१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ पञ्चब्रह्मापनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय परम्परा की है। इसमें कुल ४१ मन्त्र हैं। इसका शुभारम्भ शाकल द्वारा
पैप्पलाद से पूछे गये प्रश्न-सर्वप्रथम सृष्टि के प्रारम्भ में क्या उत्पन्न हुआ ?-से हुआ है। पहले तो पैप्पलाद ने
क्रमशः सद्योजात, अघोर, वामदेव, तत्पुरुष तथा ईशान के उत्पन्न होने की बात कही, बाद में क्रमशः उनका
स्वरूप वर्णित किया। इन्हीं पाँचों को 'पंचब्रह्म' की संज्ञा प्रदान की गई है तथा कहा गया है कि इस
पंचब्रह्मात्मक स्वरूप को अपनी आत्मा में अवस्थित मानकर 'पंचब्रह्म मैं ही हूँ'- इस प्रकार का आनुभविकज्ञान
प्राप्त कर लेने वाला साधक ब्रह्मामृत का रसास्वादन करता हुआ मुक्ति प्राप्त कर लेता है। अन्त में इस
पंचब्रह्मात्मक विद्या की महती महिमा का गुणगान करते हुए हृदयकमल में विद्यमान सदाशिव तत्त्व के
अनुसन्धान करने का निर्देश देकर उपनिषद् को पूर्ण किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु...............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद् )
अथ पैप्पलादो भगवाम्भो किमादौ किं जातमिति । सद्यो जातमिति किं भगव इति ।
अघोर इति । किं भगव इति । वामदेव इति । किं वा पुनरिमे भगव इति । तत्पुरुष इति । किं वा
पुनरिमे भगव इति । सर्वेषां दिव्यानां प्रेरयिता ईशान इति । ईशानो भूतभव्यस्य सर्वेषां
देवयोनिनाम् ॥ १॥
एक बार शाकल के द्वारा पूछने पर कि सर्वप्रथम क्या उत्पन्न हुआ ? पैप्पलाद ने उत्तर देते हुए कहा-
सर्वप्रथम 'सद्योजात' नामक ब्रह्म का आविर्भाव हुआ। शाकल ने पूछा-इसके अतिरिक्त क्या और भी कोई
अन्य भेद है? पैप्पलाद जी ने कहा- 'हाँ, 'अघोर' है। शाकल ने फिर प्रश्न किया कि क्या और भी अन्य भेद
है? पैप्पलाद ने उत्तर दिया- 'वामदेव । शाकल ने पुनः पूछा-'क्या यही भेद हैं?' पैप्पलाद जी ने कहा 'नहीं,
'तत्पुरुष' नामक एक और भी भेद है। शाकल ने पुनः प्रश्न किया- अच्छा तो क्या यही चार भेद हैं? पैप्पलाद
जी ने कहा नहीं, सभी देवों को प्रेरित करने वाला 'ईशान' नामक एक भेद और है। यह सभी भूत, भविष्यत्
एवं समस्त देवयोनियों का शासक है ॥ १ ॥
कति वर्णाः । कति भेदाः । कति शक्तयः । यत्सर्वं तद्गुह्यम् ॥ २ ॥
इसके कितने वर्ण हैं? कितने भेद (प्रकार) हैं? तथा कितनी शक्तियाँ हैं? ये समस्त बातें बड़ी
गोपनीय हैं (अतः अनधिकारियों से छिपाकर रखनी चाहिए) ॥ २ ॥
तस्मै नमो महादेवाय महारुद्राय ॥ ३ ॥ प्रोवाच तस्मै भगवान्महेशः ॥ ४ ॥
महारुद्र उन महादेव को नमस्कार है। भगवान् महेश ने पैप्पलाद जी को ये सभी उपदेश प्रदान किये ॥
गोप्याद्गोप्यतरं लोके यद्यस्ति शृणु शाकल । सद्योजातं मही पूषा रमा ब्रह्मा त्रिवृत्स्वरः ॥ ५ ॥
ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्त स्वरास्तथा । वर्णं पीतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ ६ ॥
हे शाकल ! इस लोक में अति गोपनीय बातों में भी जो अति गूढ़ है, उसे सुनो। वह है 'सद्योजात'
नामक ब्रह्म। सभी तरह की अभीष्ट सिद्धियों को देने वाली मही, पूषा, रमा, ब्रह्मा, त्रिवृत् (सत्, रज, तम),
अकारादि स्वर, ऋग्वेद, गार्हपत्य (अग्नि), विविध मंत्र (नमः शिवाय आदि) सात स्वर (स, रे, ग, म, प, ध, नि),
पीला वर्ण (रंग) तथा क्रिया नामक शक्ति आदि जिसके अनेक स्वरूप हैं ॥ ५-६ ॥
१७९ पञ्चब्रह्मोपनिषद्
अघोरं सलिलं चन्द्रं गौरी वेदद्वितीयकम्। नीरदाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम्॥ ७॥
पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छाक्रियान्वितम्। शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम्॥ ८॥
सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् ॥ ९॥
जल, चन्द्र, गौरी, यजुर्वेद, नीरदाभ (मेघ की आभा वाले), स्वर (उकार), स्निग्ध, दक्षिणाग्नि आदि ये
सभी अघोर के स्वरूप बतलाये गये हैं। ये तथा इनके अतिरिक्त पचास (अ से लेकर क्ष तक जो) वर्ण हैं,
उनसे युक्त स्थिति, इच्छा तथा क्रिया शक्ति से युक्त (अपनी विकल्पित) शक्ति के रक्षण से युक्त जो अघोर का
स्वरूप है, वह सभी तरह के पापों के समूह का शमन करने वाला, सभी दुष्टों का विनाश करने वाला तथा सभी
तरह के ऐश्वर्य के फल को प्रदान करने वाला है॥ ७-९॥
वामदेवं महाबोधदायकं पावकात्मकम्। विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम्॥ १०॥
प्रसन्नं सामवेदाख्यं गानाष्टकसमन्वितम्। धीरस्वरमधीनं चाहवनीयमनुत्तमम्॥ ११॥
ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम्। वर्णं शुक्लं तमोमिश्रं पूर्णबोधकरं स्वयम्॥ १२॥
धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम्। सर्वसौभाग्यदं नृणां सर्वकर्मफलप्रदम्॥ १३॥
अष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम्॥ १४॥
'वामदेव' महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों
सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं। अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत
शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश),
ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है। वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं
ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को
सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ
अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्त्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों) तथा अष्टदल
(पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं॥ १०-१४॥
यत्तत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम्। पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम्॥१५॥
पञ्चाशतस्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम्। कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम्॥१६
वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम्। सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक्॥१७॥
अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसंज्ञितम्। ब्रह्माविष्णुवादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम्॥ १८॥
जो यह 'तत्पुरुष' हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति
का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है। वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध,
अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर
वाले हैं। उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि-
व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) की अनुपम औषधि हैं। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के
एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं। इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत्, स्वप्न एवं
सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं। वे (ब्रह्म)
ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं॥ १५-१८॥
ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम्। आकाशात्मकमव्यक्तमोंकारस्वरभूषितम्॥ १९॥
सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्वहिः। अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम्॥ २०॥
मन्त्र ३२ १८०
पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत्॥ २१॥ पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः।
स्वमायावैभवान्सर्वान्संहृत्य स्वात्मनि स्थितः॥ २२॥ पञ्चब्रह्मात्म कातीतो भासते स्वस्वते-
जसा। आदावन्ते च मध्ये च भासते नान्यहेतुना ॥ २३॥
'ईशान' को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए। (वे) बुद्धि के साक्षीरूप,
आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं। वे समस्त देवों
के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से
जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), 'अकार' आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरूप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक)
शरीर से युक्त हैं। (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं
सर्वव्यापक विराट् पंच ब्रह्मस्वरूप हैं। वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में
प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले
हैं। वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी
किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं॥ १९-२३॥
मायया मोहिताः शंभोर्महादेवं जगद्गुरुम्। न जानन्ति सुराः सर्वे सर्वकारणकारणम्। न
संदृशे तिष्ठति रूपमस्य परात्परं पुरुषं विश्वधाम ॥ २४॥ येन प्रकाशते विश्वं यत्रैव प्रविलीयते।
तद्ब्रह्म परमं शान्तं तद्ब्रह्मास्मि परं पदम् ॥ २५॥
भगवान् शम्भु की माया से मोहित देवगण, सम्पूर्ण जगत् के गुरु एवं समस्त कारणों के कारण उन
देवाधिदेव महादेव को नहीं जानते। सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश देने वाले उन परात्पर विराट् पुरुष का रूप
सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। जिसके द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता है, जिसमें विलय को प्राप्त हो
जाता है, ऐसा वह परम अविनाशी ब्रह्म शान्त स्वरूप है। वही अद्वितीय परमपद स्वरूप मैं स्वयं हूँ ॥२४-२५
