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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 141

४० स्पन्दकारिका
अन्यत्र भी कहा गया है—
'लिखते जगतित्रतयचित्रमद्भुत
प्रतिभापरिस्फुरितशंंसिते नमः ।
सुसितैकसूक्ष्मनिजशक्तिवर्तिका,
रचितावभासशतशोभि शंभवे ॥'
'शक्तीनां चक्रम्' = वह परमेश्वर से स्वरूप में अभिन्न 'शक्ति'—'इदम्' के
परामर्शभेद से उत्पन्न नाना नाम रूप भेदों से अवभासमाना होने पर ही है तो एक, किन्तु
बहुत्व में व्यक्त होने के कारण बहुरूपात्मिका होने से 'शक्तीनां चक्रम्' कही गई है ।
'शक्ति' शब्द भावाभिव्यक्ति के समय परमेश्वर से भिन्न दिखाई पड़ती हुई भी
उनसे अभिन्न है—यही अभेदाभाव प्रतिपादन ग्रन्थकार का प्रयोजन है । यही ईश्वर का
विभव है और उसी से ईश्वर वैभवशील कहलाता है । पारमेश्वर में भी कहा गया है—
'शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते ।
शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांश्च महेश्वरः ॥'
'विभवप्रभव'—इस प्रकार स्वशक्ति भूतविभव का 'प्रभव' (उत्पत्ति का कारण),
न कि स्वरूप व्यतिरिक्त एवं अन्य स्थल से प्राप्त वैभव का प्रभव ।
'यस्य'—जिस जगत्कारण रूप शङ्कर का । शङ्कर का—स्वशक्तिचक्रात्मक
ऐश्वर्यभूत जगत् का प्रभव ॥
उन्मेष एवं निमेष का कार्य क्या है? उद्भव एवं विनाश—
'उन्मेषे क्रियाशक्ति प्रतिसंहारात् स्वरूपविकासे जगतः प्रलयो विनाशः, निमेषे
प्रसृतक्रियाशक्तित्वात् स्वरूप संकोचरूपे जगतः उदय उद्भवः ।'
शक्तिचक्र का ऐश्वर्य—शक्तियों के समूह की विभूतियाँ—
'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य । उत्पत्तिहेतुत्वम्'
'विज्ञानदेहो' = विशुद्ध संविन्मात्रमूर्ति महेश्वर ।
'विज्ञानदेहात्मक' = विशुद्धसंविन्मात्र वह महेश्वर जिसका स्वस्वभाव आत्मा
हो वहः ॥ 'आत्मा' = स्वभाव ॥ विज्ञानदेह महेश्वर केवल आत्मा ही है अन्य नहीं है ।
'स च आत्मैव नान्यः ।' 'यस्य' = जिसके । किसके ? विज्ञानदेहात्मकस्य
शक्तिचक्रैश्वर्यस्य'—के स्वभाव वाले शङ्कर के । ('यस्य' शब्द इसी भाव का द्योतक
है) क्योंकि इन पचासों कारिकाओं में प्रपंचित अर्थ की पर्यालोचना से यही शिव-
स्वभाव द्योतित होता है ।
वृत्तिकार ने भी यही कहा है—'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' ।
'स्वस्य'= आत्मा का । 'स्व' = आत्मीयभाव यथा स्वरूप अर्थात् स्वस्वभाव ।
प्रथम श्लोक का यही तात्पर्यार्थ है 'परमेश्वरः इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ विदधाति,
लब्धस्थितिकमपि जगत् तच्छक्तिविभूतिरेकैव मायावशात् तु नानात्वेन अवभासते ॥'