सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 179

१८७ परब्रह्मोपनिषद्
प्रणव (ॐकार) ही हंस (ब्रह्म) और नाद ही यह त्रिवृत् (तीन लड़ी) वाला सूत्र है। यह अपनी ही महिमा से
अपने में स्थित है। वह चैतन्य रूप से हृदय में विराजता है। पर और अपर के भेद से इस ब्रह्म को दो प्रकार से
समझना चाहिए। यदि कोई अपने से पृथक् अन्य कुछ नहीं देखता, सब आत्मरूप में ही देखता है, ऐसे मुमुक्षु
को प्रपञ्चयुक्त शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ५॥
सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परंब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ६ ॥
बुद्धिमानों (अर्थात् उपर्युक्त स्थिति वालों) को शिखा सहित केश कर्तन करके बाह्य उपवीत (यज्ञोपवीत)
का विसर्जन कर देना चाहिए और अक्षर ब्रह्म को ही सूत्र स्वरूप धारण करना चाहिए ॥ ६ ॥
पुनर्जन्मनिवृत्त्यर्थं मोक्षस्याहर्निशं स्मरेत् । सूचनात्सूत्रमित्युक्तं सूत्रं नाम परं पदम् ॥ ७ ॥
पुनर्जन्म से निवृत्ति के लिए सतत मोक्ष का स्मरण करे। सूचना देने वाला होने से ही ब्रह्मरूपी सूत्र को
परमपद रूप 'सूत्र' कहा जाता है ॥ ७ ॥
तत्सूत्रं विदितं येन स मुमुक्षुः स भिक्षुकः । स वेदवित्सदाचारः स विप्रः पंक्तिपावनः ॥ ८ ॥
उस सूत्र (ब्रह्मसूत्र) का जिसे ज्ञान हो गया, वही मुमुक्षु, भिक्षुक, वेदज्ञ, सदाचारी और विप्र है, जो
अनेक प्राणियों को पावन करता है ॥ ८ ॥
येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव। तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगविद्ब्राह्मणो यतिः ॥ ९ ॥
जिस परब्रह्म ने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मणि-मनकों की तरह एक ही सूत्र में पिरोया है, उस सूत्र को
धारण करने वाला योगी, योगविद् ब्राह्मण और यति होता है ॥ ९ ॥
बहिःसूत्रं त्यजेद्विप्रो योगविज्ञानतत्परः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स मुक्तिभाक् ।
नाशुचित्वं न चोच्छिष्टं तस्य सूत्रस्य धारणात् ॥ १० ॥
ब्राह्मण, योगविद् और ज्ञानतत्पर व्यक्ति को चाहिए कि वह बाहरी सूत्र का परित्याग कर दे; क्योंकि जो
ब्रह्मभाव युक्त सूत्र को धारण करता है, वह मुक्ति का अधिकारी होता है। उस (ब्रह्मभावमय) सूत्र को धारण
करने में किसी प्रकार की अपवित्रता, उच्छिष्टता (जूठा होना) नहीं रहती ॥ १० ॥
सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते तु सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥ ११ ॥
संसार में जिन यज्ञोपवीतधारियों के यज्ञोपवीत (सूत्र) के अन्तर्गत ज्ञान समाहित है, वे ही इस जगत् में
सूत्रविद् और सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं ॥ ११ ॥
ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमीरितम् ॥ १२ ॥
जो ज्ञानरूपी शिखा, ज्ञान की निष्ठा और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, उनके लिए ज्ञान ही
सर्वस्व है; क्योंकि ज्ञान को परम पवित्र कहा गया है ॥ १२ ॥
अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा । स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥१३ ॥
जिनकी अग्नि के समान तेजस्वी ज्ञानरूपी शिखा है, अन्य कोई जिनकी शिखा नहीं है, वस्तुतः वे ही
शिखी (चोटी वाले) हैं, शेष तो मात्र केशधारी हैं, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥ १३ ॥
कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके लौकिकेऽपि वा । ब्राह्मणाभासमात्रेण जीवन्ते कुक्षिपूरकाः ।
व्रजन्ते निरयं ते तु पुनर्जन्मनि जन्मनि ॥ १४ ॥
जो वैदिक (यज्ञादि) कर्मों अथवा लौकिक (आहार-विहार आदि) कर्मों में निरत हैं, वे तो आभास
मात्र ब्राह्मण हैं; क्योंकि वे केवल उदर-पूर्ति के लिए जीते हैं, ऐसे लोग प्रत्येक जन्म के अन्त में नरक में जाते
हैं (अथवा संसार के इस जन्म-मृत्यु रूपी नरक में विविध कष्ट सहते हैं) ॥ १४ ॥