पञ्चब्रह्मैमिदं विद्यात्सद्योजातादिपूर्वकम्। दृश्यते श्रूयते यच्च पञ्चब्रह्मात्मकं स्वयम् ॥ २६ ॥
पञ्चधा वर्तमानं तं ब्रह्मकार्यमिति स्मृतम्। ब्रह्मकार्यमिति ज्ञात्वा ईशानं प्रतिपद्यते ॥ २७॥
पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं स्वात्मनि प्रविलाप्य च। सोऽहमस्मीति जानीयाद्विद्वान्ब्रह्मामृतो भवेत् ॥ २८ ॥
इत्येतद्ब्रह्म जानीयाद्यः स मुक्तो न संशयः ॥ २९ ॥
'सद्योजात' आदि यही पंचब्रह्म हैं, इस चराचर जगत् में जो भी दृष्टिगोचर हो रहा है अथवा सुनाई पड़
रहा है, वह सभी कुछ पंच ब्रह्मात्मक ही है। पाँच रूपों में प्रतिष्ठित वह (सद्योजात) ब्रह्मकार्य कहा गया है।
इस ब्रह्मकार्य को जान करके 'ईशान' को प्राप्त किया जाता है। यदि विद्वान् मनुष्य उन पंच ब्रह्मात्मक को
अपनी आत्मा में विलीन करके (अर्थात् मान कर) 'सोऽहमस्मि' अर्थात् 'मैं वही पंचब्रह्म हूँ, स्वयं उन्हीं का
रूप हूँ।' इस प्रकार समझे, तो (वह) ब्रह्मामृत का रसास्वादन करने वाला हो जाता है। अतः इस प्रकार से जो
ब्रह्म के स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ २६-२९ ॥
पञ्चाक्षरमयं शम्भुं परब्रह्मस्वरूपिणम्। नकारादियकारान्तं ज्ञात्वा पञ्चाक्षरं जपेत् ॥ ३० ॥
सर्वं पञ्चात्मकं विद्यात्पञ्चब्रह्मात्मतत्त्वतः ॥३१॥ पञ्चब्रह्मात्मिकीं विद्यां योऽधीते
भक्तिभावितः। स पञ्चात्मकतामेत्य भासते पञ्चधा स्वयम् ॥३२॥
पंचाक्षरमय उस परब्रह्म स्वरूप भगवान् शम्भु को जान करके प्रारम्भ में 'नकार' और अन्त में 'यकार'
है जिसके, ऐसे पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) को जपना चाहिए। समस्त वस्तुओं को पंचात्मक ब्रह्म के रूप में
जानकर सर्वत्र पंचब्रह्म तत्त्व का ही दर्शन करना चाहिए। जो भी व्यक्ति भक्ति-भावनापूर्वक पंचब्रह्मात्मक
विद्या को पढ़ता है, वह स्वयं ही पंचब्रह्म का साकार रूप होकर पंचब्रह्म की समीपता को प्राप्त कर लेता है ॥
१८१ पञ्चब्रह्मोपनिषद्
एवमुक्त्वा महादेवो गालवस्य महात्मनः। कृपां चकार तत्रैव स्वान्तर्धिमगमत्स्वयम् ॥ ३३॥
इस प्रकार इस ज्ञान को महादेव जी 'गालव' मुनि को कृपापूर्वक बताते हुए वहीं आत्मलीन हो गए॥
यस्य श्रवणमात्रेणाश्रुतमेव श्रुतं भवेत्। अमतं च मतं ज्ञातमविज्ञातं च शाकल ॥ ३४॥
एकेनैव तु पिण्डेन मृत्तिकायाश्च गौतम। विज्ञातं मृण्मयं सर्वं मृदभिन्नं हि कार्यकम् ॥ ३५॥
हे शाकल! जिसके श्रवण मात्र से ही अश्रुत (अनसुना) श्रुत (ज्ञात) हो जाता है। जाना हुआ, न जाना
हुआ सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो जाता है और जिन सिद्धान्तों का ज्ञान न हो, वे सभी स्वयं ही ज्ञात हो जाते हैं।
हे गौतम! जिस प्रकार से मिट्टी के एक ही पिण्ड से अभिन्न समस्त वस्तुओं का पूर्ण ज्ञान हो जाता है; क्योंकि
कार्य-कारण से अभिन्न होता है, वैसे ही पंचब्रह्म के ज्ञान द्वारा समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है ॥३४-३५॥
एकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं यथा। विज्ञातं स्यादथैकेन नखानां कृन्तनेन च ॥ ३६॥
सर्वं कार्ष्णायसं ज्ञातं तदभिन्नं स्वभावतः। कारणाभिन्नरूपेण कार्यकारणमेव हि ॥ ३७॥
जिस प्रकार एक लोहमणि के द्वारा समस्त लोहतत्त्व ज्ञात हो जाते हैं, उसी प्रकार नाखून को काटने की
छुरी से सभी लोहे के बने अस्त्रों की जानकारी प्राप्त हो जाती है; यह स्वाभाविक है कि उससे अपृथक् जितनी
भी वस्तुएँ होंगी, वे सभी तदनुरूप होंगी; क्योंकि कारण से अभिन्न जो भी कार्य है, वह कारण रूप ही होता है॥
तद्रूपेण सदा सत्यं भेदेनोक्तिर्मृषा खलु। तच्च कारणमेकं हि न भिन्नं नोभयात्मकम् ॥ ३८ ॥
भेदः सर्वत्र मिथ्यैव धर्मादेरनिरूपणात्। अतश्च कारणं नित्यमेकमेवाद्वयं खलु। अत्र कारणमद्वैतं
शुद्धचैतन्यमेव हि ॥ ३९ ॥
यदि किसी भी वस्तु को (कार्य को) तद्रूप अर्थात् कारण के अनुरूप मान लिया जाए, तो वह सदा
सत्य है। जब उसे भिन्न (तद्रूप से भिन्न) कहेंगे, तो वह मिथ्या कथन होगा; क्योंकि सभी कार्यों का कारण तो
एक ही है। वह न तो भिन्न है और न ही उभयात्मक है। यह जो सभी जगहों पर भेद की प्रतीति होती है,
उसका कारण धर्म के निरूपण का अभाव ही है। अतः कारण तो वस्तुतः एक ही है, वह दूसरा (भिन्न) नहीं
है। इसलिए इस चराचर विश्व का कारण शुद्ध चैतन्यरूप अद्वैत ही है॥ ३८-३९॥
अस्मिन्ब्रह्मपुरे वेश्म दहरं यदिदं मुने। पुण्डरीकं तु तन्मध्ये आकाशो दहरोऽस्ति तत्। स
शिवः सच्चिदानन्दः सोऽन्वेष्टव्यो मुमुक्षुभिः ॥ ४० ॥ अयं हृदि स्थितः साक्षी सर्वेषामविशेषतः।
तेनायं हृदयं प्रोक्तः शिवः संसारमोचकः। इत्युपनिषत् ॥ ४१ ॥
हे मुने! इस अविनाशी ब्रह्म के आश्रयस्थल शरीर में जो दहर नामक निवास स्थल (हृदय में) है, जिसे
पुण्डरीक (कमल) भी कहते हैं, उसी में दहराकाश स्थित है। उसी में ही मोक्ष के इच्छुक साधकों को सत्-
चित् एवं आनन्दस्वरूप उस शिव को ढूँढ़ना चाहिए। यह शिव सदैव हृदय कमल में ही प्रतिष्ठित रहता है एवं
निर्विशेष (सामान्य) दृष्टि से सभी का साक्षीभूत है। इस कारण से हृदय को शिवस्वरूप कहकर इस (हृदय)
को ही संसार का मोचक अर्थात् संसार से मुक्त करने वाला कहा गया है॥ ४०-४१॥
ॐ सह नाववतु ................इति शान्तिः ॥
॥ इति पञ्चब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ परब्रह्मोपनिषद् ॥
यह अथर्ववेदीय उपनिषद् है। इसमें कुल २० मन्त्र हैं, जिसमें परब्रह्म की प्राप्ति हेतु संन्यास-धर्म का
विस्तृत विवेचन किया गया है।
उपनिषद् का शुभारंभ महाशाल शौनक के उस प्रश्न से हुआ है, जिसमें उन्होंने महर्षि पिप्पलाद से पूछा
है कि संसार में उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थ इसके पूर्व कहाँ स्थित रहते हैं? भगवान् हिरण्यगर्भ ने उन
पदार्थों को किस प्रकार सृजित किया और वस्तुतः वे कौन हैं? महर्षि पिप्पलाद ने इसी प्रश्न का विशद
विवेचन किया है तथा उस परम सत्ता को; जो सृष्टि का आदिकारण है, जानने के लिए अष्टकपाल-अष्टांगयोग
का आश्रय लेना बताया है। आगे चलकर संन्यास-धर्म का अतीव प्रभावोत्पादक वर्णन किया गया है, जिसमें
संन्यासी को बाह्य यज्ञोपवीत और शिखा के स्थान पर आन्तरिक यज्ञोपवीत एवं शिखा की अनिवार्यता बताई
गई है। साथ ही यह कहा गया है कि जिसने अग्निमय-ज्ञानमय शिखा और यज्ञोपवीत धारण किया है, वही
सच्चा साधक और मुक्ति का अधिकारी बनता है। अन्त में बाहरी प्रपञ्चमय शिखा और यज्ञोपवीत का
परित्याग करके प्रणव हंस ( ॐ कार ब्रह्म) रूपी शिखा और यज्ञोपवीत का आश्रय लेकर मोक्ष का अधिकारी
बनने का निर्देश दिया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः ...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद )
अथ हैन महाशालः शौनकोऽङ्गिरसं भगवन्तं पिप्पलादं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ दिव्ये
ब्रह्मपुरे संप्रतिष्ठिता भवन्ति खलु । कथं सृज्यन्ते । नित्यात्मन एष महिमा। विभज्य एष महिमा
विभुः । क एषः । तस्मै स होवाच। एतत्सत्यं यत्प्रब्रवीमि ब्रह्मविद्यां वरिष्ठां देवेभ्यः प्राणेभ्यः ।
परब्रह्मपुरे विरजं निष्कलं शुभ्रमक्षरं विरजं विभाति । स नियच्छति मधुकरराश्या निर्मकः।
अकर्मस्वपुरस्थितः । कर्मतरः कर्षकवत्फलमनुभवति । कर्ममर्मज्ञाता कर्म करोति । कर्ममर्म
ज्ञात्वा कर्म कुर्यात्। को जालं विक्षिपेदेको नैनमपकर्षत्यपकर्षति ॥ १ ॥
एक बार बुद्धिमान् शौनक ने विधिवत् समीप बैठकर अङ्गिरस गोत्रीय भगवान् पिप्पलाद से पूछा-क्या
संसार में उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थ पहले दिव्य ब्रह्मपुर अर्थात् भगवान् हिरण्यगर्भ के हृदयाकाश में
प्रतिष्ठित होते हैं? ये व्यापक महिमाशाली भगवान् अपने अन्दर से उन पदार्थों को यथा विभाग किस तरह
सृजित करते हैं? इन विभु की महिमा क्या है ? अर्थात् ये वस्तुतः कौन हैं? महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा-
जो श्रेष्ठ ब्रह्म विद्या मैं तुमसे कहूँगा, वह सत्य है। यह सत्, देवों (इन्द्रियों) तथा प्राण-अपान आदि दस प्राणों
को अपने-अपने विषय ग्रहण करने की शक्ति प्रदान करता है। यह परब्रह्मपुर में विरज (रज आदि गुणत्रय के
अभाव वाला) और निष्कल (प्राण आदि नामवाली षोडश कलाओं से रहित) है। इसी कारण शुभ्र (स्वच्छ)
और अक्षर (अविनाशी) है, जो गुणातीत होकर सुशोभित होता है, वह जीव समूह के बन्धन और मोक्ष का
निर्माण कर्त्ता होने से 'निर्मक' कहलाता है। इसी प्रकार जो निर्माता है, वह परमात्मा मुमुक्षुओं की अविद्या का
समापन कर देता है, जिससे वे शुद्ध चैतन्य उस परमात्मा का अनुभव (दर्शन) कर पाते हैं। वह परब्रह्म अपने
१८३ परब्रह्मोपनिषद्
ही स्थान में रहकर अकर्म (कर्महीन) स्वरूप में अवस्थित रहता है, क्योंकि वह कृत-कृत्य होता है, अर्थात्
उसके लिए कुछ भी करना शेष नहीं रहता। वह पराग् दृष्टि (विपरीत दृष्टि) वाला व्यक्ति तो इह लोक और
परलोक के फल प्राप्त करने की दृष्टि से विविध कर्म करता है और कृषक की भाँति अपने द्वारा किये हुए
कर्मों का फल प्राप्त करता है। जो ज्ञानी कर्म के मर्म को (कर्म को जन्म आदि का कारण) जानकर कर्म करता
है, वह तो चित्त की शुद्धि के लिए परमेश्वर की आराधना रूप कर्म करता है। जो मुनि अपने अतिरिक्त (अपने
को ब्रह्म मानकर) अन्य भ्रम से मुक्ति चाहता है, वह कर्म के मर्म को जानकर (कर्मानुसार ही उच्च-नीच
योनियाँ मिलती हैं, यह जानकर) अपने आश्रम के अनुरूप निष्काम कर्म करता है। एक मात्र ब्रह्म में चित्त को
लगाने वाला कौन ऐसा विवेकी है, जो विविध प्रकार के कर्म जाल में फँसकर अपना अपकर्ष करता है?
