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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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<u>माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद का ऐतिहासिक निर्णय</u>
माननीय उच्चन्यायालय इलाहाबाद ने रिट याचिका संख्या ५६४४७ सन २००३ श्यामलरंजन
मुखर्जी बनाम निर्मलरंजन मुखर्जी एवं अन्य के प्रकरण में अपने निर्णय दिनांक ३० अगस्त
२००७ को “श्रीमद् भगवद् गीता” को समस्त विश्व का धर्मशास्त्र मानते हुए राष्ट्रीय धर्मशास्त्र
की मान्यता देने की संस्तुति की है। अपने निर्णय के प्रस्तर ११५ से १२३ में माननीय न्यायालय
ने विभिन्न गीता भाष्यों पर विचार करते हुए यथार्थ गीता को इसके सम्यक एवं युगानुकुल
भाष्य के रुप में मान्य करते हुए धर्म, कर्म, यज्ञ, योग आदि को परिभाषा के आधार पर इसे
जाति पाति मजहब सम्प्रदाय देश व काल से परे मानवमात्र का धर्मशास्त्र माना जिसके माध्यम
से लौकिक व पारलौकिक दोनों समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
नोट - उपरोक्त निर्णय माननीय उच्च न्यायालय ईलाहाबाद की बेवसाईट पर उपलब्ध है।
<u>Extract from Historical Judgment of Hon'ble High Court,</u>
<u>Allahabad</u>
Hon'ble Mr. Justice S.N. Srivastava, (in his judgment dated
30.8.2007 passed in writ petition No. 56447 of 2003 Shyamal Ranjan
Mukherjee Vs. Nirmal Ranjan Mukherjee & others) has been pleased to hold
that:
“Shrimadbhagwad Gita is a Dharmshastra not only for Hindu but for
all human beings. Message of Gita is relevant for all Religions of the world
and is not limited for any particular Religion”.
“Yatharth Geeta” by Swami Adgadanandji Maharaj, a great saint of
India,is Dharm and Dharmshastra for all, irrespective of their caste, creed,
race, religion, Dharm & community and is for all times and space.
N.B.:- The aforesaid decision is available on the Website:
http://www.allahabadhighcourt.in