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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 421 में से

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पृष्ठ 347

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष ऽ आ पदे गोः.
यदा ते मर्तो अनु भोगमानडादिद् ग्रसिष्ठ ऽ ओषधीर्जीगः.. (१८)
हे हवि रूपी वायु! हम यहां आप के यज्ञ करने की इच्छा वाले उत्तम रूप को
देखते हैं. आप गो मंडल में जाते हैं. जब आप के लिए हवि का भोग लगाया जाता
है तब आप उसे और ओषध रूप हवि को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (१८)
अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोन्व भगः कनीनाम्.
अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते.. (१९)
हे अर्वन् देव! हमारे रथ आप का अनुकरण करते हैं. हम आप का अनुकरण
करते हैं. हमारी गाएं व हमारी कन्याओं के भाग्य आप का अनुकरण करते हैं. हमारे
व्रत आप का अनुकरण करते हैं. हम ने आप की मित्रता पाई. देवताओं ने आप के
पराक्रम का वर्णन किया है. (१९)
हिरण्यशृङ्गोऽयो अस्य पादा मनोजवा ऽ अवर ऽ इन्द्र ऽ आसीत्.
देवा ऽ इदस्य हविरद्यमायन् यो अर्वन्तं प्रथमो अध्यतिष्ठत्.. (२०)
हे अर्वन्! यह घोड़ा सोने के सींगों वाला है. इस के पैर लोहे के हैं. इस की गति
मन जैसी तीव्र है. देवताओं ने इसे हवि के रूप में ग्रहण किया. इंद्र देव सब से पहले
इस घोड़े पर बैठे हुए. (२०)
ईर्मांन्तासः सिलिकमध्यमासः स ष्ठ् शूरणासो दिव्यासो अत्याः.
ह ष्ठ् सा ऽ इव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वाः.. (२१)
अश्व पतले मध्यभाग (कमर) वाले, बलवान, पुष्ट जांघों व वक्षस्थल वाले
हैं. वे दिव्य और हंसों की तरह एक पांत में चलते हैं. ये घोड़े स्वर्ग में स्वर्गिक आनंद
(दिव्यता) पाते हैं. (२१)
तव शरीरं पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तं वात ऽ इव ध्रजीमान्.
तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति.. (२२)
हे अर्वन्! आप का शरीर ऊपर की ओर जाने वाला है. चित्त वायु जैसा गतिशील
है. आप की पताकाएं जंगलों में दावानल के रूप में विचर रही हैं. (२२)
उप प्रागाच्छसनं वाज्यर्वा देवद्रीचा मनसा दीध्यानः.
अजः पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्कवयो यन्ति रेभाः.. (२३)
हे अर्वन्! हवि गतिशील है. मन की तरह तेजी से ऊपर की ओर जाती है. इस
का धुआं आगे की ओर ले जाया जाता है. नाभि इस का अनुकरण करती है.
पीछेपीछे पाठ करते हुए कविगण चलते हैं. (२३)
यजुर्वेद - ३४७