अर्थात् कोई नहीं (इसका आशय है कि निष्काम कर्म करने वाले को उसके कर्म सांसारिक विषयों में नहीं
खींच सकते) ॥१ ॥
प्राणदेवताश्चत्वारः। ताः सर्वा नाड्यः सुषुप्तश्येनाकाशवत्। यथा श्येनः खमाश्रित्य
याति स्वमालयं कुलायम्। एवं सुषुप्तं ब्रूत। अयं च परं च स सर्वत्र हिरण्मये परे कोशे।
अमृता ह्येषा नाडीत्रयं संचरति। तस्य त्रिपादं ब्रह्म। एषात्रेष्य ततोऽनुतिष्ठति। अन्यत्र ब्रूत। अयं
च परं च सर्वत्र हिरण्मये परे कोशे। यथैष देवदत्तो यष्ट्या च ताड्यमानो नैवैति। एवमिष्टापूर्तकर्मणा
शुभाशुभैर्न लिप्यते। यथा कुमारको निष्काम आनन्दमभियाति। तथैष देवः स्वप्न आनन्दम-
भिधावति। वेद एव परं ज्योतिः। ज्योतिषा मा ज्योतिरानन्दयत्येवमेव। तत्परं यच्चित्तं परमात्मा-
नमानन्दयति। शुभ्रवर्णमाजायतेश्वरात्। भूयस्तेनैव मार्गेण स्वप्रस्थानं नियच्छति। जलूकाभाव-
वद्व्यर्थाकाममाजायतेश्वरात्। तावतात्मानमानन्दयति। परसंधि यदपरसन्धीति। तत्परं नापरं
त्यजति। तदैवं कपालाष्टकं संधाय य एष स्तन इवावलम्बते सेन्द्रयोनिः स वेदयानिरिति।
अत्र जाग्रति शुभाशुभातिरिक्तः शुभाशुभैरपि कर्मभिर्न लिप्यते। य एष देवोऽन्यदेवस्य संप्रसा-
दोऽन्तर्याम्यसङ्गचिद्रूपः पुरुषः। प्रणवहंसः परं ब्रह्म। न प्राणहंसः। प्रणवो जीवः। आद्या
देवता निवेदयति। य एवं वेद। तत्कथं निवेदयते। जीवस्य ब्रह्मत्वमापादयति ॥ २ ॥
(त्रिपाद् ब्रह्म की प्राप्ति के उपाय बताते हुए ऋषि कहते हैं कि) जीव के प्राणाधार रूप में विश्वादि
तुरीयान्त भेद से प्राण के चार भेद होते हैं। उन्हें प्राप्त करने वाली नाड़ियाँ भी चार प्रकार की होती हैं। ये चार-
रमा, अरमा, इच्छा और पुनर्भवा नामक हैं। इनमें रमा और अरमा नाड़ियों का अवलम्बन लेकर वह (प्राण)
आकाशगामी श्येन (बाज़) की तरह जाग्रत्, स्वप्न आदि के व्यवहार से थकित होकर सुषुप्तावस्था में चला
जाता है, अर्थात् जिस प्रकार श्येन आकाश में उड़ते-उड़ते थककर अपने घोंसले में विश्राम हेतु चला जाता है,
उसी प्रकार जीव भी जाग्रत् स्वप्नादि प्रपञ्चों से थककर दोनों नाड़ियों का आश्रय लेकर सुषुप्ति में विश्रान्ति प्राप्त
करता है। वह (जीव) कभी-कभी सुषुप्तावस्था में अन्यत्र भी भ्रमण करता है, इस संदर्भ में बताते हैं-यह
वस्तुतः अमृत रूप देवता सर्वत्र व्यापक हिरण्मयमय परकोश अर्थात् हृदयाकाश में रमा आदि नाड़ीत्रय का
आश्रय लेकर संचरण करता है। उसके बाद उसका त्रिपाद् रूप ब्रह्म ही शेष रह जाता है। यह जीव
(प्राणवत्ता) रूप देवता अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर तत्स्वरूप में स्थित रहकर मुक्त हो जाता है। इस
प्रकार जीव इस जाग्रदवस्था के अतिरिक्त भी अन्य अवस्थाओं में अपनी स्वतन्त्र सत्ता समझकर परिभ्रमण
करता रहता है। सर्वत्र सदैव हिरण्मय परकोश में विचरण करता हुआ भी स्वाज्ञानावरणाच्छन्न होकर जाग्रत्
मन्त्र २ १८४
आदि अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) के गर्त में गिरता है अर्थात् बन्धनयुक्त होता है। जिस प्रकार कोई
देवदत्त नामक व्यक्ति शयन की स्थिति में हो, उसे कोई बेंत से ताड़ित करे, तो जागने के बाद वह पुनः नहीं
सोता; उसी प्रकार यह जीव भी श्रुतिरूप (वेद शास्त्रादि) आचार्य द्वारा जाग्रत् हो जाने पर पुनः अवस्थात्रय रूप
गर्त में नहीं पड़ता और न ही इष्टापूर्त आदि शुभाशुभ कर्मों में लिप्त होता है। इसी प्रकार जैसे बालक किसी
वस्तु में विशेष आसक्ति न होने के कारण जो भी मिल जाए, उसी को पाकर आनन्दित होता रहता है, उसी
प्रकार यह जीव भी स्वप्न अथवा जाग्रत्-अवस्था में भी निरन्तर आनन्द का अनुभव करता है अथवा आनन्द
की ओर ही दौड़ता है।
अतः जो कोई श्रुतिरूप आचार्य के मुख से यह जान लेता है कि मैं परम ज्योति और आनन्द का स्वरूप
हूँ तथा परम ज्योति सूर्यादि की किरण हूँ, प्रकाश हूँ, अपने आप में आनन्दित रहता हूँ। इस प्रकार जिसका
हृदय (चित्त) उस परब्रह्म में तत्पर (समर्पित) हो जाता है, वह परमात्मा को प्राप्त कर आत्मा को तृप्त
(आनन्दित) करता रहता है अथवा अपने आत्मस्वरूप आनन्दस्वरूप में स्थित रहता है। ईश्वर से शुभ्रवर्ण
(निर्विकल्प भाव) उत्पन्न होता है, जिससे चित्त प्रसन्न होता है। इस प्रकार त्रिपुटि विरल निर्विकल्प समाधि
का अनुभव करके स्वप्न स्थान में विश्राम करता है अर्थात् त्रिपुटि विशिष्ट अखण्डाकार वृत्ति से शीघ्र ही
स्वप्नावस्था को प्राप्त कर 'तत्त्वमसि,' 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव करके आत्मा को विश्राम प्रदान करता है।
जिस प्रकार जलूका (जोंक) एक तिनके से दूसरे तिनके पर जाती है, उसी प्रकार यह विद्वान् भी तुरन्त
जागरणस्थ और तुरन्त स्वप्नस्थ हो जाता है। पुनः जागरण को त्याग कर फिर स्वप्नस्थ हो जाता है। ईश्वर की
कृपा से (अवस्था विभाग से) तीनों अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में सञ्चरण करने की इच्छा करने मात्र
से वैसी स्थिति बन जाती है। इस कारण यह (जीव) सविकल्प और निर्विकल्प समाधि से अपनी आत्मा को
आनन्दित करता है। तत्पश्चात् जीवात्मा और परमात्मा के एकत्व में जो भेद सापेक्षत्व (अविद्या) है, उसका
यह आत्मतत्त्व त्याग कर देता है। इस प्रकार वह अविद्यारहित आत्मतत्त्व (परब्रह्म) अपर (उस ब्रह्म से भिन्न
कुछ न होने से) का त्याग नहीं करता। स्वयमेव विद्यमान रहता है।
यदि केवल श्रवणादि के माध्यम से निर्विशेष ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तो कपालाष्टक का आश्रय
लेना चाहिए। कपालाष्टक के आठ (८) अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और
समाधि। इनके द्वारा अन्तर के कलुष को शुद्ध करके ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इस कपालाष्टक-अष्टांगयोग
के द्वारा स्तन (हृदय स्थान में स्थित केले के पुष्प) की भाँति लटका रहता है, जो योग के समय ऊपर उठता
हुआ विकास को प्राप्त होता है; इसमें ही इन्द्रयोनि (परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग), जिसे वेदयोनि कहते हैं, वह
ईश्वर जाग्रत् रहता है। इस प्रकार जो अपने हृदयकमल में ईश्वर का ध्यान करता है, वह शुभ-अशुभ से परे
होकर शुभाशुभ कर्मों के द्वारा कभी लिप्त नहीं होता। वह देव कैसा है? इस संदर्भ में बताते हैं-वह अन्य देवों
का संप्रसाद (अत्यन्त प्रसन्नता) दाता, अन्तर्यामी, असङ्ग, चैतन्य स्वरूप, पुरुष, प्रणव हंस (ॐकार),
परब्रह्म है, जो प्राण हंस नहीं है। (यहाँ प्राण हंस से अभिप्राय मुख्य प्राण से है, क्योंकि यह परब्रह्म प्रकरण
है, प्राण का नहीं) प्रणव ही जीव है; क्योंकि वह ओंकार के अवयव के आकार से समझा जाने वाला है। वह
जीवरूपी आद्य देवता कहा जाता है। जो इस यथार्थता को इस प्रकार जानता है, वह जीव-ब्रह्म के भेद को
कैसे निरूपित (निवेदित) कर सकता है। वह तो जीव और ब्रह्म का एकत्व ही प्रतिपादित करता है, उनका
भेद कभी स्मरण नहीं करता ॥ २ ॥
[यहाँ ऋषि ने योग के अष्टांगों को कपालाष्टक कहा है। अपनी भाव दृष्टि से ऋषि उसे एक कमल पुष्प की तरह
१८५ परब्रह्मोपनिषद्
अनुभव करते हैं। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से लटका हुआ बंद कमल ऊर्ध्वमुख होकर खिल जाता है, उसी प्रकार
सुप्तावस्था में स्थित योग वृत्तियाँ ब्राह्मी चेतना के संयोग से जाग्रत् और ऊर्ध्वमुखी हो उठती हैं।]
सत्त्वमथास्य पुरुषान्तःशिखोपवीतत्वम्। ब्राह्मणस्य मुमुक्षोरन्तःशिखोपवीतधारणम्।
बहिर्लक्ष्यमाणशिखायज्ञोपवीतधारणं कर्मिणो गृहस्थस्य। अन्तरुपवीतलक्षणं तु बहिस्तन्तु-
वदव्यक्तमन्तस्तत्त्वमेलनम्॥ ३॥
ब्रह्म रूप इस पुरुष का सत्त्व आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत है। मुमुक्षु ब्राह्मण को यह आन्तरिक
शिखा और यज्ञोपवीत ही धारण करना चाहिए। बाहर दिखाई देने वाले शिखा और यज्ञोपवीत को धारण करना
गृहस्थ का कर्त्तव्य है। आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत बाह्य सूत्रवत् शिखा और यज्ञोपवीत के समान व्यक्त
नहीं है। वे तो अव्यक्त हैं और ब्रह्मत्व से मेल कराने वाले हैं॥ ३॥
न सन्नासन्न सदसद्भिन्न्राभिन्नं न चोभयम्। न सभागं न निर्भागं न चाप्युभयरूपकम्।
ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं हेयं मिथ्यात्वकारणादिति ॥ ४॥
अविद्या का स्वरूप न सत् है, न असत्; न भिन्न है, न अभिन्न और न दोनों का उभय स्वरूप है। वह
न सभाग है, न निर्भाग और न इनका उभय रूप ही है। अतः जब तक अनिर्वचनीय ब्रह्म का आत्मैकत्व
(प्रत्येक आत्मा ब्रह्म है, यह ज्ञान) उदित नहीं होता, तभी तक अविद्या की स्थिति है। ब्रह्म स्वरूप का
वास्तविक ज्ञान हो जाने पर, यह सभी हेय है, त्याग देने योग्य है, क्योंकि यह सब मिथ्या है॥ ४॥
पञ्चपादब्रह्मणो न किंचन। चतुष्पादन्तर्वर्तिनोऽन्तर्जीवब्रह्मणश्चत्वारि स्थानानि।
नाभिहृदयकण्ठमूर्धसु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयावस्थाः। आहवनीयगार्हपत्यदक्षिणसभ्याग्निषु।
जागरिते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः सुषुप्तौ रुद्रस्तुरीयमक्षरं चिन्मयम्। तस्माच्चतुरवस्था। चतुरङ्गुलवे-
ष्टनमिव षण्णवतितत्त्वानि तन्तुवद्विभज्य तदाहितं त्रिगुणीकृत्य द्वात्रिंशत्तत्त्वनिष्कर्षमापाद्य
ज्ञानपूतं त्रिगुणस्वरूपं त्रिमूर्तित्वं पृथग्विज्ञाय नवब्रह्माख्यनवगुणोपेतं ज्ञात्वा नवमानमितं
त्रिःपुनस्त्रि गुणीकृत्य सूर्येन्द्रग्निकलास्वरूपत्वेनैकीकृत्याद्यन्तरेकत्वमपि मध्ये त्रिरावृत्य ब्रह्म
विष्णुमहेश्वरत्वमनुसंधायाद्यान्तमेकीकृत्य चिद्ग्रन्थावद्वैतग्रन्थिं कृत्वा नाभ्यादिब्रह्म बिलप्रमाणं
पृथक् पृथक् सप्तविंशतितत्त्वसंबन्धं त्रिगुणोपेतं त्रिमूर्तिलक्षणलक्षित मप्येकत्वमापाद्य
वामांसादिदक्षिणाकट्यन्तं विभाव्याद्यान्तग्रहसंमेलनमेवं ज्ञात्वा मूलमेकं सत्यं मृण्मयं विज्ञातं
