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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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गीता मानव मात्र का धर्मशास्त्र है।
-महर्षि वेदव्यास
श्रीकृष्णकालीन महर्षि वेदव्यास से पूर्व कोई भी शास्त्र पुस्तक के रूप
में उपलब्ध नहीं था। श्रुतज्ञान की इस परम्परा को तोड़ते हुए उन्होंने चार वेद,
ब्रह्मसूत्र, महाभारत, भागवत एवं गीता-जैसे ग्रन्थों में पूर्वसंचित भौतिक एवं
आध्यात्मिक ज्ञानराशि को संकलित कर अन्त में स्वयं ही निर्णय दिया कि-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।
( म.भा., भीष्मपर्व अ० ४३/१ )
गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो
पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से निःसृत वाणी है; फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की
क्या आवश्यकता? मानव-सृष्टि के आदि में भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से
निःसृत अविनाशी योग अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता, जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद
और उपनिषद् हैं, विस्मृति आ जाने पर उसी आदिशास्त्र को भगवान श्रीकृष्ण
ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया, जिसकी यथावत् व्याख्या 'यथार्थ
गीता' है।
'गीता' का सारांश इस श्लोक से प्रकट होता है-
एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम्
एको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।
-( गीता-माहात्म्य )
अर्थात् एक ही शास्त्र है जो देवकीपुत्र भगवान ने श्रीमुख से गायन
किया- गीता! एक ही प्राप्त करने योग्य देव है। उस गायन में जो सत्य
बताया- आत्मा! सिवाय आत्मा के कुछ भी शाश्वत नहीं है। उस गायन में उन