सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

मन्त्र ३१ ३५
अब मेरा कर्तृत्व-भाव बिल्कुल नष्ट हो गया है तथा मुझे कुछ भी करना शेष नहीं है। ब्राह्मण कुल- गोत्र,
नाम की सुन्दरता एवं जाति का अस्तित्व तो मात्र स्थूल शरीर में ही होता है, मैं तो स्थूल पदार्थों से बिल्कुल
पृथक् हूँ। क्षुधा (भूख), पिपासा (प्यास), अन्धापन, बहरापन, काम-क्रोध आदि सभी तरह के धर्म-लिङ्ग
(चिह्न) आदि शरीर में स्थित रहते हैं, मैं तो इस लिंग शरीर से रहित हूँ। मुझमें इनमें से कोई भी विकार नहीं
है। जड़ता, प्रियता और आनन्द मनाना आदि कारण शरीर के धर्म हैं॥ २२-२४॥
न सन्ति मम नित्यस्य निर्विकारस्वरूपिणः। उलूकस्य यथा भानुरन्धकारः प्रतीयते ॥ २५ ॥
स्वप्रकाशे परानन्दे तमो मूढस्य जायते। चतुर्दृष्टिनिरोधेऽभ्रैः सूर्यो नास्तीति मन्यते ॥ २६ ॥
तथाऽज्ञानावृतो देही ब्रह्म नास्तीति मन्यते। यथामृतं विषाद्भिन्नं विषदोषैर्न लिप्यते ॥ २७ ॥
मैं तो नित्य और निर्विकार स्वरूप से युक्त हूँ, अतः ये (उपर्युक्त) सभी मेरे धर्म नहीं हैं। जैसे उलूक
(उल्लू) को सूर्य अन्धकार युक्त दिखाई देता है, वैसे ही मूढ़ (अज्ञानी) मनुष्य को स्वयं प्रकाश स्वरूप
परमानन्द में अज्ञान दृष्टिगोचर होता है। जैसे बादलों के कारण चारों ओर से दृष्टि के रुक जाने से लोग समझने
लगते हैं कि सूर्य नहीं है, वैसे ही मूढ़ता से आवृत प्राणी यह मान लेता है कि ब्रह्म है ही नहीं। जिस प्रकार से
अमृत विष से अलग है, इस कारण विष के दोषों से वह दूषित नहीं होता, उसी प्रकार मैं (आत्मा) जड़ से भिन्न
हूँ। अतः जड़ के दोषों का मुझमें स्पर्श नहीं होता ॥ २५-२७ ॥
न स्पृशामि जडाद्भिन्नो जडदोषान् प्रकाशतः। स्वल्पापि दीपकणिका बहुलं नाशयेत्तमः ॥२८॥
स्वल्पोऽपि बोधो निबिडं बहुलं नाशयेत्तथा। कालत्रये यथा सर्पो रज्जौ नास्ति तथा मयि ॥ २९
अहंकारादिदेहान्तं जगन्नास्त्यहमद्वयः। चिद्रूपत्वान्न मे जाड्यं सत्यत्वान्नानृतं मम ॥ ३० ॥
जैसे दीपकणिका अर्थात् दीपक की छोटी सी ज्योति भी बहुत बड़े अन्धकार को विनष्ट कर देती है,
वैसे ही थोड़े से ज्ञान का प्रकाश भी घने अन्धकार रूपी अज्ञान को विनष्ट कर देता है। जैसे रस्सी में तीनों कालों
में कभी भी सर्प नहीं है, वैसे ही अहंकार से लेकर शरीर तक का संसार मेरे अन्दर तीनों काल में नहीं है, मैं
तो केवल अद्वैत रूप में ही हूँ। मैं चैतन्य स्वरूप हूँ, इसलिए मुझ में जड़ता नहीं है। मैं सत्य स्वरूप हूँ, इस
कारण मुझ में झूठ नहीं है। मैं आनन्द स्वरूप हूँ ॥ २८-३० ॥
आनन्दत्वान्न मे दुःखमज्ञानाद्भाति सत्यवत्। आत्मप्रबोधोपनिषन्मुहूर्तमुपासित्वा न स पुनरावर्तते।
न स पुनरावर्तत इत्युपनिषत् ॥ ३१ ॥
आनन्द स्वरूप होने के कारण मुझ में दुःख नहीं हैं। ये सभी (जगत्प्रपंच) तो केवल अज्ञान से ही
प्रतिभासित होते हैं। इस आत्मप्रबोध उपनिषद् का जो व्यक्ति कुछ क्षण भी उपासना (साक्षात्कार प्राप्त) कर
लेता है, वह पुनः इस संसार में नहीं आता है, ऐसी यह उपनिषद् (रहस्य विद्या) है॥ ३१ ॥
ॐ वाङ्मे मनसि..................... इति शान्तिः ॥
॥ इत्यात्मबोधोपनिषत्समाप्ता ॥