स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। हंसेति वर्णद्वयेनान्तःशिखोपवीतित्वं
निश्चित्य ब्राह्मणत्वं ब्रह्मध्यानाईत्वं यतित्वमलक्षितान्तः शिखोपवीतित्वमेवं बहिर्लक्षितकर्म-
शिखाज्ञानोपवीतं गृहस्थस्याभासब्राह्मणत्वस्य केशसमूहशिखाप्रत्यक्षकार्पासतन्तुकृ-
तोपवीतत्वम्। चतुः चतुर्गुणीकृत्य चतुर्विंशतितत्त्वापादनतन्तुकृत्वं नवतत्त्वमेकमेव परंब्रह्म
तत्प्रतिसरयोग्यत्वाद्वहुमार्गप्रवृत्तिं कल्पयन्ति। सर्वेषां ब्रह्मादीनां देवर्षीणां मनुष्याणां मुक्तिरेका।
ब्रह्मैकमेव। ब्राह्मणत्वमेकमेव। वर्णाश्रमाचारविशेषाः पृथक्पृथक् शिखा वर्णाश्रमिणामे -
ककैव। अपवर्गस्य यतेः शिखायज्ञोपवीतमूलं प्रणवमेकमेव वदन्ति। हंसः शिखा। प्रणव
उपवीतम्। नादः संधानम्। एष धर्मो नेतरो धर्मः। तत्कथमिति। प्रणवहंसो नादस्त्रिवृत्सूत्रं
स्वहृदि चैतन्ये तिष्ठति त्रिविधं ब्रह्म। तद्विद्धि प्रापञ्चिकशिखोपवीतं त्यजेत्॥५॥
मन्त्र ५ १८६
पंचपाद (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत) ब्रह्म अपने से पृथक् अविद्यारूप है या नहीं,
यह भ्रान्ति कुछ नहीं है अर्थात् वह सर्वमय है। व्यष्टि और समष्टि रूप चतुष्पाद के अन्तर्गत विद्यमान जीवरूप
ब्रह्म के चार स्थान हैं-नाभि, हृदय, कण्ठ और मूर्धा (सिर)। ब्रह्म चार अवस्थाओं में प्राप्त होता है-जाग्रत्,
स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य (तुरीय)। आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिण और सभ्य अग्नियों में यथाशक्य आत्मभाव
करना चाहिए। जाग्रत्-अवस्था में ब्रह्मा, स्वप्नावस्था में विष्णु, सुषुप्तावस्था में रुद्र तथा तुरीयावस्था में अक्षर
चिद्रूप ब्रह्म ध्यातव्य है।
अब ब्रह्म को यज्ञोपवीत स्वरूप विवेचित किया जाता है, क्योंकि संन्यासी इसी ब्रह्मरूप यज्ञोपवीत को
धारण करता है-चार अवस्थाएँ (जो ऊपर कही गई हैं) ही चार अँगुलियों का वेष्टन है (चार अँगुलियों में
लपेट कर ही यज्ञोपवीत का निर्माण किया जाता है) जो छः बार किया जाता है। इसमें ९६ तत्त्व लपेटे जाते हैं।
इसके तीन विभाग करके ३ गुने (३२×३=९६) रूप द्वारा बत्तीस तत्त्वों के निष्कर्ष का सम्पादन करके ज्ञानपूत,
त्रिगुण (सत्, रज, तम) रूप (तीन गुण अर्थात् यज्ञोपवीत की तीन लड़ें) और त्रिमूर्ति रूप को पृथक् जानकर,
नौ ब्रह्म अर्थात् नौ गुणों (नौ धागों) को जानकर नौ के मान से (परिमाण से) तीन को पुनः तीन गुना करके
सूर्य, इन्दु(चन्द्रमा) और अग्नि की कला के स्वरूप से एकीकृत करके फिर आदि, मध्य और अन्त की तीन
आवृत्तियाँ करके, ब्रह्मा, विष्णु, और महेश (रुद्र) का अनुसन्धान करके, उन आवृत्तियों को आदि से अन्त
तक एक करके चिद्ग्रन्थि में अद्वैत ग्रन्थि बनाकर नाभि से लेकर ब्रह्म बिल (ब्रह्मरन्ध्र) तक के परिमाण में
पृथक्-पृथक् सत्ताईस (२७) तत्त्वों से सम्बन्धित त्रिगुणयुक्त (तीन लड़ों से युक्त), त्रिमूर्तिरूप (तीन अलग-
अलग रूपों में) दीखने पर भी उसमें एकत्व सम्पादन करके बाँयें कन्धे से लेकर दाहिने भाग की कमर तक
इसकी भावना करके (इसे धारण करके) ही चित्त शुद्ध हो सकता है। इस यज्ञोपवीत के विषय में ऐसा
जानना चाहिए कि इसमें प्रारम्भ से अन्त तक विभिन्न तत्त्वों के सम्मेलन में मूल तत्त्व एक ही है- जैसे- मिट्टी
से बने हुए कुम्भ आदि विभिन्न पात्र होते हैं, पर उनमें सत्य केवल मिट्टी ही है। इसी प्रकार ब्रह्म निर्मित सभी
कुछ ब्रह्म ही है, उससे पृथक् अन्य कोई सत्ता नहीं है। अस्तु सोऽहं (हंस) वही ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा भाव सतत
करना ही अन्तर्वर्ती शिखा और यज्ञोपवीतत्व है, ऐसा निश्चय करके ब्राह्मणत्व (ब्रह्म ध्यान की अर्हता-
योग्यता) और यतित्व की प्राप्ति होती है। इनके (ब्राह्मणत्व और यतित्व प्राप्त व्यक्तियों की) शिखा और
यज्ञोपवीत अलक्षित अर्थात् अन्तर्वर्ती होते हैं। बाहर दीखने वाले कर्म रूप शिखा और ज्ञानरूप उपवीत गृहस्थों
के होते हैं। बाहर से दीखने वाले केश समूह शिखा और प्रत्यक्ष कपास के धागों से निर्मित उपवीत तो
ब्राह्मणत्व अथवा वैदिक धर्मानुष्ठान योग्यता के आभासक हैं। यज्ञोपवीत के सूत्र चौबीस (२४) तत्त्वों का
चौगुना (अर्थात् २४×४=९६) अर्थात् छियानवे तत्त्व रूपी ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, यज्ञोपवीत के नौ
तत्त्व (धागे) भी ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, यज्ञोपवीत के नौ तत्त्व (धागे) भी ब्रह्म के ही प्रतिपादक हैं।
ब्रह्म एक ही है, किन्तु बहुत से लोग अपनी-अपनी बुद्धि से उसकी प्राप्ति के विविध उपायों (सांख्ययोगादि)
की कल्पना करते हैं। सभी ब्राह्मणों, देवर्षियों और मनुष्यों के लिए मुक्ति, ब्रह्म और ब्राह्मणत्व एक समान हैं।
वर्णाश्रम और आचार पृथक्-पृथक् हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था वालों के लिए शिखा का स्वरूप एक ही है। मोक्ष के
अधिकारी यति की शिखा और यज्ञोपवीत का मूल प्रणव (ॐकार) ही है, ऐसा कहते हैं। इनके (यतियों के)
लिए हंस (ब्रह्मज्ञान) ही शिखा और तुरीय ॐकार (प्रणव) ही उपवीत है तथा नाद ही इन दोनों को जोड़ने
वाला अर्थात् सन्धान है।
यही इनका धर्म है, अन्य कोई नहीं। इनका यह धर्म किस प्रकार है? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं-
१८७ परब्रह्मोपनिषद्
प्रणव (ॐकार) ही हंस (ब्रह्म) और नाद ही यह त्रिवृत् (तीन लड़ी) वाला सूत्र है। यह अपनी ही महिमा से
अपने में स्थित है। वह चैतन्य रूप से हृदय में विराजता है। पर और अपर के भेद से इस ब्रह्म को दो प्रकार से
समझना चाहिए। यदि कोई अपने से पृथक् अन्य कुछ नहीं देखता, सब आत्मरूप में ही देखता है, ऐसे मुमुक्षु
को प्रपञ्चयुक्त शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ५॥
सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परंब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ६ ॥
बुद्धिमानों (अर्थात् उपर्युक्त स्थिति वालों) को शिखा सहित केश कर्तन करके बाह्य उपवीत (यज्ञोपवीत)
का विसर्जन कर देना चाहिए और अक्षर ब्रह्म को ही सूत्र स्वरूप धारण करना चाहिए ॥ ६ ॥
पुनर्जन्मनिवृत्त्यर्थं मोक्षस्याहर्निशं स्मरेत् । सूचनात्सूत्रमित्युक्तं सूत्रं नाम परं पदम् ॥ ७ ॥
पुनर्जन्म से निवृत्ति के लिए सतत मोक्ष का स्मरण करे। सूचना देने वाला होने से ही ब्रह्मरूपी सूत्र को
परमपद रूप 'सूत्र' कहा जाता है ॥ ७ ॥
तत्सूत्रं विदितं येन स मुमुक्षुः स भिक्षुकः । स वेदवित्सदाचारः स विप्रः पंक्तिपावनः ॥ ८ ॥
उस सूत्र (ब्रह्मसूत्र) का जिसे ज्ञान हो गया, वही मुमुक्षु, भिक्षुक, वेदज्ञ, सदाचारी और विप्र है, जो
अनेक प्राणियों को पावन करता है ॥ ८ ॥
येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव। तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगविद्ब्राह्मणो यतिः ॥ ९ ॥
जिस परब्रह्म ने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मणि-मनकों की तरह एक ही सूत्र में पिरोया है, उस सूत्र को
धारण करने वाला योगी, योगविद् ब्राह्मण और यति होता है ॥ ९ ॥
बहिःसूत्रं त्यजेद्विप्रो योगविज्ञानतत्परः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स मुक्तिभाक् ।
नाशुचित्वं न चोच्छिष्टं तस्य सूत्रस्य धारणात् ॥ १० ॥
ब्राह्मण, योगविद् और ज्ञानतत्पर व्यक्ति को चाहिए कि वह बाहरी सूत्र का परित्याग कर दे; क्योंकि जो
ब्रह्मभाव युक्त सूत्र को धारण करता है, वह मुक्ति का अधिकारी होता है। उस (ब्रह्मभावमय) सूत्र को धारण
करने में किसी प्रकार की अपवित्रता, उच्छिष्टता (जूठा होना) नहीं रहती ॥ १० ॥
सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते तु सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥ ११ ॥
संसार में जिन यज्ञोपवीतधारियों के यज्ञोपवीत (सूत्र) के अन्तर्गत ज्ञान समाहित है, वे ही इस जगत् में
सूत्रविद् और सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं ॥ ११ ॥
ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमीरितम् ॥ १२ ॥
जो ज्ञानरूपी शिखा, ज्ञान की निष्ठा और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, उनके लिए ज्ञान ही
सर्वस्व है; क्योंकि ज्ञान को परम पवित्र कहा गया है ॥ १२ ॥
अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा । स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥१३ ॥
जिनकी अग्नि के समान तेजस्वी ज्ञानरूपी शिखा है, अन्य कोई जिनकी शिखा नहीं है, वस्तुतः वे ही
शिखी (चोटी वाले) हैं, शेष तो मात्र केशधारी हैं, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥ १३ ॥
कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके लौकिकेऽपि वा । ब्राह्मणाभासमात्रेण जीवन्ते कुक्षिपूरकाः ।
व्रजन्ते निरयं ते तु पुनर्जन्मनि जन्मनि ॥ १४ ॥
जो वैदिक (यज्ञादि) कर्मों अथवा लौकिक (आहार-विहार आदि) कर्मों में निरत हैं, वे तो आभास
मात्र ब्राह्मण हैं; क्योंकि वे केवल उदर-पूर्ति के लिए जीते हैं, ऐसे लोग प्रत्येक जन्म के अन्त में नरक में जाते
हैं (अथवा संसार के इस जन्म-मृत्यु रूपी नरक में विविध कष्ट सहते हैं) ॥ १४ ॥
मंत्र २० १८८
वामांसदक्षकट्यन्तं ब्रह्मसूत्रं तु सव्यतः। अन्तर्बहिरिवात्यर्थं तत्त्वतन्तुसमन्वितम्।
नाभ्यादिब्रह्मरन्ध्रान्तप्रमाणं धारयेत्सुधीः॥ १५ ॥
सुधी (विद्वान्) के लिए उचित है कि वह बाँयें कन्धे से दाहिनी कमर पर्यन्त ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत)
धारण करे। यह तो बाह्य यज्ञोपवीत की बात हुई, इसी प्रकार अन्तर में परमतत्त्व रूप तन्तु (धागे) से निर्मित
ब्रह्मसूत्र नाभि से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त यथा प्रमाण (परिमाण) धारण करे ॥ १५ ॥
