सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextअधौली बहुलीहवासनमथो घण्टावसन्नौलिका
ये कुर्वन्ति च कारयन्ति च सदा भ्राम्यन्ति खिद्यन्ति ते । ८६ ।
योगशास्त्र में निरूपित तथा आचार्यद्वारा निर्दिष्ट ज्ञान के बल से जो
पहले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की पाँच धारणाओं में आकाशधारणा,
पराकाशधारणा और महाकाश-धारणा तथा तत्वाकाश ( सम्पूर्ण पाँच तत्वों की )
धारणा पूरी कर ध्येय ( आत्मस्वरूप परम लक्ष्य ) में दृष्टि स्थिर करते हैं तथा
षट्कर्म—अधौली ( धौति ), वासन ( वस्ति ) नेति, नौलि, कपालभाति तथा
त्राटक आदि करते और दूसरों से भी इनका अभ्यास कराते हैं, वे भी सत्स्वरूप
निरुत्थान की प्राप्ति से वंचित रह कर भ्रमित और खिन्न रहते हैं ।। ८६ ।।
शङ्खक्षालनमन्तरं रसनया ताल्वोष्ठनासारसं
वान्तेरुल्लुठनं कपाटममरीपानं तथा खर्परी ।
वीर्यद्रावितमात्मजं पुनरहो ग्रासं प्रलेपश्च वा
ये कुर्वन्ति जडास्तु ते नहि फलं तेषां तु सिद्धान्तजम् । ८७ ।
शंखनाड़ी का शोधन कर रसना से तालु, ओष्ठ और नासारस को निकाल
कर इस तरह भीतर के समस्त चक्रों का शोधन करने के उपरान्त, कपाट मुद्रा-
भेदन के अभ्यास में तत्पर होकर खर्पर धारण कर अमरीपान करनेवाले तथा
उसका शरीर में लेप कर स्फूर्ति प्राप्त करनेवाले जड़बुद्धि भी इस तरह स्थित
रहकर सामरस्यरूप परमात्मपद की प्राप्ति से वंचित रहते हैं ।। ८७ ।।
घण्टाकोहलकालमार्दुलमहाभेरीनिनादं यदा
सम्यङ्नादमनाहतध्वनिमयं शृण्वन्ति चैतादृशम् ।
पिण्ड सर्वगतं निरन्तरतया ब्रह्माण्डमध्येऽपि वा
तेषां सिद्धपदं ततः समुचितं नैवं परं लभ्यते । ८८ ।
जो प्राणायाम की सिद्धि कर प्राण, बिन्दु और मन को ऊर्ध्वगामी कर
शिवशक्ति के साक्षात्कार के लिये उनका पारस्परिक लय सम्पादित कर व्यष्टि
पिण्ड और ब्रह्माण्ड में निरन्तर घण्टा, कोहल, कांस्य, ढोल, महाभेरी के अनाहत
१६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति