१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ मन्त्र २५ २५३
देशकालविमुक्तोऽस्मि दिगम्बरसुखोऽस्म्यहम्।
नास्ति नास्ति विमुक्तोऽस्मि नकाररहितोऽस्म्यहम्॥ १९ ॥
मैं देश और काल से रहित हूँ, दिगम्बर एवं आनन्द स्वरूप हूँ। यह नहीं है, यह नहीं है-इससे मैं मुक्त
हूँ अर्थात् मैं अभावशून्य हूँ तथा 'नकार' से रहित भी मैं ही हूँ॥ १९ ॥
अखण्डाकाशरूपोऽस्मि ह्यखण्डाकारमस्म्यहम्।
प्रपञ्चमुक्तचित्तोस्मि प्रपञ्चरहितोऽस्म्यहम्॥ २० ॥
मैं अखण्ड आकाश स्वरूप हूँ, अखण्डाकार भी मैं ही हूँ, मैं सांसारिक प्रपञ्चों से परे चित्त वाला हूँ
तथा संसार प्रपञ्चादि से रहित हूँ॥ २० ॥
सर्वप्रकाशरूपोऽस्मि चिन्मात्रज्योतिरस्र्यहम्।
कालत्रयविमुक्तोऽस्मि कामादिरहितोऽस्म्यहम्॥ २१ ॥
मैं सर्वप्रकाश स्वरूप हूँ तथा चैतन्य रूपी ज्योति भी मैं ही हूँ। तीनों कालों से परे अर्थात् मुक्त हूँ एवं मैं
काम-क्रोधादि से रहित हूँ॥ २१ ॥
कायिकादिविमुक्तोऽस्मि निर्गुणः केवलोऽस्म्यहम्।
मुक्तिहीनोऽस्मि मुक्तोऽस्मि मोक्षहीनोऽस्म्यहं सदा ॥ २२ ॥
मैं देह-अदेह (शरीर-अशरीर) से मुक्त हूँ, निर्गुण हूँ तथा मैं केवल एक हूँ। मुक्ति रहित होते हुए भी
मुक्त हूँ तथा मैं सदैव मोक्षरहित हूँ॥ २२ ॥
सत्यासत्यादिहीनोऽस्मि सन्मात्रान्नास्म्यहं सदा।
गन्तव्यदेशहीनोऽस्मि गमनादिविवर्जितः ॥ २३ ॥
(मैं) सत्य-असत्य से रहित हूँ, केवल मैं ही सत्य स्वरूप से (भिन्न) सभी कालों में नहीं हूँ। मैं
गमनागमन से रहित हूँ अर्थात् मुझे कहीं जाना अथवा न जाना नहीं है एवं मेरा गन्तव्य (जाने का स्थान) भी
नहीं है॥ २३ ॥
सर्वदा समरूपोऽस्मि शान्तोऽस्मि पुरुषोत्तमः।
एवं स्वानुभवो यस्य सोऽहमस्मि न संशयः ॥ २४ ॥
(मैं) सर्वदा समरूप एवं शान्त परमात्मा (पुरुषोत्तम) हूँ। जिसका इस प्रकार से स्वानुभव है, वह
(ब्रह्म) निश्चित ही मैं हूँ। इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं है॥ २४ ॥
यः शृणोति सकृद्वापि ब्रह्मैव भवति स्वयमित्युपनिषत् ॥२५ ॥
जो (मनुष्य) एक बार भी इस (मैत्रेयी) उपनिषद् का श्रवण करता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।
ऐसी ही यह उपनिषद् है॥ २५ ॥
ॐ आप्यायन्तु .....................इति शान्तिः ॥
॥ इति मैत्रेय्युपनिषत्समाप्ता ॥