तेभिर्धार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तन्तुनिर्मितम्। शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्।
ब्राह्मण्यं सकलं तस्य नेतेरेषां तु किंचन ॥ १६ ॥
इस प्रकार परमतत्त्व रूपी तन्तु से निर्मित विविध क्रियाओं के अङ्ग रूप इस ब्रह्मसूत्र को धारण करना
चाहिए। जिसकी शिखा और यज्ञोपवीत ज्ञानमय होते हैं, उसके लिए सब कुछ ब्रह्ममय है, उसके अतिरिक्त
कुछ नहीं है ॥ १६ ॥
इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्परायणम्। विद्वांन्यज्ञोपवीती संधारयेद्यः स मुक्तिभाक् ॥ १७॥
जो विद्वान् इस परम तत्त्व रूपी और ब्रह्मपरायण यज्ञोपवीत को धारण करता है, वही सच्चा यज्ञोपवीती
और मुक्ति का अधिकारी है ॥ १७ ॥
बहिरन्तश्चोपवीती विप्रः संन्यस्तुमर्हति । एकयज्ञोपवीती तु नैव संन्यस्तुमर्हति ॥ १८ ॥
जो बाहर और अन्दर दोनों प्रकार से यज्ञोपवीत धारण करता है, वही विप्र वस्तुतः संन्यास का
अधिकारी है अर्थात् बाह्य यज्ञोपवीत धारण कर लौकिक-वैदिक कर्मों को विधिवत् सम्पन्न करते हुए
आन्तरिक यज्ञोपवीत द्वारा जिसके अन्दर ब्रह्मतत्त्व जिज्ञासा से वैराग्य वृत्ति उत्पन्न हो गई हो, वही संन्यास का
अधिकारी है। केवल एक (बाह्य) यज्ञोपवीत धारण करने वाला विप्र संन्यास का अधिकारी नहीं है ॥ १८ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मोक्षापेक्षी भवेद्यतिः । बहिःसूत्रं परित्यज्य स्वान्तःसूत्रं तु धारयेत् ॥१९॥
इसलिए यति को चाहिए कि वह सभी प्रयत्नों से मोक्षापेक्षी (मुमुक्षु) बने तथा बाह्यसूत्र का परित्याग
करके अपने अन्दर सूत्र को धारण करे ॥ १९ ॥
बहिःप्रपञ्चशिखोपवीतित्वमनादृत्य प्रणवहंसशिखोपवीतित्वमवलम्ब्य मोक्षसाधनं
कुर्यादित्याह भगवाञ्छौनक इत्युपनिषत् ॥ २० ॥
(अन्त में) भगवान् शौनक ने कहा कि बाहरी प्रपञ्चमय शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग करके
प्रणव हंस (ॐकार ब्रह्म) रूपी शिखा तथा यज्ञोपवीत का अवलम्बन लेकर मोक्ष के लिए प्रयत्न करे। ऐसी
यह रहस्यमयी विद्या है ॥ २० ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः ...........................इतिः शान्तिः ॥
॥ इति परब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ परमहंसपरिव्राजकोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। गद्यात्मक इस उपनिषद् में ५ बड़े अनुच्छेद हैं, जिसमें परमहंस-
परिव्राजक के लक्षण, परिव्रजन के अधिकारी, परिव्रज्या प्राप्ति की विधि आदि का विवेचन किया गया है।
उपनिषद् का शुभारम्भ पितामह ब्रह्मा द्वारा अपने पिता आदिनारायण से परमहंस परिव्राजक विषयक
प्रश्न से हुआ है। नारायण ने उत्तर देते हुए कहा कि पहले व्यक्ति को वर्णाश्रम धर्म की मर्यादाओं का पालन
करना चाहिए। तदुपरान्त क्रमशः संन्यास ग्रहण करना चाहिए। संन्यास ग्रहण की विधि का उल्लेख करते हुए
नारायण ने आगे उसकी जीवनचर्या पर प्रकाश डाला है। पुनः ब्रह्माजी के पूछने पर नारायण ने ब्रह्म-प्रणव का
रहस्य समझाते हुए कहा है कि यह ‘ब्रह्म प्रणव’ षोडशमात्रात्मक होता है। इसे भली प्रकार जानकर इसकी
उपासना करने वाला परमहंस अन्ततः विदेह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस स्थिति की प्राप्ति के बाद शिखा,
यज्ञोपवीत आदि बाह्य उपचारों की आवश्यकता नहीं रहती। उसे अन्य मन्त्र-तन्त्र, उपासना-ध्यान की भी
आवश्यकता नहीं रहती। वह तो ब्रह्म-प्रणव के अनुसन्धानपूर्वक सच्चिदानन्द, अद्वैत, चिद्घन स्वरूप ‘मैं ब्रह्म
हूँ’—ऐसी भावना से अपने जीवन को कृतकृत्य बना लेता है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः ............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद )
अथ पितामहः स्वपितरमादिनारायणमुपसमेत्य प्रणम्य पप्रच्छ । भगवंस्त्वन्मुखा-
द्वर्णाश्रमधर्मक्रमं सर्वं श्रुतं विदितमवगतम् । इदानीं परमहंसपरिव्राजकलक्षणं वेदितुमिच्छामि
कः परिव्रजनाधिकारी, कीदृशं परिव्राजकलक्षणं, कः परमहंसः, परिव्राजकत्वं कथं, तत्सर्वं
मे ब्रूहीति। स होवाच भगवानादिनारायणः ॥ १॥
(एक बार) पितामह (ब्रह्मा) ने अपने पिता आदि नारायण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके पूछा-
हे भगवन् ! आपके श्रीमुख से सुनकर वर्णाश्रम धर्म का क्रम तो मैंने पूरी तरह जान लिया है। अब मैं परमहंस
परिव्राजक के लक्षण जानने की इच्छा रखता हूँ। परिव्रजन का अधिकारी कौन है ? परिव्राजक के क्या लक्षण
हैं ? परमहंस कौन है ? परिव्राजकत्व कैसे प्राप्त होता है? यह सब मुझे बताने की कृपा करें। भगवान् आदि-
नारायण ने कहा- ॥१॥
सद्गुरुसमीपे सकलविद्यापरिश्रमज्ञो भूत्वा विद्वान्सर्वमैहिकामुष्मिकसुखश्रमं ज्ञात्वैषणा-
त्रयवासनात्रयममत्वाहंकारादिकं वमनान्नमिव हेयमधिगम्य मोक्षमार्गैकसाधनो ब्रह्मचर्यं
समाप्य गृही भवेत्। गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा
वनाद्वा। अथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव
विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेदिति बुद्ध्वा सर्वसंसारेषु विरक्तो ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो वा पितरं
मातरं कलत्रपुत्रमाप्तबन्धुवर्गं तदभावे शिष्यं सहवासिनं वाऽनुमोदयित्वा तदङ्गैके प्राजापत्या-
मेवेष्टिं कुर्वन्ति। तदु तथा न कुर्यात्। आग्नेय्यामेव कुर्यात्। अग्निर्हि प्राणः प्राणमेवैतया
१९० परमहंसपरिव्राजकोपनिषद्
करोति। त्रैधातवीयामेव कुर्यात्। एतत्यैव त्रयो धातवो यदुत सत्त्वं रजस्तम इति। अयं ते
योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः। तं जानन्नग्न आरोहाथा नो वर्धया रयिमित्यनेन
मन्त्रेणाग्निमाजिघ्रेत्। एष वा अग्नेर्योनिर्यः प्राणं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहेत्येवमेवैतदाह।
ग्रामाच्छ्रोत्रियागारादग्निमाहृत्य स्वविध्युक्तक्रमेण पूर्ववदग्निमाजिघ्रेत्। यद्यातुरो वाग्निं न विन्दे-
दप्सु जुहुयात्। आपो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नीयात्
साज्यं हविरनामयम्। एष विधिर्वीराध्वने वाऽनाशके वापां प्रवेशे वाऽग्निप्रवेशे वा महाप्रस्थाने
वा। यद्यातुरः स्यान्मनसा वाचा वा संन्यसेदेष पन्थाः॥ २॥
सद्गुरु के समीप परिश्रमपूर्वक समस्त विद्याओं का ज्ञाता होकर वह विद्वान् इहलौकिक और पारलौकिक
सुखों को श्रम स्वरूप (श्रमसाध्य) जानकर एषणात्रय (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा), वासनात्रय (देह,
मन तथा बुद्धिजन्य मिथ्या संस्कार), ममत्व और अहंकारादि को वमन किए (उगले हुए) अन्न के समान हेय
समझ कर मोक्षपथ के एकमात्र साधन ब्रह्मचर्य को पूरा करके (अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम के पश्चात्) गृहस्थ बने।
गृहस्थ धर्म के पालन के बाद 'वनी' (वानप्रस्थी) बने, तब परिव्राजक संन्यासी बने। (यह सामान्य अनुशासन
है) इसके अतिरिक्त विशेष संदर्भों में किसी भी आश्रम-ब्रह्मचर्याश्रम से अथवा गृहस्थाश्रम से या वानप्रस्थाश्रम
से भी प्रव्रज्या में प्रवेश कर सकता है। अतः व्रती हो या अव्रती, स्नातक हो या अस्नातक, अग्निहोत्र करने वाला
हो अथवा न हो, जब भी विरक्ति उत्पन्न हो जाए, तभी संन्यास ग्रहण करके परिव्राजक हो जाना चाहिए। संसार
से सभी प्रकार से विरक्त ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी अपने माता, पिता, पत्नी, पुत्र, सम्बन्धी, बन्धुओं और
उनके अभाव में शिष्यों अथवा साथ में रहने वालों से सम्मति लेकर प्राजापत्य इष्टि (यज्ञ) करते हैं। उन्हें वैसा
नहीं करना चाहिए। आग्नेयी इष्टि ही करनी चाहिए। अग्नि ही प्राण है। इसके (अग्नि) द्वारा ही प्राण क्रिया करता
है-ऐसा भाव करते हुए त्रैधातवी (इष्टि) करे। सत्त्व, रज और तम ये ही त्रिधातु हैं। इसके पश्चात् इस मंत्र से
अग्नि को सूंघे 'हे अग्निदेव! यह प्राण आपका कारण रूप है, यह जानते हुए आप इसमें प्रवेश करें। आप प्राण
से उद्भूत हैं। इसलिए आप हमें प्रकाश और वृद्धि प्रदान करें।' हे अग्निदेव! आप अपने योनि स्थल (प्राण)
में प्रविष्ट हों, अपने उत्पत्ति स्थल में गमन करें। 'स्वाहा' इस प्रकार ऐसा कहा गया है। ग्राम के श्रोत्रिय के घर
से अग्नि लाकर पूर्वोक्त विधि से अग्नि को सूँघे। यदि आतुरतापूर्ण भाव हो और अग्नि उपलब्ध न हो, तो जल
में ही हवन करे। 'आपः' (जल) ही समस्त देवताओं का स्वरूप है 'समस्त देवताओं के निमित्त हवन कर रहा
हूँ' ऐसा भाव करते हुए स्वाहा सहित आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् हवन किए हुए पदार्थ को उठाकर, घृत
सहित हवि को ग्रहण (भक्षण) करे। इस विधि का प्रयोग वीर मार्ग में अथवा अनशन द्वारा शरीर छोड़ने के
क्रम में अथवा जल प्रवेश में अथवा अग्नि प्रवेश में अथवा महाप्रस्थान में किया जाता है। यदि आतुरता हो,
तो मन अथवा वाणी से संन्यास की विधि सम्पन्न कर लेनी चाहिए, यही मार्ग है॥ २॥
स्वस्थक्रमेणैव चेदात्मश्राद्धं विरजाहोमं कृत्वाऽग्निमात्मन्यारोप्य लौकिकवैदिकसामर्थ्यं
स्वचतुर्दशकरणप्रवृत्तिं च पुत्रे समारोप्य तदभावे शिष्ये वा तदभावे स्वात्मन्येव वा ब्रह्मा त्वं
यज्ञस्त्वमित्यभिमन्त्र्य ब्रह्मभावनया ध्यात्वा सावित्रीप्रवेशपूर्वकमप्सु सर्वविद्यार्थस्वरूपां
ब्राह्मण्याधारां वेदमातरं क्रमाद्व्याहृतिषु त्रिषु प्रविलाप्य व्याहृतित्रयमकारोकारमकारेषु
प्रविलाप्य तत्सावधानेनापः प्राश्य प्रणवेन शिखामुत्कृष्य यज्ञोपवीतं छित्त्वा वस्त्रमपि भूमौ
वाऽप्सु वा विसृज्य ॐ भूः स्वाहा ॐ भुवः स्वाहा ॐ सुवः स्वाहेत्यनेन जातरूपधरो भूत्वा
मन्त्र ३-ख १९१
स्वं रूपं ध्यायन्पुनः पृथक् प्रणवव्याहृतिपूर्वकं मनसा वचसापि संन्यस्तं मया संन्यस्तं मया
संन्यस्तं मयेति मन्द्रमध्यमतारध्वनिभिस्त्रिवारं त्रिगुणीकृतप्रैषोच्चारणं कृत्वा प्रणवैकध्या-
