्रहण करने के उपरान्त ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह
और सत्य का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। हे वत्स ! उन (संन्यास के सभी अनुशासनों) की प्रयत्नपूर्वक
रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ३॥
अथातः परमहंसपरिव्राजकानामासनशयनादिकं भूमौ ब्रह्मचारिणां मृत्पात्रं वाऽलाबुपात्रं
दारुपात्रं वा। कामक्रोधहर्षरोषलोभमोहदम्भदर्पेच्छासूयाममत्वाहंकारादीनपि परित्यजेत्।
वर्षासु ध्रुवशीलोऽष्टौ मासानेकाकी यतिश्चरेद् द्वावे वा चरेद् द्वावे वा चरेदिति ॥ ४ ॥