१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५२ मैत्रेय्युपनिषद्
मैं आश्रय-निराश्रय से रहित हूँ, मैं आधार रहित हूँ, बन्ध एवं मोक्ष से भी रहित हूँ तथा मैं ही शुद्ध ब्रह्म
स्वरूप हूँ॥ ९॥
चित्तादिसर्वहीनोऽस्मि परमोऽस्मि परात्परः।
सदा विचाररूपोऽस्मि निर्विचारोऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥१०॥
मैं चित्त आदि सभी से रहित हूँ, मैं परात्पर (ब्रह्म) हूँ। मैं सर्वदा विचार रूप हूँ, साथ ही विचार से परे
भी हूँ॥ १०॥
अकारोकाररूपोऽस्मि मकारोऽस्मि सनातनः।
ध्यातृध्यानविहीनोऽस्मि ध्येयहीनोऽस्मि सोऽस्म्यहम्॥ ११॥
'अकार', 'उकार' एवं 'मकार' रूप सनातन मैं ही हूँ। मैं ध्याता, ध्यान एवं ध्येय से परे भी हूँ॥ ११॥
सर्वत्रपूर्णरूपोऽस्मि सच्चिदानन्दलक्षणः। सर्वतीर्थस्वरूपोऽस्मि परमात्मास्म्यहं शिवः ॥ १२॥
मैं सर्वत्र पूर्णरूप हूँ, सच्चिदानन्द के लक्षणों से युक्त हूँ। सम्पूर्ण तीर्थों का स्वरूप भी मैं हूँ और परमात्म
स्वरूप कल्याणकारी भगवान् शिव भी मैं ही हूँ॥ १२॥
लक्ष्यालक्ष्यविहीनोऽस्मि लयहीनरसोऽस्म्यहम्। मातृमानविहीनोऽस्मि मेयहीनः शिवोऽस्म्यहम्॥
मैं लक्ष्य एवं अलक्ष्य से विहीन हूँ तथा लय न होने वाला रस स्वरूप हूँ। मैं ही प्रमाण, प्रमेय और
प्रमाता से रहित तथा मैं ही शिव स्वरूप हूँ॥ १३॥
न जगत्सर्वद्रष्टास्मि नेत्रादिरहितोऽस्म्यहम्। प्रवृद्धोऽस्मि प्रबुद्धोस्मि प्रसन्नोऽस्मि हरोऽस्म्यहम्॥१४
मैं इस संसार का सर्वद्रष्टा नहीं हूँ। मैं आँख आदि समस्त इन्द्रियों से रहित हूँ। मैं ही वृद्धि को प्राप्त
करता हुआ, ज्ञानवान्, प्रसन्न एवं हर (पापों को हरने वाला) हूँ॥ १४॥
सर्वेन्द्रियविहीनोऽस्मि सर्वकर्मकृदप्यहम्। सर्ववेदान्ततृप्तोऽस्मि सर्वदा सुलभोऽस्म्यहम्॥ १५॥
मैं सभी इन्द्रियों से रहित हूँ, तब भी समस्त कर्म करने वाला मैं स्वयं ही हूँ। समस्त वेदान्त द्वारा सर्वदा
तृप्त एवं सर्व सुलभ मैं ही हूँ॥ १५॥
मुदितामुदिताख्योऽस्मि सर्वमौनफलोऽस्म्यहम्।
नित्यचिन्मात्ररूपोऽस्मि सदा सच्चिन्मयोऽस्म्यहम्॥ १६॥
मैं आनन्द एवं शोक रूप हूँ, सर्वदा मौन रहने का फल रूप हूँ। नित्य चिद् रूप हूँ तथा मैं ही सच्चिद्
रूप भी हूँ॥ १६॥
यत्किंचिदपि हीनोऽस्मि स्वल्पमप्यति नास्म्यहम्। हृदयग्रन्थिहीनोऽस्मि हृदयाम्बुजमध्यगः ॥१७
जो कुछ भी है, मैं उससे रहित हूँ, मैं अति अल्प और अत्यधिक भी नहीं हूँ। (मैं) हृदय की ग्रन्थि से
रहित हूँ तथा हृदय कमल के मध्य में रहने वाला भी हूँ॥ १७॥
षड्विकारविहीनोऽस्मि षट्कोशरहितोऽस्म्यहम्।
अरिषड्वर्गमुक्तोऽस्मि अन्तरादन्तरोऽस्म्यहम्॥ १८॥
मैं (जन्म, अस्तित्व, विपरिणमन, विकास, अपक्षय और विनाश) छः विकारों से रहित, चर्म आदि छः
कोशों (चर्म, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद और मज्जा) से रहित तथा काम, क्रोधादि षड् रिपुओं से हीन हूँ और
नितान्त अन्तः स्थान में रहने वाला हूँ॥ १८॥