नपरायणः सन्नभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहेत्यूर्ध्वबाहुर्भूत्वा ब्रह्माहमस्मीति तत्त्वमस्यादिमहा-
वाक्यार्थस्वरूपानुसंधानं कुर्वन्नुदीचीं दिशं गच्छेत् । जातरूपधरश्चरेत् । एष संन्यासः ॥ ३क
स्वस्थ क्रम से आत्मश्राद्ध एवं विरजा होम (संन्यास ग्रहण के समय किया जाने वाला यज्ञ विशेष)
करके अग्नि को आत्मा में आरोपित करके अपनी लौकिक और वैदिक सामर्थ्य को तथा अपनी चतुर्दशकरण
प्रवृत्ति को पुत्र में आरोपित करे। पुत्र के न होने पर शिष्य में और शिष्य के अभाव में अपनी आत्मा में ही
आरोपित कर दे। इसके पश्चात् 'ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं' मंत्र का उच्चारण करके, भावनापूर्वक ब्रह्म का ध्यान करके
सावित्री में प्रवेश करे। तब अप्तत्त्व (जल) में समस्त विद्याओं के अर्थरूप, ब्राह्मण्य की आधाररूपा वेदमाता
(गायत्री) को व्याहृतित्रय (भूः, भुवः, स्वः) में विलीन करके इन तीनों व्याहृतियों को अकार, उकार और
मकार [अ,उ,म् (ॐ)] में विलीन करे। इसके पश्चात् सावधान होकर जल का पान करे। इसके बाद प्रणव
(ॐ) मंत्र का उच्चारण करते हुए शिखा को त्यागकर, यज्ञोपवीत को काटकर, वस्त्रों को भूमि अथवा जल
में विसर्जित कर, ॐभूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा, इस मन्त्र से जातरूपधर (शिशुवत्
निश्छल) होकर अपने स्वरूप का ध्यान करे। फिर पृथक् प्रणव और व्याहृतिपूर्वक मन और वाणी से भी 'मैंने
संन्यास लिया, मैंने संन्यास लिया, मैंने संन्यास लिया, ऐसा मन्द्र, मध्य और तार सप्तक की ध्वनि में तीन बार
तीन गुना प्रैष मंत्र उच्चारण करके कहे। तत्पश्चात् 'प्रणव' का ध्यान करते हुए समस्त प्राणियों को मैं अभयदान
कर रहा हूँ—ऐसा भुजा उठाकर बोले कि 'मैं ब्रह्म हूँ' (अहं ब्रह्मास्मि), 'तुम वही (ब्रह्म) हो' (तत्त्वमसि)
आदि और इन्हीं महावाक्यों के अर्थ पर चिन्तन करता हुआ अपने वास्तविक स्वरूप के अनुसंधान हेतु निर्लिप्त
होकर उत्तर दिशा में जाकर विचरण करे—यही संन्यास (धर्म) है॥ ३-क॥
तदधिकारी न भवेद्यदि गृहस्थप्रार्थनापूर्वकमभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते सखा
मा गोपायौजःसखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारयेत्यनेन
मन्त्रेण प्रणवपूर्वकं सलक्षणं वैणवं दण्डं कटिसूत्रं कौपीनं कमण्डलुं विवर्णवस्त्रमेकं
परिगृह्य सद्गुरुमुपगम्य नत्वा गुरुमुखात्तत्त्वमसीति महावाक्यं प्रणवपूर्वकमुपलभ्याथ
जीर्णवल्कलाजिनं धृत्वाथ जलावतरणमूर्ध्वगमनमेकभिक्षां परित्यज्य त्रिकालस्नानमाच-
रन्वेदान्तश्रवणपूर्वकं प्रणवानुष्ठानं कुर्वन्ब्रह्ममार्गे सम्यक्संपन्नः स्वाभिमतमात्मनि गोपयित्वा
निर्ममोऽध्यात्मनिष्ठः कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यदम्भदर्पाहंकारासूयागर्वेच्छाद्वेषहर्षा-
मर्षममत्वादींश्च हित्वा ज्ञानवैराग्ययुक्तो वित्तस्त्रीपराङ्मुखः शुद्धमानसः सर्वोपनिषद्धर्मा
लोच्य ब्रह्मचर्यापरिग्रहाहिंसासत्यं यत्नेन रक्षञ्जितेन्द्रियो बहिरन्तः स्नेहवर्जितः शरीरसंधार-
णार्थं चतुर्षु वर्णेष्वभिशस्तपतितवर्जितेषु पशुरद्रोही भैक्षमाणो ब्रह्मभूयाय भवति ॥३-ख॥
यदि इस विधि का अधिकारी न हो-अर्थात् दिगम्बर वृत्ति न अपना सके, तो दूसरी विधि कहते हैं। वह
गृहस्थ प्रार्थना पूर्वक समस्त प्राणियों को अभय प्रदान करे। कहे-हे सखा ! तुम मेरे बल का रक्षण करो। तुम
वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र के वज्र हो, मेरे लिए शान्ति प्रदायक हो, मुझे पापों से मुक्त करो, इस मन्त्र का
प्रणवपूर्वक उच्चारण करके, श्रेष्ठ लक्षण युक्त (दोषमुक्त) बाँस के दण्ड, कटिसूत्र, कौपीन, कमण्डलु और एक
गेरुआ वस्त्र को धारण करके सद्गुरु के निकट जाकर उन्हें प्रणाम करे और उन (गुरुदेव) से प्रणवपूर्वक
'तत्त्वमसि' महावाक्य को प्राप्त करे (श्रवण करे)। इसके उपरान्त जीर्ण वल्कल अथवा मृगचर्म धारण करके
१९२ परमहंसपरिव्राजकोपनिषद्
जल में उतरना, ऊपर चढ़ना तथा एक ही (घर की) भिक्षा का परित्याग करके (अर्थात् कई घरों से थोड़ी-
थोड़ी भिक्षा लेकर), त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न और सायं) स्नान के नियम का आचरण करते हुए वेदान्त दर्शन
का श्रवण और प्रणव (ॐकार) का अनुष्ठान सम्पन्न करे। ब्रह्म मार्ग में विस्तृत (सम्यक्) ज्ञान प्राप्त करके,
अपने मत (भावनाओं) को आत्मा (मन) में छिपाकर रखते हुए अपने को ममतारहित और अध्यात्मनिष्ठ
बनाए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, दम्भ, दर्प, अहंकार, असूया, गर्व, इच्छा, द्वेष, हर्ष, अमर्ष, ममत्व
आदि का परित्याग करके, ज्ञान वैराग्य से युक्त होकर, कञ्चन और कामिनी से पराङ्मुख होकर, शुद्ध मन से
समस्त उपनिषदों की समालोचना करके ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अहिंसा, सत्य आदि की यत्नपूर्वक रक्षा करते हुए
जितेन्द्रिय बने। बाह्याभ्यन्तर से रागरहित होकर शरीर रक्षण के लिए चारों वर्णों में पतितों (अनुशासनों से गिरे
हुओं) को छोड़कर किसी वर्ण के सदाचारी गृहस्थों से भी उसी प्रकार निर्वैर होकर भिक्षा ग्रहण कर ले, जैसे
पशु बिना भेद-भाव के आहार ग्रहण करता है। ऐसा करने वाला सबमें ब्रह्म भाव रखता है॥ ३-ख॥
सर्वेषु कालेषु लाभालाभौ समौ कृत्वा करपात्रमाधूकरेणान्नम्नश्नन्मेदोवृद्धिमकुर्वन्कृशी-
भूत्वा ब्रह्माहमस्मीति भावयन्गुर्र्वर्थं ग्राममुपेत्य ध्रुवशीलोऽष्टौ मास्येकाकी चरेद्द्वावेवा-
चरेत्। यदालंबुद्धिर्भवेत्तदा कुटीचको वा बहूदको वा हंसो वा परमहंसो वा तत्तन्मन्त्रपूर्वकं
कटिसूत्रं कौपीनं दण्डं कमण्डलुं सर्वमप्सु विसृज्याथ जातरूपधरश्चरेत्। ग्राम एकरात्रं
तीर्थे त्रिरात्रं पत्तने पञ्चरात्रं क्षेत्रे सप्तरात्रमनिकेतः स्थिरमतिरनग्निसेवी निर्विकारो नियमानिय-
ममुत्सृज्य प्राणसंधारणार्थमयमेव लाभालाभौ समौ कृत्वा गोवृत्त्या भैक्षमाचरन्नुदकस्थलक-
मण्डलुरबाधकरहस्यस्थलवासो न पुनर्लाभालाभरतः शुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः सर्वत्र भूतल-
शयनः क्षौरकर्मपरित्यक्तो मुक्तचातुर्मास्यव्रतनियमः शुक्लध्यानपरायणोऽर्थस्त्रीपुरपराङ् -
मुखोऽनुन्मत्तोऽप्युन्मत्तवदाचरन्नव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारो दिवानक्तसमत्वेनास्वप्नः स्वरूपानु-
संधानब्रह्मप्रणवध्यानमार्गेणावहितः संन्यासेन देहत्यागं करोति स परमहंसपरिव्राजको भवति ॥
समस्त कालों में लाभ-हानि को समान मानता हुआ हाथ (करपात्र) में ही अल्प भिक्षा ग्रहण करे।
शरीर मोटा न करके कृशकाय होकर, मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा भाव करते हुए आठ महीने तक गुरु के निमित्त अडिग
होकर भिक्षाशील होकर एकाकी विचरण करे। जब सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो जाए, तब कुटीचक अथवा बहूदक
अथवा हंस अथवा परमहंस होकर मंत्रपूर्वक कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड और कमण्डलु आदि सभी को जल में
विसर्जित करके जातरूपधर (शिशुवत् निर्लिप्त) होकर विचरण करे। (विचरण के अन्तराल में) ग्राम में एक
रात्रि, तीर्थ में तीन रात्रि, नगर में पाँच रात्रि और क्षेत्र में सात रात्रि तक निवास करता हुआ वह अनिकेत (घर
रहित), स्थिर बुद्धि, निरग्निसेवी (अग्नि का सेवन न करने वाला), निर्विकार, नियम-अनियम का परित्याग
करने वाला, लाभ और हानि को समान समझने वाला, मात्र प्राण धारण के लिए गोवृत्ति से भिक्षा ग्रहण करने
वाला हो। जलस्थल (जलाशय) को ही वह कमण्डलु माने और अबाध (बाधा रहित एकान्त) स्थान में ही
रहे। लाभ-हानि के विचार में रत न हो, सर्वत्र भूतल पर शयन करे, क्षौर कर्म (हजामत का कार्य) त्याग दे।
चातुर्मास्य आदि व्रतों के नियमों से मुक्त रहे और मात्र शुक्ल (सात्त्विक) ध्यान परायण रहे। धन-सम्पदा, स्त्री
और नगर से पराङ्मुख रहे और ज्ञान-सम्पन्न होने पर भी प्रत्यक्षतः उन्मत्त की तरह रहे। अपने लिङ्ग और
आचार को अव्यक्त रहने दे। दिन और रात्रि को समान भाव से देखने के कारण वह सदैव अस्वप्न अर्थात्
जाग्रत्-अवस्था में ही रहे। अस्तु, जो निज स्वरूप के अनुसंधान और प्रणव के ध्यान में रत रहकर संन्यास पथ
के द्वारा देह का परित्याग करता है, वह परमहंस-परिव्राजक होता है॥ ३-ग॥
मन्त्र ४ १९३
भगवन् ब्रह्मप्रणवः कीदृश इति ब्रह्मा पृच्छति। स होवाच नारायणः। ब्रह्मप्रणवः
षोडशमात्रात्मकः सोऽवस्थाचतुष्टयगोचरः। जाग्रदवस्थायां जाग्रदादिचतस्रोऽवस्थाः स्वप्ने
स्वप्नादिचतस्रोऽवस्थाः सुषुप्तौ सुषुप्त्यादिचतस्रोऽवस्थास्तुरीये तुरीयादिचतस्रोऽवस्था
भवन्तीति। व्यष्टिजाग्रदवस्थायां विश्वस्य चातुर्विध्यं विश्वविश्वो विश्वतैजसो विश्वप्राज्ञो
विश्वतुरीय इति। व्यष्टिस्वप्नावस्थायां तैजसस्य चातुर्विध्यं तैजसविश्वस्तैजसतैजसस्तै-
जसप्राज्ञस्तैजसतुरीय इति। सुषुप्त्यवस्थायां प्राज्ञस्य चातुर्विध्यं प्राज्ञविश्वः प्राज्ञतैजसः प्राज्ञप्राज्ञः
प्राज्ञतुरीय इति। तुरीयावस्थायां तुरीयस्य चातुर्विध्यं तुरीयविश्वस्तुरीयतैजसस्तुरीयप्राज्ञस्तु-
रीयतुरीय इति। ते क्रमेण षोडशमात्रारूढा अकारे जाग्रद्विश्व उकारे जाग्रत्तैजसो मकारे
जाग्रत्प्राज्ञ अर्धमात्रायां जाग्रत्तुरीयो बिन्दौ स्वप्नविश्वो नादे स्वप्नतैजसः कलायां स्वप्नप्राज्ञः
कलातीते स्वप्नतुरीयः शान्तौ सुषुप्तविश्वः शान्त्यतीते सुषुप्ततैजस उन्मन्यां सुषुप्तप्राज्ञो मनोन्मन्यां
सुषुप्ततुरीयः तुर्यां तुरीयविश्वो मध्यमायां तुरीयतैजसः पश्यन्त्यां तुरीयप्राज्ञः परायां तुरीयतुरीयः।
जाग्रन्मात्राचतुष्टयमकारांशं स्वप्नमात्राचतुष्टयमुकारांशं सुषुप्तिमात्राचतुष्टयं मकारांशं
तुरीयमात्राचतुष्टयमर्धमात्रांशम्। अयमेव ब्रह्मप्रणवः। स परमहंसतुरीयातीतावधूतैरूपास्यः।
तेनैव ब्रह्म प्रकाशते तेन विदेहमुक्तिः ॥ ४ ॥
ब्रह्मा जी ने (आदि पिता नारायण से) आगे प्रश्न किया-हे भगवन्! ब्रह्म प्रणव कैसा होता है?
आदिनारायण ने कहा-ब्रह्म प्रणव षोडशमात्रात्मक होता है। चारों अवस्थाओं में प्रत्येक की चार-चार स्थितियों
के संयोग से इनकी संख्या सोलह हो जाती है। जाग्रत् अवस्था में जाग्रत् आदि चारों (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति,
तुरीय) अवस्थाएँ, स्वप्नावस्था में स्वप्न आदि चारों (स्वप्न, जाग्रत्, सुषुप्ति, तुरीय) अवस्थाएँ, सुषुप्तावस्था में
सुषुप्ति आदि चारों (सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न, तुरीय) अवस्थाएँ तथा तुरीयावस्था में तुरीय आदि चारों (तुरीय,
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) अवस्थाएँ रहती हैं। व्यष्टि जाग्रत् अवस्था में विश्व के चार स्वरूप होते हैं, विश्व-विश्व,
विश्व तैजस, विश्व प्राज्ञ और विश्व तुरीय। व्यष्टि स्वप्नावस्था में तैजस के चार रूप होते हैं-तैजस विश्व, तैजस-
तैजस, तैजस प्राज्ञ और तैजस तुरीय। इसी प्रकार सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ चार प्रकार के होते हैं-प्राज्ञ विश्व, प्राज्ञ
तैजस, प्राज्ञ-प्राज्ञ और प्राज्ञ तुरीय। तुरीयावस्था में तुरीय के भी चार प्रकार होते हैं-तुरीय विश्व, तुरीय तैजस,
तुरीय-तुरीय और तुरीय प्राज्ञ। इस प्रकार यह (ब्रह्म प्रणव) षोडशमात्रारूढ़ रहता है। अकार में जाग्रत् विश्व,
उकार में जाग्रत् तैजस और मकार में जाग्रत् प्राज्ञ होता है। अर्धमात्रा में जाग्रत् तुरीय, बिन्दु में स्वप्न विश्व, नाद
में स्वप्न तैजस, कला में स्वप्न प्राज्ञ और कलातीत में स्वप्न तुरीय होता है। शान्ति में सुषुप्त विश्व, शान्ति अतीत
में सुषुप्त तैजस, उन्मनी अवस्था में सुषुप्त-प्राज्ञ और मनोन्मनी अवस्था में सुषुप्त तुरीय होता है। तुर्या (वैखरी)
में तुरीय विश्व, मध्यमा में तुरीय तैजस, पश्यन्ती में तुरीय प्राज्ञ और परा में तुरीय-तुरीय होता है। (प्रणव ॐ
के) जाग्रत् अवस्था की चार मात्राएँ अकार अंश की, स्वप्नावस्था की चार मात्राएँ उकार अंश की, सुषुप्ति
अवस्था की चार मात्राएँ मकार अंश की और तुरीयावस्था की चार मात्राएँ अर्धमात्रा के अंश की हैं। यही ब्रह्म
प्रणव है। यह (ब्रह्मप्रणव) ही परमहंस तुरीयातीत अवधूतों द्वारा उपास्य है। इसी के द्वारा ब्रह्म प्रकाशित होता
है। इसी से विदेह मुक्ति प्राप्त होती है ॥ ४॥
भगवन् कथमयज्ञोपवीत्यशिखी सर्वकर्मपरित्यक्तः कथं ब्रह्मनिष्ठापरः कथं ब्राह्मण
इति ब्रह्मा पृच्छति। स होवाच विष्णुर्भो भोऽर्भक यस्यास्त्यद्वैतमात्मज्ञानं तदेव यज्ञोपवीतम्।
१९४ परमहंसपरिव्राजकोपनिषद्
तस्य ध्याननिष्ठैव शिखा। तत्कर्म स पवित्रम्। स सर्वकर्मकृत्। स ब्राह्मणः। स ब्रह्मनिष्ठापरः।
स देवः। स ऋषिः। स तपस्वी। स श्रेष्ठः। स एव सर्वज्येष्ठः। स एव जगद्गुरुः। स एवाहं
विद्धि। लोके परमहंसपरिव्राजको दुर्लभतरो यद्येकोऽस्ति। स एव नित्यपूतः। स एव वेदपुरुषो
महापुरुषो यस्तच्चित्तं मय्येवावतिष्ठते। अहं च तस्मिन्नेवावस्थितः। स एव नित्यतृप्तः। स
शीतोष्णसुखदुःखमानावमानवर्जितः। स निन्दामर्षसहिष्णुः। स षडूर्विवर्जितः। षड्भाववि-
कारशून्यः। स ज्येष्ठाज्येष्ठव्यवधानरहितः। स स्वव्यतिरेकेण नान्यद्रष्टा। आशाम्बरो ननमस्कारो
नस्वाहाकारो नस्वधाकारश्च नविसर्जनपरो निन्दास्तुतिव्यतिरिक्तो नमन्त्रतन्त्रोपासको देवा-
न्तरध्यानशून्यो लक्ष्यालक्ष्यनिवर्तकः सर्वोपरतः स सच्चिदानन्दाद्वयचिद्धनः सम्पूर्णा-
नन्दैकबोधो ब्रह्मैवाहमस्मीत्यनवरतं ब्रह्मप्रणवानुसंधानेन यः कृतकृत्यो भवति स ह
परमहंसपरिव्राडित्युपनिषत्॥ ५॥
ब्रह्मा ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्! अयज्ञोपवीती, अशिखी एवं समस्त कर्मों का परित्याग कर देने
वाला ब्रह्मनिष्ठ परायण ब्राह्मण कैसे हो सकता है? भगवान् विष्णु ने कहा- अद्वैतरूप आत्मज्ञान ही जिसका
यज्ञोपवीत है और ध्यान निष्ठा.ही जिसकी शिखा है, वह अपने सत्कर्म से पवित्र हो जाता है। सम्पूर्ण कर्मों को
वह कर चुका है। वह ब्राह्मण है, वह ब्रह्मनिष्ठ परायण है, वह देव है, वह ऋषि है, वह तपस्वी है, वह श्रेष्ठ
है, सर्वज्येष्ठ एवं जगद्गुरु है, वह मैं ही हूँ, ऐसा जानना चाहिए। इस लोक में परमहंस परिव्राजक दुर्लभ है।
यदि कोई एकाध (परमहंस) होता है, तो वह नित्यपावन और वेद पुरुष है। वह महापुरुष जिसका चित्त मुझमें
ही अवस्थित रहता है, मैं उसमें अवस्थित रहता हूँ। वही नित्य तृप्त होता है। वह सर्दी-गर्मी, मान-अपमान और
सुख-दुःख से रहित होता है। वह निन्दा और क्रोध को सहन कर लेने वाला होता है तथा षड्ऊर्मियों से रहित
होता है। वह षड्भाव विकारों से शून्य होता है। उसकी दृष्टि में बड़े-छोटे का कोई भेद नहीं रहता अर्थात् वह
सबके प्रति समान दृष्टि रखता है। वह (सर्वत्र) अपने आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं देखता। दिशाएँ ही
उसके वस्त्र हैं। वह नमस्कार, स्वाहाकार, स्वधाकार और विसर्जन कुछ भी नहीं करता है। वह निन्दा-स्तुति
से परे होता है। वह मन्त्र-तन्त्र की उपासना भी नहीं करता। वह किसी अन्य देव का भी ध्यान नहीं करता। वह
लक्ष्य-अलक्ष्य से रहित होता है। वह सभी से उपरत रहता है। वह सच्चिदानन्द, अद्वैत, चिद्धन और सम्पूर्ण
आनन्द के बोधवाला 'मैं ब्रह्म हूँ'-ऐसी अनवरत भावना रखने वाला है। जो ब्रह्म प्रणव के अनुसंधान से
कृतकृत्य हो जाता है, उसे ही परमहंस परिव्राजक कहते हैं, ऐसा इस उपनिषद् का मत है॥ ५॥
[अन्तरंग यज्ञोपवीत और अन्तरंग शिखा का विस्तार से उल्लेख 'परब्रह्मोपनिषद्' में किया गया है।]
ॐ भद्रं कर्णेभिः ...................इति शान्तिः ॥
॥ इति परमहंसपरिव्राजकोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ परमहंसापानषद् ॥
यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदीय है। इस लघुकाय (कुल ४ मन्त्र) उपनिषद् में महामुनि नारद ने
भगवान् ब्रह्मा जी से 'परमहंस' की स्थिति और मार्ग के विषय में पूछा है। जिसके उत्तर में भगवान् ब्रह्मा ने
परमहंस का स्वरूप, उसका वेश-विन्यास, प्रमुख दीक्षा, उसका व्यवहार आदि विस्तार से बताया है। इससे
विपरीत आचरण करने वाले को संन्यास के नाम पर कलंक स्वरूप और घोर रौरव नरक में जाने वाला बताया
है। परमहंस को स्वर्ण आदि धन किसी भी स्थिति में अपने पास नहीं रखना चाहिए, यदि कोई ऐसा करता है,
तो वह ब्रह्म हत्या, चाण्डाल एवं आत्महत्या सदृश स्थिति में पहुँच जाता है। परमहंस तो आप्तकाम,
कामनाशन्य, सुख-दुःख, राग-द्वेष, शुभाशुभ आदि से ऊपर होता है। वह जितेन्द्रिय, आत्मस्थ और पूर्णानन्द-
पूर्णबोध स्वरूप होता है। यही जीवन की सर्वोच्च स्थिति है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद्)
अथ योगिनां परमहंसानां कोऽयं मार्गस्तेषां का स्थितिरिति नारदो भगवन्तमुपगत्योवाच।
तं भगवानाह। योऽयं परमहंसमार्गों लोके दुर्लभतरो न तु बाहुल्यो यद्येको भवति स एव
नित्यपूतस्थः स एव वेदपुरुष इति विदुषो मन्यन्ते महापुरुषो यच्चित्तं तत्सर्वदा मय्येवावतिष्ठते
तस्मादहं च तस्मिन्नेवावस्थीयते। असौ स्वपुत्रमित्रकलत्रबान्धवादीञ्शिखायज्ञोपवीतं स्वाध्यायं
च सर्वकर्माणि संन्यस्यायं ब्रह्माण्डं च हित्वा कौपीनं दण्डमाच्छादनं च स्वशरीरोपभोगार्थाय
च लोकस्योपकारार्थाय च परिग्रहेत्। तच्च न मुख्योऽस्ति कोऽयं मुख्य इति चेदयं मुख्यः ॥१॥
एक बार नारद मुनि ने भगवान् (ब्रह्मा) के पास जाकर पूछा-योगी पुरुषों में जो परमहंस हैं, उनकी
स्थिति कैसी होती है और उनका मार्ग कौन सा है? यह सुनकर भगवान् ने कहा-परमहंसों का मार्ग इस जगत्
में अति दुर्लभ है, ऐसे व्यक्ति संसार में बहुत कम ही होते हैं। परमहंस संन्यासी एकाध ही मिलते हैं, वे नित्य
पवित्र भाव में स्थित रहते हैं। ऐसे परमहंस ही वेद-पुरुष हैं; ऐसा विद्वज्जन मानते हैं। ऐसे महापुरुष का चित्त
सदैव मुझमें ही अधिष्ठित रहता है और मैं भी उस महापुरुष में ही स्थित रहता हूँ। परमहंस संन्यासी अपने
पुत्र, पत्नी, बन्धु, शिखा, यज्ञोपवीत, स्वाध्याय आदि समस्त कर्मों का परित्याग कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के हित
में शरीर की रक्षा के लिए मात्र कौपीन, दण्ड और आच्छादन (उपवस्त्र) धारण करता है; किन्तु यह भी
परमहंस की मुख्य दीक्षा नहीं है। नारद ने पूछा-फिर मुख्य दीक्षा कौन सी है? ॥ १॥
न दण्डं न शिखां न यज्ञोपवीतं न चाच्छादनं चरति परमहंसो न शीतं न चोष्णं न सुखं
न दुःखं न मानापमाने च षडूर्विवर्जं निन्दागर्वमत्सरदम्भदर्पेच्छाद्वेषसुखदुःखकामक्रोधलोभमो-
हहर्षासूयाहंकारादींश्च हित्वा स्ववपुः कुणपमिव दृश्यते यतस्तद्वपुरपध्वस्तं संशयविपरीत-
मिथ्याज्ञानानां यो हेतुस्तेन नित्यनिवृत्तस्तन्नित्यबोधस्तत्स्वयमेवावस्थितिरस्तं शान्तमचलमद्वया-
नन्दचिद्घन एवास्मि। तदेव मम परमधाम तदेव शिखा च तदेवोपवीतं च। परमात्मनात्मनोरे-
कत्वज्ञानेन तयोर्भेद एव विभग्नः सा संध्या ॥ २ ॥
परमहंस की प्रमुख दीक्षा इस प्रकार है-वह दण्ड, शिखा, यज्ञोपवीत, आच्छादन धारण न करे। इसके
अतिरिक्त शीत, उष्ण, मान-अपमान, सुख और दुःख इन षड्ऊर्मियों से रहित हो। वह निन्दा, गर्व, मत्सर,
दर्प, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह, हर्ष, असूया, अहंकार को त्यागकर अपनी काया को
मृतक के समान देखता है। उसका संशय और मिथ्याभाव तिरोहित हो जाता है। वह नित्य बोध स्वरूप होता
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है, जो संसार में किसी भी पदार्थ की अपेक्षा न रखता हुआ यह मानता है कि मैं एक मात्र अचल, अद्वयानन्द
और चिद्घन ही हूँ। यही मेरा परमधाम है, शिखा और यज्ञोपवीत सभी कुछ यही है। वह आत्मा और परमात्मा
में समान दृष्टि रखता है, उसके लिए दोनों का भेद नष्ट हो जाता है, यही उसकी सन्ध्या है ॥ २ ॥
सर्वान्कामान्परित्यज्य अद्वैते परमे स्थितिः। ज्ञानदण्डो धृतो येन एकदण्डी स उच्यते।
काष्ठदण्डो धृतो येन सर्वांशी ज्ञानवर्जितः। तितिक्षाज्ञानवैराग्यशमादिगुणवर्जितः। भिक्षामात्रेण
यो जीवेत्स पापी यतिवृत्तिहा। स याति नरकान्घोरान्महारौरवसंज्ञकान्। इदगन्तरं ज्ञात्वा स
परमहंसः ॥ ३ ॥
वह (परमहंस) समस्त कामनाओं का परित्याग करके अद्वैत परब्रह्म के स्वरूप में स्थित रहता है। ज्ञान
का दण्ड धारण किये रहने के कारण उसे एकदण्डी स्वामी भी कहते हैं; किन्तु जो काष्ठ दण्ड धारण किये
रहकर समस्त आशाओं से पूर्ण है, अज्ञानी है, तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य, शम आदि गुणों से रहित है तथा भिक्षा
मात्र से जीवनयापन करते हुए, जिसने यति वृत्ति का विनाश कर दिया है, वह पापी घोर रौरव नामक नरक में
जाता है। जो इस अन्तर (पापी संन्यासी और परमहंस के अन्तर) को समझता है, वह परमहंस है ॥ ३ ॥
आशाम्बरो न नमस्कारो न स्वाहाकारो न स्वधाकारो न निन्दा न स्तुतिर्यादृच्छिको
भवेद्भिक्षुः। नावाहनं न विसर्जनं न मन्त्रं न ध्यानं नोपासनं च। न लक्ष्यं नालक्ष्यं न पृथङ्
नापृथगहं न न त्वं न सर्वं चानिकेतस्थिरमतिरेव स भिक्षुः सौवर्णादीनां नैव परिग्रहेन्न लोकनं
नावलोकनं च न च बाधकः क इति चेद्बाधकोऽस्त्येव। यस्माद्भिक्षुर्हिरण्यं रसेन दृष्टं चेत्स
ब्रह्महा भवेदद्यस्माद्भिक्षुर्हिरण्यं रसेन स्पृष्टं चेत्स पौल्कसो भवेदद्यस्माद्भिक्षु र्हिरण्यं रसेन ग्राह्यं
चेत्स आत्महा भवेत्तस्माद्भिक्षुर्हिरण्यं रसेन न दृष्टं च न स्पृष्टं च न ग्राह्यं च। सर्वे कामा
मनोगता व्यावर्तन्ते। दुःखे नोद्विग्नः सुखे न स्पृहा त्यागो रागे सर्वत्र शुभाशुभयोरनभिस्नेहो न
द्वेष्टि न मोदं च। सर्वेषामिन्द्रियाणां गतिरुपरमते य आत्मन्येवावस्थीयते। तत्पूर्णानन्दैकबोधस्त-
दब्रह्मैवाहमस्मीति कृतकृत्यो भवति कृतकृत्यो भवति ॥ ४ ॥
वह दिगम्बर, नमस्कार, स्वाहाकार, स्वधाकार, निन्दा, स्तुति की ओर ध्यान न देकर स्वेच्छापूर्वक भिक्षु
बनता है। उसका आवाहन, विसर्जन, मन्त्र, ध्यान, उपासना, लक्ष्य, अलक्ष्य कुछ भी नहीं होता। उसका
पृथक्, अपृथक्, मेरे-तेरे का भाव और सर्वभाव भी नहीं होता। वह अनिकेत अर्थात् निवास रहित और
स्थिर-मति वाला होता है। वह भिक्षु स्वर्ण आदि के संग्रह में प्रवृत्त नहीं होता। उसे कोई वस्तु आकर्षक और
अनाकर्षक प्रतीत नहीं होती। उसके लिए क्या बाधक है ? अर्थात् कुछ नहीं। भिक्षु परमहंस होकर यदि वह
स्वर्ण (धन) से प्रेम करे, तो उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है। भिक्षु होकर यदि परमहंस स्वर्ण से लगाव
रखता है, तो चाण्डाल की तरह होता है। स्वर्ण से प्रेम करने वाला भिक्षु आत्मघाती होता है। इसलिए भिक्षु
(परमहंस) को चाहिए कि वह न तो स्वर्ण को देखे, न स्पर्श करे और न ग्रहण ही करे। ऐसा परमहंस
आसकाम हो जाता है अर्थात् या तो उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं या समाप्त हो जाती हैं। वह दुःख
से उद्विग्न नहीं होता और सुख से भी निस्पृह रहता है। राग को त्याग कर वह शुभ और अशुभ के प्रति स्नेहहीन
(आसक्ति रहित) हो जाता है, जो न द्वेष करता है, न मुदित होता है। उसकी समस्त इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं।
वह अपने आत्म-तत्त्व में ही स्थित रहता है। वह अपने को सदा पूर्णानन्द, पूर्ण बोध स्वरूप ब्रह्म ही समझता
है। ऐसी मान्यता रखने (और अनुभव करने) से वह कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ४ ॥
ॐ पूर्णमदः .................... इति शान्तिः ॥
॥ इति परमहंसोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ पैङ्गलोपनिषद् ॥
यह शुक्ल यजुर्वेदीय उपनिषद् है। इसमें कुल चार अध्याय हैं, जिनमें ऋषि पैंगल और महर्षि
याज्ञवल्क्य के प्रश्नोत्तर के माध्यम से परम कैवल्य का रहस्य वर्णित है।
प्रथम अध्याय में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सृष्टि के प्राकट्य का बड़ा ही वैज्ञानिक एवं स्पष्ट विवेचन किया
है। द्वितीय अध्याय में 'ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना, पालन एवं संहार करने की सामर्थ्य से युक्त होने पर भी वह
'जीव भाव' को कैसे प्राप्त होता है ? इसका वर्णन किया गया है। तृतीय अध्याय में 'तत्त्वमसि' (वह तुम हो),
त्वं तदसि (तुम वह हो), त्वं ब्रह्मासि (तुम ब्रह्म हो) तथा अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) इन चार महावाक्यों का
विवेचन है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि वेदान्त प्रसिद्ध चार महावाक्यों (अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, प्रज्ञानं ब्रह्म,
अयमात्मा ब्रह्म) से इनकी कुछ भिन्नता है। चतुर्थ अध्याय में 'ज्ञानियों की स्थिति एवं कर्म' पर प्रश्न पूछा गया
है, जिसका उत्तर याज्ञवल्क्य जी ने बड़े विस्तार से दिया है, जिसका सारांश है कि 'ज्ञानी' अपने ज्ञानाग्नि से
समस्त प्रारब्ध कर्मों को जला डालता है और आवागमन के बन्धन से पूर्णतया मुक्त होकर परम कैवल्य की
प्राप्ति कर लेता है। अन्त में उपनिषद् का माहात्म्य बताते हुए उसे पूर्ण कर दिया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः ................. इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद)
॥ प्रथमोऽध्यायः ॥
अथ ह पैङ्गलो याज्ञवल्क्यमुपसमेत्य द्वादशवर्षशुश्रूषापूर्वकं परमरहस्यकैवल्यमनु-
ब्रूहीति पप्रच्छ ॥ १ ॥
(एक बार) ऋषि पैङ्गल याज्ञवल्क्य ऋषि के पास गये और बारह वर्ष तक उनकी सेवा-शुश्रूषा करने
के पश्चात् उनसे कहा कि मुझे परम रहस्य कैवल्य का उपदेश कीजिए ॥ १ ॥
स होवाच याज्ञवल्क्यः सदेव सोम्येदमग्र आसीत्। तन्नित्यमुक्तमविक्रियं सत्यज्ञानमानन्दं
परिपूर्णं सनातनमेकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ॥ २ ॥
(यह सुनकर) ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा-पूर्व में केवल सत् ही था। वही नित्य, मुक्त, अविकारी, सत्य,
ज्ञान और आनन्द से पूरित सनातन तथा एकमात्र अद्वैत ब्रह्म है ॥ २ ॥
तस्मिन्मरुशुक्तिकास्थाणुस्फटिकादौ जलरौप्यपुरुषरेखादिवल्लोहितशुक्लकृष्ण-
गुणमयी गुणसाम्यानिर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत् । तत्प्रतिबिम्बितं यत्तत्साक्षीचैतन्यमासीत् ॥३ ॥
जिस प्रकार मरुस्थल में जल, सीप में रजत, स्थाणु में पुरुष और स्फटिक में रेखा का आभास होता है,
उसी प्रकार उस (ब्रह्म) से रक्त (लाल), श्वेत और कृष्ण वर्णा (सत्, रज, तम रूपी) मूल प्रकृति उत्पन्न हुई,
जिसमें तीनों गुण समानावस्था में विद्यमान थे। उसमें जो प्रतिबिम्बित हुआ, उसे ही साक्षी चैतन्य कहा गया ॥३
सा पुनर्विकृतिं प्राप्य सत्त्वोद्रिक्ताऽव्यक्ताख्यावरणशक्तिरासीत् । तत्प्रतिबिम्बितं
यत्तदीश्वरचैतन्यमासीत् । स स्वाधीनमायः सर्वज्ञः सृष्टिस्थितिलयानामादिकर्ता जगदङ्कुररूपो
भवति स्वस्मिन्विलीनं सकलं जगदाविर्भावयति । प्राणिकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारितः
प्राणिकर्मक्षयात् पुनस्तिरोभावयति । तस्मिन्नेवाखिलं विश्वं संकोचितपटवद्वर्तते ॥ ४ ॥